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शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

सावधान, सावधान, सावधान ---------- ललित शर्मा

जिबीमारी का ईलाज नहीं, उसकी हजारों दवाएं हैं। लाईलाज बीमारियाँ लोगों को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करती हैं। ऐलोपैथी के प्रति अभी तक ग्रामीण अंचल में पूरी तरह लोगों को विश्वास नहीं है। थोड़ी सी भी सर्दी जुकाम या हरारत होने पर देव स्थान में जाकर बैगा से झाड़ फ़ूंक करवा लेते हैं। जिससे उन्हे लगता है कि स्वस्थ हो जाएगें।  मुफ़्त की सलाह देने वाले बहुत मिल जाएगें, साथ ही दवाई देने वाले बैगा-गुनिया एवं नीम-हकीम का पता बताना भी नहीं भूलते। जब इंसान ऐलोपैथी से हार जाता है तब वैकल्पिक चिकित्सा बैगा-गुनिया तथा झाड़ फ़ूंक का सहारा लेता है। बस इसी समय का फ़ायदा उठाने के लिए बैगा-गुनिया और झाड़-फ़ूकिया मुस्तैद रहते हैं। आया हुआ मुर्गा हाथ से नहीं जाने देते। दुनिया चाँद से होकर मंगल पर पहुंच रही है, पर समाज अंधविश्वास के शिकंजे से बाहर नहीं निकला है। इसकी जड़े बहुत गहरी हैं। लाख जागरुकता  अभियान सरकार और सामाजिक संस्थाएं करें, पर लोग रुढियों की जंजीरे नहीं तोड़ना चाहते। बीमार होने की अवस्था में चमत्कार की आस लगाए दर-दर पर माथा घिसते-फ़िरते हैं और अंधविश्वास के कारण जान से हाथ गंवाते हैं। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो चुकता है। पीछे बचते हैं रोते-धोते परिजन। नीम-हकीमों पर कोई प्रशासनिक कार्यवाही न होने से इनका धंधा बदस्तूर जारी रहता है। 
5 जुलाई 2012 नई दुनिया

हमारे पड़ोसी मित्र को को किसी ने बताया कि मुझे डायबीटिज हो गयी है। तो वे संध्या काल में मेरे पास आए। वो भी डायबीटिज के शिकार हैं। इस राज रोग के अपने अनुभव बताने लगे। साथ जो दवाईयाँ ले रहे थे उसके बारे में भी जानकारी देने लगे, मैं सुनता रहा। नीम, मेथी, जामुन, गुड़मार इत्यादि मिश्रित नुश्खा भी बताया। अपोलो के डॉक्टर मित्र ने मुझे कहा था कि डायबीटिज के रोग में आप जिस पैथी से ईलाज कराते हैं उसे कभी बंद मत करना। अधिंकाश मरीज बार-बार चिकित्सा पद्धति एवं दवाई बदलने के चक्कर में जान गंवा बैठते हैं और कोई चिकित्सा पद्धति पूर्णत: कारगर सिद्ध होकर सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाती। मैने डॉक्टर का मंत्र गाँठ बांध लिया तथा दवाईयों के साथ ही व्यायाम और 5-6 किलोमीटर की सैर जारी थी। एक दिन वही मित्र फ़िर आए और कहने लगे कि दुर्ग में एक ऐसा हकीम है जो एक बार दवाई देता है और खूब मीठा खाने कहता है। एक बार की दवाई से ही डायबीटिज का ईलाज हो जाता है। फ़लाना भी वहीं से दवाई लेकर आया है, उसके बताने पर मैं भी वहाँ गया था। आपको भी जाना चाहिए। वैसे भी मै किसी के दावे को बिना अपने परीक्षण के सही नहीं मानता और न ही इन नीम-हकीमों पर विश्वास करता। फ़िर भी सोचना पड़ा कि एक बार की दवाई लेने से अगर बीमारी ठीक हो जाती है तो रोज-रोज मंहगी चिकित्सा से मुक्ति मिलेगी। यह भी पता चल जाएगा कि दवाई के नाम पर वह वैद्य क्या खिला रहा है। यही सोच कर दवाई लेने दुर्ग जाने का मन बना लिया।

सुबह जल्दी तैयार होकर दुर्ग के लिए चल पड़ा। मुझे मित्र ने बताया था कि बस स्टैंड के पास मस्जिद के निकट जाकर हकीम का पता पूछ लेना, कोइ भी बता देगा। मैने रास्ते में चलते-चलते सोचा कि भिलाई से विश्वनाथन जी को भी साथ ले लिया जाए। जब मेरा ईलाज हकीम की दवाई से हो जाएगा तो वे भी ईलाज से क्यों वंचित रहें? एक से भले दो। रास्ते से ही उन्हे फ़ोन कर दिया कि वे तैयार रहें। भिलाई से हम दोनो साथ ही दुर्ग चले, वहाँ जाकर हकीम का पता पूछा। लोगों ने ठिकाना बता दिया। वहाँ पर हकीम मिले, बोले कि - शक्कर वाला एक लीटर दूध लाए हो? हमने कहा -  नहीं। तो बोले यहीं सामने मिलता है उस दुकान में, ले आओ। हम दोनो एक-एक लीटर शक्कर वाला दूध लेकर आए। उनके घर पर काफ़ी लोग थे। जो दवा लेने आए थे। पूछने पर पता चला कि बहुत दूर दूर से आए हैं। केरल से लेकर हरियाणा तक के मरीज मिले। इससे अंदाजा लगा कि डायबीटिज के ईलाज के लिए यह भारत में प्रसिद्ध हो चुके हैं। हकीम ने धमेले (बड़ा बर्तन) में रखी दवाई की दो मुट्ठी दूध में डाली और पी जाने कहा। एक लीटर दूध, वो भी गर्म और खाली पेट पीना बड़ा कष्ट दायी लगा। दूध को पीने पर उसमें मुझे चिरपरिचित गंध एवं स्वाद आया। दवाई को जानने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ गयी। मेरे पूछने पर हकीम ने अपना गुप्त फ़ार्मुला नहीं बताया, लेकिन मैं जान गया। सामने ही दान पेटी रखी थी, हमसे 200-200 रुपए उसमें डालने कहे और वहां पर जिस लड़की ने पानी लाकर दिया था उसे 50-50 रुपए दिलाए। साथ ही बताया कि हम अब जी भर मीठा खा सकते हैं। सिर्फ़ ईमली और बैंगन का परहेज करना पड़ेगा। अन्यथा दवाई काम नहीं करेगी। हम ईलाज करा कर खुशी-खुशी घर आ गए।

घर आने पर साथ में ऐलोपैथी दवाई चलती रही। कुछ दिनों के बाद हाथ की उंगलियाँ सुन्न रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया, शुगर लेवल चेक करने पर 478 निकला, डॉक्टर ने एक टेबलेट की जगह तीन टेबलेट लिख दी। हकीम के ईलाज का दुष्परिणाम सामने था। समय पर चिकित्सा मिलने पर किसी बड़े नुकसान से बच गया। कुछ दिनों के बाद गोरखपुर से एक मित्र ने फ़ोन करके इस हकीम के विषय में जानकारी ली। राउरकेला से फ़ोन पर एक परिजन ने पूछा। भारत से कई जगहों से फ़ोन आए। हकीम का इतना वाचिक प्रचार हो गया था कि लोग दूर-दूर से आकर ईलाज कराना चाहते थे। मैने उनको हकीकत बताई, लेकिन लोग मानते कहाँ है? कुछ लोग आखिर आकर ही गए और भुगते भी। कुछ दिनों के बाद हकीम की दवाई के कारण बाहर से आए एक व्यक्ति की दुर्ग में ही तबियत खराब हो गयी। जिसे जान बचाने के लिए भिलाई के सेक्टर-9 दाखिल होना पड़ा। फ़िर सुनने में आया कि हकीम की दवाई से शुगर लेवल बढने के कारण किसी की जान चली गयी। जब यह खबर अखबारों में आई तो प्रशासनिक अमला जागा और जवाहर चौक दुर्ग जामा मस्जिद बाड़ा में रहने वाले शेख इस्माईल वल्द स्व: शेख बहादूर 70 वर्ष के विरुद्ध 5-7 चमत्कारिक उपचार अधिनियम 1954 के अधीन मामला दर्ज किया। उसके पास औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम 1940 के तहत दवाई बनाने की अनुज्ञा भी नहीं थी। दवाई को परीक्षण के लिए प्रयोग शाला भेजा। जिसकी रिपोर्ट का पता नहीं चला। यह घटना 3 जनवरी 2012 की है। मामला कलेक्टर के पास कार्यवाही के लिए 5 माह से लंबित है।

4 जनवरी 2012
अपराध दर्ज होने के बाद भी हकीम का दवाई देना निर्बाध जारी है। इसके दुष्परिणाम स्वरुप एक व्यक्ति की जान और चली गयी। अनुपपुर मध्यप्रदेश के रामप्रसाद यादव पिता लाभसिह यादव 25 वर्ष की मंगलवार 3 जुलाई 12 को दवाई पीने के बाद रात को तबियत बिगड़ गयी। उसे जिला चिकित्सालय में भर्ती गया, जहां उपचार के दौरान बुधवार को उसकी मृत्यु हो गयी। दुर्ग पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया। अंधविश्वास ने एक युवक की जान ले ली। शेख इस्माईल द्वारा शुगर की दवाई दी जा रही है। कई मौते होने के बाद भी प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की। न ही लोगों तक दवाई से होने वाली मौतों की सूचना पहुंची। मैने अनुभव किया कि - यहाँ शक्कर वाला दूध पीने से मरीज की शुगर खतरनाक स्तर तक पहुच जाती है। जिसका दुष्परिणाम उसे भोगना पड़ता है। दवाई के सेवन के बाद मुझे नीम की गुठली, मेथी, जामुन की गुठली का स्वाद आया। नीम के तेल की खुश्बू और मेथी का लसलसापन कोई भी जान सकता है। शुगर के मरीजों में भ्रम है कि कड़ूवा खाने पर खून में मीठे का स्तर कम हो जाता है। इसलिए कहीं भी किसी अनजान नीम-हकीम की दवा खाने से पहले सौ बार सोचें, तब निर्णय लें। नीम-हकीम खतरे जान से जहाँ तक संभव हो बचें।  अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें, अन्यथा शुगर बढने से प्राण गंवाना पड़ेगा। 

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

"माल प्रैक्टिस" का जमाना ------- ललित शर्मा

कहावत है कि अस्पताल, थाना, कचहरी व्यक्ति अपनी खुशी से नहीं जाता। मजबूरी में ही जाना पड़ता है। व्यक्ति को जीवन में चिकित्सकों से पाला पड़ता ही है, शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा मिले जिसे डॉक्टर के पास न जाना पड़ा हो,चिकित्सा को विश्वास का पेशा माना गया है और चिकित्सक को भगवान। मरीज अपने प्राण चिकित्सक के हाथ में सहर्ष सौंप देता है। समाज में यह पेशा प्रतिष्ठा का माना जाता है, अगर हम किसी भी व्यक्ति से पूछे तो सबसे पहले वह अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना चाहता है। उसके पश्चात अन्य पेशे के विषय में सोचता है। पहले और वर्तमान के चिकित्सकों की कार्य प्रणाली में अत्यधिक बदलाव देखा जा रहा है।

पहले डॉक्टरी के पेशे को सेवा भाव के से किया जाता था, डॉक्टरों का कार्य मरीज की सेवा सुश्रुषा करके स्वास्थ्य प्रदान करना था। वर्तमान में चिकित्सा का पेशा व्यावसायिकता की पराकाष्ठा पर पहुंच चुका हैं। इनकी कारगुजारियाँ और स्थिति यह है कि अब मरीज मजबूरी में ही इनके पास जाना चाहता है तथा एक बार किसी नर्सिंग होम या अस्पताल में भर्ती हुए तो समझ लो सारा बैंक बैलेंस खत्म। ॠण लेकर ही इनकी जेब भरनी पड़ेगी। ऐसा नहीं है कि मैं सभी चिकित्सक समाज को एक तुला पर ही तौल रहा हूँ, कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो पूर्वजों से मिले उत्तम संस्कार के द्वारा मानवीय मूल्यों को समझ कर पेशे की पवित्रता कायम रखे हुए हैं।

एक डॉक्टर मित्र से इस विषय पर चर्चा हो रही थी, तो उन्होने कहा कि अब डॉक्टर "माल प्रैक्टिस" पर उतर आए हैं। इनसे ही मुझे प्रैक्टिस के नए तरीके के विषय में पता चला। साथ ही "माल प्रैक्टिस" क्या होती है, इस विषय में भी। मानवता को दरकिनार कर लूटने में लगे हुए हैं। एक मित्र ने बताया कि उनकी पत्नी को बच्चा होने वाला था, नर्सिंग होम लेकर गए, वहाँ डॉक्टर ने सभी पैथालाजिकल, सोनोग्राफ़ी एवं अन्य टेस्ट कराए। उसके पश्चात पेशेंट को अकेले में समझाया गया की पेट में बच्चे ने गंदा पानी पी लिया है और पॉटी कर सकता है, जिससे जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा है। इसलिए सिजेरियन आपरेशन तुरंत करना पड़ेगा। 20,000 रुपए जमा करवा दीजिए। मित्र ने रुपए जमा कराए और ऑपरेशन के फ़ार्म पर हस्ताक्षर कर दिए। थोड़ी देर बाद बिना ऑपरेशन के ही उनकी पत्नी ने बच्चे को जन्म दे दिया। जच्चा-बच्चा दोनो स्वस्थ्य थे। ईश्वर ने डॉक्टर के षड़यंत्र को विफ़ल कर दिया।

वर्तमान में अतिरिक्त कमाई के लालच में 90% जच्चाओं के सिजेरियन ऑपरेशन कर दिए जाते हैं,"माल प्रैक्टिस" जोरों पर है। बच्चे के जन्म लेने के तीसरे-चौथे दिन उसकी त्वचा हल्की पीली दिखाई देती है। तब उसे तुरंत पीलिया बता कर नीले प्रकाश में रख दिया है। जहाँ 1000 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक प्रतिदिन का चार्ज वसूला जाता है। जच्चा और बच्चा दोनो से "माल पैक्टिस" चालु है। "माल प्रैक्टिस" करने वाले डॉक्टरों ने चिकित्सा जैसे पावन पेशे को बदनाम कर दिया। अस्पताल जाने के नाम पर जेब और रुह दोनो काँप जाती है। प्राण बचे न बचे पर अस्पताल का चार्ज ले ही लिया जाता है। किडनी एवं शरीर के अन्य अंग चोरी से निकालने के समाचार मिलते ही रहते हैं।

सिजेरियन ऑपरेशन के बाद अब महिलाओं की बच्चे दानी निकालने का काम जोरों पर चल रहा है। किसी महिला को कमर के नीचे थोड़ा सा भी दर्द हुआ तो समझ लो बच्चे दानी निकलवाने की सलाह डॉक्टर तुरंत दे देते हैं। 25-30 साल की महिलाओं की बच्चे दानी बेधड़क निकाली जा रही है। भले ही फ़िर उस महिला को जीवन भर भुगतना पड़े। गर्भाशय निकालने के इस दुष्कृत्य में ग्रामीण स्वास्थ्य रक्षकों के रुप में तैनात "मितानिन" मुख्य तौर पर सम्मिलित हैं। निजी नर्सिंग होम संचालकों ने इन्हे मोबाईल बांट रखे हैं, साथ ही गर्भाशय आपरेशन के प्रत्येक मरीज पर 1000 से 2000 रुपए का का कमीशन तय है। कुछ दिनों पूर्व समाचार था कि मृत शरीर को वेंटिलेटर पर रख कर हजारों रुपए वसूल लिए गए। डॉक्टर का कहना था कि मशीनों का चार्ज तो लेना ही पड़ेगा। मरीज चाहे बचे या न बचे। इस पेशे से संवेदनाएं समाप्त होती जा रही हैं। गरीब आदमी का तो मरण ही है। सरकार ने चिकित्सा बीमा योजना शुरु की है इसमें भी ये घोटाला करने से बाज नहीं आ रहे। मरीज के चिकित्सा बीमा की राशि को ध्यान में रख कर बिल बनाया जाता है। एक ही झटके में उसका सारा बीमा बैलेंस खाली कर दिया जाता है।

सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा नागरिकों को भी जागरुक होने की आवश्यकता है। अगर मरीज को उपभोक्ता के तौर पर देखा जा रहा है तो इन डॉक्टरों से दुकानदार जैसा ही व्यवहार होना चाहिए तथा सजा निश्चित की जानी चाहिए। चिकित्सकीय लापरवाही से हुई मौत पर हत्या का अपराध दर्ज होना चाहिए। लापरवाही के कारण कभी किसी के पेट में कैंची, गॉज बैंडेज या तौलिया छोड़ने जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी। इनकी लापरवाही की सजा तो मरीज को ही भुगतनी पड़ती है।