शनिवार, 28 जुलाई 2012

गड़ा खजाना मिला मुझे ------------------- ललित शर्मा

मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
रती के कोने-कोने में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं,छत्तीसगढ भी इससे अछूता नहीं है। यहां पग-पग पर पुरावशेष मिल जाते हैं। धरती की कोख में खजाने गड़े हुए हैं, हम यह किस्से कहानियों में सुनते आए हैं। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजाओं के खजाने सुरक्षित रखने की दृष्टि से धरती में या गिरि कंदराओं में छिपाए जाते थे। पृथ्वी में गड़े पुरावशेष भी किसी गड़े हुए खजाने से कम नहीं है। जब यह खजाना बाहर आता है तो अपने काल के सारे किस्से उगल देते हैं।

चौरस मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
ऐसा ही एक पुरातात्विक खजाना उगलने को तैयार है 21N05 81E46 अक्षांश-देशांश पर जिला रायपुर छत्तीसगढ के अभनपुर जनपद एवं नगर पंचायत का राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर बसा हुआ ग्राम बड़े उरला। इस गांव को लगभग200-250 वर्ष पूर्व बोधवा गौंटिया द्वारा बसाया था। इनके परिवार के 40-45 घर अभी भी यहाँ निवास करते हैं। इनके वंशज 60 वर्षिय हृदय लाल गिलहरे (गुरुजी) सेवानिवृत व्याख्याता है। ग्रामाधारित विषयों पर हमेशा इनसे चर्चा होते रहती है। उन्होने बताया कि उरला गाँव कुल रकबा (छोटे उरला एवं बड़े उरला) 1800 एकड़ का है। इनके पूर्वजों ने गाँव में ईशान कोण में दर्री तालब एवं पूर्व में बंधवा तालाब बनवाया था।


हृदयलाल गिलहरे(गुरुजी) पार्श्व में ठाकुर देव

शासकों द्वारा सुरक्षा की दृष्टि से बनाए जाने वाले दुर्गों (किलों) में गिरि दुर्ग, जल दुर्ग एवं धूलि दुर्ग (मडफ़ोर्ट) प्रमुख हैं। 26 जुलाई 2012 को गुरुजी से हसदा के मडफ़ोर्ट के विषय में चर्चा हो रही थी, तो वे मुझे गाँव के पूर्व में स्थित डीह (टीला) दिखाने ले आए। शाम के समय मैंने यहाँ की संरचना देखी। देखते ही अहसास हो गया कि यह एक मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) है। मुझे गांव की पूर्व दिशा में मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) के अवशेष के साथ पुरातात्विक प्रमाणो की जानकारी मिली। इस स्थान पर मैं बचपन से जाता रहा हूँ। यहाँ पर सैकड़ों साल पुराना विशाल पीपल का वृक्ष हुआ करता था।

डीह पर स्थापित ठाकुर देव
जिसकी गोलाई लगभग 30 फ़ुट रही होगी। गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि यह वृक्ष कितना पुराना है यह किसी को नहीं पता। इस स्थान को देखने पर पता चलता है कि यहां चारों तरफ़ लगभग 15 फ़ुट चौड़ी एवं 20 फ़ुट गहरी खाई है। इस मडफ़ोर्ट के पूर्व एवं पश्चिम के द्वार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उत्तर-दक्षिण के द्वार गुगल इमेज से दिखाई देते हैं। ऊंचाई पर स्थित होने के कारण ग्रामवासी इसे "डीह" ( टीला या ऊंचा स्थान) कहते हैं। डीह के आग्नेय कोण में पीपल के वृक्ष के नीचे सर्वमान्य प्रमुख ग्राम देवता ठाकुर देव का स्थान है। यहाँ सदियों से किसान अक्ति (अक्षय तृतीया) को दोना में धान चढाते हैं और पूजा अर्चना करके खेती-किसानी की शुरुआत करते हैं।

पूर्व दिशा में मड फ़ोर्ट की खाई
डीह की पूर्व दिशा में किसान के खेत में एक गड्ढा है जिसमें बरसात होने के कारण पानी भरा हुआ है। गुरुजी कहते हैं कि यह सुरंग हैं, जब कोई सगा मेहमान गाँव में आता था उनके दादा उसे यह सुरंग दिखाने के लिए लाते थे। सुरंग के पास लेट्राईट में खोदे हुए 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे हैं। ऐसे ही गड्ढे बावड़ी के पास भी बने हुए हैं। सुरंग से लगभग 700 फ़ुट की दूरी पर एक 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी है। जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है। बड़े उरला के प्रवेश में 1942 में गिरधारी कहार (तत्कालीन गौंटिया) द्वारा बनाया गया पंचमुखी शिवालय भी है। गाँव के ईशान कोण में दर्री तालाब के किनारे शीतला मंदिर है और डीह के ईशान कोण में सतबहनिया देवी है। डीह के पश्चिम एवं गांव के पूर्व में सांहड़ा देव है। डीह के पूर्व में भैंसासुर है। किसानों के आधिपत्य में होने के कारण डीह की मिट्टी खुदाई कर किसान अपने खेतों में डालते थे। यहाँ की मिट्टी उपजाऊ होने के कारण खेतों में दो-तीन वर्ष तक गोबर खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती। उपजाऊ भूरी मिट्टी होने के कारण किसानों ने डीह के आधे हिस्से की खुदाई करके अपने खेतों में पहुचा डाली। बताते हैं कि डीह को खोदने पर मानवोपयोगी घर-गृहस्थी के उपकरण प्राप्त होते हैं। जिनमें मिट्टी के पके लाल बर्तन, दीया, खाना पकाने के बर्तन, धान कूटने का मूसल, मसाला पीसने का सिल-लोढा इत्यादि प्राप्त हुए हैं।

सुरंग का मुहाना और पार्श्व में डीह
मडफ़ोर्ट के पूर्वी द्वार से लगभग 150 मीटर पर स्थित सुरंग का उपयोग सुरक्षा के लिए किया जाता रहा होगा। सुरंग का एक ही मुहाना दिखाई देता है। दुसरा मुहाना कहाँ पर है और कहाँ तक जाता है इसका कोई पता नहीं। डीह के आसपास की मिट्टी से बाहर निकले हुए कठोर लेट्राईट पत्थर दिखाई देते हैं तथा सुरंग भी लेट्राईट में खोद कर बनाई गयी है। अगर सुरंग की सफ़ाई की जाए तो पता चल सकता है कि इसका दूसरा मुहाना कहाँ पर है। या फ़िर यह सुरंग न होकर कोई खोह होगी जिसमें युद्ध के समय या आपातकाल में गढीदार या सैनिक छिपते रहे होगें। 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे सैनिकों के छिपने के लिए बनाए गए होगें। इन गड्ढों को तीन फ़ुट की तश्तरीनुमा प्लेट से ढका जा सकता है। इसके भीतर आराम से बैठकर एक व्यक्ति तीर इत्यादि जैसे अस्त्र चला सकता है। युद्ध की स्थिति में आस-पास का सघन वन भी सैनिकों के छिपने में सहायक होता होगा। उपर्युक्त संरचनाओं को देखने से प्रतीत होता है कि यह व्यवस्था सामरिक उपयोग को ध्यान में रख कर की गयी होगी।

कोल्हान नाला का उद्गम
यहाँ का निवासी होने के कारण इलाके की भौगौलिक स्थिति से मैं पूरी तरह परिचित हूँ। बड़े उरला में मात्र 3 तालाब हैं जिसमें बंधवा तरिया, दर्री तरिया का निर्माण बोधवा गौंटिया के परिजनों द्वारा एवं बोईर तरिया का निर्माण राहत कार्य के दौरान हुआ है। यहाँ मडफ़ोर्ट में रहने वालों के लिए पानी की क्या व्यवस्था रही होगी? क्योंकि जहाँ निस्तारी के लिए पानी का साधन न हो वहाँ कोई निवास नहीं करता। यह विचार करने पर मडफ़ोर्ट के पूर्व में स्थित कोल्हान नाला याद आता है। यहाँ से कोल्हान नाला एक फ़र्लांग ही होगा। बेलडीह, गिरोला, अभनपुर, नायकबांधा, बड़े उरला का बरसात का पानी एकत्र होकर नाले का निर्माण करता है। यह नाला खरोरा के पास जाकर छोटी नदी का रुप धारण कर लेता है। इसका पाट काफ़ी चौड़ा हो जाता है। अनुमान है कि कोल्हान नाला समीप होने के कारण यहां के निवासियों को निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध होता रहा होगा। सुरंग के समीप मिलने वाले 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे झरिया के काम आते होगें। साथ ही 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी भी निस्तारी के लिए मिलने वाले जल का प्रमाण है। कोल्हान नाला गिरोला और बड़े उरला के बीच से प्रवाहित होता है। वर्तमान में नाले पर किसानों नें अतिक्रमण करके खेत बना लिए गए हैं। नाला कहीं दिखाई नहीं देता। मैदानों का पानी खेतों के भीतर से ही प्रवाहित होता है।

खोजकर्ता ब्लॉ. ललित शर्मा पार्श्व में मडफ़ोर्ट का पूर्वी द्वार
बचपन में रामगोपाल साहू के साथ सायकिल पर इसी रास्ते से उसके गाँव गिरोला जाता था। उरला एवं गिरोला के बीच कई सौ एकड़ का भाटा (उंचाई लिए बंजर भूमि) पड़ता था। तब रामगोपाल बताता था कि उसके सियान कहते थे कि पहले उनका गाँव यहीं भाटा में बसता था। गाँव में दैवीय प्रकोप के कारण धूकी(वर्षा जनित बीमारी) से कई लोग मर गए, तब इस स्थान को छोड़कर कुछ ग्रामवासी एक किलोमीटर दूर उत्तर की तरफ़ छोटे उरला जाकर बस गए और कुछ पूर्व की ओर जाकर बस गए, उस बसाहटा को गिरोला नाम दिया। शायद बीमारी के थक हार कर गिरते पड़ते उस स्थान पर पहुंचने के कारण गाँव का नाम गिरोला प्रचलन में आया हो। जहाँ से ग्रामवासियों ने सपरिवार पलायन करके नया गाँव बसाया उस पुराने गाँव का नाम "बगबुड़ा" है। अभी यह गाँव राजस्व रिकार्ड में वीरान गाँव के नाम से दर्ज है। ऐसे वीरान गाँव छत्तीसगढ अंचल में बहुत हैं। गिरोला से लगा हुआ बड़ा तालाब है, जिससे ग्रामवासियों की निस्तारी होती है। वर्तमान में इस भाटा में नवभारत एक्सप्लोसिव कम्पनी की बारुद फ़ैक्टरी लगी हुई है। 

वन देवी कर्राबाघिन उरला एवं गातापार की सीमा में
गिरोला, बड़े उरला, बेलडीह के मैदानों में तेंदू पत्ता की भरमार है। ग्रामवासी बीड़ी बनाने के लिए गर्मी के दिनों में यहीं से तेंदू के पत्तों की तोड़ाई करते हैं। रायपुर-राजिम के  तीर्थ यात्रियों वाले पुराने रास्ते पर बड़े उरला से लगभग एक कोस पर वन देवी कर्राबाघिन का स्थान है तथा गांव के खार (खेतों) में भैंसासुर भी विराजमान है। भैंसासुर वन देवता है, त्यौहारों के विशेष अवसरों भैंसासुर का मान-दान किया जाता है। वनदेवी कर्राबाघिन वन के प्रवेश द्वार पर होती हैं। वन में प्रवेश करने के पूर्व उनकी पूजा अर्चना करके कुशलता की प्रार्थना की जाती है है। विशेष कर वीरान गाँव का "बगबुड़ा" नाम ध्यान आकृष्ट कराता है। बग=बाघ और बुड़ा=डूबना या दिखाई न देना। याने इतना सघन वन कि बाघ दिखाई न दे। साथ ही डीह पर खाद जैसी उपजाऊ मिट्टी का मिलने यह प्रतीत होता है कि यह स्थान वीरान होने पर यहाँ के वृक्ष सड़ कर कम्पोस्ट खाद में बदल गए। भैंसासुर, बगमुड़ा, वनदेवी कर्रा बाघिन, डीह से उपजाऊ मिट्टी का प्राप्त होना आदि सूत्रों को जोड़ने पर लगता है कि इस स्थान पर सैकड़ों वर्षों पूर्व सघन वन रहा होगा।

पश्चिम दिशा में मडफ़ोर्ट की खाई
बुजुर्ग ग्रामवासी बताते थे कि राष्ट्रीय राजमार्ग 30 बनने के पूर्व रायपुर से राजिम जाने वाले तीर्थ यात्री इस मार्ग से ही राजिम जाते थे तथा यह मार्ग राजिम से आगे जाने वाले यात्रियों के काम भी आता होगा। प्राचीन काल में शासक और श्रेष्ठिजन पथिकों के विश्राम एवं जल की आवश्यकता को देखते हुए मार्ग पर कुंए और सराय बनवाते थे। जहाँ यात्री जल ग्रहण कर अपनी प्यास बुझा सकें और आवश्यकता पडने पर कुछ देर विश्राम कर सकें। इस मार्ग पर कुंआ भी है जिसका अवशेष मात्र ही दिखाई देता है। इस मार्ग का सर्वे किया जाए तो अन्य स्थानों पर भी कुंए के अवशेष मिल सकते हैं, जिससे इस प्राचीन मार्ग की प्रमाणिकता सिद्ध होगी। अभी तक मैने जितने भी मडफ़ोर्ट देखे हैं वे सभी गोलाई लिए हुए हैं। बड़े उरला में प्राप्त मडफ़ोर्ट चौरस (स्क्वेयर) होना इसे विशिष्ट बनाता है, चौरस मडफ़ोर्ट मुझे पहली बार देखने मिला। इस मडफ़ोर्ट को किसने बनाया? इसमें कौन और किस काल में निवास करता था? किस राजा की यह गढी थी? इसका इतिहास क्या है? आदि प्रश्न मेरे जेहन में घुम रहे हैं। बड़े उरला के इस मडफ़ोर्ट के प्राप्त होने के बाद इन सब प्रश्नों के उत्तर ढूढना पुरातत्ववेत्ताओं एवं इतिहास के अध्येताओं का कार्य है। जिससे देश-दुनिया को यहाँ के इतिहास की जानकारी मिलेगी तथा इतिहास में नवीन कड़ियाँ जुड़ेगीं।

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राहुल सिंह जी
मनुष्य के जीवन में कब, क्या घट जाए उसका पता नजुमियों को भी नहीं रहता। कब जीवन की धारा किधर मुड़ जाए उसका पता ही नहीं चलता। यद्यपि शैक्षणिक दृष्टि से मेरा विषय पुरातत्व नहीं रहा, परन्तु इतिहास और पुरातत्व में मेरी गहन रुचि सदा से ही रही। पुरातात्विक स्थलों एवं प्राकृतिक स्थानों की घुमक्कड़ी करने एवं कुछ नया देखने और करने की लालसा सदैव बनी रहती है। जिस तरह चिंगारी को अग्नि बनाने का कार्य हवा करती है उसी तरह मेरी रुचि को परवान चढाने का कार्य राहुल सिंह जी ने किया। उनसे मिलने के पश्चात पुरातात्विक स्थलों के प्रति मेरी दृष्टि ही बदल गयी। देखने का अंदाज बदल गया। साथ ही नया कुछ जानने की जिज्ञासा सदा ही बनी रही। अप्रेल माह में मैने हसदपुर के मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) पर अपना प्रथम आलेख प्रस्तुत किया था। इसका श्रेय नि:संदेह राहुल सिंह जी के सानिध्य को जाता है।

42 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत बधाई ललित जी आपको इस खोज के लिए .....!!

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  2. इस धरती के गर्भ में पता नहीं कितने ऐतिहासिक महत्व के पुरातात्विक स्थल दबे है| आपके जैसे यायावरों का बहुत बहुत आभार और कोटि कोटि धन्यवाद कि वे इन्हें खोजकर लोगों के सामने ले आते है|

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  3. bahut khoob ... nirantartaa banaaye rakhen ... shubhakaamanaayen ... !!

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  4. badhai sath hi aagarah us sthan ki aap mujhe sai karayen aap nit nawin khoj men yun hi lage rahen .ishwar aapko lambi sewa ka awasar pradan karen .

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  5. रोचक जानकारी..
    दृष्टि हो तो आपके जैसी ..

    रूचि का काम तो फलदायक होता ही है ..

    ऊपर से उस क्षेत्र के विशेषज्ञ मिल जाएं तो क्‍या कहना ..
    प्रतिदिन इसी तरह कुछ न कुछ ढूंढकर हमारे सामने प्रस्‍तुत करते रहिए ..

    आपको बहुत शुभकामनाएं !!

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  6. यह अपना विषय नहीं है और मुझे आलेख पढ़ कर ऐसा भी कुछ प्रश्न मन में नहीं उभरा जो मैं व्यक्त कर सकूं
    फिर राहुल जी का वरद हस्त आपको प्राप्त है -सुब्रमन्यन साहब से और और दरियाफ्त कर लें

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  7. kya bat hai bhiya.....lajwab. waise urla mujhe bhi jana hai..tab ye sthan jaroor dekhna chahunga

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  8. वाह !!
    ई तो बड़ी अच्छी खबर सुनाई आपने...
    आते हैं देखने हम भी :)

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  9. गरिष्ट लेखन ,शाम को देखता हूँ

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  10. ललित जी आपकी यायावरी नें बहुत से रंग हम पाठको को दिखाये हैं। बहुत बारीकी से आपने जानकरियाँ, साक्ष्य तथा इतिहास को समेटा है साथ ही चित्रों नें आपके वर्णन जो जीवित कर दिया है। इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिये बधाई तथा आभार।

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  11. bahut achha sarkar ko protection ke liye aage baat badhaya jaa sakta hai aur ise bachane ki kosish karna chahiye.....

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  12. सजग दृष्टि का कमाल.

    आप से ब्‍लागरी सीखते हुए, आप कब पुरातत्‍व का पाठ पढ़ गए पता ही नहीं लगा.

    अच्‍छा किया कि हमारा चित्र आखीर में लगाया, वरना पूरी पोस्‍ट छूट जाती, हम वहीं अटक जाते.

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  13. अन्वेषी निगाहें आपकी | बहुत खूब |

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  14. बधाई. बड़े उरला को देखने की इच्छा हो रही है. आपने लिखा है वहां चारों तरफ खाई है. अभी बारिश के दिन हैं. ऊपर से पानी बहकर जब उस खाई में जाती होगी तो मिटटी कटती होगी. उन कटाओं का परीक्षण करें. कुछ पुरा अवशेष मिल सकते हैं, मिटटी में लिपटे हुए. मार्गदर्शन तो राहुल जी का मिल ही जाएगा.

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  15. बधाई नयी खोज के लिए !

    भाई राहुल सिंह का ट्रान्सफर दिल्ली नहीं हो सकता ??

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  16. चल गुरू चेपटी धर उहें डेरा डाल देथन फ़ेर चालू सुरता संसार के खोज

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  17. आपका उत्साह अच्छा लग रहा है। यह पोस्ट लिखने से वह औरों में भी संक्रमण करे और लोग अपने परिवेश को ब्लॉग पर प्रस्तुत कर सकें तो संतोष का विषय होगा।

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  18. भू अवशेषों के बारे में न ई खोज साथ ही बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि है ... और फोटोसाहित अच्छी जानकारी दी है ... इसे विकिपीडिया में डालने का प्रयास करें ... आभार

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  19. ललित जी ,
    आपकी यायावरी को प्रणाम. सच में अब तो आपके लेख पढकर मुझे ऐसा लगता है कि मैं खुद वहां घूम रहा हूँ. पहले तो बहुत घूमा हुआ हूँ अब थोडा बंद है . लेकिन एक बार आपके साथ किसी न किसी स्थान पर जरुर जाऊँगा.

    धन्यवाद.
    विजय

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  20. इस खोज के लिए आपको बहुत बहुत बधाई ललित जी
    लगता है आप पुरातत्त्ववेता बन गये

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  21. यायावर जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए हार्दिक शुभकामनायें...इसका पूरा श्रेय आपकी जिज्ञासु दृष्टी और राहुल सिंह जी के अनुभवी साथ को जाता है... सचमुच खजाना मिला है आपको...

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  22. बहुत बहुत बधाई ललित भाई ।

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  23. ललित जी, इस खोज के लिए बहुत बहुत बधाई आपको ....

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  24. एक नयी खोज ....अनुभवी व्यक्ति द्वारा....

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  25. राहुल जी की संगती का कुछ अच्छा फल तों परिणाम रूप में आना ही था , बेहतरीन खबर, भविष्य में फिर से ऐसी ही उम्मीद रहेगी

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  26. विस्तृत जानकारी... आप ने सच कहा छत्तीसगढ़ पुरावशेषों का पिटारा ही है...
    बड़े उरला जाने की इच्छा होने लगी...
    सादर।

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  27. कल 29/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  28. हां, मुझे याद है, आपने हसदपुर वाला शोधपत्र किसी राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा था! आपकी उपलब्धियों को देखकर खुशी होती है! आप यूंही नित नई खोज करें! सफलतायें सदा आपके साथ रहें! शुभकामनायें!

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  29. अपने आस पास इतने ध्यान से पुरातत्व विभाग का काम आसान करते हुए खोज कर रहे हैं . यह अत्यंत सराहनीय है .

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  30. इस अद्भुत और नायाब खोज के लिए आपको सलाम ...!

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  31. ललित जी,
    आप तो गजब करतें हैं जी, "क्रांतिरथ छत्तीसगढ़" के अगले अंक में आपकी यह पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ. राहुल सिंह जी के सानिध्य ने आपको पुरातत्वेत्ता बना दिया है इसमें कोई संदेह नहीं है. एक दिन छत्तीसगढ़ का नाम आप और राहुल जी रौशन करेंगे इसका मुझे पूर्ण विश्वास है. बधाई एवं शुभकामनाएं .

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  32. नई रूचि... नई खोज
    उल्लेखनीय आलेख
    बधाई शुभकामनाएं

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  33. यायावरी के साथ महत्त्वपूर्ण खोज .... बहुत बहुत बधाई ...

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  34. जबरदस्त खोज रही...आपको अनेक बधाई...

    कभी आपके साथ चला जायेगा वहाँ. आगे जानकारी देते रहियेगा..

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  35. कसडोल से लेकर बस्तर तक का इलाका किसी ज़माने में वनाच्छादित था. कांक्रीट के जंगल के रूप विकसित रायपुर शहर भी जंगल को उजाड़ कर ही बसा है. आज भी कुछ चश्मदीद मौजूद है जो 70-80 पुराने रईपुर की कहानी बयाँ करते है. मानस-काल में समूचा छत्तीसगढ़ वनाच्छादित था. तभी तो प्रभु राम ने वनवास काल का अधिकांश समय इसी अंचल में बिताया. जल-जंगल और जमीन आज अहम् मसला है, इसकी सुरक्षा लिए कोई किला कहीं हो तो ढूढ़ों. बहरहाल ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए आभार.

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