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रविवार, 14 अगस्त 2016

विश्व की सबसे ऊंची शाक्य मुनि की कांस्य प्रतिमा : थिम्पू भूटान

आरम्भ से पढ़ें 
आज तीन अप्रेल था और हमें थिम्पू भ्रमण करना था। सुबह आठ बजे सभी तैयार होकर नाश्ते की टेबिल पर आ गए। नाश्ता करने के बाद सब थिम्पू भ्रमण के लिए चल दिए। सबसे पहले थिम्पू जोंग देखा गया। यह भव्य इमारत है। इसका निर्माण 1629 में नावांग नामग्याल ने करवाया था। इस भवन में चारों तरफ़ गलियारा है और अन्य इमारते बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए बनाई गई हैं। भूटान की आबादी का 75% बौद्ध धर्म को मानने वाला है तथा 25% हिन्दु हैं जो सनातन धर्म को मानते हैं। यहां बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। मैं गत वर्ष भी भूटान भ्रमण के लिए आया था। उस दौरान भी भूटान को देखा और महसूस किया।
थिम्पू जोंग
यहां से हम लोग विश्व की शाक्यमुनि पद्म संभव (द्वितीय बुद्ध) की सबसे ऊंची प्रतिमा के दर्शन करने पहुंचे। जब हम इस स्थान पर पहुंचे तो सूर्य शीर्ष पर था, यह स्थान पर्वत शीर्ष होने के कारण सूर्य की किरणें सीधी पड़ रही थी। हालत यह थी कि सूर्य की चमक से आँखे खोलने में भी कठिनाई हो रही थी। ऐसे समय में सबसे मुझे अपना गॉगल याद आया। मैने बैग से गॉगल निकालकर पहना तभी यहाँ कुछ देख पाया। यहाँ भूटान का सबसे बड़ा निर्माण कार्य चल रहा है। मुझे नहीं लगता कि इससे बड़ी किसी परियोजना पर भूटान में कोई काम हुआ होगा। यहाँ पहुंचकर ग्रुप फ़ोटो लेते तक गर्मी के कारण सबकी हालत खराब हो गई।
शाक्य मुनी द्वितीय बुद्ध
थिम्पू से 12 किमी चलकर एक पहाड़ी के शीर्ष पर बुद्धा दोरदेन्मा निर्मित किया गया है। इसके निर्माण का संकल्प बीसवीं सदी के योगी सोनम जांग्पो ने किया था। उसने भविष्यवाणी की थी कि इस स्थान पर शाक्यमुनि पद्म संभव (द्वितीय बुद्ध) की इतनी ऊंची प्रतिमा का स्थापित होती जो यहाँ से सारे विश्व में शांति एवं मैत्री का संदेश देगी। इस संकल्प के साथ 169 फ़ुट ऊंची कांस्य प्रतिमा का निर्माण प्रारंभ हुआ तथा चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक के साठवें जन्म दिन 25 सितम्बर 2015 को सम्पन्न किया गया। इस दिन को उत्सव के रुप में मनाया गया।
शाक्य मुनी द्वितीय बुद्ध के समक्ष हम हिन्दुस्तानी दल
इस प्रतिमा के निर्माण में 47 लाख अमेरिकन डॉलर खर्च हो चुके हैं। इस प्रतिमा के नीचे बनाए गए हॉल में बुद्ध की स्वर्ण मंडित आठ इंच की एक लाख प्रतिमाएँ एवं बारह इंच की पचीस हजार प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी तथा इस हॉल को ध्यान एवं साधना केन्द्र के रुप में भी विकसित किया जा रहा है। इस स्थान के विकास में 100 लाख अमेरिकी डॉलर खर्च करने की योजना है। इस प्रतिमा का निर्माण नानजिंग चीन की कम्पनी एरोसुन कार्पोरेशन द्वारा किया जा रहा है। इसके समस्त भागों को चीन में बनाकर यहाँ लाकर जोड़ा गया है।
बुद्धा टॉप पर गरुड़
बौद्ध परम्पराओं से संबंधित देवियों को चारों तरफ़ मैदान में स्थापित किया गया है। निर्माण कार्य बहुत ही उम्दा हुआ है और प्रतिमाओं को बारीकी से घड़ा गया है। मुख्य प्रतिमा शाक्यमुनि पद्म संभव को भू-स्पर्श मुद्रा में दिखाया गया है। इनकी आँखे बहुत ही सुंदर बनाई गई है। देखकर ही लगता है कि प्रतिमा अभी बोल उठेगी। प्रतिमा को स्वर्ण मंडित किया है, जिससे खुले में मौसम का असर न हो। वरना कांस्य पर मौसम का असर होता है।
बौद्ध देवी तारा
इसके समक्ष लगभग 900 एकड़ में बगीचा बनाने की योजना है, इसके निर्माण में अभी समय लगेगा। जब बगीचा बन जाएगा तो यह स्थान स्वर्ग से कम दिखाई नहीं देगा। यहाँ से थिम्पू शहर का एरियल व्यू भी देखा जा सकता है। यहां से थिम्पू शहर चू के दोनो तरफ़ बसा हुआ बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। थिम्पू शहर के मैने कुछ चित्र लिए। इस स्थान का निर्माण योगी सोनम जांग्पो के अनुयाइयों ने किया है, इसमें सरकार का धन नहीं लगा है।  जारी है आगे पढें…

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

पारो - भूटान यात्रा 8

प्रारम्भ से पढ़ें 
यहाँ बहने वाली पारो चू के कारण ही इस स्थान का नाम पारो पड़ा। भूटान का एकमात्र हवाई अड्डा पारो में ही है। फ़िर यहाँ से ही लोगों को सड़क मार्ग से थिम्पू जाना पड़ता है। विश्व के प्रथम दस सबसे खतरनाक हवाई अड्डों में से एक है तथा स्थान कम होने के कारण यहाँ का रन वे भी काफ़ी छोटा है। यात्री जहाज को यहाँ पर उतारने के लिए काफ़ी कुशल पायलेट की आवश्यकता होती है। यहाँ पहुचने हमें 2 जहाज खड़े दिखाई दे गए। घाटी के रास्ते के साथ साथ चलते हुए रन वे भी दिखाई दे रहा था। यदि फ़्लाईट का समय होता तो हमें यहाँ के जहाज की उड़ान भी देखनी थी, कैसे पायलट दो पहाड़ों के बीचे से जहाज को उड़ा कर ले जाता है।
पारो भूटान की हवाई पट्टी के साथ बहती पारो नदी
पारो पहुंचने के बाद हमे गाईड सातवी संदी के बने बौद्ध मठ क्यीचू ल्हाखांग में ले गया। इसे तिब्बत के राजा सोङ्ग्त्सेन गेंपो द्वारा बनवाया गया था। सातवीं सदी के प्राचीन इस प्राचीन मठ में बुद्ध के अवतार पद्मसंभव की बड़ी प्रतिमा स्थापित की गई है। पद्म संभव एवं बुद्ध की प्रतिमा सिर्फ़ मूंछों का अंतर पाया जाता है। इसकी मूंछे तिब्बतियों के जैसी पतली होती हैं। इस स्थान पर मैने भी तंत्र के देवता को भूटानी मुद्रा में 20 रुपए अर्पित किए। जब किसी के घर जाते हैं तो परम्परा से उसे नजराना पेश करना ही पड़ता है। यह बौद्द मठ परम्परागत चटक रंगों में ही संवारा गया है।
क्यीचू ल्हाखांग मठ 
यहाँ हमें पेलरी कॉटेज रिसोर्ट ले जाया गया। मौसम शाम होने से बिगड़ रहा था कुछ बूंदे माथे पर से टकरा कर अपनी उपस्थिति का अहसास दिला रही थी। यहां पहुंचने पर पता चला कि कॉटेज में रुकना है। बारुद फ़ैक्टरी जैसे सभी मैग्जिन अलग-अलग बनी हुई थी। अच्छा ही था, कवि, लेखक जैसे अति ज्वलनशील और ब्लॉगर फ़ेसबुकिए जैसे अत्यंत विस्फ़ोटक पदार्थ ही थे। इन्हें अलग-अलग रखने में ही भलाई थी। खैर भ्रमण के बाद अब देह विश्राम करना चाहती थी। काफ़ी लम्बा सफ़र तय करके आए थे। हमारी चौकुटिया में पड़ोसी बने डॉ नित्यानंद पाण्डे एवं शुभदा पाण्डे जी, पिछवाड़े में प्रकाश हिन्दूस्तानी कृष्णकुमार यादव, सुनीता यादव एवं कुसुम वर्मा थे। 
पेलरी कॉटेज पारो
रुम में पहुंचने पर पता चला कि खिड़कियों से ठंडी हवा आ रही है, वैसे भी तापमान माईनस 8-9 चल रहा था और मौसम देखते हुए रात में 13-14 तक पहुंचने की आशंका थी। मैने खिड़कियों की झिरियों में टेप चिपकवाया तब कहीं जाकर ठंडी हवा आनी बंद हुई। कॉटेज बहुत ही सुंदर स्थान पर था। सामने पर्वतों पर जमी हुई बर्फ़ एवं बहती हुई पारो चू सुंदर दृश्य उत्पन्न कर रही थी। चाय की चुस्कियां लेते हुए हमने बरामदे में ही कुछ समय गुजार दिया। थोड़ी देर बाद कृष्णकुमार यादव की अपना लेपटाप लेकर आ गए, उन्हें फ़ोटोएं चाहिए थे तथा सभी मित्र चाहते थे कि वहीं पर अपने-अपने कैमरे की फ़ोटुओं का आदान-प्रदान हो जाए तो ठीक ही रहेगा। सभी फ़ोटोएं उनके पेनड्राइव में डालकर सुपुर्द कर दिया। और भोजन करके अपनी रजाई गर्म की।
कॉटेज में सांझ की चाय की चुस्कियां लेते प्रकाश हिन्दुस्तानी
सुबह नास्ते के बाद फ़्लाईट की सवारियों को यहीं से एयरपोर्ट जाना था और ट्रेन वाली सवारियों को जलपाईगुड़ी या सिलीगुड़ी तक। इस मौके हमें अलग होना था, सभी ने एक दूसरे को भावभीनी विदाई दी और चल पड़े अपनी-अपनी मंजिल की ओर। लौटते हुए हमने पारो एयरपोर्ट से हवाई जहाज की उड़ान देखी और उसे कैमरे में कैद करने की भी कोशिश की। बस में फ़िर से गजल और कविताओं की महफ़िल प्रारंभ हो गई। सफ़र कटता जा रहा था। धीरे-धीरे चलते हुए हम फ़्यूशलिंग पहुंच गए। सीमा पार करते ही कोलाहल सुनाई देने लगा। समझ आ गया था कि हम भारत में पहुंच गए। यहाँ से हमें फ़िर दो हिस्सों में बंटना था। छत्तीसगढ़ से जाने वाले अलग एवं उत्तर प्रदेश जाने वाले अलग हो गए। 
जय गाँव में अलग होते यात्री, पप्पू अवस्थी जी, डॉ रामबहादूर  मिश्र जी, डॉ अशोक गुलशन जी, मनोज पाण्डे जी
उन्हें बड़ी गाड़ी में बैठाया और हमें सूमो दे गई। हम सुमो से सिलीगुड़ी पहुंचे। वहां काफ़ी देर तो हमें होटल ढूंढने में लग गया। रात हो गई थी, इसलिए शीघ्र ही होटल ढूंढ कर आराम करना था। आखिर एक होटल मोल तोल करके जम ही गया और हम उसमें शिफ़्ट हो गए। होटल वाले मैनेजर ने सभी की फ़ोटो ली और पहचान पत्र की फ़ोटो कापी कराई। उसने बताया कि होटल में ठहरने वाले सभी ग्राहकों की फ़ोटो आई डी यहाँ के पुलिस विभाग को रात तक मेल करना पड़ता है। जिससे उनके पास भी जानकारी उपलब्ध रहे कि होटल में कौन रुका हुआ है। खैर सुरक्षा के लिहाज से यह ठीक भी था। रात दही पराठा खा कर हम स्लीपिंग मोड में आ गए। जारी है, आगे पढ़ें