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बुधवार, 31 अगस्त 2016

अजंता की गुफ़ाओं की सैर

अजंता (अजिंठा लेणी) की दूरी एलोरा से लगभग 101 किलोमीटर है, हम एलोरा से घाट चढ़ कर अजंता पहुंचे। जो एलोरा देखने जाता है वह अजंता भी पहुचता है। मेरी यह यात्रा 1994 के दौरान की है, और चित्र भी उसी समय के रोल कैमरे से खींचे गए हैं।

यहाँ चट्टानों को काटकर बनाए गए बौद्ध गुफ़ा मंदिर व मठ, अजंता गाँव के समीप, उत्तर-मध्य महाराष्ट्र, पश्चिमी भारत में स्थित है, जो अपनी भित्ति चित्रकारी के लिए विख्यात है।

औरंगाबाद से 107 किलोमीटर पूर्वोत्तर में वगुर्ना नदी घाटी के 20 मीटर गहरे बाएँ छोर पर एक चट्टान के आग्नेय पत्थरों की परतों को खोखला करके ये मंदिर बनाए गए हैं।

गुफ़ाओं के इस समूह की खुदाई पहली शताब्दी ई. पू. और सातवीं शताब्दी के बीच दो रूपों में की गई थी- चैत्य (मंदिर) और विहार (मठ)। यद्यपि इन मंदिरों की मूर्तिकला, ख़ासकर चैत्य स्तंभों का अलंकरण अद्भुत तो है, लेकिन अंजता की गुफ़ाओं का मुख्य आकर्षण भित्ति चित्रकारी है। 

इन चित्रों में बौद्ध धार्मिक आख्यानों और देवताओं का जितनी प्रचुरता और जीवंतता के साथ चित्रण किया गया है, वह भारतीय कला के क्षेत्र में अद्वितीय है।
अजंता की गुफ़ांए
घोड़े के नाल की आकार की अजंता लेणी
अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म द्वारा प्रेरित और उनकी करुणामय भावनाओं से भरी हुई शिल्‍पकला और चित्रकला से ओतप्रोत हैं, जो मानवीय इतिहास में कला के उत्‍कृष्‍ट ज्ञान और अनमोल समय को दर्शाती हैं।

बौद्ध तथा जैन सम्‍प्रदाय द्वारा बनाई गई ये गुफाएं सजावटी रूप से तराशी गई हैं। फिर भी इनमें एक शांति और अध्‍यात्‍म झलकता है तथा ये दैवीय ऊर्जा और शक्ति से भरपूर हैं।

दूसरी शताब्‍दी डी. सी. में आरंभ करते हुए और छठवीं शताब्‍दी ए. डी. में जारी रखते हुए महाराष्ट्र में औरंगाबाद शहर से लगभग 107 किलो मीटर की दूरी पर अजंता की ये गुफाएं पहाड़ को काट कर विशाल घोड़े की नाल के आकार में बनाई गई हैं।

अजंता में 29 गुफाओं का एक झुंड बौद्ध वास्‍तुकला, गुफा चित्रकला और शिल्‍प चित्रकला के उत्‍कृष्‍तम उदाहरणों में से एक है।

इन गुफाओं में चैत्‍य कक्ष या मठ है, जो भगवान बुद्ध और विहार को समर्पित हैं, जिनका उपयोग बौद्ध भिक्षुओं द्वारा ध्‍यान लगाने और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्‍ययन करने के लिए किया जाता था।

गुफाओं की दीवारों तथा छतों पर बनाई गई ये तस्‍वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्‍न घटनाओं और विभिन्‍न बौद्ध देवत्‍व की घटनाओं का चित्रण करती हैं।

इसमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं हैं, जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं, ये एक संत थे जिन्‍हें बुद्ध बनने की नियति प्राप्‍त थी।

ये शिल्‍पकलाओं और तस्‍वीरों को प्रभावशाली रूप में प्रस्‍तुत करती हैं जबकि ये समय के असर से मुक्‍त है। ये सुंदर छवियां और तस्‍वीरें बुद्ध को शांत और पवित्र मुद्रा में दर्शाती हैं।
अजंता की गुफ़ांओं में ललित शर्मा
लेखक के पार्श्व में अजंता लेणी
सह्याद्रि की पहाडि़यों पर स्थित इन गुफाओं में लगभग 5 प्रार्थना भवन और 25 बौद्ध मठ हैं। इन गुफाओं की खोज आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके दल द्वारा सन् 1819 में की गई थी। 

वे यहाँ शिकार करने आए थे, तभी उन्हें कतारबद्ध 29 गुफाओं की एक शृंखला नज़र आई और इस तरह ये गुफाएँ प्रसिद्ध हो गई।

घोड़े की नाल के आकार में निर्मित ये गुफाएँ अत्यन्त ही प्राचीन व ऐतिहासिक महत्त्व की है। इनमें 200 ईसा पूर्व से 650 ईसा पश्चात तक के बौद्ध धर्म का चित्रण किया गया है। 

अजंता की गुफाओं में दीवारों पर ख़ूबसूरत अप्सराओं व राजकुमारियों के विभिन्न मुद्राओं वाले सुंदर चित्र भी उकेरे गए है, जो यहाँ की उत्कृष्ट चित्रकारी व मूर्तिकला के बेहद ही सुंदर नमूने है।

अजंता की गुफाओं को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक भाग में बौद्ध धर्म के हीनयान और दूसरे भाग में महायान संप्रदाय की झलक देखने को मिलती है। हीनयान वाले भाग में 2 चैत्य और 4 विहार है तथा महायान वाले भाग में 3 चैत्य और 11 विहार है।

ये 19वीं शताब्दी की गुफाएँ है, जिसमें बौद्ध भिक्षुओं की मूर्तियाँ व चित्र है। हथौड़े और छैनी की सहायता से तराशी गई ये मूर्तियाँ अपने आप में अप्रतिम सुंदरता को समेटे है।
अजंता की गुफ़ांए
अजंता की गुफ़ांए

अजन्ता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही, गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16, 17 शेष है। इन 6 गुफाओं में गुफा संख्या 16 एवं 17 ही गुप्तकालीन हैं। अजन्ता के चित्र तकनीकि दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखते हैं।

इन गुफाओं में अनेक प्रकार के फूल-पत्तियों, वृक्षों एवं पशु आकृति से सजावट का काम तथा बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं के चित्रण का काम, जातक ग्रंथों से ली गई कहानियों का वर्णनात्मक दृश्य के रूप में प्रयोग हुआ है।

ये चित्र अधिकतर जातक कथाओं को दर्शाते हैं। इन चित्रों में कहीं-कही गैर भारतीय मूल के मानव चरित्र भी दर्शाये गये हैं। अजन्ता की चित्रकला की एक विशेषता यह है कि इन चित्रों में दृश्यों को अलग अलग विन्यास में नहीं विभाजित किया गया है।

अजन्ता में 'फ़्रेस्को' तथा 'टेम्पेरा' दोनों ही विधियों से चित्र बनाये गए हैं। चित्र बनाने से पूर्व दीवार को भली भांति रगड़कर साफ़ किया जाता था तथा फिर उसके ऊपर लेप चढ़ाया जाता था।

अजन्ता की गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण ‘मरणासन्न राजकुमारी‘ का चित्र प्रशंसनीय है। इस चित्र की प्रशंसा करते हुए ग्रिफिथ, वर्गेस एवं फर्गुसन ने कहा,- ‘करुणा, भाव एवं अपनी कथा को स्पष्ट ढंग से कहने की दृष्टि‘ यह चित्रकला के इतिहास में अनतिक्रमणीय है। 
अजंता की गुफ़ांए
अजंता की गुफ़ाओं का अनुपम दृश्य
वाकाटक वंश के वसुगुप्त शाखा के शासक हरिषेण (475-500ई.) के मंत्री वराहमंत्री ने गुफा संख्या 16 को बौद्ध संघ को दान में दिया था। 

गुफा संख्या 17 के चित्र को ‘चित्रशाला‘ कहा गया है। इसका निर्माण हरिषेण नामक एक सामन्त ने कराया था। 

इस चित्रशाला में बुद्ध के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से संबधित चित्र उकेरे गए हैं। 

गुफा संख्या 17 में उत्कीर्ण सभी चित्रों में माता और शिशु नाम का चित्र सर्वोत्कृष्ट है। अजन्ता की गुफाऐं बौद्ध धर्म की ‘महायान शाखा से संबधित थी।

अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के चित्रों की चमक हज़ार से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी आधुनिक समय से विद्वानों के लिए आश्चर्य का विषय है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं को इन चित्रों में अभिव्यक्त किया गया है।

चावल के मांड, गोंद और अन्य कुछ पत्तियों तथा वस्तुओं का सम्मिश्रमण कर आविष्कृत किए गए रंगों से ये चित्र बनाए गए।

लगभग हज़ार साल तक भूमि में दबे रहे और 1819 में पुन: उत्खनन कर इन्हें प्रकाश में लाया गया। हज़ार वर्ष बीतने पर भी इनका रंग हल्का नहीं हुआ, ख़राब नहीं हुआ, चमक यथावत बनी रही।

कहीं कुछ सुधारने या आधुनिक रंग लगाने का प्रयत्न हुआ तो वह असफल ही हुआ। रंगों और रेखाओं की यह तकनीक आज भी गौरवशाली अतीत का याद दिलाती है।

सोमवार, 29 अगस्त 2016

अद्भुत शिल्पकारी का अद्भुत नमूना कैलाश मंदिर गुफ़ा एलोरा

भूली बिसरी यादों के पन्नों से एलोरा की कैलाश मंदिर गुफ़ा की आज याद आई। 1994 में मैने कुछ दिन अजंता एवं एलोरा की गुफ़ाएं देखने में बिताए थे। गजब का अनुभव था इन गुफ़ाओं को देखने का। 

एलोरा की गुफ़ाएं तीन प्रकार की हैं 1 -महायानी बौद्ध गुफ़ाएँ, 2 - पौराणिक हिंदू गुफ़ाएँ, 3- दिगंबर जैन गुफ़ाएँ। 
कैलाश मंदिर एलोरा


इन गुफ़ाओं में एक गुफ़ा को 'कैलाश मंदिर' कहा जाता है। मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने करवया था। यह गुफ़ा शिल्प कला का अद्भुत नमूना है। एक ही चट्टान में काट कर बनाए गए विशाल मंदिर की प्रत्येक मूर्ति का शिल्प उच्च कोटि का है। 

इन गुफ़ाओं से एक किलोमीटर की दूरी पर एलोरा गाँव है। इसी गाँव के नाम पर ये 'एलोरा गुफ़ाएँ' कहलाती हैं।

कैलाश मंदिर एलोरा



एलोरा का कैलाश मन्दिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले में प्रसिद्ध 'एलोरा की गुफ़ाओं' में स्थित है। यह मंदिर दुनिया भर में एक ही पत्‍थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर को तैयार करने में क़रीब 150 वर्ष लगे और लगभग 7000 मज़दूरों ने लगातार इस पर काम किया। पच्‍चीकारी की दृष्टि से कैलाश मन्दिर अद्भुत है। मंदिर एलोरा की गुफ़ा संख्या 16 में स्थित है। इस मन्दिर में कैलाश पर्वत की अनुकृति निर्मित की गई है।

कैलाश मंदिर एलोरा



एलोरा की गुफ़ा-16 सबसे बड़ी गुफा है, जिसमें सबसे ज़्यादा खुदाई कार्य किया गया है। यहाँ के कैलाश मंदिर में विशाल और भव्‍य नक़्क़ाशी है, जो कि कैलाश के स्‍वामी भगवान शिव को समर्पित है। कैलाश मंदिर 'विरुपाक्ष मन्दिर' से प्रेरित होकर राष्ट्रकूट वंश के शासन के दौरान बनाया गया था। अन्‍य गुफाओं की तरह इसमें भी प्रवेश द्धार, मंडप तथा मूर्तियाँ हैं।


कैलाश मंदिर एलोरा



कैलाश मंदिर को हिमालय के कैलाश का रूप देने में एलोरा के वास्तुकारों ने कुछ कमी नहीं की। शिव का यह दोमंजिला मंदिर पर्वत की ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है और अनुमान है कि प्राय: 30 लाख हाथ पत्थर इसमें से काटकर निकाल लिया गया है। 

एथेंस का प्रसिद्ध मंदिर 'पार्थेनन' इसके आयाम में समूचा समा सकता है और इसकी ऊँचाई पार्थेनन से कम से कम ड्योढ़ी है। कैलाश के भैरव की मूर्ति जितनी भयकारक है, पार्वती की उतनी ही स्नेहशील है और तांडव का वेग तो ऐसा है, जैसा पत्थर में अन्यत्र उपलब्ध नहीं।

कैलाश मंदिर एलोरा


शिव-पार्वती का परिणय भावी सुख की मर्यादा बाँधता है, जैसे रावण का कैलाशत्तोलन पौरुष को मूर्तिमान कर देता है। उसकी भुजाएँ फैलकर कैलाश के तल को जैसे घेर लेती हैं और इतने जोर से हिलाती हैं कि उसकी चूलें ढीली हो जाती हैं और उमा के साथ ही कैलाश के अन्य जीव भी संत्रस्त काँप उठते हैं। फिर शिव पैर के अँगूठे से पर्वत को हल्के से दबाकर रावण के गर्व को चूर-चूर कर देते हैं। 
कैलाश मंदिर एलोरा

कालिदास ने कुमारसंभव में जो रावण के इस प्रयत्न से कैलाश की संधियों के बिखर जाने की बात कही है, वह इस दृश्य में सर्वथा कलाकारों ने प्रस्तुत कर दी है। एलोरा का वैभव भारतीय मूर्तिकला की मूर्धन्य उपलब्धि है। यह मंदिर बहुत खूबसूरत है, शिल्पकारों की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। अब पुन: एक बार अंजता एलोरा की गुफ़ाएँ देखने का विचार है।

गुरुवार, 17 मार्च 2016

वो सत्रह घंटे : दक्षिण यात्रा-2

आरम्भ से पढ़ें 
त श्री अकाल का संदेश सुबह 4 बजे मेरे चलभाष पर आ गया। मतलब पाबला जी भिलाई से अभनपुर की ओर प्रस्थान कर चुके थे। भिलाई से अभनपुर 60 किमी की दूरी पर है। मैने भी उनके पहुंचते तक तैयारी कर ली। मालकिन ने भी रास्ते के लिए खाना बना दिया। सुबह सवा पाँच बजे हमने अभनपुर से बंगलोर के लिए माता जी का आशीर्वाद लेकर यात्रा का श्री गणेश कर दिया। अभी अंधेरा ही था, रायपुर और भिलाई के बीच उजाला होने लगा, दिन निकलने वाला था। भिलाई से निकलते हुए पाबला जी मन एक बार फ़िर घर की तरफ़ जाने का हुआ, फ़िर उन्होने इरादा बदल कर गाड़ी हाईवे पर डाल दी। ठीक दो घंटे के बाद हमने सुबह सवा सात बजे राजनांदगाँव के बाद तुमड़ी बोड़ के गुरुनानक ढाबे में चाय पी। तुमड़ी बोड़ से डोंगरगढ़ के लिए रास्ता जाता है। 
सफ़र का प्रारंभ अभनपुर
मुकेश के पुराने गानों एवं जीपीएस वाली बाई के निर्देशों के तहत सपाटे से गाड़ी आगे बढ़ती गई। रायपुर नागपुर हाईवे फ़ोर लाईन होने के बाद से मैने कार द्वारा इस सड़क पर सफ़र नहीं किया था, तो अंदाजा था कि 12 से एक बजे के बीच नागपुर पहुंच जाएगें। पर हाईवे पर सपाटे के साथ गाड़ी एक सौ बीस की स्पीड से चल रही थी रास्ता जल्दी तय हो रहा था। हम सवा आठ बजे महाराष्ट्र की सीमा में प्रवेश कर गए। हमें नागपुर से संध्या जी के यहाँ का बना खाना लेना था। इसलिए उन्हें समय 12 से एक बजे के बीच का बताया गया था। हमारी गाड़ी लगभग साढ़े नौ बजे भंडारा के पास पहुंच चुकी थी। इससे लगा कि साढे दस बजे तक किसी भी हालत में नागपुर पहुंच जाएगें। 
तुमड़ी बोड़ ढाबा छत्तीसगढ़
हमने वहीं नाश्ता करने का निर्णय लिया। होटल वाले से दही होने की जानकारी ली, मिलने पर मटर के पराठे निकाल कर वहीं पर बैठ कर खाए। इस प्रक्रिया में आधा घंटा लग गया। इसके बाद नागपुर बायपास से हम शहर के बाहर ही बाहर निकल लिए। यह बायपास बुटीबोरी वाले रोड़ में जामठा के पास मिल जाता है। यहीं पर हमें खाना मिल गया। यहां से हम बारह बजे आगे बढे। हिंगणघाट होते हुए हमें आज रात हैदराबाद पहुंचना था। एक बजे के बाद भूख लगने लगी। हम भोजन करने के लिए हाईवे के किनारे नीम, बरगद, पीपल, महुआ आदि किसी छायादार वृक्ष की तलाश करने लगे। परन्तु एक घंटे तक तलाश करने पर भी हमें कहीं पर मनवांछित वृक्ष नहीं मिला। हर तरफ़ कीकर की ही झाड़ियाँ नजर आ रही थी। जिसके नीचे बैठने की सोच कर बचपन में लगाई डॉक्टर की सारी सुईयाँ याद कर तशरीफ़ सिहर जाती है।
सपाटे की सड़क
आखिर दो बजे एक ढाबे के पास नीम का एक वृक्ष दिखाई दिया, जिसके नीचे छाया में एक गाड़ी वाला सोया हुआ था। हमें यही स्थान उपयुक्त लगा भोजन के लिए। गाड़ी वृक्ष के नीचे लगा कर, छाया में चादर बिछाकर हमने आराम से भोजन किया। जब मनचाहा हो जाए तो उससे अच्छी तृप्ति और कोई नहीं हो सकती। भोजन के बाद हमने तीन बजे फ़िर सफ़र शुरु किया। यहाँ से हैदराबाद लगभग 400 किमी था। बीच में लगभग 50 किमी की सड़क का निर्माण अधूरा होने के कारण गति धीमी हो गई। इसके बाद आगे चलकर पांडुरकवड़ा होते हुए आदिलाबाद के बायपास से गुजरे। देखा जाए तो विदर्भ के इस इलाके में वर्षा आधारित फ़सल ही हो सकती है। सिंचाई के कोई साधन दिखाई नहीं दे रहे थे और न ही हरियाली। चारों तरफ़ झाड़ झंखाड़ एवं सूखा दिखाई दे रहा था।
दोपहर का भोजन कुड़ूए नीम की छांव में
हम एशियन हाईवे 43 पर चल रहे थे। एशियन हाईवे बनने के बाद यह पता चलना कठिन हो गया है कि हम किस गाँव से गुजर रहे हैं। क्योंकि इसकी गति इतनी अधिक है कि गांवों की तरफ़ ध्यान ही नहीं जाता। कामारेड्डी पहुंचने पर दिन ढल गया। चौड़ी सड़क गाड़ी सपाटे से चलती है और एक टोल से दूसरे टोल के बीच का सफ़र तेजी से कट जाता है। 45 रुपए के टोल से शुरु हुई यात्रा 103 रुपए तक पहुंच गई। ये टोल रोड़ भी नोट को कागज बनाने की मशीन हो गए हैं, आप उन्हें नोट दो और ये आपको उसके बदले में एक छोटी सी पर्ची थमा देते हैं। हमने टोल रोड़ की सारी पर्चियाँ जमा करना शुरु कर दिया था। टोल देते ही पर्ची गाड़ी के टूल बाक्स में पहुंच जाती थी। यह पर्चियों का गुल्लक बन गया था।
अब जबेलियाँ दिखने लगी।
पाबला जी ने हैदराबाद बंगलोर रोड़ पर शहर से बाहर होटल बुक करवा रखा था। आज हमने लगभग 872 किमी और 17 घंटे लगातार कार ड्राईव की। हम रात को 10 बजे होटल में पहुंच गए।  होटल पहुंच कर खाना खाया। इस यात्रा के दौरान सभी होटलों में नेपाली या असमी स्टाफ़ ही दिखाई दिया। नेपाल में भूकंप से हुए नुकसान के बाद बड़ी संख्या में नेपाली बाहर काम करने निकल गए। भाषा की समस्या होने के बाद भी ये नौकरी कर कुछ धन अर्जित करने के लिए जद्दो जहद कर रहे हैं। रात को सुबह जल्दी बंगलोर निकलने के लिए प्लान बनने लगा। पर गोलकुंडा का किला देखने का मुड बन गया तो तय किया गया कि किला नौ बजे खुलता है इसलिए होटल से आठ बजे चला जाए और रास्ते में ही नाश्ता किया जाए। किला देखकर बंगलोर के लिए प्रस्थान किया जाए। जारी है, आगे पढ़ें 

बुधवार, 16 मार्च 2016

स्मार्ट कार से दक्षिण भारत की ओर

भारत के दक्षिण प्रदेशों का रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, भाषा एवं विभिन्न विषयों पर दर्शन भी उत्तर भारत भिन्न हैं, इस विभिन्नता के बाद भी उत्तर-दक्षिण दोनो जुड़े हुए हैं, इन्हें हमारी संस्कृति जोड़ती है। अगर हम उत्तर की निगाह से देखें तो अत्यधिक भिन्नता पाएगें। उत्तर भारतीयों के लिए दक्षिण में भाषाई समस्या बड़ा रोड़ा बनती है। पूर्व में भी दक्षिण भारत की यात्राएं कर चुका हूँ। परन्तु यात्राएं रेल एवं वायू मार्ग से होने के कारण के क्षेत्र को समीप से देखने एवं समझने में कठिनाई होती रही। जब तक धरातल (सड़क मार्ग) पर न उतरा जाए तब तक किसी भी संस्कृति को समझना बहुत ही कठिन है। इसे समझने के लिए यायावर जैसे दृष्टि एवं संकल्प की आवश्यकता होती है। 
नेपाल की सीमा पर स्मार्ट कार
यायावरी के लिए समय भरपूर चाहिए, जिससे निकट से किसी भी चीज की परख की जा सके। वर्तमान की भागम-भाग भरी जिन्दगी में सभी घरेलू जिम्मेदारियों की कथरी उतार कर कुछ समय यायावरी के लिए चुराना बहुत ही दुष्कर है। खासकर एक गृहस्थी व्यक्ति के लिए। जिसके आगे नाथ, न पीछे पगहा हो, वह कुछ भी कर सकता है। यायावर मन कभी चैन नहीं लेने देता। हमेशा कदम चलने को तैयार रहते हैं, थोड़ी बहुत तकलीफ़ झेलकर भी यायावरी करने को तत्पर रहते हैं, बस जरा सी हवा चली और ये व्याकुल हो जाते हैं कि अब चलना चाहिए। बहुत दिन हो गए एक स्थान पर ही ठहरे हुए। अवसर मिलते ही मन यायावरी साधने निकल पड़ता है।
नेपाल की सीमा
अब की यायावरी में पुन: साथी बने बी एस पाबला जी। पिछली नेपाल यात्रा हमने कार से संग-संग ही की थी और यह यात्रा काफ़ी सफ़ल और सकुशल रही। पाबला जी के पास मारुति ईको कार है, जिसे उन्होंने विभिन्न गजट लगाकर "स्मार्ट कार" बना रखा है। इसकी खासियत यह है कि एक बार स्टेयरिंग पर बैठने के बाद किसी से रास्ता पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती। रास्ता बताने वाली बाई (जीपीएस) को निर्धारित स्थान बताने पर वह स्वयं ही रास्ता बताते हुए मंजिल तक पहुंचा देती है। चौक चाराहों, मोड़ों की जानकारी 100 मीटर पहले से ही मिलने के कारण गति बनी रहती है और चालक पूर्व से ही कार्यवाही के लिए सावधान हो जाता है। 
बी एस पाबला जी स्मार्ट कार के साथ
दूसरी खासियत यह है कि इसमें 4 कैमरे लगे हैं, जो बाहर के रास्ते और भीतर के लोगों की बातचीत एवं गतिविधियों की फ़िल्म भी बनाता है। जिससे सड़क की समस्त घटनाएं रिकार्ड होती जाती हैं और यात्रा करने वालों का आत्मविश्वास बना रहता है। अगर कोई चूक भी हो जाए तो वह भी रिकार्ड हो जाती है। जिससे उसे रिप्ले करके देखा जा सकता है। तीसरी खासियत है कि पाबला जी वाहन के सुचालक है। जिसके कारण मुझे कार चलाने का मौका ही नहीं मिल पाता और लम्बी से लम्बी यात्रा सकुशल सम्पन्न हो जाती है। चौथी खासियत है कि हमारी आपस में पटरी बैठ जाती है। खान-पान और भाषा के साथ समझदारी आड़े नहीं आती। दोनों एक सी भाषा बोलते हैं और समझते हैं साथ ही खान-पान भी एक सा ही है। जिसके कारण कभी असहजता महसूस नहीं होती।
स्मार्ट कार के स्मार्ट कैमरे
मैने देखा है कि कई महीने पहले से यात्रा बनाने पर मेरी यात्रा योजना हमेशा फ़ेल हो जाती है। समय समीप आने पर कोई न कोई अड़ंगा आ जाता है और जब भी तत्काल यात्रा बनाई गई, वह सफ़लता से सम्पन्न हो जाती है। फ़ेसबुक पाबला जी ने कार से बैंगलोर यात्रा की मंशा जताई थी, पर वे असमंजस में थे। मैने देखा और कहा चलो। बस इतने में ही बात बन गई, उनका फ़ोन आने पर मैने कहा कि जरा "मालकिन" से स्वीकृति ले लेता हूँ। उनसे भी स्वीकृति लेने में पाँच मिनट ही लगे और अगले दिन यात्रा की तैयारी के लिए था। मैने अपनी तैयारियाँ कर ली, कम से कम सामान और सुविधा की सारी वस्तुएं जुटा ली गई। पाबला जी ने भी गाड़ी की सर्विंसिंग करवा कर टायर इत्यादि बदलवा लिए। अब गाड़ी जाने के लिए टनाटन होकर तैयार थी। 
हम और हमार मालकिन
इस बार की यात्रा में हमारे दर्शनीय स्थल क्या होगें, इसके लिए हमने पूर्व से कोई तय नहीं किया था। रास्ते में जो दिख जाए, उसे देख लेगें। यही योजना बनी थी। हमें अभनपुर से नागपुर, हैदराबाद होते हुए बंगलोर तक जाना था। वहां दो तीन दिन रुक कर वापस लौटना था। इस बीच रास्ते में पुरातात्विक महत्व के स्मारकों की जानकारी लेकर भी उन्हें देखना था। दक्षिण भारत के समुद्री किनारों की यात्रा तो हो गई थी, परन्तु यह बीच वाला भाग हमेशा छूट जाता था। इस यात्रा में वह भी पूर्ण होने वाला था। सड़क यात्रा का रोमांच भी अलग ही होता है, हर पर जान हथेली पे लेकर चलने वाला काम है। कई तरह की शंका कुशंकाएं मन में आती है, यात्रा के रोमांच से मन दृढ़ हो जाता है, कि बस अब चलना चाहिए। आगे पढें……

शुक्रवार, 22 जून 2012

हिडिम्बा टेकरी और गंजों के लिए खुशखबरी ………… ललित शर्मा

हम बोधिसत्व नागार्जुन संस्थान के पिछले गेट से पहाड़ी पर चढने के लिए चल पड़े। इस पहाड़ी को स्थानीय लोग हिडिम्बा टेकरी कहते हैं। धूप बहुत तेज थी,  पहाड़ी के किनारे बहुत बड़ी झील है, जिसके नाम पर ही इस गाँव का नाम मनसर पड़ा। मनसर नाम मणिसर का अपभ्रंस है। इसे देखने से आभास होता है कि पहाड़ियों के बीच यह एक प्राकृतिक झील है। जिसमें बारहों महीने पानी रहता है। पहाड़ी की तरफ़ झील का उलट है, अर्थात झील लबालब भरने पर पानी की निकासी का मार्ग बना है। इसमें लोहे का गेट भी लगा है। पहाड़ी छोटी है पर चढाई खड़ी है। रास्ते में हमें रुक कर कुछ जलपान लेना पड़ा। उस दिन की गर्मी का अहसास करता हूँ तो आज भी उबल उठता हूँ। 
हिडिम्बा टेकरी से मनसर झील का नजारा
पहाड़ी पर चढते समय ही धरती पर पाषाण काल के मानव के रहने चिन्ह प्राप्त होते हैं। मिट्टी के बर्तनों की ठेकरियाँ और चकमक पत्थर के पाषाण कालीन औजार बिखरे पड़े हैं। कौन कितना उठाए और सहेजे। गर्मी से संध्या जी तो लाल हो गयी थी, पुरातात्विक धरोहरें देखने के मजे के साथ कष्ट भी था, लेकिन इस कष्ट का भी हर हाल में आनंद लेना था। पैट्रोल के बढे हुए रेट ने रोते-गाते भी मजा लेने को मजबूर कर दिया। पहाड़ी पर चढते ही एक चार दीवारी दिखाई दी। इसके भीतर एक बड़ी शिला पर लिखे हुए अभिलेख है, जो समय की मार से धुंधले हो गए, पढने मे  ही नहीं आया क्या लिखा है? वैसे भी हम कोई प्राचीन भाषा के विशेषज्ञ तो हैं नहीं जो पढ लेगें, पर आडी टेढी लाईने तो समझते हैं। 
समय की मार से धुंधले होते शिलालेख
इस स्थान से उपर पहाड़ी पर ईंटो की अंडाकार कलात्मक इमारत अभी भग्नावस्था में है। हम ईमारत पर चढते हैं, पर वैसा कुछ दिखाई नहीं देता जैसा भंते रामचंद्र ने बताया था। उनका कहना था कि यह एक बौद्ध मठ था, इसके आचार्य नागार्जुन थे। ईमारत में त्रिआयामी त्रिभुजों का निर्माण हुआ है। पूरी ईमारत पक्की ईंटो की बनी है। उपर जाने के लिए त्रिकोणी घुमावदार सीढियाँ बनी हैं। पहाड़ी के शिखर पर बनी हुई यह सुंदर संरचना है। ईमारत के चारों तरफ़ लाल पत्थर के शिवलिंग स्थापित हैं। जिन्हे अभी भी देखा जा सकता है। इससे पता चलता है कि यह एक शिवालय था। 
हिडिम्बा टेकरी के द्वादश शिवलिंगों मे से एक
पूर्व दिशा में एक टीन शेड बना हुआ है जिसके दरवाजे पर ताला लगा है। वहां पर पुरातत्व विभाग का कोई व्यक्ति नहीं मिला। अगर कोई पर्यटक ईमारत को नुकसान पहुंचा दे तो कोई देखने वाला नहीं है। पहाड़ी से मनसर कस्बे का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। साथ ही मणिसर झील भी खूबसूरत दिखाई देती है। पूर्व दिशा में एक पहाड़ी पर भी ईमारत के चिन्ह दिखाई दिए। वहां जाने के लिए किसी दूसरे रास्ते का उपयोग होता है। इस पहाड़ी से उसका कोई संबंध नहीं है। हम मंदिर की उत्कृष्ट  कलाकारी को देखते रहे। समय कम था और हमें आगे भी जाना था। एक पेड़ के नीचे बैठ कर आराम किया। संग में लाए छाछ और फ़लों को उदरस्थ किया।
लू लग जाएगी, कुछ तो खा लीजिए
लौटते हुए मुझे ईमारत में एक दरवाजा दिखाई दिया, बाहर तो ईंटों की दीवाल है पर भीतर जाने पर पत्थरों को खोद कर बनाई गयी एक सुरंग दिखाई देती है। सुरंग का मुहाना भी ईटों से बनाया हुआ है। मै उसके भीतर उतरता हूं तो घुप्प अंधरा था। मोबाईल के टार्च की रोशनी में दीवाल से चिपकी हुई एक गोह (गोईहा) दिखाई दी। मैने आगे बढने का ईरादा त्याग दिया। क्योंकि शुरुवात में ही कुछ ऐसे चिन्ह दिखाई दे दिए कि आगे बढना जान जोखिम में ही डालना नजर आया। जैसे कभी अनजान गाँव के तालाब में गहरे नहीं जाना चाहिए वैसे ही अनजान जगह में सुरंग या पहाड़ी खोह को पूरी देख भाल कर जाना चाहिए। 
सुरंग का मुहाना
अनजान जगह पर भीतर जाने का विचार त्याग देना चाहिए। क्योंकि भालू जैसा प्राणी ऐसे स्थानों पर पाया जाता है। जो कि बड़ा खतरनाक होता है। साथ ही पहाड़ी पर तेंदुए भी विचरण करते हैं जो रहने के लिए ऐसे ही मुफ़ीद स्थानों की तलाश करते हैं। सुरंग में जाने पर सड़ांध आई, जिससे अहसास हो गया कि यह किसी मांसाहारी प्राणी का ठिकाना बन चुकी है। इससे दूर ही रहना सही होगा। भंते रामचंद्र ने बताया कि यह सुरंग 25-30 फ़ुट आगे तक जाती है, फ़िर बंद है। ऐसी ही एक सुरंग और भी है। उसका दरवाजा बंद है।
हिडिम्बा टेकरी का शीर्ष
दो लड़के भी चश्मा लगाए हमारे पीछे पीछे यहाँ आए थे। वे तो थोड़ी देर में ही कूद फ़ांद कर नीचे जाने लगे। मैने उन्हे रोक कर पूछा कि उन्होने यहाँ क्या देखा और समझा? दोनो यूवक महाविद्यालय के छात्र थे। उनका कहना था कि कुछ समय होने के कारण इसे देखने चले आए। अब यह क्या है और किसने बनाया है? इसके विषय में उन्हे जानकारी नहीं है। सरासर सच कहा दोनों ने, उनकी बातें सुनकर अच्छा लगा। पुरातात्विक पर्यटन स्थलों पर अधिकतर यही होता है। गाईड की व्यवस्था न होने पर पर्यटक को कुछ समझ ही नहीं आता कि वह क्या देख रहा है और क्यों देख रहा है? 
शिल्पियों द्वारा कलात्मक निर्माण
बिना गाईड के किसी भी स्थान के विषय में जानकारी नहीं मिल पाती। पर्यटक आता है और मुंह फ़ाड़े देखकर चला जाता है।थोड़े से पैसे खर्च करके किसी स्थान के विषय में सार्थ जानकारी मिल जाए तो घुमने का उद्देश्य पूरा हो जाता है।  हम भी सिर्फ़ देखकर यहाँ की जानकारी लिए बिना ही वापस चल पड़ते हैं। खड़ी चढाई से उतरते समय सावधानी रखने की जरुरत है। थोड़ा सा पैर फ़िसला नहीं कि एकाध हड्डी टूटने की गारंटी मानिए। हड्डी टूटने पर धरती पर यमराज के एजेटों का चक्कर पड़ सकता है। इसलिए हम संभल कर नीचे उतरे और नागार्जुन स्मारक संस्था में पहुचे। जहाँ हमारी मोटरसायकिलें खड़ी थी।
हिडिम्बा टेकरी पर यायावर- पुख्ता सबूत
संस्थान में एक स्थान पर लिखा था कि यहाँ गंजों के सिर में 10 दिन में शर्तिया बाल उगाए जाते हैं। इसे पढकर जानने की इच्छा हुई तो केयर टेकर प्रो रामचंद्र से ही हमने पूछा। उन्होने बताया कि बाल उगाने वाली दवाई वे ही देते हैं और शर्तिया 10 दिनों में बाल उग आते हैं। उनके पास आने वाले बहुत से लोगों का वे ईलाज कर चुके हैं। मैने मजाक में कहा कि शर्मा जी सिर के बगल के कुछ बाल उड़े हुए हैं उन्हे उगा दीजिए। इसका अनुभव हम भी ले लेते हैं। तो उनका कहना था कि हम सिर्फ़ 30 साल से कम उम्र वाले व्यक्ति के ही बालों का ईलाज करते हैं। इससे अधिक उम्र वालों के सिर पर पूरे बाल नहीं आते तथा यह ईलाज गर्मी के दिनों में नहीं करते। क्योंकि गर्मी में दवाई से सिर पर फ़ोड़े फ़ुंसी निकलने का डर रहता है। 
प्रो रामचंद्र उके (केयर टेकर)
इसलिए बरसात का मौसम सबसे अच्छा होता है बाल की फ़सल उगाने के लिए। साथ ही उन्होने अपनी फ़ीस 10,000/- अक्षरी दस हजार रुपए भी बता दी। लेकिन बाल उगाने का मजबूत दावा पेश किया। हमने उनका पता लिया। उन्होने बताया कि इस स्थान से दो किलोमीटर पर नालंदा जैसी एक सरंचना भी उत्खनन में प्राप्त हुई है। उसे आपको अवश्य देखना चाहिए। पहाड़ी पर उत्खनन में प्राप्त सामग्री को यहाँ स्थित एक भवन में रखा गया है। पर उसकी चाबी अरुण कु्मार शर्मा जी के पास ही है। इसलिए उसे खोला नहीं जा सकता। प्रो रामचंद्र से हम विदा लेकर अगले स्थान की ओर चल पडे। 
शिल्पियों द्वारा ईंटो से निर्मित त्रिआयामी भवन विन्यास
गंजे सर पर बाल उगाने वाले का पता है - प्रो रामचंद्र उके, केयर टेकर, बोधिसत्व नागार्जुन स्मारक संस्था व अनुसंधान केन्द्र, मनसर, तहसील रामटेक जिला नागपुर (महाराष्ट्र) मो. 09823214196, 08055397715। इनसे सम्पर्क कर अपने रिस्क से सिर पर बाल उगाएं। (मनसर के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक पहलू पर मैने नागपुर से आने के बाद सिरपुर जाकर अरुण कुमार शर्मा जी से चर्चा की वह विवरण आपको आगामी पोस्ट में मिलगा।) आगे पढें

बुधवार, 20 जून 2012

मनसर की ओर यायावर ------------- ललित शर्मा

 अयोध्या का ददुवा राजा महल
जीवन चलने का नाम, चलते रहो जब तक हो प्राण। चलना ही जीवित रहने का परिचायक है, ठहरना मुर्दा होने के समान। रमता जोगी और बहता दरया, दोनो ही उत्तम होते हैं। साधू रमता रहे तो दाग लगे न कोय। साधू तो हूँ पर जोगी नहीं हूँ। साधना मुझे आता है, जोग गृहस्थ का लिया है। गृहस्थी जीवन में समय निकाल कर यायावरी करना बहुत कठिन कार्य है। फ़िर भी कुछ समय चुरा ही लिया जाता है। गत फ़रवरी माह में पारिवारिक कार्यों से नागपुर गया था, फ़िर वहाँ से उमरेड से शंकरपुर होते हुए हीरापुर गया। जो कि नागपुर से लगभग सौ किलोमीटर है। वहाँ एक मैगालिथिक पुरातात्विक साईट की खोज की है डेक्कन विश्वविद्यालय के कांति कुमार ने। तब से इस साईट को जाकर देखने की इच्छा थी। हम साईट पर बाईक से गए, बहुत सारे फ़ोटो लिए। लेकिन उसके बारे में लिखने से पहले ही मेरा मोबाईल गुम हो गया और सारी मेहनत पर पानी फ़िर गया। हीरापुर की साईट का एक भी चित्र  नहीं था मेरे पास। इसलिए उस पर लिख भी न सका। वहां पर किसी ने बताया था कि आस-पास की पहाड़ियों में आदिम मानव निर्मित शैल चित्र भी हैं। साथ यह भी चेताया था कि उस पहाड़ी पर शेर और भालु भी हैं। इसलिए दिन रहते ही जाना और आना पड़ता है। देखते हैं दुबारा कब समय मिलता है जाने का?

कवियत्री संध्या जी और सत्येन्द्र जी
तीन चार किलोमीटर पहाड़ी पर चल कर गुफ़ाएं देखना और वहाँ शैल चित्रों का अवलोकन करना, कष्टप्रद कार्य है। पर मुझे पसंद है, इसलिए फ़िर कभी जाना चाहुंगा। दुबारा महात्मा फ़ूले टैलेंट अकादमी के कार्यक्रम में 14 अप्रेल को अंजु चौधरी के निमंत्रण पर जाना हुआ। पहुंचने के पहले ही संध्या जी और सत्येन्द्र जी ने कार्यक्रम बना लिया था कि 15 अप्रेल को रामटेक जाएगें। रामटेक का नाम मैने बहुत सुना था। कुछ मराठी भाई रामटेके सरनेम भी लगाते हैं। इसलिए यह नाम जाना पहचाना लगा और रामटेक जाने का मन भी बना लिया। नागपुर से रामटेक 56 किलोमीटर है और वर्धारोड़ सोमलवाड़ा से 70 किलोमीटर है। अप्रेल की भीषण गर्मी में वहाँ जाना मूर्खता से कम नहीं था, परन्तु पहले से कार्यक्रम बन गया था,हमने बाईक से जाना तय कर लिया। पारा 45-46 डिग्री पर चल रहा था। सुबह 8 बजे से ही धूप चमकने लगती थी। सुबह की सैर से लौटने में ही पसीने की धार बह निकलती थी। बाईक से लम्बा सफ़र करना तकलीफ़देह तो है, पर बाईक से ही चल कर आस पास के सभी स्थान आसानी से देखे जा सकते हैं। सड़क पर जाम लगने की स्थिति में थोड़ी सी ही जगह मिलने पर आसानी से निकला जा सकता है। इस तरह समय की बचत के साथ सफ़र चलता रहता है।

कुलेश्वर दर्शन
सुबह 10 बजे हम तीनों (मैं, संध्या जी, सत्येन्द्र जी) दो मोटर सायकिलों पर प्रात:रास के प्रश्चात चल पड़े। वर्धा रोड़ सोमलवाड़ा से हम सीधे ही नेशनल हाईवे 7 पर सवार पर हो गए। यह हाईवे कामठी के बाद कन्हान पार करके मनसर जाता है, यही से आगे रामटेक के लिए राज्य मार्ग है। सत्येन्द्र जी ने गर्मी से बचने के लिए टोपी लगा ली और संध्या जी ने स्कार्फ़ बांध लिया। मुझे आदत नहीं सिर ढक कर चलने की, चाहे कितनी भी लू चले। एक गॉगल आँखों पर चढा लिया वही बहुत है। हेलमेट लगाने में भी समस्या होती है। पहली बार जब हेलमेट लगाया था, तब एक बार में जी भर के पान थूक लिया और हेलमेट की नमस्ते हो गयी। हमने भी उससे पीछा छुड़ा लिया। हाईवे नम्बर 7 पर चलते हुए हम कामठी पहुंचे। शहर के भीतर से चल कर पुन: हाईवे पर आ गए। तिराहे पर मुझे मनपसंद सामान मिल गया। मतलब बर्फ़ की चुस्की (गोला भी कहते हैं) मिल गयी। तुंरत गाडी किनारे लगाई और तीन चुस्की बनवाई। जलती बरसती गर्मी में चुस्की से कुछ राहत मिली। पर एक चुस्की से क्या होना था। दूसरी भी बनवा ली, पहली खत्म होते ही। यहां से रिचार्ज होकर आगे बढे, 4 लाईन हाईवे पर फ़ुल स्पीड में बाईक ड्राईव करने का मजा आ रहा था। सड़के के किनारे पेड़ों पर तोरी (तोरई) की सूखी बेलें लटकी हुई थी। उनमें सूखी तोरई भी लटक रही थी। एक बार तो मन किया कि रुक कर इसे तोड़ा जाए। (ग्रामीण जानते हैं सूखी हुई तोरई किस काम आती है) समय की कमी को देखते हुए रुकना ठीक न समझा।

मनसर से रामटेक की ओर
कन्हान से लगभग 25 किलोमीटर चलने पर मनसर कस्बा है यहाँ से एक रास्ता  दाहिनी तरफ़ रामटेक के लिए जाता है। इस रास्ते पर स्वागत द्वार बना हुआ है। मनसर नाम देखते ही मेरे मन में बिजली सी कौंधी। लगा कि यह नाम कहीं सुना है, क्यों सुना, किस लिए सुना, किसने सुनाया?  कुछ याद नहीं, बस नाम कुछ जाना पहचाना सा लगा। मैने सत्येन्द्र जी को बाईक रोकने के लिए इशारा किया और किसी दुकान वाले से इस गाँव की विशेषता के बारे में पूछने कहा। पूछने पर पता चला कि यहाँ से 4 किलो मीटर पर खुदाई में कोई प्राचीन स्थल मिला है। तब दीमाग की घंटी बज गयी, एक दिन रायपुर पुरातत्व परिमंडल के तात्कालीन अधीक्षण प्रवीण मिश्रा जी ने इसके विषय में बताया था और यहाँ जाकर एक बार देखने कहा था, साथ किसी भी जानकारी के लिए नागपुर पुरातत्व मंडल में कार्यरत नंदिनी साहू जी का मोबाईल नम्बर भी दिया था। अब तो सोने में सुहागा हो गया, मन चाही जगह रास्ते में ही मिल गयी। दीदे खोल कर हम आगे बढे। 4 किलों मीटर पर बाएं हाथ की तरफ़ बहुत सी बुद्ध की मूर्तियाँ लगी है तथा बहुत बड़ा इलाका चार दीवारी से घेरा हुआ है। हमने यहीं पूछना उपयुक्त समझा। संस्थान के भीतर प्रवेश करने पर पेड़ की छांव में दो लोग बैठे दिखाई दिए। बाईक स्टैंड पर लगा कर हमने उत्खनित स्थल के विषय में पूछा तो एक व्यक्ति ने पीछे की तरफ़ की पहाड़ी की ओर ईशारा कर दिया। परिचय पूछने पर उसने अपना नाम प्रो रामचंद्र उके एवं संस्थान का केयर टेकर होना बताया।

नागार्जुन स्मारक संस्था एवं अनुसंधान केंद्र
उन्होने कुर्सियाँ मंगवाई, बैठने के बाद उस स्थान के विषय में चर्चा होने लगी। उन्होने बताया कि पहाड़ी पर नागार्जुन से संबंधित पुरावशेष उत्खनन में प्राप्त हुए हैं तथा जापान के आर्थिक सहयोग से यहाँ उत्खनन हुआ है। यहां से एक किलोमीटर की दूरी पर नालंदा के विश्वविद्यालय जैसी संरचना भी प्राप्त हुई है। यह सुनने के पश्चात मेरी जिज्ञासा और बढ गयी। यहाँ उत्खनन करने वाले विद्वान का नाम पूछने पर उन्होने अरुण कुमार शर्मा जी नाम लिया। बताया कि शर्मा जी ने 1998 से 2008 तक यहाँ अपने निर्देशन में उत्खनन कार्य करवाया। अरुण कुमार शर्मा जी से मेरी भेंट होते रहती है। लेकिन नालंदा जैसे विश्वविद्यालय की बात मेरे गले से नहीं उतरी। मैने बैठे-बैठे सोच लिया कि इस स्थल के चित्र लिए जाएं और वास्तविक जानकारी शर्मा जी से सिरपुर जाकर प्राप्त कर लेगें। यही उत्तम रहेगा। हम नागपुर से ही अपने साथ खाने का सामान लेकर चले थे और साथ में पानी भी। 12 बज गए थे और सूरज सिर पर पहुंच कर भीषण आग बरसा रहा था। इतनी गर्मी झेलना बहुत ही कठिन है। संध्या जी गर्मी से हलाकान हो रही थी। पहाड़ी पर चढने पर तो इससे भी अधिक गर्मी झेलनी पड़ेगी। खैर हमने अपनी बाईक वहीं खड़ी की और संस्थान के पिछले दरवाजे से पहाड़ी की ओर चल पड़े……… जारी है मनसर कथा…… आगे पढें

रविवार, 27 जून 2010

भूख न देखे सूखी रोटी, यात्रा महाराष्ट्र

बिस्तर पर करवटें बदलते लोग सोने के लिए स्लीपिंग पिल्स का सहारा लेते हैं। थककर चूर हुआ आदमी बस लेटने की जगह ढूंढता है। नींद का संबंध मनुष्य के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। बस वह आनी चाहिए, फ़िर कुछ नहीं नजर आता। सिर्फ़ सोना और सोना।

बुलढाणा का घाट
एक बार 20 साल पहले मैं भी अकेला चित्तौड़ के प्लेट फ़ार्म पर सो गया, भीलवाड़ा जाने के लिए ट्रेन आने में चार घंटों का विलंब था। नींद आ रही थी, प्लेटफ़ार्म के बाहर ठंडी हवा चल रही थी और नींद आ रही थी। फ़िर क्या?

वहीं सड़क पर पेपर बिछाया और बैग सिरहाने लगा कर सो गया। बड़ी गहरी नींद आई। खुले आसमान में फ़ुटपाथ की वह नींद याद आने पर आज तक तरोताजा करती है। कहते हैं न " भूख न देखे सूखी रोटी, भूख न देखे सूखी खाट" 
 ढाबे में नींद-खाट की वाट
कुछ इसी तरह की नींद नीरज को भी आ रही है। उसने रात को एक ढाबे में कार रोकी और दौड़ कर एक खाट पकड़ ली। बस फ़िर क्या था, निद्रा रानी की गोद में नींद का मजा ले रहे हैं। यहां घर में एसी एवं गद्दों पर जो नींद नहीं आई होगी, उससे अच्छी नींद बिना बिछौने एवं एसी के सड़क के किनारे ली जा रही है। सुबह हमने इन्हे उठाया तो बड़ी मुस्किल से उठे, हम कार चला रहे थे और ये सीट लम्बी करके फ़िर पड़ लिए। सोते रहे और हम गाड़ी चलाते रहे।
कार में सोना ही सोना
कुछ इसी तरह से यात्रा चल रही है। एक सोता है तो एक ड्राईव करता है। वैसे बिना लक्ष्य की इस यात्रा में आनंद बहुत आ रहा है। कहीं भी पहुंच जाते हैं। जो रास्ते में मिल गया देख लेते हैं। 

नागपुर से प्लान करके निकले थे कि मुंबई जाना है धुलिया रोड़ पर मलकापुर के पास साले साहेब का फ़ोन आ गया कि वे चिखली(बुलढाणा) मे अपनी ससुराल में हैं। आपको यहां आना ही पड़ेगा। लेकिन हमने बताया कि बहुत दूर निकल चुके हैं वापस आने के लिए 125 किलो मीटर आना पड़ेगा। हम नहीं आ सकते। 

कुछ देर बाद घर से सुप्रीम अथारिटी का फ़ोन आ गया कि हमें वहां जाना ही पड़ेगा। मरते क्या न करते, गाड़ी वापस घुमाई और नांदुरा से मोपाळा-बुलढाणा होते हुए 11 बजे चिखली पहुंचे। 

यहां स्नान भोजन आदि से निवृत होकर अब दुसरा प्लान बना की शनि सिंघणापुर देखते हुए चलते हैं। यह स्थान औरंगाबाद पूना हाईवे पर 76 किलोमीटर पर है। गाड़ी की टंकी फ़ुल करके सिंघणापुर चल पड़े। मुंबई जाना स्थगित हो गया।

बुधवार, 23 जून 2010

घूमक्कड़ निकले यात्रा पर, हाल मुकाम नागपुर

बैठे बिठाये अचानक उठ कर चल लिए. कल रात ९ बजे जगदलपुर से नीरज शर्मा पहुंचे. अब अचानक घूमने जाने का कार्यक्रम बन गया. घर में बैठ कर सोचने लगे की किधर को जाया जाये? 

कुछ देर बाद तय हुआ की अभी रात को नागपुर चलते हैं. फिर नागपुर पहुच कर सोचते हैं कि कहाँ जाना है? बस फिर कार से निकल पड़े नागपुर की ओर. रात ११ बजे से २०० किलोमीटर लगातार कार मैंने चलाई फिर नीरज ने. 

सुबह ७ बजे नागपुर पहुँच पर भौसर चौक गाँधी बाग में होटल लिया. आते ही सो गए. अभी उठे हैं. तय हुआ कि गुजरात की ओर चलते हैं. अब गुजरात में कहाँ-कहाँ जाना है. यह तय कर रहे हैं.

मित्रों से गुजारिश है कि गुजरात में घुमने की जगह कौन कौन सी है? कृपया बताएं. जिससे हम अपना यात्रा मार्ग रात तक तय कर सकें. नागपुर से गुजरात के लिए कौन सा मार्ग अच्छा रहेगा? 

इसकी भी जानकारी दें. हम भी बिना योजना के ही निकल लिए. अब बताइए यह कैसी घुमक्कड़ी है. लेकिन एक हफ्ता गुजरात घूमने का मन है. जिसमे कठियावाड़ और सौराष्ट्र दोनों जगह जाना है. 

एतिहासिक स्थलों को देखने की तमन्ना है. इसलिए एतिहासिक स्थलों की जानकारी चाहिए.

नागपुर में कोई  ब्लोगर बंधू हैं तो उनके विषय में भी जानकारी दे. जिससे उनसे भी मुलाकात हो जाए. एक छोटी सी ब्लागर मीट ही सही. 

आज रात को भी नागपुर में हैं. कल सुबह हम निकल पड़ेगें आगे कि यात्रा पर. रास्ते में हम मिलते रहेंगे. सफ़र में मेरा फोन नंबर है--०९४२५५९०४६१--९७५२५१०२६१, इस पर संपर्क हो सकता है. लोटपोट साथ में हैं, नेट पर भी मुलाकात होती रहेगी.