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बुधवार, 12 मार्च 2014

नगाड़ों का सफ़र

संतागमन के साथ प्रकृति खिल उठती है, खेतों में रबी की फ़सल के बीच खड़े टेसू के वृक्ष फ़ूलों से लद जाते हैं, मानों प्रकृति धानी परिधान पहन कर टेसू के वन फ़ूलों से अपना श्रृंगार कर वसंत का स्वागत कर रही हो। टेसू के फ़ूलों से प्रकृति अपना श्रृंगार कर पूर्ण यौवन पर होती है तथा वातावरण में फ़ूलों की महक गमकते रहती है। पतझड़ का मौसम होने के कारण पहाड़ों पर टेसू के फ़ूल ऐसे दिखाई देते हैं जानो पहाड़ में आग लग गई हो। विरही नायिका के हृदय को भी अग्निदग्ध करने में यह ॠतू कोई कसर बाकी नहीं रखती। इसी समय होली का त्यौहार आता है और दूर कहीं नगाड़ों के बजने की मधुर ध्वनि सुनाई देती है। साथ ही होली के फ़ाग गीत वातावरण को मादक बनाने में सहायक होते हैं।
टेसू (शुक चंचु) के फ़ूल
"अयोध्या में राम खेलैं होरी, जहाँ बाजे नगाड़ा दस जोड़ी" फ़ाग गीत के साथ नगाड़ों की धमक सांझ होते ही चहूं ओर सुनाई देती है। होली के त्यौहार का स्वरुप बदलते जा रहा है लेकिन गावों में परम्पराएं कायम हैं। नगाड़ा प्राचीन वाद्य है, जिसे दुदूम्भि, धौरा, भेरी, नक्कारा, नगाड़ा, नगारा, दमदमा इत्यादि नामों से भारत में जाना जाता है। छत्तीसगढ़ अंचल में विशेषकर नगाड़ा या नंगाड़ा कहा जाता है। संस्कृत की डम धातू का अर्थ ध्वनि होता है। इसलिए इसे दमदमा भी कहा जाता है। इसका अर्थ लगातार या मुसलसल होता है। 
कोकड़ा
शनिचरी बाजार में मेरी मुलाकात नगाड़ों की दुकान सजाए मन्नु लाल हठीले से होती है, नगाड़े बनाने एवं बेचने में इनकी उत्मार्ध बुधकुंवर भी हाथ बटाती दिखाई देती है। मन्नु लाल मिट्टी की हांडियों पर चमड़ा कसते हैं और बुधकुंवर चमड़े को विभिन्न रंगों से सजाती है। इनकी दुकान में 80 रुपए से लेकर 1200 रुपए तक के नगाड़े की जोड़ियाँ विक्रय के लिए रखी हुई हैं। पूछने पर बताते हैं कि इनका पैतृक घर डोंगरगढ में है। गत 20 वर्षों से ये नगाड़ा बनाने एवं बेचने का काम करते हैं। होली के अवसर पर विशेषकर नगाड़ों की बिक्री होती है। बाकी दिनों में जूता चप्पल बेचने का काम करते हैं।
मन्नु लाल हठीले एवं बुधकुंवर
छत्तीसगढ़ अंचल में नगाड़े बनाने का काम विशेषत: चमड़े का व्यवसाय करने वाली मोची, मेहर और गाड़ा जातियाँ करती हैं। फ़ूलकुंवर कहती है कि पहले शादी के अवसर पर दफ़ड़ा एवं निशान बाजा बहुत बिकता था, परन्तु धुमाल बाजा आने के कारण इनकी बिक्री कम हो गई। दफ़ड़ा निशान बजाने वाले भी अब कम ही हैं। होली के बाद नगाड़ों की बिक्री पर विराम लग जाता है, महीनें में कोई एकाध जोड़ी नगाड़ा बिक्री होता है, वह भी कबूलना एवं बदना वाले लोग देवता-धामी मंदिर आदि में चढाने के लिए ले जाते हैं। कबुलना नगाड़े इन नगाड़ों से बड़े बनते हैं। 
नगाड़ों पर कलमकारी
नगाड़ा बनाने के लिए मिट्टी की हाँडी के साथ चमड़े का उपयोग होता है। मन्नु लाल बताते हैं कि नगाड़े की जोड़ी में दो सुर होते हैं, जिसे "गद" और "ठिन" कहते हैं। इसका निर्माण बैल या गाय के चमड़े से होता है। पशु के शीर्ष भाग का चमड़ा पतला होता है जिससे "ठिन" एवं पार्श्व भाग का चमड़ा मोटा होता है इससे "गद" नगाड़ा बनाया जाता है। हाँडी पर चमड़ा मढने के लिए भैंसे के चमड़े की रस्सियों उपयोग में लाई जाती हैं। तभी नगाड़ों से "गद" एवं "ठिन" की ध्वनि निकलती है। छोटा नगाड़ा बनाने के लिए बकरा-बकरी और अन्य जानवरों का चमड़ा उपयोग में लाया जाता है। इसे बजाने के लिए दो डंडियों का इस्तेमाल होता है जिन्हें स्थानीय बोली में "बठेना" कहा जाता है। नगाड़े की वास्तविक ध्वनि का आनंद गाय-बैल के चमड़े से मढे नगाड़े में ही आता है। 
नगाड़े बजा कर "गद" एवं "ठिन" ध्वनि का परिक्षण
मन्नुलाल कहते हैं कि होली के समय नगाड़े बेचकर 10 -15 हजार रुपए बचा लेते हैं। मंह्गाई बहुत बढ गई है, कच्चे माल का मूल्य भी आसमान छू रहा है। पहले एक ट्रक माल लेकर आते थे, वर्तमान में एक मेटाडोर ही नगाड़े लेकर आए हैं, किराया भी बहुत बढ गया। साथ ही रमन सरकार की तारीफ़ करते हुए कहते हैं कि राशन कार्ड में चावल, गेहूं, नमक, चना इत्यादि मिलने से गुजर-बसर अच्छे से चल रहा है। वरना जीवन भी बहुत कठिनाईयों से चलता था। इसी बीच फ़ूलकुंवर कहती है कि उनका स्मार्ट कार्ड नहीं बना है, आधार कार्ड बन गया है। इतना कहकर वह चूल्हे पर भोजन बनाने की तैयारी करने लगती है। 
नगाड़े संवारती बुध कुंवर
इतिहास से ज्ञात होता है कि नगाड़ा प्राचीन संदेश प्रणाली का महत्वपूर्ण यंत्र माना जाता है। इसके माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक संदेश शीघ्र ही पहुंचाया जाता था एवं नगाड़ा का प्रयोग सूचना देने में किया जाता था। जब किसी सरकारी आदेश को जनता तक प्रसारित करना होता था तो नगाड़ा बजाकर संदेश सुनाया जाता था। युद्ध काल में सेना के प्रस्थान के समय नगाड़े बजाए जाते थे, मुगलों के दरबार में फ़ैसले नगाड़ा बजा कर सुनाए जाते थे तथा किसी की जायदाद कुर्की करने की सूचना देने का कार्य भी नगाड़ा बजा कर किया जाता था।
पतझड़ का मौसम खड़ुवा के जंगल में
वर्तमान में नगाड़ा मंदिरों में आरती के समय बजाया जाता है या फ़िर होली के अवसर पर बजाया जाता है। छत्तीसगढ़ अंचल में सामूहिक होलिका दहन स्थल पर फ़ाग गीतों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। नगाड़ा बजता है तो गायक का उत्साहवर्धन होता है और सुर ताल बैठने पर फ़ाग गीत रात के सन्नाटे को चीरते हुए दूर तक सुनाई देते हैं। नगाड़ों की ध्वनि के साथ वसंत का रंग सारे वातावरण पर छा जाता है। होली समीप है और नगाड़ों की ध्वनि मन को मोह रही है। आस पास बजते नगाड़े का होली का स्वागत कर रहे हैं …… डम डम डम डम डमक डम डम…………

(डिस्क्लैमर - सभी चित्र एवं लेखन सामग्री लेखक की निजी संपत्ति हैं, इनका बिना अनुमति उपयोग करना कापीराईट के अधीन अपराध माना जाएगा। अनुमति के लिए shilpkarr@gmail.com पर सम्पर्क करें।)

रविवार, 3 नवंबर 2013

हैप्पी दीवाली: कुछ उनकी, कुछ अपनी

दृश्य-1

कल दशहरा मना लिया गया, रावण अपने धाम को विदा हो गया। मौसम में दीवाली महक आ गई है। सुबह-सुबह ओस के साथ मौसम दीवालियाना लगने लगा है। चाय का कप लिए करंज के पेड़ के नीचे कुर्सी डाले बैठा हूँ। इस एक महीने के त्यौहार में कितने काम रुक जाते हैं और कितने काम हो जाते हैं सोच रहा हूँ। रामगढ़ पर मेरी पुस्तक अधूरी है, उसे पूरा करने के लिए मुझे एक बार 2-4 दिनों के लिए रामगढ़ और जाना होगा। पिछले छ: महीने से योजना बना रहा हूँ। लेकिन कुछ न कुछ अड़ंगा आ जाता है। बरसात के चार महीने तो जंगल में घुसने लायक भी नहीं हैं। अब चुनाव का डंका बज चुका है। घर में रहकर ही राजनैतिक प्रतिस्पर्धा (लड़ाई) का आनंद लिया जाए। उसके बाद देखा जाएगा, कहीं जाना होगा तो। वैसे भी दीवाली का कितना काम पड़ा है।

दृश्य-2

बाईक स्टार्ट कर रहा हूँ, बाजार जाना है। तभी मालकिन पहुंच जाती है - दीवाली सिर पर आ गई है। रंगाई, पोताई, साफ़-सफ़ाई नहीं करवानी क्या? कोई चिंता ही नहीं है आपको। बाजार जा रहे हो तो रंग रोगन ले कर आना। परसों से काम शुरु हो जाना चाहिए।
अरे! हर साल रंग-रोगन तो टाटा-बिड़ला के यहाँ भी नहीं होता। पहले मकानों में चूना करना होता था तो लोग हर साल पुताई कर लेते थे। अब कितना मंहगा हो गया है, रंग-पेंट। दस हजार से कम का नहीं आएगा और पेंटरों का भी भाव बढा हुआ है। कहाँ ढूंढने जाऊंगा।
कहीं से लाईए ढूंढ कर। मुझे घर की रंगाई पुताई करवानी है। एक साल में घर की दीवारें कितनी गंदी हो जाती हैं। आपको नहीं दिखता क्या? मालकिन ने अपना आदेश सुना दिया और चली गई। मजबूरी युक्त हमारी मजदूरी शुरु हो गई।

दृश्य - 3

रंग-रोगन की दुकान में भारी भीड़। लोग सामान धक्का मुक्की कर सामान खरीद रहे हैं। सोच रहा हूँ कि ये भी मेरे जैसे ही होगें। इनकी मालकिनों ने भी इन्हें खदेड़ा होगा। दुकानदार की नजर मुझ पर पड़ती है - नमस्कार भैया! कैसे आना हुआ?
नमस्कार! यार मैं सोच रहा था कि तेरी बारात में जाने के बाद भूल गया ही गया। कम से कम बच्चों के बारे में पूछना चाहिए था कि कितने हुए। आज याद आया तो पता करने चला आया।
हे हे हे हे! आप भी मजाक करते हैं भैया। 10 साल बाद आपको याद आई।
अरे! मुझे रंग रोगन लेना है, इसलिए आया हूँ। इतना भी नहीं समझता। एशियन का इमल्शन पेंट लेना है। कलर कार्ड दिखा  मुझे। हॉल के लिए 2 रंग। बैडरुम के लिए 2 रंग, दूसरे बैडरुम में 2 रंग। भगवान के कमरे के लिए अलग लेना है। बाकी जो बच गया किचन में लगा लेगें। छत और बार्डर का रंग मिला कर भीतर के लिए लगभग 15 लीटर लग जाएगा तथा बाहर के लिए स्नोशेम कलर भिजवा दे। साथ में 1 छ: इंची ब्रस, 1 दो इंची, एमरी पेपर 80 नम्बर, व्हाईट सीमेंट 5 किलो भी साथ में देना।

दृश्य -3

भोजन जारी है- बोल आए रंग रोगन के लिए? मालकिन ने प्रश्न दागा। मेरे जवाब देते तक ही डोर बेल बजी। लड़का रंग रोगन का डिब्बा लिए सामने खड़ा था। मालकिन के चेहरे पर विजयी मुस्कान की चमक आ गई थी। रख दो भैया, उधर कोने में। साथ ही मेरी ओर मुखातिब होते बोली- कल सुबह सातपारा जाकर पेंटर का पता करके आओ। अब अधिक समय नहीं रह गया है। घर की साफ़ सफ़ाई भी करनी पड़ती है। रंग रोगन के बाद फ़र्श पर कितना कचरा फ़ैल जाता है। काम वाली बाई भी नौंटकी करने लगती है। आपका क्या है, जब देखो तब कम्पयूटर पर डटे रहते हो। थोड़ा भी ध्यान न दूं तो सारा काम ऐसे ही पड़ा रहे। आखिर सारा काम मुझे ही करना पड़ता है। मैं सिर झुकाए खाने में व्यस्त हूँ। आदेश सुनाई दे गया। अब कल की कल देखी जाएगी।

दृश्य-4

रात के 10 बज रहे हैं और मैं नेपाल यात्रा के पोस्ट लेखन से जूझ रहा हूँ। सब कुछ याद है कि कुछ भूल रहा हूँ। कीबोर्ड की खटर पटर जारी है। इसी बीच मालकिन का आगमन होता है - रविवार को बच्चों के कपड़े लेने जाना है। फ़िर सब छंटे छंटाए मिलेगें।
चले जाना भई, मैने कब रोका है। - मैने कीबोर्ड खटखटाते हुए कहा।
आप सारा दिन इसी में लगे रहते हो। कभी फ़ुरसत है यह सब सोचने की।
अरे! सारे ही सोचने लग जाएगें तो काम बिगड़ जाएगा। परिवार का काम यही है कि सब सोचें और कार्य पर विजय पाएं। अब मैं भी सोचने लग गया तो तुम्हारे लिए सोचने के लिए क्या बचेगा। इसलिए जिसका काम उसी को साजे, नही साजे तो डंडा बाजे।

दृश्य-5

कीबोर्ड विराम मोड में है और माऊस का काम चल रहा है। पोस्ट में फ़ोटो अपलोड हो रही हैं। दिमाग सोचनीय मोड में है। इसी घर में बचपन में देखते थे कि पितृपक्ष समाप्ति और नवरात्रि के पहले दिन से ही दीवाली के काम शुरु हो जाते थे। कामगारों की रेलम पेल। खेत से फ़सल आने की तैयारी। खलिहान की लिपाई शुरु हो जाती थी। उरला गाँव का बुधारु टेलर सिलाई मशीन लेकर बैठक की परछी में डेरा लगा लेता था। पंजाबी की दुकान से थान के थान कपड़े आते थे और सभी बच्चों के नाप के हिसाब से 2-2 जोड़ी कपड़ों की सिलाई शुरु हो जाती थी। स्कूल से आते ही पहला काम होता था कि आज टेलर ने किसके कपड़े सीले हैं और कल किसकी बारी है। कपड़े की दुकान घर पर ही खुल जाती थी। टेलर की भी मौज हो जाती थी, एक ही घर के कपड़े सीने में उसकी दीवाली मन जाती थी।

दृश्य-6

पेंटर काम पे लगे हुए हैं, उनकी सहायता के लिए उदय महाराज तैयार हैं, कभी इस डिब्बे की ब्रश उस डिब्बे में तो कभी इधर का पेंट उधर। हम कम्प्यूटर पर चिपके हुए हैं। कभी झांक कर देख लेते हैं क्या काम हो रहा है। आप यहाँ बैठे है और उदय उन्हें काम नहीं करने दे रहा है - तमतमाते हुए मालकिन का आगमन होता है।
उदयSSSSSSS! क्यों फ़ालतू परेशान कर रहा है। काम करने दे। चल तुझे एक काम देता हूँ, देख कितनी सारी तितलियाँ बाड़े में उड़ रही हैं। दो-चार सुंदर की फ़ोटो ही खींच ले। कम्प्यूटर का वाल पेपर बनाएगें। खुशी खुशी उदय कैमरा लेकर मंदिर की तरफ़ चला जाता है।
ये श्रुति भी न, जब काम होगा तभी स्कूल जाएगी। नहीं तो छुट्टी कर लेती है। काम के बोझ के नीचे कोई नहीं आता। सारा दिन रात खटना पड़ता है। तब कहीं जाकर दीपावली का काम निपटता है। अभी तो बिजली मिस्त्री को बुलाना है। 2 महीने से बाहर की ट्यूब लाईट खराब पड़ी है। उसे ठीक करवाना है। कोई ध्यान ही नहीं देता। - मालकिन बड़बड़ा रही थी।

दृश्य-7

पेंटर आधा अधूरा काम छोड़ कर गायब हो गए हैं ।मालिक साहब स्टूल पर चढे दीवाल पर रोगन चढा रहे हैं। अरे! इतना तो रंग मत टपकाओ। फ़र्श पर गिरने के बाद चिपक जाता है, साफ़ नहीं होता।
अब ब्रश से चूह जाता है तो मैं क्या करुं? कौन सा मैने पेंटिंग का कोर्स किया है। अब काम वाले नहीं आए तो मैं क्या करुं। ब्लेड से खुरच कर साफ़ कर दूंगा। दीवाली का काम है करना ही पड़ेगा। वरना कौन सुबह-शाम सिर पर बेलन बजवाएगा। हाँ नहीं तो। जरा ड्रम इधर खिसकाना तो।
ये छिपकिलियाँ बहुत परेशान करती हैं। जहाँ देखो वहीं घुसे रहती हैं। फ़ोटो के पीछे, कपड़ों के पीछे, आलमारी के पीछे। किताबों के सेल्फ़ में। मरती भी नहीं है। कोई इलाज नहीं है क्या इनका?
इलाज तो मुझे भी नहीं मालूम। फ़ेसबुक पर लिख कर मित्रों की राय ले लेता हूँ। अगर वे कोई समाधान बताएगें तो अमल में लाया जाएगा।
फ़ेसबुक पर लगाया हुआ महत्वपूर्ण स्टेटस, ही-ही बक-बक की बलि चढ जाता है। लेकिन मगरमच्छ की बहनों से पैदा हुई समस्या का हल नहीं मिलता।

दृश्य-8

पटाखे लाने हैं कि नहीं?
क्या करना है पटाखे लाकर। पिछले साल ही 2500 के लाए थे और किसी ने चलाए भी नहीं। अभी तक पड़े हैं घर में। फ़ालतू खर्च करने से क्या हासिल होगा।
दीवाली है, लोग पटाखे चलाते हैं। फ़िर आदि, हनी, श्रुति, श्रेया, उदय को तो पटाखे चलाने हैं। आप चलाओ चाहे न चलाओ।
रोज अखबार वाले और टीवी वाले कह रहे हैं कि पटाखे चलाने से ध्वनि प्रदूषण एवं वायू प्रदूषण होता है। साथ ही आचार संहिता लगने के कारण आज ही चुनाव आयोग का मेल-पत्र आया है कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक पटाखे चलाने पर प्रतिबंध है। अब पटाखे चलाने वालों को पुलिस पकड़ कर ले गई तो समझो मन गई दीवाली। - मैने टालने की कोशिश करते हुए कहा।
कोई पुलिस वाला पकड़ कर नहीं ले जाएगा। साल भर का त्यौहार है, इस दिन भी क्या पटाखे नहीं चलाने देगें। जाओ लेकर आओ और ज्यादा पटाखे नहीं लाना। सभी एक एक पैकेट ले आना।
बाजार से वापसी लौटते हुए उदय के पास एक बड़ी पालिथिन में भरे हुए पटाखे दिखाई देते हैं। इतने सारे क्यों ले आए? मैने तो थोड़े से लाने कहा था।
मुझसे थोड़ा सामान नहीं खरीदा जाता। साला ईज्जत का कचरा हो जाता है। तुम्हे थोड़ा सामान खरीदना हो तो किसी और से मंगवा लिए करो। मुझे मत कहे करो। हाँ ! साथ में लट्टूओं की झालर भी ला दी हैं 6 नग। मुझे मत कहना फ़िर बाजार जाने के लिए।

दृश्य- 9

आम के पत्तों को तोड़ कर नंगा करने पर तुले हैं नंदलाल और उसके लड़के। अरे! सारे पत्ते तुम ही तोड़ ले जाओगे तो दीवाली में हम कहाँ से लाएगें? मैने उन्हें झिड़कते हुए कहा।
दादी से पूछ कर तोड़ रहे हैं।
ले भई, जब दादी ने कह दिया तो पूरा पेड़ ही उखाड़ कर ले जाओ। कल तो कुछ मरदूद फ़ूल तोड़ने भी आएगें। - मैने कहा
तब तक मालकिन भी मैदान में आ जाती है- सब इन्हीं लोग ले जाते हैं दादी की सिफ़ारिश से, हमारे लिए तो बचते ही नहीं। आंगन लीपने के लिए गोबर भी नहीं आया है। श्रुति रंगोली का सारा सामान लेकर आ गई है। गोबर आएगा तो लीपा जाएगा, तब रंगोली बनेगी। इतवारी के लड़के को कब से खोवा (मावा) लाने कही हूँ, अभी तक लेकर नहीं आया है। कितना काम पड़ा है। कब खोवा लेकर आएगा तो कब गुलाब जामुन बनेगें।
मैने तो मना कर दिया था खोवे के लिए। आजकल खोवा खराब आ रहा है और मंहगा भी कितना है। 10 रुपए किलो में कोई कुत्ता भी नहीं पूछता था। आज 400 रुपए किलो हो गया है। वह भी शुद्ध होने की कोई गारंटी नहीं। नकली खोवा खाओ और अपनी तबियत खराब करो। 400 का खोवा और 1400 की दवाई।
आपकी चले तो कोई त्यौहार भी न मने। मैने कहा है उसे खोवा लाने के लिए। अगर तबियत खराब होगी तो मेरी होगी। देखा जाएगा, कम से कम दीवाली तो जी भर के मनाएं।

दृश्य -10

बरगद के पेड़ के नीचे कैमरा लिए बैठा हूँ, कुछ बगुले गाय की पीठ पर सवार हैं और लछमन झूला झूलने का मजा ले रहे हैं। बाड़े में चारों तरफ़ नजर दौड़ाता हूँ तो सूना सूना लगता है। लगता है जैसे काटने को दौड़ रहा हो। कभी इसी जगह पर त्यौहार पर 40-50 परिजन इकट्ठे होते थे। उस आनंद के कहने ही क्या थे। लक्ष्मी पूजन करने के बाद आशीर्वाद लेने-देने का क्रम चलता था और आतिशबाजी रात भर चलती थी। अब ऐसा कुछ नहीं है। कुछ बाहर चले गए, कुछ धरती में समा गए। कुछ अलग हो गए अपने - अपने कुटूंब कबीले को लेकर।
कैसा मजा रह गया है अब इन त्यौहारों का? सिर्फ़ परम्परा का निर्वहन हो रहा है। कल जब लोग पूछेगें कि दीवाली कैसी मनी? तो उन्हें बताने के लिए भी कुछ होना चाहिए। इन परिवार नियोजन वालों ने दुनिया का सत्यानाश कर दिया। वरना एक परिवार की दीवाली इतनी बड़ी होती थी, जितनी आज सारे मोहल्ले की होती है। 8-10 बच्चे होते तो उनकी उछल कूद और उत्साह से लगता कि आज कोई त्यौहार है। जब वे नए कपड़े पहन कर उत्साह से फ़ूलझड़ियाँ चलाते, आतिशबाजी करते। कोई किसी के पटाखे चुराकर जला देता तो किसी की पतलून के पांयचे में चकरी के पतंगे लग जाते। कितना आनंद होता उस दीवाली का।

क्या सोच रहे हो? चाय पीलो और मैने पानी गर्म कर दिया है, नहा धोकर तैयार हो जाओ। पूजा का मुहूर्त 6 बजे का है। आज तो कम से कम आलस छोड़ दो।

इस तरह संसार के रंगमंच पर न जाने कितने ही दृश्यों में पात्र को अभिनय करना पड़ता है और जीना पड़ता है इस दुनिया की वास्तविकता को। जो सपनों से तथा कल्पनाओं से कहीं अलहदा होती हैं। सभी मित्रों की दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

रविवार, 20 मार्च 2011

होली है भई होली है रंग बिरंगी होली है ---- ललित शर्मा

सभी मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।



नया मौसम आया है जरा सा तुम संवर जाओ
जरा सा हम बदल जाएँ, जरा सा तुम बदल जाओ

जमी ने भी ओढ़ ली है एक नयी चुनर वासंती
गुजारिश है के फागुन में जरा सा तुम महक जाओ

नए चंदा- सितारों से सजाओ मांग तुम अपनी
परिंदों के तरन्नुम में जरा सा तुम चहक जाओ

तुम्हारे पैर की पायल नया एक राग गाती है
जरा सा हम मचल जाएँ जरा सा तुम थिरक जाओ

"ललित" के मय के प्याले में तुम भी डूब लो साकी
जरा सा हम बहक जाएँ जरा सा तुम बहक जाओ