शनिवार, 5 नवंबर 2011

लखनऊ में मिलेगें स्वामी ललितानंद एवं स्वामी महफ़ूजानंद --- -ललित शर्मा

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सामुहिक यात्रा के भी अपने मजे हैं, अकेले दुकेले यात्राएं बहुत की, लेकिन सामुहिक यात्रा दो-तीन ही हुई। आज से एक सामुहिक यात्रा पर फ़िर चल रहे हैं। पूरे गेंग में 117 यात्री हैं। बच्चे से लेकर बूढे तक। सामुहिक यात्रा के मजे हैं तो कुछ कठिनाईयाँ भी हैं। सभी का एक साथ ट्रेन में चढना उतरना एवं फ़िर उनको सही सलामत घर तक पहूंचाना एक बड़ी जिम्मेदारी हो जाती है। सन 1999 में हरिद्वार में अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन हुआ, तो मित्र चौरसिया जी के कहने पर हरिद्वार के लिए चल पड़े, मुझे 16 नवम्बर को दिल्ली में काम था। इसलिए 4 नवम्बर को रायपुर से चल कर हरिद्वार में कुछ दिन घुमक्कड़ी करके दिल्ली पहुंचना तय हुआ। लम्बी दूरी की मेरी पहली सामुहिक यात्रा थी। मेरी सीट कनफ़र्म थी, पर सभी लोग सामान्य श्रेणी के सवार थे, संगलोभ के कारण इनके साथ ही जाना तय किया। ट्रेन में मजदूरी के लिए छत्तीसगढ से पलायन करने वालों की भीड़ थी। हम लोग कुल 17 नग थे। जैसे तैसे ट्रेन में चढे और ट्रेन चल पड़ी।
विचार क्रांति अभिय
दुर्ग पार होने के बाद हमारे एक साथी को घड़ी मिली, उसने आवाज लगाकर पूछा कि यह घड़ी किसकी है? किसी ने जवाब नहीं दिया। तो घड़ी हमने रख ली, अगर कोई दावेदार होगा तो उसे लौटा दी जाएगी। शाम को हमारे एक साथी ने अपनी घड़ी गायब होने की सूचना दी। जब पूछा जा रहा था तो वे सामने ही थे, लेकिन तब ध्यान नहीं दिया। शिनाख्त करवा कर उनको घड़ी सौंप दी। गाड़ी आगे बढती गयी और सभी को स्थान मिलता गया। जैसे तैसे करके निजामुद्दीन से पुरानी दिल्ली पहुंचे। वहां से हमे रात को मसूरी एक्सप्रेस से हरिद्वार पहुंचना था। पुरानी दिल्ली पहुंचकर इन्होने दिल्ली भ्रमण का विचार किया। एक टूर वाले से मोल भाव करके प्रतिव्यक्ति 60 रुपए में दिल्ली घूमना ठहराया। बस से सभी दिल्ली भ्रमण पर निकल गए। बस वाले ने अपना रुट तय कर रखा था। साथ में एक फ़ोटोग्राफ़र भी था। एक फ़ोटो के 20 रुपए दाम और निगेटिव भी नहीं दूंगा कह रहा था। मेरे पास अपना कैमरा था, इसलिए मुझे जरुरत नहीं पड़ी। दिन भर दिल्ली घूमते रहे। शाम को बिड़ला मंदिर देखने के बाद पुरानी दिल्ली वापसी होनी थी। वहां पहुंचकर बस का डीजल खत्म हो गया, ईंजन ने एयर ले ली।
मसूरी का सर्पीला रास्ता
अब हमने उतर कर पुरानी दिल्ली के लिए बस पकड़ी। मेरे साथ पीछे सीट पर एक साथी बैठ गया। जैसे ही आगे की सीट खाली हुई, मैं आगे बढ गया और पुरानी दिल्ली सभी उतर गए। जब मसूरी एक्सप्रेस आई तो सवारियां गिने जानी लगी। एक सवारी कम निकली, कई बार गिन डाला। जैसे जैसे ट्रेन चलने का समय निकट आ रहा था, उस सवारी की तलाश व्यग्रता से बढते जा रही थी। आखिए में वह लड़का दौड़ते हुए आया और मेरे को बोला कि "महाराज आप मेरे को बस में छोड़ आए थे।" तो मैने कहा कि तु उतरा क्यों नहीं? तो उसने कहा कि "नींद लग गयी थी।" मुझे अनुभव हो गया कि ऐसे नींद लगाने वाले लोग रास्ते भर परेशान करेगें।" सुबह हरिद्वार पहुंचे, वहाँ टेन्ट की नगरी बसाई गयी थी। सभी ने रजिस्ट्रेशन करवा कर अपना अपना टेंट संभाला। टेंट में रुकने का मेरा यह पहला अनुभव था। ठंड अच्छी हो चुकी थी। ठंडे पानी से स्नान करना पड़ा। कौन गरम पानी का इंतजाम करके देता। यहां से गए यात्रियों ने वहां पहुंच कर अपना काम संभाल लिया, कोई सब्जी काटने लगा तो कोई तगाड़ी लेकर मिट्टी फ़ेंकने लगा। मतलब गुरु सेवा प्रारंभ हो चुकी थी। मैं आराम से कुर्सी पर बैठ कर देखता रहा। क्योंकि इस तरह का पहला अनुभव था।
द्रोणाचार्य गुफ़ा  सहस्त्र धारा
दुसरे दिन हमने (सीताराम गुरुजी और लखन वर्मा) ने तय किया कि घुमने चला जाए। जहां भी हम छत्तीसगढी में बात क्ररते थे आटो रिक्शा वालों का किराया 5 रुपए बढ जाता था, तो हमने तय किया कि इनसे बात सिर्फ़ मैं ही करुंगा। इसके बाद हम ॠषिकेष गए। दिन भर घूमे अच्छा लगा, शाम को गंगा आरती शामिल हुए। दुसरे दिन फ़िर वहीं पहुंच गए, चोटी वाले का होटल में नास्ता करके घूमे। लक्ष्मण झूला से मछलियों को आटे की गोलियां खिलाई। अगले दिन मसूरी जाने का कार्यक्रम बनाया। रात को हर की पौड़ी के पास एक ट्रेवलस से 155 रुपए में तीन टिकिट करवाई मसूरी के लिए, उसने बताया कि बस स्टैंड से सुबह 8 बजे 2x2 बस मिलेगी। जब हम बस स्टैंड पहुंचे तो हमे 3x2 की पिछली सीट में बैठाने लगा। मैने कहा कि टिकिट तो 2x2 का है और तुम 3x2 में बैठा रहे हो। उसने सीधा कहा कि "बैठ जाओ, नहीं तो पिट जाओगे", बड़ा अप्रत्याशित घटा। मेरा क्रोध चढ गया, मैने बिना कुछ कहे उसके सिर के बाल पकड़ कर तीन डंडे मारे तो स्टैंड के सारे ड्रायवर, कंडेक्टर आ गए। मैने गुरुजी से कहा कि "कंट्रोल रुम को फ़ोन करो, अभी इनकी सारी हेकड़ी उतार कर जाएगें। सालों ने दादा गिरी मचा रखी है। सवारियों से बदसलूकी कर रहे हैं।" फ़िर कुछ लोग बीच-बचौवल एवं मान मनौवल पर आ गए। उन्होने हमे सामने की सीट दी।
कैम्प टी फ़ॉल
अब नजारे देखते हुए, मसूरी की ओर चल पड़े। पहले स्थान था झंडू नाला, जिसे सहस्त्रधारा और द्रोणाचार्य गुफ़ा भी कहते हैं। यहां पहाड़ की चट्टानों से धाराओं में पानी निकलता है, मैने सोचा कि यही तो असली मिनरल वाटर है, न जाने कितने तरह की आयुर्वैदिक जड़ी बूटियों के सम्पर्क से बहते आ रहा है। वाटर बोटल में मैने पानी भर लिया। अब आगे चले तो पहाड़ियों की चढाईयाँ थी। चलते चलते टॉप पर पहुंचे, दृश्य इतने नयनाभिराम थे कि आँखों में ही नहीं समा रहे थे। कैमरे की आंखे भी नहीं समेट पा रही थी। पहाड़ों की रानी मसूरी आ चुकी थी। उपर पहुंच कर गाईड ने कहा कि"मसूरी के मौसम का और दिल्ली की लड़की का कोई भरोसा नहीं, कब धोखा दे जाए?" सभी सवारियाँ मुस्कुराकर रह गयी। मसूरी में माल रोड़ और गन हिल देखी। गनहिल तक रोप वे है। 50 रुपए टिकिट ले रहा था रोपवे वाला। वहां से कैम्प टी फ़ाल पहुंच गए, अच्छी जगह है, कैम्प टी फ़ाल की मैने 100 साल पुरानी तश्वीर देखी थी कहीं लेकिन अब वैसा नहीं है। इसके चारों तरफ़ अतिक्रमण की बाढ है। दुकानदारों ने इसे चारों तरफ़ से घेर इसकी सुंदरता को बरबाद कर दिया है। बाकी फ़िर कभी..........
आचार्य सतीश - अनंतबोध बाबा जी
आज मैं फ़िर एक सामुहिक यात्रा में चल पड़ा हूँ, जो मथुरा, वृंदावन से दिल्ली, दिल्ली से हरिद्वार, हरिद्वार हम मसूरी एक्सप्रेस से जाएगें और हरिद्वार में डेढ दिन का मुकाम है, वहां से मसूरी जाना चाहूंगा, पुरानी यादें ताजा करने के लिए, फ़िर हरिद्वार से लखनऊ, लखनऊ के लिए एक दिन का पूरा समय है, वहां से लखनऊ नरेश के साथ श्रावस्ती जाने का कार्यक्रम है, श्रावस्ती में भगवान बुद्ध ने अपने जीवन का सबसे अधिक समय बिताया था। इस एतिहासिक स्थल को देखे बिना यात्रा अधुरी ही रहेगी। श्रावस्ती से अयोध्या आकर रायपुर के लिए वापसी करनी है। डेढ दिन हरिद्वार में गंगा के किनारे स्वीस कॉटेज का आनंद लिया जाएगा और ॠषिकेश भी घूमा जाएगा। बाबा जी नर्मदा तट पर धूनी रमा रहे हैं, उन्हे कह दिया है कि हरिद्वार पहुंच जाएं। इब तो बाबा जी को मिलना ही पड़ेगा, नहीं तो दंड भरने को तैयार रहें :)। यह यात्रा शांतिकुंज हरिद्वार के आमंत्रण पर हो रही है, वहां महापूर्णाहूति समारोह के युग सृजन महाकूंभ में शामिल होगें। हमारा 117 यात्रियों का दल अब चल पड़ा है भ्रमण पर। वापस आकर यात्रा की कथा सुनाएंगे। इस बीच अगर कोई ब्लागर मित्र सम्पर्क करना चाहते हैं तो फ़ोन पर उपलब्ध हूँ।

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर यादें
    एक-एक घटना का विस्तृत विवरण, जाट देवता की पोस्ट की तरह, वाह!
    ललितानन्द जी किस तारीख को कहां दर्शन देंगे, आपने यह तो बताया ही नहीं जी :)

    प्रणाम

    उत्तर देंहटाएं
  2. सस्ताहा के जमाना रहिस दाउ तो चल गी्स आज चौगुना लगही कम ले कम

    उत्तर देंहटाएं
  3. पुरानी यादें ताजा कर दीं, महफूजजी तो अब तक मण्डलाधिपति हो गये होंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. दोनों स्वामियों को साष्टांग प्रणाम !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. और चाहे कुछ भी हो इस बार ड्रायवर या कंडक्टर हेकडी तो ना दिखा पाएंगें।
    पूरी यात्रा शुभ हो

    उत्तर देंहटाएं
  6. यात्रा के लिए शुभकामनायें .

    उत्तर देंहटाएं
  7. दिल्ली कब टपक रहे हो, हम तो आपसे यही पकड लेंगे, घूम आओ जीवन में और रखा ही क्या है?

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर यादें...आपकी यात्रा शुभ हो...शुभकामनायें ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. यादें....


    कई बार सोने भी नहीं देती :)

    उत्तर देंहटाएं
  10. यात्रा की कथा की प्रतीक्षा है। शुभयात्रा।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बढिया यात्रा वृतांत।

    शुभकामनाएं.............

    उत्तर देंहटाएं
  12. हमें भी प्रतीक्षा रहती है, आपकी यात्राओं की.

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत सुन्दर! श्रावस्ती यात्रा विवरण का इंतज़ार रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  14. हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं. आपकी यात्रा अच्छे अनुभवों से परिपूर्ण और मंगलमय हो.

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपकी उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत सुन्दर विवरण
    शुभयात्रा
    सादर....

    उत्तर देंहटाएं
  17. मह्फूजानंद जी महाराज मिलेंगे. हालाँकि उसमें हमें संदेह है:)उनकी ट्रांसपोर्ट वालों से खासी दुश्मनी है :)
    फिर भी आपको यात्रा के लिए समस्त शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  18. आपकी यह सामूहिक यात्रा निरापद और सफल रहे.

    उत्तर देंहटाएं
  19. samuhik yaatra ka apna ek alag hi aanand hai... yaatra ke sajeev chitran prastuti hetu aabhar!
    aage kee yaatram mangalmay ho yahi shubhkamna hai..
    saadar

    उत्तर देंहटाएं
  20. आपके पोस्ट पर आना सार्थक लगा । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  21. arre! hm soche ki mahafoozanand mharaj ke baare me kuchh likha hai pr yahan to ve kahin nhi mile.lacknow naresh ko click kiye to sidhe mahfooz-dhaam pahunch gye ha ha ha yatra vritaant to achchha lga pr...... hr jagah dadagiri kaahe krte ho bhaai?bechare ko teen dande dhr diye 3x2 kono buri thi ha ha ha
    mahafooz maharaj se milo tnik gle lgay ke bheench lijiyo.shayad oo pahchan jaaye :)

    उत्तर देंहटाएं