बुधवार, 29 अगस्त 2012

लाफ़ागढ जमींदारी ---------- ललित शर्मा

लाफ़ागढ का सिंहद्वार
म लाफ़ागढ पहुंच गए, कुछ लोगों ने बताया था कि यहाँ प्राचीन मंदिर है, हमारी कल्पना में पाली, जांजगीर, भोरमदेव, शिवरीनारायण जैसा ही मंदिर था। इसे भी देख लिया जाए। छत्तीसगढ के गढों में सम्मिलित लाफ़ागढ का नाम सुना था। आज देखने का अवसर भी आ गया। लाफ़ागढ वनस्थली में बसा हुआ गाँव हैं। गांव में प्रवेश करने पर हमने मंदिर की पड़ताल की तो बताया गया कि थोड़ा आगे बढने पर आपको मंदिर दिखाई देगा। कच्ची सड़क पर चल कर आगे बढने पर छोटा सा ग्रामीण बाजार दिखाई दिया, जहाँ दो चार दुकाने हैं। सामने लाफ़ागढ जमीदारी का विशाल सिंहद्वार बना हुआ है। जिसके दोनो तरफ़ संतरियों के लिए कमरे हैं और उपर दो सिंह खड़ी हुई मुद्रा में बने हुए हैं। वहीं पर हमने कार खड़ी की और मंदिर में प्रवेश किया। मंदिर कोई अधिक पुराना नहीं है।


श्रीमती दुलौरिन कुंवरि द्वारा निर्मित मंदिर
लगभग 90 साल पहले यहाँ की जमीदार दहराज सिंह की बेवा जमीदारिन दुलौरिन कुंवर ने बनवाया था। ईंटों के बने इस मंदिर पर पीले चूने से पुताई की हुई है। भीतर राम लक्ष्मण सीता की मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहीं पर दहराजसिंह ने तेंदू के वृक्ष के समीप माँ काली का मंदिर बनवाया था। हमने मंदिर के चित्र लिए। गर्भगृह में अंधेरा होने के कारण वहां के चित्र नहीं ले सके। यह मंदिर जमीदार की संपत्ति है।सिंहद्वार से भीतर का हाल लाफ़ागढ जमीदारी का हाल बयान कर रहा था। चारों तरफ़ ढही हुई ईमारतें अपने स्वर्णिम काल को याद करके सिसकियाँ ले रही थी। कभी इस जमीदारी का रौब-दाब 84 गाँवों में हुआ करता था। उन गाँवों की जनता के भाग्य का फ़ैसला इसी गढ से होता था। चैतुरगढ भी लाफ़ागढ जमीदारी में ही शामिल है। लाफ़ागढ की जमीदारी काफ़ी दूर तक थी।

जमींदार का घर
वहाँ का कुल देवी महामाया मंदिर इनके पूर्वजों ने बनाया था। मंदिर से बाहर निकलते हुए मुझे एक पहटिया दिखाई दिया, उससे पूछने पर पता चला की लाफ़ागढ के जमीदार के वंशज यहीं रहते हैं और अभी मिल सकते हैं। भीतर प्रवेश करने पर कवेलू की छत वाला एक घर दिखाई दिया। वहाँ दो कुर्सियाँ थी, एक कुर्सी पर बनियान पहने और पंछा बांधे अधेड़ उम्र के सज्जन बैठे थे, हमने नमस्कार कर वर्तमान जमींदार के विषय में पूछा तो उन्होने हमे अपने पास बुलाया और बताया कि वहीं वर्तमान जमीदार हैं। खस्ता हाला लाफ़ागढ के जमींदार इस हाल में मिलेगें, मुझे आश्चर्य हुआ, हम तीन थे, तो उन्होने नौकर से और कुर्सियाँ मंगवाई और हमें बैठने कहा। उनसे चर्चा होने लगी। उनके पूछने पर हमने बताया कि चैतुरगढ घूमने आए थे, लेकिन वहाँ रास्ते की खराबी के कारण पहुंच नहीं पाए, इसलिए लाफ़ागढ का मंदिर देखते हुए लौटने का इरादा है। अब आपसे भेंट हो गयी तो और जानकारी मिल जाएगी।

चर्चारत- अरविंद झा, एरमशरण सिंह,  ललित शर्मा
उन्होने नौकर को पानी लाने के लिए आवाज दी, हमसे पूछा कि आप लोग पत्रकार हैं क्या? हमने कहा- इंटरनेटिहा पत्रकार हैं, नेट पर लिखते हैं। वे बोले-पहले भी बहुत पत्रकार आएं है, कुछ भी लिखते हैं, कई बार तो कहाँ लिखते हैं, इसका ही पता नहीं चला। मैने अपना कार्ड दिया और कहा कि मेरा लिखा आपको कार्ड में लिखे पते पर मिल जाएगा। मैने उनसे जमीदारी के विषय में पूछना शुरु किया। कहने लगे अब जमींदारी कहाँ रही? जमीन सीलिंग में निकल गयी। कुछ का हिस्सा बंटवारा हो गया, जैसे तैसे गुजर-बसर हो रहा है। तभी मुझे कुर्सी सरकाने को कहते हैं, दीवाल में ततैयों ने छत्ता बना रखा है। एक ततैये ने भी चुम्मा ले लिया तो एक दिन नाचना ही पड़ेगा खुशी में। कुर्सी सरका कर बैठने पर चर्चा आगे बढी। उन्होने बताया कि दुलौरिन कुंवर ने पर्वत दान किया था। मैने पर्वत दान का अर्थ पूछा तो पता चला कि एक बड़े पोले स्तम्भ में हजारों गाड़ी धान भर कर पूजा-पाठ के बाद लोगों को ले जाने की छूट दे दी। जिसके हिस्से जितना लगा वो ले गया।

90 वर्ष पुराना पर्वत दान का चित्र
ये अपने को तंवर कहते हैं। थोड़ी देर के बाद उठ कर एक किताब लेकर आए, जिसे हम स्मारिका कह सकते हैं, यह स्मारिका विक्रम संवत 2000 (1943 ईं) में रतनपुर में हुए विष्णु महायज्ञ के समय प्रकाशित की गयी थी। इसमें लाफ़ागढ जमीदारी का जिक्र करते हुए पृष्ठ क्रं 121 पर लिखा है- लाफ़ा- कुल रखबा 359 वर्गमील, मकान संख्या 16,357, जमींदार का पद - दीवान, ग्राम संख्या - 86 । आगे वर्णन है - यह जमीदारी रतनपुर के उत्तर दिशा में फ़ैली हुई है। लाफ़ा का गढ, पाली का मंदिर, तुमान के खंडहर ये सब इसके प्राचीन वैभव हैं। इसका प्राचीन इतिहास नहीं मिलता।

विष्णु महायज्ञ की स्मारिका का पृष्ठ 121
जमींदार परिवार का कहना है कि - हम असल क्षत्रिय हैं, हमारा आगमन 100 वर्ष (शायद यह छपाई की त्रुटि है 1000 वर्ष होगा) से भी अधिक हुए दिल्ली से हुआ था। सबूत के लिए ये एक ताम्रपत्र पेश करते हैं। इस ताम्रपत्र में लिखा है कि - राज पृथ्वीदेव लुंगाराव को 120 गाँव प्रदान करते हैं। ताम्रपत्र में 806 की मिती पड़ी है। इस प्रकार लाफ़ा जमींदारी इस परिवार के अधिकार में 1173 वर्षों से है। रायबहादुर हीरालाल इस ताम्रपत्र को सच्चा नहीं मानते। मृत जमींदार का कथन था कि यह जमींदारी उनके वंश में 21 पुश्तों से चली आ रही है। जबकि उनका पिता केवल 16 पुश्तों का दावा करता था। पर ये दोनो आँकड़े गलत हैं।

श्री हेरम्बशरण सिंह लाफ़ागढ जमींदार
यदि यह सच भी मान लिया जाए तो 1173 वर्षों की लम्बी अवधि को 16 या 21 पुश्तों में बांट कर अपनी बातों पर लोगों का विश्वास संपादन नहीं करा सकते। लाफ़ागढ जमींदारी में पहाड़ अधिक हैं, निवासी अधिकतर मांझी, महतो, बिंझवार एवं धनुहार जाति के हैं। लाफ़ागढ जमींदारी से होते हुए एक सड़क रतनपुर को चली गयी है। इसी रास्ते से प्राचीन समय में मिरजापुर तक व्यापार होता था। इस जमींदारी में लोहा बहुत मिलता है, जिससे बहुत से अघरियों का गुजर-बसर हो जाता है। यहाँ की मुख्य पहाड़ियाँ चित्तौरगढ (जिस पर लाफ़ा ग़ढ का किला है) पलमा और धितौरी हैं। काम काज श्रीमती दीवानिन दुलौरिन कुंवरि देखती हैं। सरवराकार दीवान रामशरण सिंह हमारे महायज्ञ के सभापतित्व का कार्य बड़ी योग्यतापूर्वक अपनी माता जी के प्रतिनिधि स्वरुप करते रहे। महायज्ञ को सानंद संपन्न करने में जो सहायता आप लोगों ने दी है वह बहुमूल्य है। हम लाफ़ागढ जमींदार के वंशज श्री हेरम्बशरण सिंह से बात कर रहे थे। ये पिछ्ली पंचवर्षी में कोरबा जिला के जिलापंचायत अध्यक्ष थे। इनके चाचा लाल कीर्तीकुमार सिंह यहाँ से 3 बार विधायक बने।

संवत 806 का विवादित ताम्रपत्र
बातचीत में रस आने लगा, हमारे युवा छायाचित्रकार पंकज सिंह जमीदारी के चित्र लेने लगे। हेरम्बशरण सिंह मुझे कुछ विशेष दिखाना चाहते हैं। वे उठकर भीतर गए और साथ कुछ लेकर आए। दो पट्टियों के बीच बंधा हुआ ताम्रपत्र उन्होने मुझे खोल कर दिखाया। मैने ताम्रपत्र को देखा और प्रथम दृष्टया ही मुझे इसके नकली होने का आभास हो गया। तब मैने स्मारिका में लाफ़ागढ के विषय में नहीं पढा था। इसकी भाषा देवनागरी है, प्राचीन भाषाओं का मुझे ज्ञान नहीं है पर प्रत्युत्पन्न मति से मैने खोपड़ी खुजाई। ताम्रपत्र में संवत 806 लिखा है वर्तमान में 2069 संवत चल रहा है अर्थात यह ताम्रपत्र 1263 वर्ष पूर्व टंकित किया गया था।

 गरमा गरम चर्चा
मैने ताम्रपत्र का भली भांति निरीक्षण किया। यह मशीन से निर्मित तांबे की प्लेट पर टंकित है। मशीन से निर्मित होने का अनुमान इसलिए है कि इसकी मोटाई सब तरफ़ एकसार है। 1263 वर्ष पूर्व ऐसी कोई मशीन नहीं थी जिससे तांबे की एकसार प्लेट बनाई जा सके। उस समय हथौड़े से पीट कर तांबे को फ़ैलाया जाता था। जिससे वह प्लेट कहीं मोटी और कहीं पतली होती थी। तथा हथौड़े की चोट के निशान उस पर स्पष्ट दिखाई देते थे। मैने कहा कि यह ताम्रपत्र मशीन से बना हुआ है। उन्होने भी स्वीकार किया कि कुछ लोग कहते हैं यह ताम्रपत्र असली नहीं है। पर मेरे पूर्वजों से मुझे यही प्राप्त हुआ है।

 एरमशरण सिंह जी का निवास
हेरम्बशरण सिंह सरल स्वभाव के गंभीर व्यक्ति हैं। उन्होने बताया कि कोरबा पुरातत्व संग्रहालय को उन्होने बहुत सामान दिया है। मैने सोचा कि बहुत का अर्थ बहुत होता है, शायद ट्रक भर के। उनका कहना था कि दो तलवार, एक कालीन, 2 फ़ोटो, 5 मूर्तियाँ उन्होने पुरातत्व संग्रहालय को दी। ये भी अच्छा रहा कम से कम कुछ तो पुरातत्व संग्रहालय के पास पहुंचा। जिससे लाफ़ागढ का नाम भी वहाँ प्रदर्शित हो गया। लाफ़ागढ का सरपंच इनके परिवार का ही कोई सदस्य है। घर के सामने जंग लगा हुआ एक ट्रेक्टर भी खड़ा है। हम लोगों की चर्चा को अरविंद झा डायरी में लिखते जा रहे हैं।

जमींदारी के खंडहर
हम लोगों को यहाँ लगभग एक घंटा हो गया था अगर एक अदद चाय मिल जाती तो बातचीत का आनंद आ जाता। शायद जमींदार साहब ही पिला दें। लेकिन जितनी देर हम रहे अंत:पुर से किसी के चाय लाने की आहट सुनाई नहीं दी। पंकज अब हमारे फ़ालतु झमेले से ऊब गया है लगता है। उसके चेहरे से ऊब झलकने लगी, अगर हम उठ कर नहीं चलते तो शायद देशी तमंचे की तरह फ़ट पड़ती। हमने हेरम्बशरण सिंह से विदा ली। उन्हे अपना पता ठिकाना दिया और उनसे मोबाईल नम्बर लिया। उन्होने मोबाईल के दो नम्बर लिखाए।

मंदिर का शिखर
हम पुन: पाली की ओर चल पड़े। लाफ़ागढ से बाहर निकलने पर दोराहा आता है, दायीं तरफ़ का रास्ता पोंडी जाता है और बांए तरफ़ का पाली। यहीं पर हमारी भेंट कोटवार लक्षमण दास से हुई। हमारे गाड़ी रोकने पर कोटवार लक्ष्मण दास ने कोटवारी सलाम बजाया। मैने सोचा कि लाफ़ागढ के बारे में कोटवार से अधिक कोई नहीं जान सकता। इसकी कई पीढियों से कोटवारी का काम चला आ रहा है। लेकिन इलाके की जानकारी के विषय में बोदा ही निकला। हाँ इससे गाँव के किसी भी व्यक्ति की जानकारी ली जा सकती थी।

 लक्ष्मणदास कोटवार
इनकी नजर तो लोगों पर ही रहती है जिसकी सूचना सप्ताह में एक बार थाने में जाकर देनी पड़ती है। मैने पूछा कि तुम्हारे गांव में लाफ़ा के मंदिर के अतिरिक्त और कौन-कौन से देवी-देवता हैं तो उसने बताया, रक्सा, बुड़हर, महामाया, ठाकुरदेवता, चूल्हादेव, अगिनदेव इत्यादि हैं। बाकी के विषय में बैगा से जानकारी मिल सकती है। अब इतना समय नहीं था कि हम बैगा से जानकारी लेने जाएं। लक्ष्मण दास को राम-राम करके हमने पाली का रास्ता पकड़ा। अरविंद के चेहरे पर अब राहत के भाव दिख रहे थे क्योंकि चल पड़े तो अब बिलासपुर पहुंच कर ही दम लेगें। आगे पढें……

11 टिप्‍पणियां:

  1. लाफागढ़ के बारे में पढ़कर अच्छी जानकारी मिली .. जमींदारी का खस्ता हाल भी क्या खूब है . हां ततैया से कभी मोहब्बत करने की भूल न कीजियेगा .. नहीं तो प्रेम की असह्य वेदना झेलनी पड़ेगी.

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  2. लाफ़ागढ के जमींदार की ही ऐसी हालत नहीं, राजस्थान में कई जागीरदारों की ऐसी हालात मिल जायेगी जिन्होंने अपना सब कुछ दान में लुटा दिया या किसी ने नशे में लुटा दिया|

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  3. लाफा-चैतुरगढ़ का नाम छत्‍तीसगढ़ों की सूची में तो है ही, गढ़ा मंडला के बावन गढ़ों की सूची में इसका नाम आता है. लाल साहब का नाम संभवतः हेरम्‍बशरण सिंह है.

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  4. @Rahul Singh

    उन्होने यही नाम बताया था और मैने उनके सामने ही लिखा था। फ़िर भी अगर कोई चूक सुनने और लिखने में हो गयी हो तो सुधार किया जा सकता है।

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  5. छत्तीसगढ़ का बहुत बड़ा भाग साहित्य की दृष्टि से छिपा हुआ है, उसे सबके सामने लाने का आभार..

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  6. आपकी यायावरी बहुत नयी जानकारी जुटाती है .... आभार

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  7. 36गढ़ के 36 गढ़ों में से एक गढ़ लाफागढ के बारे में इतनी सारी जानकारि‍यां एक साथ उपलब्‍ध करवाने के लि‍ये धन्‍यवाद.

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