बुधवार, 23 सितंबर 2009

काव्य मुक्तक

देख  कुछ गुलाब लाया हूँ  तेरे लिए 
तोहफे  बेहिसाब लाया  हूँ  तेरे लिए
चश्मेबद्दूर नज़र ना लगे  तुझे कभी
इसलिए नकाब भी लाया हूँ तेरे लिए

अभी तो आई अभी ही चली गई 
जिन्दगी कैसे  छलती  चली गई
घूँघट उठाया जैसे ही दुल्हन  का
बड़ी बेवफा थी बिजली चली  गई



मेरे शहर में कई इज्ज़त वाले  रहते हैं
लेकिन वो  इज्ज़त  देते  नहीं हैं ,लेते हैं
दो रोटियों का खुशनुमा अहसास देकर 
गरीब  तन  के  कपडे  भी  उतार लेते हैं   

शाम  से  सोचता   रहा  माज़रा  क्या है
चाँद है अगर तो  निकलता क्यूँ नहीं  है 
कब तक रहेगा यूँ ही इंतजार का आलम 
क्या नया चाँद कारखाने में ढलता नहीं है

तपती धूप में छाँव को तरसती है जिंदगी
भागते शहर में गांव को तरसती है जिन्दगी 
शहर जला था जब से दंगे की आग में लोगों 
बूढे बरगद की छावं को तरसती है जिंदगी

17 टिप्‍पणियां:

  1. तपती धुप में छाँव को तरसती हैं जिंदगी
    भागते शहर में गांव को तरसती हैं जिन्दगी
    शहर जला था जब से दंगे की आग में लोगो
    उस बूढे बरगद की छावं को तरसती हैं जिंदगी

    यह जिंदगी भी कितनी अजीब है न

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  2. मुक्तक बड़े जोरदार है उम्दा प्रस्तुति .

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  3. बहुत बढिया मुक्‍तक सुनायेव ललित भाई. मोर गांव ला सुघ्‍घर सुरता करेव बने लागिस.

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  4. शहर जला था जबसे दंगे की आग में लोगों ..निश्चित ही इस रचना के सामाजिक सरोकार तो हैं ।

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  5. Dhanyawad shardji. choti si kavita mein aapne kai baato ko badhi khubsurati se kah dala.

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  6. muktak aache hain lalitji. 'Tapti dhoop mein chaanw' to haasil-e-post hai. Shubhkamnayein.

    Ankur (http://gubaar-e-dil.blogspot.com)

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  7. bahut hi accha wah wah kya baat hau , lalit G me bhi ek kalmkar banna chhta hu aapki kya ray hai mere bare me, me aage kalpnik kavitay likhna chtha hu plz aapki ray de tnx.

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  8. क्या ने चाँद कारखाने मैं ढलता नहीं ..क्या बात है

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  9. कब तक रहेगा यूँ ही इंतजार का आलम
    क्या नया चाँद कारखाने में ढलता नहीं हैं

    तपती धुप..... छावं को तरसती हैं जिंदगी

    वाह जवाब नहीं है इनका, लाजवाब मुक्तक...
    अंतिम मुक्तक ने कुछ बीता हुआ फिर से आखों के आगे जीवंत कर दिया... ये मुक्तक जिंदगी की सच्चाई है... आभार

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  10. तपती धुप में छाँव को तरसती हैं जिंदगी
    भागते शहर में गांव को तरसती हैं जिन्दगी
    शहर जला था जब से दंगे की आग में लोगो
    उस बूढे बरगद की छावं को तरसती हैं जिंदगी

    ज़िंदगी की स्वाभाविक तस्वीर!

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