सोमवार, 8 नवंबर 2010

एक युद्ध खत्म हुआ--अगले युद्ध की तैयारी-----ललित शर्मा

कई महीनों से रसद एकत्रित की जा रही थी, गोले-बारुद और मन पसंद बंदूक-पिस्टल संभाली जा रही थी। कब युद्ध हो और सारा असला काम आए। वह दिन आ ही गया जिसका इंतजार था। निश्चित समय पर गोली बारी शुरु हो गयी। सहसा धमाकों की बाढ आ जाती है। गोलियों की बौछार लगातार हो रही है। इधर सम्पर्क साधा जा रहा है, हेलो हेलो चार्ली हियर हेलो हेलो कुमुक भेजो। गोलियां रुक रुक कर चलती हैं कुछ देर बाद। शुरुआत में जोश था कि फ़तह कर लेंगे। अब सारी रात रह रह कर धूम धड़ाके हो रहे हैं। तभी सुबह होते ही युद्ध विराम हो जाता है।पौ फ़टते ही यत्र तत्र युद्ध के अवशेष ही दिखाई पड़ते हैं। सारे सैनिक निढाल पड़े हैं। कोई यहां कोई वहां। गोलियों के खोखे और ग्रेनेड के सिक्के कुछ लोग सकेल रहे हैं। कुछ लोग निढाल सैनिकों की मरहम पट्टी कर रहे हैं। यही नजारा दिख रहा है। एक युद्ध आया और गुजर गया। याने विराम हो गया। तुफ़ान गुजर जाने के जैसी स्थिति दिख रही है या बेटी की बारात जाने के बाद के बाद की सुबह जैसी बात है। चहुं ओर सन्नाटा।
 
यह कोई युद्ध नहीं है लेकिन युद्ध जैसा ही है। दीवाली के त्यौहार की तैयारी और उसके जाने के बाद बस ऐसा ही कुछ लग रहा है। एक महीने पहले से तैयारी चल रही थी सभी व्यस्त थे, घर का हर प्राणी तैयारी में लगा हुआ था। एक-एक दिन गिने जा रहे थे। दीवाली के इंतजार में। माता जी चिंतित दिख रही थी कि कुम्हारी नहीं आई है दीए लेकर, अब बाजार से ही लाने पड़ेंगे जा कर।हमारी खानदानी कुम्हारी ही दीए लेकर आती है, तीन पीढियाँ तो मुझे देखते हो गए। पहले उसकी सास आती है अब बहु दिए लेकर आती है। श्रीमति कहने लगी कि लाई वाली (खील लाने वाली ढिमरी) नही आई है। इसे भी त्यौहार से पहले खील लाते देख रहा हूँ बचपन से। बिना खील के पूजा नहीं होती। इसलिए खील जरुरी है। इनके आते ही कुछ काम कम हो जाता है। 

अरे अभी तक पेंटर नहीं आए हैं। बहुत कम दिन रह गए हैं। उन्हे पकड़ कर लाओ। आंगन की घास नहीं छीली गयी है, कितना खराब दिख रहा है। गेट पर पेंट कराओ अब उस पर जंग लग गया है। समय बचा ही कहां है? दीवाली सर पर आ गयी है। चन्दु को पेंसिल जीन्स चाहिए।सलमान के जैसी। उसे तो वही लेना है। बस एक ही राग चल रहा है “मुन्नी बदनाम हूई तेरे लिए” ये जनाब मुन्नी को इतना बदनाम कर चुके हैं, इतना तो सलमान ने भी नहीं किया। एक स्कार्फ़ और चश्मा मिलते ही “दबंग दबंग दबंग”।

एक और रुठ कर बैठी है कि उसे तो स्कूटी चाहिए और कुछ नहीं चाहिए। अरे स्कूटी तो ऐसे कह रहे हैं जैसे तीन चक्के की सायकिल लेनी हो। सभी की अपनी फ़रमाईश। अब स्कूटी आ गयी तो अल सुबह चल दिए चलाने मैदान में और धड़ाम। स्कूटी उपर ये नीचे, स्कूटी भी तोड़ लाए, साथ में टांग भी फ़ोड़वा आए। दीवाली है कुछ तो धमाका होना चाहिए। दो घंटे तो ये भी नहीं बताए की टांग की मरम्मत हो गयी है। जब रुई और डेटाल ढूंढने लगी तो पता चला कि स्कूटी के साथ टांग की मरम्मत हो गयी है।रंगोली बनाने से पीछा छूट जाएगा। लेकिन छूटा नहीं, रंगोली बनानी ही पड़ी।
 
फ़िर पकवान बनाने की जद्दोजहद में लगे। खोवा (मावा) लेकर नहीं आया है, पहले ही बोल दिया था उसे धनतेरस को मावा ले आना। अरे आ जाएगा, जब 30 साल से मावा दे रहा है तो आज ही छुट्टी थोड़ी कर देगा। लो मावा वाला भी आ गया, अब तैयारी शुरु करो। अब आखरी काम बच गया आंगन की गोबर से लिपाई, गोबर से लिपाई जरुरी है, तभी तो लक्ष्मी जी घर आएंगी। ये महरी भी न जाने ऐन वक्त पे कहां मर जाती है।अंतिम क्षणों तक बस तैयारी चलती ही रही।
 
उदय, आदि, हनी को पिस्टल चाहिए पटाखे वाली, किसी को बड़े वाले अनार, कोई बड़ी फ़ुलझडियों की डिमांड कर रहा है। एक ने फ़रमाईश की, ईको फ़्रेंडली पटाखे चाहिए चाईना वाले। लो कर लो बात, अरे सारी डिमांड एक साथ कर दो फ़िर बाद में कुछ नहीं मिलेगा। एक लिस्ट बना कर दो। जब लिस्ट पटाखे वाले के पास पहुंची तो मत पूछो, जैसे सारे पटाखे वहीं चल गए।3800 का बिल बना दिया। जब घर पहुंचे तो श्रीमति जी ने बोली कि इतने के पटाखे लाने किसने कहा था? लिस्ट तो तुम्ही लोगों ने दी थी। उसी पर अमल किया है। करो तब मरो नही करो तब मरो।

अभी तक रंगीन बल्बों की झालर नहीं लगी हैं घर पर, जल्दी से लगाओ, देखो पड़ोसियों के यहां पर तो दो दिन पहले से ही लग जाती हैं, अब इस कम्पयुटर से पीछा छूटे तब तो कुछ करोगे। लगाते हैं भई इतना गरम होने की क्या जरुरत है। बालुशाही जल जाएगी। तोड़ा ठंड रखो।जितनी तैयारी हम दीवाली मनाने के लिए करते हैं समझ लो उतनी तैयारी एक युद्ध के लिए भी होती है। दोनों में कोई खास फ़र्क नहीं है। इधर भी धूम धड़ाका और उधर भी धूम धड़ाका। परम्परागत ढंग से पूजा करके दीए रौशन किए गए, लक्ष्मी जी पूजा हुई और पटाखे शुरु। रात भर पटाखे चलाते रहे। इधर फ़ोन भी घनघनाते रहे। युद्ध जीतने की बधाईयों का आदान प्रदान प्रारंभ हो चुका था और हम इधर नेट पर टिपियाने बैठ गए। सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

21 टिप्‍पणियां:

  1. सच में युद्ध-स्तर पर तैयारियाँ होती हैं आपके यहाँ।
    परंपरायें जीवित हैं भी तो ऐसे युद्धों के भरोसे ही, तो शर्मा जी हमारी तो यही कामना है ऐसे बहुत से युद्ध-वर्णन आपकी कलम से पढ़ने को मिलते रहें।
    शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. लिखना भी तो एक युध्द में लगे रहना है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. जितनी तैयारी हम दीवाली मनाने के लिए करते हैं समझ लो उतनी तैयारी एक युद्ध के लिए भी होती है। दोनों में कोई खास फ़र्क नहीं है। इधर भी धूम धड़ाका और उधर भी धूम धड़ाका।
    वाह बहुत सही और अच्‍छा लिखा है .. एक बार फिर से दीपावली की शुभकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. युद्ध ही तो है महाराज...कैसे कम आंके. :)

    उत्तर देंहटाएं
  5. ये आँखों देखा हाल लगभग सभी घरों का है | कुम्हारी ने आना बंद कर दिया है |आजकल हम जैसे राजपूत भी बनिया बन गये | इस लिये कुम्हारों ने भी अपनी परम्परा को त्यागना शुरू का दिया है |

    उत्तर देंहटाएं
  6. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा

    उत्तर देंहटाएं
  7. आखिर आपने बता ही दिया की कैसी मनी दिवाली ..:):)

    बहुत आनंद आया इस दिवाली रिपोर्ट को पढ़ कर ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. जय हो दादा जय हो !!
    खूब मनवाई दिवाली !

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपने इस पोस्ट के माध्यम से ‘घर घर की कहानी‘ का वर्णन कर दिया ...रोचक आलेख।

    उत्तर देंहटाएं
  10. पर्व की तैयारियाँ और उसके बाद की दशा का जीवंत वर्णन।

    @ एक युद्ध आया और गुजर गया। याने विराम हो गया। तुफ़ान गुजर जाने के जैसी स्थिति दिख रही है या बेटी की बारात जाने के बाद के बाद की सुबह जैसी बात है। चहुं ओर सन्नाटा।

    वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  11. दीवाली सचमुच एक मुहिम भी है. वैसे यह पोस्‍ट प्रवासी अभिभावकों के लिए बड़े काम की है, जो बच्‍चे के सवाल 'क्‍या होता है, दीवाली में' का ठीक जवाब नहीं दे पाते.

    उत्तर देंहटाएं
  12. मजेदार वर्णन

    कहानी घर घर की!

    उत्तर देंहटाएं
  13. अच्छा संस्मरण रहा, पढ़ते-पढ़ते जैसे जी लिया है.



    प्रेमरस.कॉम

    उत्तर देंहटाएं
  14. मजेदार मनी दिवाली :) अच्छा लगा पढकर.

    उत्तर देंहटाएं
  15. अच्छी मनी दिवाली आपकी . हमारे यहा तो एक भी रुपये के पटाखे नही आये . लेकिन यमाहा R 15 दिलानी पड गई भान्जे को .

    उत्तर देंहटाएं
  16. पुरानी दीवालियां क्रमश: याद आती रहीं खास तौर पर हाफ़ पेंट पहन कर टिकली फ़ोड़ना मगर चिंगारीयों की बदमाशियां देखिये हाफ़ पेंट तक में घुस जातीं थीं. अच्छा हुआ कि उदय पिस्टल का स्तेमाल कर रहे हैं

    उत्तर देंहटाएं
  17. दिवाली की तैयारी सचमुच किसी युद्ध से कम नहीं होती ...
    अच्छी पोस्ट !

    उत्तर देंहटाएं
  18. भाई साहब पोस्ट का इन्तेजार लम्बा हो गया.

    उत्तर देंहटाएं