रविवार, 18 सितंबर 2011

देखईया के जर जाये गऊकिन! --- ललित शर्मा

गणपति विसर्जन के दिन श्रीमती जी ने चेताया कि आज लम्बोदर महाराज जी को विदा करना है. कहीं चले मत जाना. दोपहर को सिराये आना इन्हें. हमने उनकी आज्ञा सिरोधार्य की. 11 दिनों के इस पर्व का उत्साह के साथ इंतजार रहता है. दिन में दो बार पकवानों भोग लगा कर लम्बोदर महाराज साल भर के लिए फिट हो जाते हैं. फिर उन्हें ३५४ दिन कुछ खाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. सुबह ६ बजे आरती शुरू हो गई. भगवान को भोग लगा कर प्रसाद ग्रहण कर ब्लोगिंग चमकाने बैठ गए. उधर श्रीमती जी गुड के मोदक बनाने में लग गई. तभी फोन की घंटी बजी, उठाने पर आवाज आई "मै मुलायम सिंग बोल रहा हूँ, आप ललित शर्मा जी ही बोल रहे हैं ना. मैंने कहा- बोल रहा हूँ, लेकिन आपने गलत नंबर लगा लिया. अमर सिंह को लगना चाहिए था. आपका और कांग्रेस का संकट मोचन तो वही है. मुझे काहे झमेले में फंसा रहे हैं. उन्होंने पूछा- आप कहाँ है? मैंने कहा घर पर हूँ आज गणेश भगवान को सिराने जाना है. तो उन्होंने कहा - घर से बाहर निकलिए हम गेट पर ही खड़े हैं. येल्लो हो गया बंटाधार .....

देखे तो मुलायम जी की कार गेट पर खड़ी है और वे कुण्डी खड़खड़ा रहे हैं. आइये आइये मुलायम जी कैसे इधर आना हुआ. आज रास्ता कैसे भूल गए? मुलायम जी बोले- आपकी याद आ गई थी इसलिए चले आये. कुछ चाय पानी तो पिलवाओगे? जरुर-जरुर क्यों पिलवायेंगे... अभी हाजिर होती है चाय और साथ में नास्ता भी. चाय नास्ता करके मुलायम जी ने हमसे राजिम चलने का आग्रह किया. लेकिन सुबह की दी हुयी श्रीमती जी की चेतावनी याद आ गई, नहीं तो उनके साथ निकल ही जाते. मुलायम जी मन मसोस कर हमसे विदा लेकर निकल लिए और हम फिर अपनी ब्लोगिंग की दुकान पर आ गए.  जरा एक दो ब्लॉग झांक लें. कहीं टिपिया दें. टिपियाने क्या लगे फंटूश फिल्म जैसा सीन उपस्थित हो गया. हम गए तो हिंदी ब्लॉग नगरिया और पहुच गए अंग्रेजी के ब्लोगों में. सोचे की भाई टिपियाना तो है ब्लॉगर के लिए जैसी हिंदी वैसी अंग्रेजी :) पर अंग्रेजों की नगरी से बिना टिपियाये वापस आना मतलब हार कर आना है. अगर हार गए तो जिल्ले इलाही को नागवार गुजरेगी और हमें मुफ्त की सजा मिलगी. तभी चाचा चौधरी जैसे दिमाग की बत्ती जली और हमारे लिए संकट मोचक बन कर आये NICE वाले सुमन जी. उनसे नाईस उधार लिया और अपनी तरफ से POST और जोड़ कर NICE POST का टिप्पणी १५-२० जगह पर चेप आये. इज्जत बची लाखों पाए.

इधर हम टिपियाते टिपियाते गणेश जी के विसर्जन का गुमताडा लगा रहे थे कि कहाँ और कैसे विसर्जन किया जाये. सोचा कि मोटर सायकिल पर बैठा के ले जायेगे और सिरा आयेंगे. गणपति बप्पा भी खुश और हम भी खुश. लेकिन उदय महाराज सुबह से कुछ और ही प्लान कर रहे थे. सारी गाड़ियाँ  घर में खड़ी थी. सभी बच्चों को कह आये कि ट्रक से चलेंगे गणेश विसर्जन करने के लिए झांकी डैम में. डेढ़ बज गया खाने का समय हो चूका  था. हमने भोजन के लिए कहा तो आदेश आया की पहले गणेश जी का विसर्जन करके आइये फिर खाना मिलेगा. शंख ध्वनि के साथ गणपति बप्पा की जय बोलकर गणपति महाराज को ट्रक में विराजित किया और सभी बच्चों को लेकर चल पड़े झांकी डैम की ओर, डैम का रास्ता ख़राब है. छोटे भाई ने गाड़ी कच्चे में ले जाकर ऐसी जगह फंसाई कि आस-पास में कोई सहायता भी नहीं. हमने खूब कोशिश की गाड़ी निकालने की. लेकिन कीचड़ इतना अधिक था कि चक्के स्लिप हो जाते थे. गाड़ी निकालने प्रक्रिया में सफल ना होने पर घर में फोन लगा कर दूसरी ट्रक और रस्से मंगवाए गए.

दूसरी ट्रक का इंतजार करते हुए इधर उधर नज़र दौडाई तो गायों और भेड़ों का झुण्ड दिखाई दिया. वह हमारे तक चरते हुए पहुँच चूका था. एक विद्यार्थी उन्हें चरा रहा था. उसकी ओर मुखातिब हुआ. बालक ७ वीं कक्षा का छात्र है. छुट्टी के दिन पिताजी के साथ गाय भेड़ चराने आता है. उसने बताया कि सीताराम गुरूजी पढ़ाते हैं.सीताराम गुरुजी को ह्रदय रोग हो गया है, उनकी दो आर्टरी में ब्लोक है. लेकिन बाई पास सर्जरी कराने की बजाय कपालभाती और अनुलोम विलोम कर रहे हैं. बाबाजी ने उन्हें कह दिया है कि उनकी बीमारी योग से ठीक हो जाएगी. वे ठीक होने की आस में रोज धोंकनी चलाये जा रहे हैं. विश्वास में बहुत बल होता है. लगभग ३ वर्षों से उन्हें अटेक नहीं आया है. एक बार मेरे साथ हरिद्वार, ऋषिकेश और मसूरी की यात्रा करके आ चुके हैं. धर्म कर्म के प्रति उनका लगाव सदा से ही है. बालक से बात करते रहा तब तक उसके पिताजी भी खुमरी ओढ़े, भंदई पहने पहुच गए. राम राम होने के बाद भेड़ों के साथ दोनों चल पड़े.

समय व्यतीत करने बरगद के पेड के पास पंहुचा, थोड़ी डेरे छाया में विश्राम करने का लालच था. वहां पर पहले ही महिला मजदूरों ने कब्ज़ा कर रखा था. उनका यह भोजन और विश्राम का ठिया है. सोच लिया कि अब जगह नहीं मिलने वाली है. उनकी बातों का ही रस लिया जाए. एक कह रही थी --"कईसे या साग नई लानेच, भात संग मा, अथाने (आचार) धरे हच". दूसरी ने कहा - "सागो हां अड़बड़ महँगी होगे हे. तोरई हां घलो ४० रूपया किलो चलत हे. कतेक ला बिसाबे बहिनी, बखरी मा घलो पानी के मारे नई जागे, जम्मो बिजहा सरगे, मनमाने बरसत हे". तभी एक महिला पानी की बोतल लिए आ रही थी, उससे पूछा - कहाँ गिंजरत हस सुकवारो मंझनी मंझना?" सुखदास हां बाबु संग भर्री खार मा गे हवे, बिहनिया ले कांही खाए नई हे. अऊ मोला बजार जाना हे. घर मा कोनो नई हे. चल दुहूँ त खाए बार कोन दिही, तेखरे सेती ओखर मन बर भात साग ला अमरा के आए हंव." बात सुनते-सुनते हार्न की आवाज सुनाई दी, दूसरी ट्रक पहुँच चुकी थी. अब आशा बंध गई कि गणेश जी विसर्जित हो जायेंगे.

फंसे हुए ट्रक के चक्के के नीचे से एक बार फिर मिटटी कीचड़ निकाला गया. फावड़ा नहीं होने से दंताली का उपयोग किया गया. फंसे हुए ट्रक से दुसरे ट्रक को रस्सों से बांधा गया. बच्चे सारे ट्रक में बैठे-बैठे हलकान हो रहे थे. दोनों ड्राईवरों ने आपस में सहमती बनाकर एक साथ ट्रकों को चलाया, लेकिन रस्से ने साथ नहीं दिया. एक झटके में दम तोड़ गया. फंसे हुए ट्रक ने फिर जोर लगाया. अब वह बिना रस्से के ही कीचड़ से  निकल गया. इसे कहते हैं मुफ्त की मगजमारी. जब कहीं हलकान होना लिखा रहता है तो आदमी बेबात ही हलकानी में फँस जाता है. अगर यह ट्रक पहले ही निकल जाता तो दूसरी गाड़ी मंगाने कि जरुरत नहीं पड़ती. सारी विद्याएँ धरी की धरी रह गई. गाड़ी अपने मन से निकल गई. चल पड़े लिफ्ट की तरफ. पहुँचते ही गणपति बप्पा ने सारे पम्प चलवा दिये नहर में पानी आने लगा. हमने भी तय किया कि बप्पा को यही सिरा दिया जाये. पूजा पाठ करके नहर के हवाले कर दिया गया. 
         
महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना एशिया की सबसे बड़ी परियोजना मानी जाती है. महानदी के पर बने गंगरेल बांध से नहर द्वारा पानी यहाँ लाया जाता है. और फिर उसे २८ पंपों से लिफ्ट करके नहर में छोड़ा जाता है, जिससे यह पानी नहरों द्वारा आरंग एवं तिल्दा-नेवरा तक खेतों की सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जाता है. ३० बरस पहले जब इस परियोजना का निर्माण हो रहा था तो हम लोग इसे देखने आते थे. करोड़ों रूपये खर्च करके इस महत्वाकांक्षी योजना का निर्माण हुआ. इसके कारण आस पास के गांवों में दो फसल होने लगी, किसानो को इससे बड़ी राहत मिली. गणपति बप्पा अगले बरस आने का निमंत्रण स्वीकार कर अपने धाम को चले गए और हम भी उन्हें विदा करके घर पहुचे तभी खाना मिला. गणपति बप्पा मोरिया, अगले बरस तू जल्दी आ. ड्राईवर कह रहे थे- गणेश भगवान अब्बड़ वजनी होगे गा. लटे-पटे ठंडा हुईस....."देखईया के जर जाये" गऊकिन. 

23 टिप्‍पणियां:

  1. इसे कहते है डूबते को तिनके का सहारा,

    मुबारक हो नया ब्लॉग संग्रहालय बनाने के लिये भी देख लिया है
    मैंने भी।

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  2. हमारे लिए तो जिल्‍ले इलाही जैसे भी हैं चाचा चौधरी ही. चटखारेदार मिंझरा यानि हॉट मिक्‍स वेजिटेबल.

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  3. nice post. आनन्‍द आया ना? सुबह-सुबह मुलायमसिंह कहां से आ धमके? राज गहरा है।

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  4. श्रीमती जी ने चेताया कि आज लम्बोदर महाराज जी को विदा करना है. कहीं चले मत जाना. दोपहर को सिराये आना इन्हें. हमने उनकी आज्ञा सिरोधार्य की.

    भाई इतने शरीफ़ कब से हो गये?:)

    रामराम.

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  5. रचना का प्रवाह और आपकी शैली ने काफ़ी प्रभावित किया।

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  6. रोचक आलेख. दिलचस्प प्रस्तुतिकरण .

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  7. अंग्रेजी ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं कर पाना , मुलायम सिंह जी का आना ,गणेश विसर्जन , ट्रक का फंसना !
    कहाँ से कहाँ पहुंची बात !

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  8. गाँव की प्रष्ठभूमि में बहुत दिलचस्प लेख लिख लेते हैं आप ।
    चलिए बाप्पा जी का भी बेडा पार कर दिया । बधाई ।

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  9. बहुत ही रोचक लेख है आपका इसके लिए आपका आभार

    आप भी कमाल करतें है कहां गणपति विसर्जन से चले और मुलायम सिंह से बातचीत करते हुउ चाचा चैधरी से बातचीत करवाते हुऐ पुनः गणपति के रास्ते पर आकर चरवाहों को दिखाते हुए मजदूरों तक आराम करवाने के लिए पहुचा दिया और ट्रक को निकलवाकर उन्ही मजदूरों से नहर परियोजना का निर्माण करवाकर गांव का भला करवा लिया और पुनः गणपति को अगले बरस आने का न्योता भी दे डाला अगले बरस क्या करवाने का इरादा है। भाई ...

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  10. यह्हा... उत्ता धुर्रा पानी गिरई ए ग... चारों डहार चिखला माते हवे...
    ओ दिन बिलईगढ़ म हमरो जीप हर अरहज गे रिहिस... ले दे के उंहा ले निकलेन त कोल्हान पार म रात भर बईठना परिस.... जी छूट गे भीतरी म मारे मच्छर... अउ बाहिर म सांप उ मन सरसर सरसर बोहात रहय...
    फेर बढ़िया लिखे हवस ए पोस्ट ल... जय गणेश देवा....

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  11. य्या... ब्लॉग ललित के बधइ दे बर भुला गेंव... सुग्घर बने हवे.... बधइ... बधइ... बधइ

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  12. गणेश विसर्जन के साथ बहुत सी बातें जुड गयीं ... ब्लॉग ललित बहुत बढ़िया संकलन ... आभार इसकी जानकारी हेतु

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  13. एक ही पोस्ट में क्या क्या लपेट लेते हो ..

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  14. जैसे गुंगे की भाषा गुंगा ही समझता है जंगली हाथी को पालतु हाथी काबू में लाता है वैसे ही ट्रक की भाषा ट्रक ने ही समझी और ट्रक की ट्रिक काम आयी।

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  15. रचना का प्रवाह और शैली बहुत ही अच्छी लगी... क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग ने लेख में चार चाँद से लगा दिए...

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  16. ५०० वी पोस्ट के लिए अग्रिम शुभकामनायें....

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  17. बढिया रहा दिनभर का लेखा जोखा शामिल करते हुए लिखी गयी पोस्‍ट ..

    NICE POST .. बढिया टिप्‍पणी चेप आए हर जगह ..

    अंग्रेजी ब्‍लॉगर अबतक आपकी दानशीलता को महसूस कर रहे होंगे !!

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  18. आखिर विसर्जन हो ही गया ? बड़ी मस्कत ke साथ ..

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  19. ghatna kram rochkata ke sath jari raha...kab ek vakaye se doosre par aa gaye aur unhe aapas me jod gunth diya pata hi nahi chala...ganpati bappa ki jai...

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