सोमवार, 5 नवंबर 2012

करबीन टीले में दबे (unexplore) प्राचीन युगल मंदिर ..Sirpur Chhattisgarh......... ललित शर्मा

अवैध कटाई 
प्राम्भ से पढ़ें 
रबा-करबीन टीला के विषय में प्रभात सिंह से पूर्व में चर्चा हुई थी। पूर्व में जब सिरपुर आया था तो समय नहीं था कि सभी जगहों पर जा सकूँ। इस दौरे में हमने दो दिन निर्धारित किये थे।दिन में भ्रमण करना और रात में देखी गयी जगहों पर चर्चा करना। इन दो दिनों में विभिन्न विषयों पर खूब चर्चा हुयी। तीवरदेव विहार परिसर में बौद्ध भिक्षुणियों के लिए निवास के लिए पृथक व्यवस्था थी। जहाँ तक देखा गया है सन्यासियों के साध्वियों के निवास नहीं रहते। महिलाओं को विहारों में निवास को अनुमति बुद्ध ने ही दी थी और अनुमति देते हुए अपने शिष्य आनंद से  कहा था ..... आनंद! मैंने जो धर्म चलाया वह पांच हजार वर्ष तक टिकने वाला था लेकिन अब वह सिर्फ पांच सौ वर्ष तक ही चलेगा, क्योंकि हमने स्त्रियों को संघ में शामिल होने की प्रथा चला दी है।"

जंगल के राही, प्रभात सिंह और राजीव 
सिरपुर से लगभग 5-6 किलोमीटर दक्षिण में मुख्य मार्ग से लगभग आधे किलोमीटर पर करबीन तालाब है। छत्तीसगढ़ी में करबा-करबीन हिजड़ों को कहा जाता है। अनुमान है सिरपुर राजधानी में हिजड़ों के निवास की व्यवस्था आम रिहायश से पृथक होगी या इस तालाब का निर्माण किसी हिजड़े ने कराया होगा या हिजड़ों के निवास के समीप होने के कारण इस तालाबा का नाम करबिन तालाब रूढ़ हुआ होगा। मुख्य मार्ग से जंगल में जाने के लिए कार का मार्ग नहीं है। हमने कार सड़क पर ही छोड़ दी और पैदल ही जंगल में प्रवेश कर गए। नई जगह देखने का लालच यहाँ तक खींच लाया था। धूप सिर पर चढ़ रही थी। बरसात के मौसम में विभिन्न तरह के कीटों का जन्म होता है, कुछ का प्रजनन काल बरसात के बाद शरद के मौसम में। इनमे मकड़ियाँ प्रमुख हैं, जगह-जगह बड़ी-बड़ी मकड़ियों ने जले बना रखे हैं। इनसे बचते हुए चलना जरुरी है, अन्यथा थोडा सा भी मकड़ी का जहर विकलांग बनाने के लिए काफी है।

शिव मंदिर के भग्नावशेष - स्तम्भ 
जंगल में लकड़ियों की चोरी वन विभाग के सहयोग से बेखटके होती है, पहले वृक्ष को सुखा लिया जाता है, जड़ कमजोर होने पर काट कर इस्तेमाल कर लेते हैं। अगर कोई दबंग है तो हरे-भरे वृक्ष ही ईमारती लकड़ी में तब्दील हो जाते हैं। ऐसा ही नजारा हमें जंगल में दिखाई दिया। एक जगह बीजा का वृक्ष काट कर पटक रखा था। समय मिलते ही उसे पार किया जाएगा। आगे चलने पर कुछ वृक्ष और कटे दिखाई दिए। करबीन तालाब का दृश्य मनोहारी लगा। तालाब में कमल-कुमुदिनी खिले हुए थे। उसके आस पास की झाड़ियों में पिकनिक कर्ताओं के छोड़े गए अवशेष दिखाई दे रहे थे। जहाँ एक मुर्गा और एक बोतल दारू का इंतजाम हो जाये, वहीँ पिकनिक हो जाती है। मुर्गे के पंख उड़ रहे थे, साथ ही अंग्रेजी के एक ब्रांड की बोतल डिस्पोजल गिलासों के साथ दिखाई दे रही थी।

शिव मंदिर की चौखट के अवशेष 
थोड़ी दूर चलने पर मकोई की कटीली घनी झाड़ियाँ प्रारंभ हो गयी, यहाँ तो जंगल में कोई पगडंडी भी नहीं थी। इस स्थान पर कोई आता हो तो पगडंडी बनेगी। हम सामने टीला देख कर उसी दिशा में चल रहे थे। इस स्थान पर गर्मियों के मौसम में प्रभात सिंह पूर्व में आ चुके हैं, उस समय सभी झाड़ियाँ सूख जाती हैं, रास्ता दूर से ही दिखाई देता है। टीले में कुछ दूरी तक ईंटों के टुकड़े बिखरे हुए हैं साथ ही चारों तरफ पत्थरों का भंडार भी लगा हुआ है। यह स्थान भी खजाने के चोरों से सुरक्षित नहीं है। टीले पर पहुँचने पर पत्थरों एवं ईंटों के दो ऊँचे ढेर दिखाई दिए। ढेर पर चढ़ने पर दिखा की यहाँ किसी ने पहले ही खुदाई कर डाली है। एक गड्ढे में काली हांड़ी और स्टील की छोटी कटोरी पड़ी थी। इससे अनुमान है कि यह "हंडा" (सोने की मोहरों से भरी हांड़ी) ढूंढने वालों की करतूत है।

यायावर टीले पर 
दूसरे ढेर पर दो स्तम्भ दिखाई दे रहे थे, उससे थोड़ी ही दूर पर शिव मंदिर में जल निकासी के लिए बने गई जलहरी दिखाई दे रही थी , पत्थर पर खोद कर नाली को जलहरी का रूप दिया गया है। ढेर के ऊपर मंदिर की चौखट के दो पत्थर भी स्पष्ट दिख रहे थे। उत्तर दिशा में जलहरी होने पर अनुमान है कि यह मंदिर पूर्वाभिमुख रहा होगा। प्रभात सिंह ने बताया कि यहाँ किसी बाबा ने भी कुटिया बना कर डेरा डाल लिया था, जोत भी जलाने लगा था, लेकिन दाल नहीं गलने पर डेरा-डंडा उठा कर चलते बना। पहले टीले से तो स्पष्ट है कि यह विशाल शिव मंदिर रहा होगा। इसके स्तम्भ भी विशाल हैं। दूसरे टीले के विषय में उत्खनन के उपरांत ही जानकारी मिल पायेगी कि उसके नीचे क्या दबा हुआ है। हमने कुछ चित्र लिए और लौट चले।

गुल्लू  का पेड़ (गिदोल)
मंदिर टीले से लौटते हुए मुझे एक बांस की लाठी मिल गयी, पसीने आने के कारण पसीना चुसने वाली छोटी मक्खियों ने परेशान कर दिया। झाड़ियों के बीच से निकलने के कारण पसीना खुजा रहा था। बांस की लाठी का उपयोग मैंने मकड़ियों का जाला हटाने में किया। रास्ते में एक खूबसूरत वृक्ष दिखाई दिया, जिसका तना सफेद एवं चिकना था, बड़े बड़े पत्ते सुन्दर दिख रहे थे। इस पर लगे फल शायद गर्मी के मौसम में फूट चुके थे, उसका खोल चार भागों में बंट कर सुन्दर फूल की तरह दिखाई दे रहा था। मैंने पहले कभी देखा नहीं था इस प्रजाति का वृक्ष। इसकी हमने फोटो ली, मकड़ियों के जालों से बचते हुए हम रास्ता भटक कर दूसरी जगह पर पहुच गए, यहाँ हमारे और सड़क के बीच  नाला होने के कारण पार करना मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं। हमने उचित जगह की तलाश आकर ध्यान से नाला पार किया। अगला पड़ाव था सिरपुर का पर्यटन सूचना केंद्र .................
   

9 टिप्‍पणियां:

  1. यायावर का प्राचीन धरोहर की खोज का सचित्र विवरण बड़े ध्यान से चाय की चुस्कियों के साथ पढ़ा . सबसे बड़ी खासियत यह मालूम पड़ी की आपने इतिहास का गहरा अध्ययन किया है साथ ही फोटोग्राफी का भी जवाब नहीं। ऐसा प्रतीत हुआ मानो हम सिनेमा देख रहे हैं जिसमे ललित भाई का तिबल रोल है। पिकनिक वालों की करतूत आप से भला और कौन पहचान सकता है? अंतिम अनुच्छेद (पैराग्राफ ) में गूलर के फल का विवरण ! और सार चीज तो यह है की प्रस्तुतिकरण का जवाब नहीं! बहुत खूब! यायावर का भ्रमण जारी रहे इसी तरह ....जय जोहार।

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  2. महिला भी हिजड़ा के अंतर्गत आती हैं? और इनका मूल धरम क्या होता है? पुरुष हिजड़ा तो थोडा बहुत समझ आ जाता है. आपने शानदार जगह को खोजा और तथ्य बिखेरे आभार .

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  3. दिलचस्प घुमक्कड़ी और वृतांत !

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  4. बीन, करबा का बहुवचन है करबीन या कोई और अंतर ?

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  5. पृथ्वी के गर्भ में छिपे इतिहास के अध्याय..

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  6. बहुत बढ़िया वृत्तान्त, प्रकृति के संरक्षण और वनों की अवैध कटाई पर आपकी चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही है... आशा है सरकार भी इस दिशा में कुछ सकारात्मक कदम उठाएगी... शुभकामनायें

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