शनिवार, 24 नवंबर 2012

अदृश्य रहस्यमय गाँव टेंवारी

रती पर गाँव-नगर, राजधानियाँ उजड़ी, फिर बसी, पर कुछ जगह ऐसी हैं जो एक बार उजड़ी, फिर बस न सकी। कभी राजाओं के साम्राज्य विस्तार की लड़ाई तो कभी प्राकृतिक आपदा, कभी दैवीय प्रकोप से लोग बेघर हुए। बसी हुयी घर गृहस्थी और पुरखों के बनाये घरों को अचानक छोड़ कर जाना त्रासदी ही है। बंजारों की नियति है कि वे अपना स्थान बदलते रहते हैं, पर किसानों का गाँव छोड़ कर जाना त्रासदीपूर्ण होता है, एक बार उजड़ने पर कोई गाँव बिरले ही आबाद होता है। गरियाबंद जिले का केडी आमा (अब रमनपुर )गाँव 150 वर्षों के बाद 3 साल पहले पुन: आबाद हुआ। यदा कदा उजड़े गांव मिलते हैं, यात्रा के दौरान। ऐसा ही एक गाँव मुझे गरियाबंद जिले में फिंगेश्वर तहसील से 7 किलो मीटर की दूरी पर चंदली पहाड़ी के नीचे मिला।
गूगल बाबा की नजर से 
सूखा नदी के किनारे चंदली पहाड़ी की गोद में 20.56,08.00" उत्तर एवं 82.06,40.20" पूर्व अक्षांश-देशांश पर बसा था टेंवारी गाँव। यह आदिवासी गाँव कभी आबाद था, जीवन की चहल-पहल यहाँ दिखाई देती थी। अपने पालतू पशुओं के साथ ग्राम वासी गुजर-बसर करते थे। दक्षिण में चंदली पहाड़ी और पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती सूखा नदी आगे चल कर महानदी में मिल जाती है। इस सुरम्य वातावरण के बीच टेंवारी आज वीरान-सुनसान है। इस गाँव के विषय में मिली जानकारी के अनुसार इसे रहस्यमयी कहने में कोई संदेह नहीं है। उजड़े हुए घरों के खंडहर आज भी अपने उजड़ने की कहानी स्वयं बयान करते हैं। ईमली के घने वृक्ष इसे और भी रहस्यमयी बनाते हैं। ईमली के वृक्षों के बीच साँपों बड़ी-बड़ी बांबियाँ  दिखाई देती हैं। परसदा और सोरिद ग्राम के जानकार कहते हैं कि गाँव उजड़ने के बाद से लेकर आज तक वहां कोई भी रहने की हिम्मत नहीं कर पाया।
रमई पाट के पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव

ग्राम सोरिद खुर्द से सूखा नदी पार करने के बाद इस वीरान गाँव में अब एक मंदिर आश्रम स्थित है। रमई पाट के पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव कहते हैं- जब हम जंगल के रास्ते से गुजरते थे तो एक साल के वृक्ष की आड़ में विशाल शिवलिंग दिखाई देता था। जो पत्तों एवं घास की आड़ छिपा था। ग्रामीण कहते थे कि उधर जाने से देवता प्रकोपित हो जाते हैं इसलिए उस स्थान पर ठहरना हानिप्रद है। इसके बाद मंगल दास नामक साधू आए, उनके लिए हमने पर्णकुटी तैयार की। पहली रात को ही हमे भयावह नजारा देखने मिल गया। हम दोनों एक चटाई पर सोये थे, बरसाती रात में शेर आ गया और झोंपड़ी को पंजे से खोलने लगा। हम साँस रोके पड़े रहे और भगवान से जान बचाने की प्रार्थना करते रहे। छत की तरफ निगाह गयी तो वहां बहुत बड़ा काला नाग सांप लटक कर जीभ लपलपा रहा था। हमारी जान हलक तक आ गयी थी, भगवान से अनुनय-विनय करने पर दोनों चले गए। मैं झोंपड़ी से निकल कर शिवलिंग के सामने दंडवत हो गया। उस दिन के पश्चात इस तरह की घटना नहीं हुयी।
टानेश्वर नाथ महादेव

आश्रम में पहुचने पर भगत सुकालू राम ध्रुव से भेंट होती है, शिव मंदिर आश्रम खपरैल की छत का बना है, सामने ही एक कुंवा है। कच्ची मिटटी की दीवारों पर सुन्दर देवाकृतियाँ बनी हैं। शिव मंदिर की दक्षिण दिशा में सूखा नदी है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यह शिवलिंग प्राचीन एवं मान्य है। इसे टानेश्वर नाथ महादेव कहा जाता है, यह एकमुखी शिवलिंग तिरछा है। कहते हैं कि फिंगेश्वर के मालगुजार इसे ले जाना चाहते थे, खोदने पर शिवलिंग कि गहराई की थाह नहीं मिली। तब उसने ट्रेक्टर से बांध कर इसे खिंचवाया। तब भी शिवलिंग अपने स्थान से टस से मस नहीं हुआ। थक हार इसे यहीं छोड़ दिया गया। तब से यह शिवलिंग टेढ़ा ही है। मंगल दास बाबा की समाधी हो गयी। वे ही यहाँ रात्रि निवास करते थे, उसके बाद से आज तक यहाँ रात्रि को कोई रुकता नहीं है। अगर कोई धोखे से रुक जाता है तो स्थानीय देवी-देवता उसे विभिन्न रूपों में आकर परेशान करते हैं, डराते हैं। सुकालू भगत भी शाम होते ही अपने गाँव धुडसा चला जाता है।
सुकालू भगत

बाबा मंगल दास के पट्ट शिष्य परसदा निवासी भूतपूर्व सरपंच जगतपाल इस गाँव के उजड़ने का बताते हैं कि टेंवारी गाँव में इतने सारे देवी देवता इकट्ठे हो गए हैं कि त्यौहार के अवसर पर एक कांवर भर के उनके नाम के दिए जलाने पड़ते हैं। किसी देवता की भूलवश अवहेलना होने पर उसके उत्पात गाँव में प्रारंभ हो जाते थे। महिलाओं के मासिक धर्म के समय की अपवित्रता के दौरान अगर कोई महिला घर से बाहर निकल जाती थी तो ग्रामवासियों को दैवीय प्रकोप झेलना पड़ता था। बीमारी हो जाना, रात को जानवरों का बाड़ा स्वयमेव खुल जाना, मवेशियों को शेर, बुंदिया द्वारा उठा ले जाना, अकस्मात किसी की मृत्यु हो जाना इत्यादि दैवीय प्रकोपों को निरंतर झेलना पड़ता था। इससे बचने के लिए मासिक धर्म के दौरान पुरुष, महिलाओं के स्नान के लिए स्वयं पानी भर के लाते थे। सावधानी बरतने के बाद भी चूक हो ही जाती थी। तब फिर से दैवीय प्रताड़ना का सिलसिला प्रारंभ हो जाता था।
घरों के अवशेष 

एक समय ऐसा आया की सभी ग्रामवासियों ने यहाँ से उठकर अन्य स्थान पर निवास करने का निर्णय किया।  भागवत जगत "भुमिल" कहते हैं कि सोरिद मेरी जन्म भूमि है, लगभग सन 1934 में टेंवारी के ग्राम वासी सोरिद खुर्द, नांगझर एवं फिन्गेश्वरी  में विस्थापित हुए, 1920 के राजस्व अभिलेखों में इस गाँव का उल्लेख मिलता है। अदृश्य शक्तियों के उत्पात इस वीरान गाँव में तहलका मचाते हैं। यहाँ के शक्तिशाली देवता बरदे बाबा हैं, इनका स्थान चंदली पहाड़ी पर है। जगतपाल कहते हैं कि यदि इस पहाड़ी पर कोई भटक जाता है तो बरदे बाबा उसे भूखा नहीं मरने देते। उसे जंगल में ही चावल, पानी और पकाने का साधन मिल जाता है। यहाँ के समस्त देवी देवताओं की जानकारी तो नहीं मिलती पर मरलिन-भटनिन, कोडिया देव, कमार-कमारिन, कोटवार, धोबनिन, गन्धर्व, गंगवा, शीतला, मौली, पूर्व दिशा में सोनई-रुपई जानकारी में हैं तथा नायक-नयकिन यहाँ के मालिक देवी-देवता हैं।
ईमली के पेड़ों के बीच अवशेष 

जगतपाल कहते हैं कि जब मैं आश्रम में रुकता था तो तरह-तरह के सर्प दिखाई देते थे। दूध नाग, इच्छाधारी नागिन, लाल रंग का मणिधारी सर्प दिखाई देता था, वह अपनी मणि को उगल कर शिकार करता है, अगर मैं चाहता तो उसकी मणि को टोकनी से ढक भी सकता था पर किसी अनिष्ट की आशंका से यह काम नहीं किया। आश्रम में रात को सोनई-रुपई स्वयं चलकर आती हैं। मैंने कई बार देखा है। इस स्थान पर सिर्फ मंगल दास बाबा ही टिक सके, अन्य किसी के बस की बात नहीं थी। बाबा ने बताया था कि एक बार 12 लोगों ने मिल कर खुदाई करके सोनई-रुपई को निकल लिया था, पर ले जा नहीं सके। यहाँ कोई चोरी करने का प्रयास करता है उससे स्थानीय अदृश्य शक्तियां स्वयं निपट लेती है। कहते हैं कि इस पहाड़ी की मांद में सात खंड हैं, पहले खंड में टोकरी-झांपी, दुसरे खंड में नाग सर्प, तीसरे में बैल , चौथे में शेर, पांचवे में सफ़ेद हाथी, छठे में देव कन्या एवं सातवें में बरदे बाबा निवास करते हैं।
बाबा मंगल दास के पट्ट शिष्य परसदा निवासी भूतपूर्व सरपंच जगतपाल

टानेश्वर नाथ शिवजी के विषय में मान्यता है कि जब इसके पुजारी धरती पर जन्म लेते हैं तब यह (भुई फोर) धरती से ऊपर आकर प्रकाशित होते हैं, इनके पुजारी नहीं रहते तो ये फिर धरती में समाहित हो जाते हैं। साथ ही किंवदंती है कि टानेश्वर नाथ महादेव के दर्शन करने से सभी पाप एवं कल्मषों का शमन हो जाता है। टेंवारी गाँव उजड़े लगभग एक शताब्दी बीत गयी पर दूबारा किसी ने इस वीरान गाँव को आबाद करने की हिम्मत नहीं दिखाई। ईश्वर ही जाने अब टेंवारी कब आबाद होगा? शायद इसकी भी किस्मत केडी आमा गाँव जैसे जाग जाए।
सूखा नदी के किनारे यायावर 

22 टिप्‍पणियां:

  1. रोचकता और रोंमाच से भरपूर कहानी..

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  2. इस रहस्यमयी दौरे में हम भी शामिल हो लिए.

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  3. शर्मा जी रात रुककर हकीकत पता करते आप के साथ भी कुछ रोमांचक होता तो और मजा आता ।

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  4. शर्मा जी रात रुककर हकीकत पता करते आप के साथ भी कुछ रोमांचक होता तो और मजा आता ।

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. हर देश में ऐसे स्थान होते हैं जिनके रहस्यों का खुलासा कभी नहीं हो पाता.बहुत रोचक पोस्ट !

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  7. आश्चर्य जगह कि सैर करना आपके बस की ही बात है ...आपकी यायव्री को सलाम ...सुखी नदी में आप साबुत दिख रहे है....

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  8. बहुत ही अच्छा ऐतिहासिक पुरातात्विक उल्लेख
    आपको वहां रात को रूक कर और नया अनुभव करना चाहिए था।

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  9. पता नहीं कहाँ कहाँ घूमते हो आप भाई जी ...और आपके साथ साथ हम सब भी ......नेट के इतिहास में आपने अपना नाम अमर कर लिया है ...ये हम जानते है ...

    एक नई जगह को दिखाने और पढवाने के लिए ...धन्यवाद

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  10. बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई

    सीजी रेडियो पर सुनिए ... रुमाल का सफ़र

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  11. अद्भुत ....बहुत रोचकपूर्ण विवरण ....

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  12. ललित जी पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ , आपके ब्लॉग पर " अदृश्य रहस्मय गाँव टेंवारी " को पढ़कर बहुत अच्छा लगा । और हाँ ? बधाई हो , हम आपके 350 वें "अपने" बन गए है ।

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  13. एक उजाड़ गाँव अपने पीछे कितनी किंवदंतियाँ छोड़ जाता है

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