शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

भानगढ़ का मंदिर शिल्प

भूतिया कुंए का पानी पीते रतन सिंह जी
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सोमेश्वर मंदिर से दांई तरफ़ चलने पर घनी झाड़ियाँ है तथा इधर कोई रिहायसी निर्माण कार्य नहीं है। यहाँ पर शेवड़ों की मढियाँ और समाधियाँ है तथा एक भवन के बाहर शिवलिंग स्थापित है और भवन के भीतर गणेश जी। कहते हैं कि यहीं पर शेवड़े (शव साधक तांत्रिक) तांत्रिक उपासना करते थे। जो चेला दर चेला चली आ अही है। धूणे के पास एक छोटा सा कुंआ है, जिस पर डिब्बा और रस्सी रखी हुई थी। गढ में काम करने वाले मजदूर इसी कुंए से पानी पीते हैं। हमें भी प्यास लग रही थी। भरत सिंह ने पानी निकाला तथा हमने बारी-बारी से अपनी प्यास बुझाई। कुंए का जल शीतल होने के साथ मीठा भी था। इस दौरान चौकीदार हमारे साथ ही चल रहा था। झाड़ियों के बीच से हम रास्ता बनाते हुए टीले पर चढे। यह मंगला देवी का मंदिर था। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है। बलुए पत्थर से निर्मित मंदिर की कलात्मकता देखते ही बनती है। 

मंगला माता मन्दिर
भानगढ़ के मंदिरों में मुझे कहीं पर भी मिथुन  मूर्तियाँ दिखाई नहीं दी। जिस तरह अन्य प्राचीन मंदिरों में दिख जाती है। किसी भी प्राचीन मंदिर बहुत सारी नहीं तो एक मिथुन मूर्ति मिलती ही है। अगर मानव मिथुन मूर्तियाँ नहीं प्राप्त होती तो उनकी जगह पशु मिथुनरत मूतियाँ उत्कीर्ण होती हैं। प्रतीत होता है कि पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में मिथुन मूर्तियों का निर्माण शिल्पकारों ने बंद कर दिया होगा। जबकि प्राचीन काल में मिथुन मूतियों के निर्माण के पीछे मान्यता थी कि मंदिरों में मिथुन प्रतिमाएं बनाने के कारण उस पर तड़िक प्रकोप नहीं होता तथा वे मिथुन मूर्तियों को मंदिर में उत्कीर्ण कर जनता के लिए एक कौतूक पैदा करना चाहते थे। मिथुन मूर्तियों के निर्माण के पीछे अन्य कारण भी बताए जाते हैं। यहाँ मिथुन मूर्तियों के न होने से लगता है कि मिथुन दृश्यों का कौतुक जन सामान्य की निगाह में समाप्त हो गया था।

केशवराय मंदिर के पार्श्व में मंगला माता मंदिर
मंगला देवी मंदिर के गर्भगृह की प्रतिमा गायब है। इसके वितान पर 16 वाद्यकों का चित्रण है। संगीत में प्रयोग में आने वाले तत्कालीन वाद्यों का चित्रण शिल्प की समृद्धता का परिचायक है। इसके द्वार पर भी प्रतिहारों का अंकन है. इस मंदिर से थोड़ी दूर पर केशव राय का मंदिर है, इस मंदिर के गर्भ गृह में भी प्रतिमा नहीं है। गर्भ गृह के द्वार पर दंडधारी प्रतिहारों का ही अंकन है. इस मंदिर में कोई विशेष शिल्पकारी नहीं है। कहते हैं कि इन मंदिरों की प्रतिमाएं तत्कालीन राजा जयपुर ले गए थे। यहाँ पर हमने कुछ देर विश्राम किया। चौकीदार ने चर्चा के दौरान बताया कि यहाँ आर्कियोलाजी के 16 चौकीदार 4-4 की पाली में काम करते हैं। किसी को भी कभी कोई भूत प्रेत नहीं दिखाई दिया और न ही कोई आवाजें सुनाई दी। उसका कहना है कि लोगों ने इस तरह की अफ़वाहें उड़ा रखी हैं। उसने बताया कि एक बार मंगला माता के मंदिर तरफ़ आते हुए उसे शेर मिल गया था। हाथ में लालटेन लिए दो चौकीदार साथ थे और मंगला माता के मंदिर तरफ़ जा रहे थे। अचानक झाड़ियों में से शेर निकल कर सामने आ गया। उनकी तो घिघ्गी बंध गई। थोड़ी देर बाद शेर चला गया। यहाँ भूत प्रेतों की बजाए जंगली जानवरों का अधिक डर है।

भानगढ के यात्री
इस किले में 5 द्वार हैं जिन्हें हनुमान द्वार, फ़ुलवारी द्वार, अजमेरी द्वार, दिल्ली द्वार तथा लुहारी द्वार के नाम से जाना जाता है। 5 शताब्दी पूर्व भानगढ़ के समीप से अजमेर और दिल्ली जाने वाला मार्ग रहा होगा। इसलिए इन द्वारों का दिल्ली और अजमेरी द्वार नामकरण किया गया होगा। लुहारी द्वार से संबंधित कथानक है कि इस द्वार के समीप लुहारों की बस्ती थी। इस स्थान पर आज भी लौह मल के बड़े बड़े ढेर पड़े हैं। राजा को आयुधों के निर्माण के लिए सिद्धस्थ लुहारों की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्हे अलग बस्ती बनाकर बसाया गया होगा। इन लुहारों के वशंज समीप के गांवों में रहते हैं। गढ की प्राचीर के ये द्वार दूर-दूर स्थित हैं। भानगढ का क्षेत्र काफ़ी बड़ा है, इसे एक दिन में देख पाना संभव नहीं। जंगली जानवरों की आमद के कारण यहाँ पर रात्रि में भ्रमण करने अनुज्ञा नहीं दी जाती तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रात्रि में किसी भी संरक्षित स्मारक में जाने की अनुमति नहीं देता। इसमें भानगढ़ की कोई विशेष बात नहीं है। 

चलते चलते यात्रा समापन  चित्र
भानगढ़ से भ्रमण कर हम अब वापस जयपुर की ओर चल पड़े। मुझे अलवर से खैरथल जाना था और अन्य साथियों को जयपुर। चौकीदार से चर्चा होने पर उसने बताया कि 5 बजे आश्रम एक्सप्रेस दौसा से खैरथल जाने के लिए मिल सकती है। अगर आप 5 बजे तक दौसा स्टेशन तक पहुंच गए तो खैरथल जाने के लिए यह बढिया साधन है। भानगढ से दौसा लगभग 22 किलो मीटर की दूरी पर है। प्रदीप जी ने जल्दी ही मुझे दौसा स्टेशन पहुंचा दिया। यहाँ से मैने खैरथल की टिकिट ली। क्योंकि अगले दिन मुझे अलवर का बाला किला देखना था। एक घंटे प्रतीक्षा करने के पश्चात आश्रम एक्सप्रेस प्लेट फ़ार्म पर लगी। अंधेरा हो चुका तथा थोड़ी ठंड भी बढ चुकी थी। यह समय राजस्थान में अच्छी ठंड का था और मैने छत्तीसगढ़ के वातावरण के हिसाब से एक पतली सी स्वेटर ले रखी थी। खैरथल पहुंचते तक सिकुड़ कर आधा रह गया था। ...... आगे पढ़ें .......... 

16 टिप्‍पणियां:

  1. देश के दस प्रमुख रहस्यमय भूतिया स्थानों में भानगढ़ प्रमुख माना जाता है , मगर आपका वर्णन , विवरण ऐसे किसी किस्से की पुष्टि नहीं करता है . इसका कारण यह भी हो सकता है कि वहां शाम के बाद वाले अनुभव भयावह बताये गए हैं , रात को किले में रहा हुआ मनुष्य जिन्दा नहीं बचता .

    किले के शिल्प की रोचक जानकारी प्राप्त हुई .

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  2. आभार बढ़िया और नयी जानकारी के लिए ...

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  3. @वाणी गीत जी

    जिन्होनें भी शाम के बाद वाले अनुभव बताएं है वह अतिशयोक्ति के अलावा कुछ नहीं है। लगभग 5 साल पहले आज तक की टीम पूरी रात भानगढ़ में रह कर आई और सभी जिंदा हैं। किसी को कुछ नहीं हुआ। हमें भी अनुज्ञा मिल सकती थी रात को विचरण करने की लेकिन समय की कमी थी हमारे पास।

    साथ ही एक बात का खुलासा और कर देता हूँ कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वार सिर्फ़ भानगढ में दिन ढलने के बाद घुमने के लिए प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। यह प्रतिबंध उनके द्वारा संरक्षित देश सभी स्मारकों पर लागु है। लेकिन यहाँ नमक मिर्च लगा कर कहानी को रोमांचक बनाने की दृष्टि से गढ़ा गया है।

    भानगढ़ पर मेरी 3 पोस्टें अभी आनी बाकी हैं।

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  4. आपके द्वारा इतिहास के वह तथ्य पता चल रहे हैं जिन्हें इतिहास की पुस्तकों में स्थान मिला ही नहीं।

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  5. अगली 3 कड़ियों का भी इंतज़ार रहेगा.

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  6. बहुत संग्रहणीय आलेखों की श्रंखला, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  7. रोचक तथ्यों को उजागर करता बढ़िया आलेख....आभार

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  8. बढ़िया यात्रा वर्णन और रोचक समापन। आभार

    नये लेख : विश्व विरासत दिवस (World Heritage Day)

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  9. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (20 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  10. बहुत विस्तृत और अनोखी जानकारी। किसी भी मंदिर में मूर्ती क्यू नही है, शिवजी के मंदिर को छोड कर। आप के पर्यटन का हम जैसे अनभिज्ञों को भी जानकारी मिल रही है।

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