सोमवार, 22 अप्रैल 2013

अलवर राज

ब्लॉगिंग करते कब 4 साल बीत गए, पता ही न चला। आज "ललित डॉट कॉम" की 701 वीं पोस्ट है। इन वर्षों से अनेको ब्लॉगर्स से मुलाकात हुई, हजारों ब्लॉगों को पढा होगा। टिप्पणियों का अदान-प्रदान हुआ और ब्लॉग युद्धों का भी साक्षी बना। लेकिन जो मजा ब्लॉग़िंग का "ब्लॉगवाणी" एवं "चिट्ठा जगत" के रहते था। वह अब कहाँ। इन चिट्ठा संकलकों का स्थान कोई अन्य नहीं ले सका। अभी तक तो उर्जा बनी हुई है लेखन के लिए, कभी थोड़ा उतार चढाव भी आ जाता है। लेकिन ब्लॉगिंग निरंतर जारी है। इस अवसर पर सभी पाठकों को मेरी शुभकामनाएं। 
जिन्दोली घाटी की सुरंग 
दिल्ली जयपुर रेलमार्ग पर अलवर और रेवाड़ी के मध्य खैरथल स्टेशन स्थित है। राजस्थान की यह सबसे बड़ी अनाज की मंडी मानी जाती है। यह एक व्यापारिक नगर है, पूर्व में रेल लाईन पार करने के बाद इस नगर से लगा हुआ कस्बा किसनगढ़ बास है। यहाँ से सोहना तावड़ू एवं भिवाड़ी तिजारा के लिए यात्रा के साधन मिलते हैं। मुझे आज की रात खैरथल में गुजारनी थी और अगले दिन सुबह अलवर का भ्रमण करना था। दौसा से ट्रेन में सवार हुए तो टीटी ने सभी सवारियों को एस टू में खदेड़ना शुरु कर दिया। सारी सवारियाँ एक ही बोगी में भर दी। मैने इस रुट पर टीटीयों की अधिक मनमानी देखी है। जयपुर से दिल्ली के लिए कुल जमा कुछ गाड़ियाँ ही हैं तथा भीड़ इतनी अधिक रहती है कि कब किसका पर्स, घड़ी, अंगुठी पलक झपकते की पार हो जाए पता नहीं चलता। 

अलवर का मार्ग 
थोड़ी देर तक दरवाजे के पास अपने पिट्ठू पर बैठा रहा। फ़िर सामने एक सीट खाली हुई तो जगह बन गई। लगभग साढे सात बजे खैरथल स्टेशन पर पहुंचा। दिलीप मुझे लेने आया हुआ था। ठंड बढ गई थी, साथ ही चलती हुई हवा कानों को काट रही थी। घर पहुंच कर खाना खाया और 8 बजे ही रजाई में घुस गया। एक रजाई से ठंड कम नहीं हुई तो उस पर कंबल डाला तब कहीं जाकर आधे घंटे में गर्मी के साथ नींद आ गई। फ़ोन बजने लगा, लेकिन रजाई से बाहर हाथ निकाल कर फ़ोन उठाने की हिम्मत नहीं थी। फ़ोन दो बार बज कर अपने आप रह गया। सुबह 8 बजे गुदड़ों से बाहर निकला और स्नानाबाद से आकर नाश्ता करके मैं और दिलीप अलवर भ्रमण को चल पड़े।

झील 
खैरथल भी अरावली पर्वत श्रेणी में ही बसा हुआ है। पूर्व में अलवर जाने के लिए जिंदोली घाटी पर चढना पड़ता था। रास्ते में कई खतरनाक मोड़ आते थे। 1994 में यहाँ टनल बननी प्रारंभ हुई थी। जिससे अलवर और खैरथल के बीच की दूरी कम हो गई। आस पास के ग्रामीण अंचल के लोगों को भी इसका फ़ायदा मिला। हम इसी टनल से अलवर के लिए निकले। काफ़ी बड़ी और ऊंची टनल बनाई गई है। इसके निर्माण में एक खास बात यह थी कि इस टनल की खुदाई दोनो तरफ़ से की गई। यह इंजीनियरिंग का बड़ा करिश्मा है। पहाड़ को दोनो तरफ़ से खोद कर सुरंग का मिलान करना बड़ी बात हैं। 10 फ़ुट इधर उधर सरक जाए तो समय और धन का अपव्यय हो सकता था। टनल में पहाड़ों से पानी रिस कर आता है और यह गर्मी में भी ठंडी रहती है। बाहर 48 डिग्री तापमान में भी टनल में 20 डिग्री तापमान रहता है।

जय पोल 
अलवर का प्राचीन नाम शाल्वपुर है। अरावली पर्वत श्रृंखला से घिरा हुए अलवर शहर का इतिहास महाभारत काल से प्राचीन है। यह प्राचीन शहर अपने आगोश में सहत्राब्दियों के इतिहास को समेटे बैठा है। न जाने कितने राजाओं ने यहाँ राज किया और न जाने कितनी कहानियों का जन्म हुआ। महाभारत काल से इसके इतिहास का पता चलता है। महाभारत के युद्ध के पूर्व राजा विराट के पिता वेणु ने मत्स्यपुरी नामक नगर बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया था। पिता की मृत्यु के उपरांत राजा विराट ने मत्स्यपुरी से 30 मील पूर्व में विराट नगर बसा कर उसे राजधानी बनाया। किंवदन्ती है कि सरिस्का के वनों में पाण्डवों ने अज्ञातवास का कुछ काल व्यतीत किया। तीसरी शताब्दी में यहां गुर्जर एवं प्रतिहार वंशीय क्षत्रियों का अधिकार था।  

महल का पहला आँगन 
पाँचवी शताब्दी के आसपास इस प्रदेश के पश्चिमोत्तरीय भाग पर राज ईशर चौहान के पुत्र राजा उमादत्त के छोटे भाई मोरध्वज का राज्य था जो सम्राट पृथ्वीराज से ३४ पीढ़ी पूर्व हुआ था। इसी की राजधानी मोरनगरी थी जो उस समय साबी नदी के किनारे बहुत दूर तक बसी हुई थी। इस बस्ती के प्राचीन चिन्ह नदी के कटाव पर अब भी पाए जाते हैं। छठी शताब्दी में इस प्रदेश के उत्तरी भाग पर भाटी क्षत्रियों का अधिकार था। राजौरगढ़ के शिलालेख से पता चलता है कि सन् ९५९ में इस प्रदेश पर गुर्जर प्रतिहार वंशीय सावर के पुत्र मथनदेव का अधिकार था, जो कन्नौज के भट्टारक राजा परमेश्वर क्षितिपाल देव के द्वितीय पुत्र श्री विजयपाल देव का सामन्त था। इसकी राजधानी राजपुर थी। 

महल का भीतरी दृश्य 
१३वीं शताब्दी से पूर्व अजमेर के राजा बीसलदेव चौहान ने राजा महेश के वंशज मंगल को हराकर यह प्रदेश निकुम्भों से छीन कर अपने वंशज के अधिकार में दे दिया। पृथ्वीराज चौहान और मंगल ने ब्यावर के राजपूतों की लड़कियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया। सन् १२०५ में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चौहानों से यह देश छीन कर पुन: निकुम्बों को दे दिया। १ जून, १७४० रविवार को मौहब्बत सिंह की रानी बख्त कुँवर ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रताप सिंह रखा गया। इसके पश्चात् सन् १७५६ में मौहब्बत सिंह बखाड़े के युद्ध में जयपुर राज्य की ओर से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। राजगढ़ में उसकी विशाल छतरी बनी हुई है। मौहब्बत सिंह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र प्रतापसिंह ने १७७५ ई. को अलवर राज्य की स्थापना की।

टूटे हुए झरोखे से अलवर शहर 
खैरथल से अलवर प्रवेश के समय सबसे पहले झील दिखाई देती हैं, पहाड़ियों के बीच बनी इस झील के किनारे महल का निर्माण 1918 में किया गया। यह महल महाराज जय सिंह का निवास था। वर्तमान में यहाँ के सांसद कुंवर भंवर सिंह का कार्यालय का सूचना पट लगा दिखाई दिया। इससे आगे बढने पर थोड़ी चढाई के बाद पहाड़ पर किले के बुर्ज दिखाई देने लगे। यह किला शहर से 595 मीटर की ऊँचाई पर है। सरिस्का अभ्यारण क्षेत्र में होने के कारण इस किले की चौकीदारी निदानी वन खंड के वन विभाग के जिम्मे है। अभ्यारण क्षेत्र होने के कारण यहाँ किसी भी तरह का निर्माण वर्जित है। बाला किला निदानी वन खंड में धोंक, रोंझ, कालाखैर, कूमठा, गुर्जन, पलाश, गोयाखैर, खिरनी, कड़ाया, तम्बोलिया, जाल, गणगार, चापरेन, गुग्ग्ल, आकड़ा, अपामार्ग, मकड़घास, शतावरी, चिरमी(रत्ति),औरया आदि वनस्पति पाई जाती है। बघेरा, लकड़बग्गा, गीदड़, सांभर, चींटीखोर,चीतल, नीलगाय, जंगली सुअर, सेही, लंगुर, नेवला, पाटा गोह, जंगली बिल्ली, कबर बिज्जू, मोर इत्यादि जीव जंतु पाए जाते हैं। जैव विविधता एंव जंगली पशु पक्षी बाला किला के वन में देखने मिलते हैं। 

21 टिप्‍पणियां:

  1. 701वीं पोस्ट की बधाई
    काफी जानकारियां मिलती हैं आपकी पोस्ट्स से ...आभार

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  2. बस जमाये रहिये -बहुत शुभकामनाएं

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  3. खूबसूरत दृश्य और वर्णन अलवर के ...
    701वीं पोस्ट की बहुत बधाई और ऐसी अनगिनत पोस्ट के लिए शुभकामनायें !

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  4. Blogging me 4 Saal poore hone aur 701vi Post ke liye Bahut-Bahut Bdhai aur Shubhkamnayen. :)

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  5. अरे वाह 701 वीं पोस्ट.... बहुत-बहुत मुबारक हो!

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  6. aapkaa blog rochak aur soochanaaprad hamesha huaa karataa hai. shubhkaamnaaen ...!

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  7. हो आये खैरथल.... :)

    सोचा कभी....

    जब सुरंग नहीं बनी थी, जिन्दोली घाटी में स्कूटर पंचर हो जाए तो....
    एक बार हो गया था.

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  8. आजकल ललित भाई पुरातत्वविद की नजर से चीजों को देख रहें हैं जबकि हम तो उनकी यायावरी नजर के कायल हैं

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  9. रोचक तथ्यों की जानकारी के साथ बहुत सुन्दर चित्र...701 वी पोस्ट की बहुत-बहुत बधाई...

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  10. इतनी मनोरंजक यात्रा करवाने का शुक्रिया....
    ७०१ वी पोस्ट की बहुत बहुत बधाई....

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  11. 700 पोस्‍ट लि‍खने वाले ललि‍त जी को नमन...हि‍न्‍दी ब्‍लॉगजगत को समृद्ध करने में आपके योगदान के लि‍ये धन्‍यवाद....हमारी कामना हजारों-हजार पोस्‍ट प्रकाशि‍त हों आपके नाम से, आपके प्रयास से...

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  12. 'ब्लॉगिंग के शेर' को गौरवमयी और उपलब्धि भरे चार साल पूरे करने के लिए बहुत-बहुत बधाई....

    जय हिंद....

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  13. बधाईयां जी बहुत बहुत बधाईयां, यायावरी चलती रहे.

    रामराम.

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  14. दीपक बाबा

    जब सुरंग नहीं थी तब की फ़ोटु भी है मेरे पास। मैं भी स्कूटर से गया था। पिछली साल पुराने वाले रास्ते पर घूमा और संस्कृत गुरुकुल में भी गया, जहाँ गोली कांड हुआ था।

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  15. हमेशा कि तरह सूचनापरक और दिलचस्प

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  16. ब्लॉगिंग में चार साल मुबारक।
    ये सफ़र यूँ ही चलता रहे। शुभकामनायें।

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  17. मेरी ओर से भी बहुत बहुत बधाई ।
    अलवर मेरा ननिहाल है(हरसौली के पास एक छोटा सा कस्बा) लेकिन फिर भी अभी तक पूरा नहीं देखा है।

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  18. यायावर
    तुम सदा के
    संघर्ष-शील हो.
    तुम्हारी साधना को नमन
    क्योंकि
    तुम मेरे मित्र हो न..न
    क्योंकि तुम
    विवेचक हो.. साधक हो
    प्रतिबद्ध हो
    सादर
    गिरीश

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