मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

भानगढ़ की नर्तकियाँ

आरम्भ से पढ़ें 
भानगढ़ पहुंचने से पहले मैने आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के एक मित्राधिकारी को फ़ोन लगाया। कम से कम भानगढ़ में पुरातत्व विभाग के कोई अधिकारी मिल जाते तो हमें सहूलियत हो जाती। थोड़ी देर में उन्होने सब लाईनअप कर दिया और मिस्टर हरिनारायण का नम्बर दे दिया और कहा कि ये आपको साईट पर ही मिल जाएगें। भानगढ़ के किले की ओर जाने से पहले एक गाँव है, जहाँ बहुत सारे शिल्पकारों के परिवार रहते हैं। वे मार्बल की मूतियाँ बनाते हैं। देखने से ही लगता है कि इस गाँव में सिर्फ़ शिल्प का ही काम होता है। कारखानों के सामने बड़े बड़े पत्थरों को छीलते काटते हुए शिल्पकार दिखाई देते हैं। कुछ जगहों पर संगमरमर के बड़े-बड़े हाथी खड़े थे। पूछने पर पता चला कि मायावती की सरकार के समय इनको बनाने का आदेश दिया था। जब से मायावती की सरकार चली गई तब से हाथियों की कोई पूछ नहीं है। हमारी मजदूरी इन हाथियों के रुप में दरवाजे पर पड़ी है। 
जन पत्रकार (ब्लॉगर) - रतन सिंह शेखावत, प्रदीप सिंह शेखावत, ललित शर्मा
हमारे सामने से एक खुली जीप में रंग बिरंगी कैपरी पहने लफ़ाड़ूओं का एक झुंड हो हल्ला करते जा रहा है। उनकी निगाह हमारी तरफ़ पड़ी तो वे चुपचाप निकल लिए। अन्यथा रतनसिंह जी तो हमारे साथ ही थे, फ़िर वे कहीं के नहीं रहते। खेतों से होकर गुजर रही सड़क पे हम चल रहे थे। रास्ते में एक दुकान से कोल्ड ड्रिंक, पानी एवं कुछ स्नेक्स लिए, क्योंकि गढ़ में से तो कुछ मिलने से रहा। थोड़ी दूर सामने पहाड़ियों के बीच गढ़ दिखाई देने लगा। गढ़ की सुरक्षा के लिए मजबूत प्राचीर बनी है। इसके मुख्य द्वार पर हनुमान जी का मंदिर है। यहां कुछ लोगों की भीड़ दिखाई दी, कोई जाजम बिछा रहा था तो कोई कड़ाही उठा रहा था। लगता था आज लाल लंगोटे वाले के रोट की तैयारी हो रही है। आज मंगलवार का ही दिन था। गाँवों में बजरंग बली का रोट करने की परम्परा है। 
उत्खनन में प्राप्त हलवाई की भट्टी
भानगढ़ तीन तरफ़ पहाड़ियों से सुरक्षित है। सामरिक दृष्टि से किसी भी राज्य के संचालन के यह उपयुक्त स्थान है। सुरक्षा की दृष्टि से इसे भागों में बांटा गया है। सबसे पहले एक बड़ी प्राचीर है जिससे दोनो तरफ़ की पहाड़ियों को जोड़ा गया है। इस प्राचीर के मुख्य द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं। इसके पश्चात बाजार प्रारंभ होता है, बाजार की समाप्ति के बाद राजमहल के परिसर के विभाजन के लिए त्रिपोलिया द्वार बना हुआ है। इसके पश्चात राज महल स्थित है। किसी जमाने में त्रिपोलिया द्वार सुदृढ सुरक्षा रही होगी। फ़ोन लगाने पर हरिनारायण जी ने मुख्यद्वार से आगे आने कहा तथा गेट पर मिला चौकीदार भी साथ आ गया।

प्रथम द्वार स्थित हनुमान मंदिर और भक्तगण
एक स्थान पर उत्खनन हो रहा था। वहाँ काफ़ी मजदूर कार्य कर रहे थे, यहीं हमारी मुलाकात हरिनारायण जी से  हुई। उत्खनन के स्थान को हमने देखा। उत्खनन में पॉटरी मिल रही थी, यह बाजार का क्षेत्र होने के कारण आज हलवाई की दूकान का उत्खनन हो रहा था। उत्खनन भट्ठियाँ और मृदा भांड निकले हुए दिखाई दिए। समीप ही एक खंडहर संचरना भी दिखाई दी। जिसे मोडा सेठ की हवेली कहा जा रहा था। राजस्थान हरियाणा में मोडा "घर छोड़ सन्यासी" को कहा जाता है। मोडा सेठ नाम के पीछे लगता है किसी ने बचपने में इसका नाम बिगाड़ दिया होगा। मोडा मोडा करते मोडा ही रुढ़ हो गया होगा। वरना मोडा को हवेली बनाने की क्या जरुरत है? मोडा की तो वैसे ही मौज रहती है। एक कहावत है " गाछी, बाछी और दासी, तीनों संतों की फ़ांसी।"
मोडा सेठ की हवेली
बाजार क्षेत्र के प्रारंभ में नर्तकियों की हवेली दिखाई देती है। यहाँ आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने सूचना पट लगा रखा है। महल क्षेत्र से अलग बाजार में नर्तकियों की उपस्थित होने का तात्पर्य है कि इन्हें यहाँ विशुद्ध मनोरंजन के लिए बसाया गया होगा तथा तत्कालीन समाज में इनका उच्च स्थान था। अन्यथा ये नर्तकियाँ वर्तमान की तरह गली-कूचों की ही जीनत रहती। हवेली काफ़ी बड़ी है तथा प्रस्तर निर्मित है। अनुमान है कि यह भी बहुमंजिली रही होगी। मनोरंजनार्थ आवश्यकता पड़ने पर राजा इन्हें रनिवास में आमंत्रित करते होगें तथा मुख्य मार्ग पर इनकी हवेली होने से यह भी अनुमान लगता है कि राज्यातिथियों का स्वागत नृत्यादि एवं पुष्प वर्षा से होता होगा।  
नर्तकियों की हवेली
यहाँ से हमारा भानगढ़ का भ्रमण प्रारंभ हुआ। हनुमान द्वार से सीधी सड़क मुख्य बाजार के मध्य से होकर राजमहल तक जाती है। मार्ग के दोनो तरफ़ स्थित दुकानों का निर्माण बलुए पत्थर से हुआ है। वास्तु की दृष्टि से यह निर्माण उत्तम है। मेहराबों के आधार पर सभी दुकानें दुमंजिला हैं। जिनकी छतों को पत्थर के किरचों एवं चूने से बनाया गया है। ये छतें इतनी मजबूत हैं कि आज भी ज्यों की त्यों विद्यमान हैं। दुकानों में पैड़ियाँ बनी हुई हैं। पैड़ियों को आधार देने के लिए उनके नीचे मेहराब बने हैं। सभी दुकानों में एक परछी, एक अंतराल एवं एक गर्भ गृह है। सामान रखने के लिए ताक बने हैं। बाजार क्षेत्र को देखने से लगता है कि कभी इसकी रौनक बुलंदी पर होगी। बाजार का निर्माण सुव्यवस्थित तरीके से योजनानुसार किया गया है। जिससे उस काल खंड के वास्तुविदों की प्रवीणता का परिचय मिलता है। ......... आगे पढ़ें ..........

16 टिप्‍पणियां:

  1. आप जो भी लिख रहे हैं, सब संग्रह करने लायक है।भविष्य में आपके लेखन से बहुत लाभ होने वाला है।

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  2. बड़े ही रोचक तथ्य हैं। इतिहास की पुस्तकें तो एक दो राजाओं पर लिख कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती हैं, यह सच में पढ़ने योग्य है।

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  3. भारत में अगर जान-पहचान और जुगाड़ न हो तो बहुत परेशानियां होती हैं. चित्र काफी कुछ बता रहे हैं.

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  4. भानगढ़ के किले के बारे में सुना बहुत था , मगर भानगढ़ की लोकेशन की रोचक जानकारी आपसे ही मिली . किले में भूत भूतनियों से कैसा वास्ता रह , यह जानने की उत्सुकता है !

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  5. सुंदर भानगढ़ यात्रा. आगे की कड़ियों का इंतज़ार रहेगा. क्या हलवाई की भट्टी मॆं कहीं कोई कालिख नहीं दिख रही है.

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  6. P.N. Subramanian

    भट्टी के उपर निर्माण कर दिया गया है, यहां से पानी एवं अनाज रखने के बड़े मृदा भांड मिले हैं। सभी चित्र पोस्ट में लगाना संभव नहीं है। इसलिए नहीं लगाया।

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  7. सब कुछ वक्त के आगोश मे समा चुका है , एन खंडहरों को देखकर एक गाना याद आता है;
    वक़्त की पाबन्द हैं
    आते जाते रौनके
    वक़्त है फूलों की सेज
    वक़्त है काँटों का ताज
    वक़्त से दिन और रात ....

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  8. ललित बाबू, जयपुर आए और बिना मिले चले गए, इसीलिए भूतों ने तारीख हाईजैक कर ली और अप्रैल में दिसम्बर, 2013 की डेट पोस्ट में लिख दी। खैर, भानगढ़ के यात्रा संस्मरण का इंतज़ार रहेगा :)

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  9. रोचक भानगढ़ की यात्रा और सुन्दर चित्र संग वृतांत बहुत खूब

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  10. सचमुच किसी स्थान के बारे में उसके इतिहास से लेकर वर्तमान तक की इतनी रोचक और सटीक जानकारी अन्यत्र कहीं भी मिलना असंभव है. भानगढ़ के यात्रा संस्मरण का इंतज़ार है...

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  11. सही कह रहे है आप मोडा सेठ नाम के पीछे लगता है किसी ने बचपने में इसका नाम बिगाड़ दिया होगा।
    @ हमारे पास के कस्बे में एक शंकर खेतान था जो बड़ा नाटकबाज था इसलिए लोग उसे फैताली कहने लगे मतलब झूंठे फैताल करने वाला| आज उसके परिवार का सरनेम ही फैताली पड़ गया|
    - जिनकी छतों को पत्थर के किरचों एवं चूने से बनाया गया है।
    @ राजस्थान में इस तरह की छत बनाने को ढोला ढालना कहते है !!

    -बाजार में नर्तकियों की उपस्थित होने का तात्पर्य है कि इन्हें यहाँ विशुद्ध मनोरंजन के लिए बसाया गया होगा
    @ ये सिर्फ राजा व अथितियों के लिए ही नहीं वरन जनता के लिए भी थी उस काल में इतिहासकारों के अनुसार राजस्थान की जनता भी आमोद प्रमोद में डूबी रहती थी आपसी भाईचारा के साथ साम्प्रदायिक सद्भाव भी बहुत बढ़िया था

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  12. आपके साथ किला व उजड़ा शहर देखने से बहुत अच्छा पुरातात्विक ज्ञान वर्धन हुआ :)
    और आपसे मिले ज्ञान के आधार तो अब भानगढ़ का चौकीदार भी खूब झाड़ रहा होगा| तभी तो वह तन्मयता से आपके श्रीमुख से पुरातात्विक ज्ञान बड़े गौर से सुन रहा था और पर्यटकों के आगे ज्ञान को झाड़ने की आकांक्षा भी उसने जाहिर कर दी थी :)

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  13. बहुत रोचक, आगे का इंतजार है कि भूत भूतनियां कब नाचेंगी.:) मजा आयेगा उनसे मिलकर.

    रामराम.

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  14. मुझे ऐसा लग रहा जैसे मैं भी आपके साथ भानगढ़ की यात्रा कर रहा हूँ। :)
    सुन्दर तस्वीरों के साथ सुन्दर प्रस्तुति। धन्यवाद।

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  15. इतहास जीवित हो उठा ...सुन्दर वर्णन ..

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