मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

तार-तार कांच, लाल पीला प्रहरी और माओवादियों का हंगामा : काठमांडू

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
सुबह तय समय पर आँख खुल गई, कैमरे की बैटरी चार्जिंग में लगी दिख रही थी अर्थात पाबला जी ने रात को मेरे कैमरे की बैटरियाँ चार्जिंग में लगा दी थी। मौसम पनीला बना हुआ था। हल्की हल्की बूंदा बांदी जारी थी। हम स्नानाबाद से होटल की लाबी में आ गए। राजीव शंकर मिश्रा जी ने चाय तैयार करवा रखी थी। नगरकोट जाने वाले ब्लॉगर तैयार होकर एक एक कर लाबी में एकत्र हो रहे थे। चलते चलते एक फ़ोटो हम सब ने खिंचाई और गाड़ी में सवार हुए। होटल में पार्किंग की जगह कम होने के कारण हमारी गाड़ी फ़ंसी हुई थी। पाबला जी गाड़ी निकालने की कोशिश कर रहे थे, मैं सामने की सीट पर था, गाड़ी के पीछे गिरीश भैया और राजीव शंकर मिश्रा जी थे। दुबारा रिवर्स करने पर भड़ की ध्वनि उत्पन्न हुई। लगा कि कुछ टकराया है गाड़ी से। पीछे लगे कैमरे ने कुछ नहीं दिखाया। मैने मुडकर देखा तो पीछे का कांच फ़ूट गया था।
नेपाल की सुबह
पाबला जी ने गिरीश भैया से गाड़ी में बैठने कहा और वे बिना पीछे देखे आगे बढ गए। रास्ता खराब होने के कारण ट्रैफ़िक जाम होने का अंदेशा बताया था, अगर हम पाँच बजे से पहले नहीं चलते तो 3-4  घंटे ट्रैफ़िक जाम में खराब हो जाते, सो हम जल्दी ही चल पड़े थे। कांच टूटने की बोहनी हो चुकी थी, अब आगे का दिन कैसा होगा राम ही जाने। नीली छतरी वाले का सुमिरन करके वापसी की यात्रा शुरु हो गई थी। मुंह अंधेरे हम काठमांडू से चल पड़े। राजीव शंकर मिश्रा के बताए रास्ते पर चल कर हम त्रिभुवन राज मार्ग पर पहुंच गए अब हमें मुग्लिंग में जाकर बांए मुड़ना था, तब तक सीधा ही चलना था। 
सुबह काम पर जाता किसान
ज्यों ज्यों हम काठमांडू की उपत्यका से नीचे आते जा रहे थे त्यों त्यों दिन की रोशनी दिखाई देने लगी। जिस स्थान पर जाम लगने की आशंका थी वह स्थान हम पार कर चुके थे। हमने बजे काठमांडू के बाहरी इलाके में नागधुंगा चेक पोस्ट के पास पेट्रोल डलवाया सुबह का समय हो और लोटाधारी न दिखें, ये संभव ही नही है। लेकिन हमें नेपाल में सुबह सड़क के किनारे शौच करते नर नारी नहीं दिखाई दिए। लगभग 70 किलोमीटर तक तथा आते वक्त भी कोई भी लोटाधारी दिखाई नहीं दिया। भारत में तो प्रवेश करते ही पता चल जाता है कि हम भारत में हैं। सड़क के किनारे और रेलपटरियों पर शौच करना यहाँ के नागरिकों का परम धरम है और इसे कर्तव्य मान कर श्रद्धापूर्वक निपटाया जाता है।
नारायणी नदी और पुल
एक स्थान पर सुंदर दृश्य देखकर हमने गाड़ी रोकी, तब तक सूरज निकल चुका था। दुकान में चाय पूछने पर उसने मना कर दिया तो हमने लीची का ज्यूस ले लिया। चलो इसी से काम चलाया जाए। आगे चलकर हम मुग्लिंग पहुच रहे थे, यहाँ से नारायणगढ़ लगभग 35 किलो मीटर था। हमने योजना बनाई थी कि लगभग 10 बजे तक लुम्बिनी पहुंच जाएगें। लुम्बिनी में घूम कर  कुछ घंटे फ़ोटो ग्राफ़ी करेगें और शाम होते तक सीमा से पार हो जाएगें।एक स्थान पर गाड़ी रोककर हम लोगों ने नाश्ता किया। मुग्लिंग प्रवेश करने पर सड़क पर कुछ वाहन रुके हुए दिखाई दिए। मैने सोचा कि यहाँ पर कोई टोल बैरियर होगा। क्योंकि नेपाल में डंडा लगाकर बैरियर खड़ा नहीं किया जाता। टोल बैरियर होने का संकेत सड़क के बीच में मार्गविभाजक पर लगा दिया जाता है।
सीढीदार खेत
लेकिन यहाँ मामला और ही कुछ था। हमने गाड़ी रोक दी, साथ ही हमारा सोचना था कि पराए देश में किसी से उलझना ठीक नहीं है, भारत होता तो कुछ भी कर सकते थे। पराए देश के नियम कानूनों का भी पता नहीं होता। जब से राजीव शंकर मिश्रा ने मुर्गी वाला कानून बताया था तब से मैं और चौकन्ना हो गया था। सड़क पर मुर्गी देखते ही ब्रेक मार देता था। यहाँ जाम लगा हुआ दिखाई दे रहा था। तभी एक ट्रैफ़िक पुलिस वाला आया, उसने गाड़ी का नम्बर देखते हुए बगल से निकल जाने को कहा तथा बताया कि चुनाव की मांग को लेकर माओवादियों ने आज नेपाल बंद का आह्वान किया है। आप लोग चाहें तो निकल जाएं, वरना खड़े रहें। गिरीश भैया अचानक उस पर भड़क गए। मैं अंचभित हो गया, पाबला जी गिरीश भैया के मुंह की तरफ़ देखने लगे। उन्होने बात संभाली, पुलिस वाला भी तैश में आ गया था। 
सड़क किनारे नेपाली मकान (आधुनिकता का प्रभाव)
हम आगे बढे, चौराहे पर झंडे लिए भीड़ और कैमरा लिए पत्रकार उपस्थित थे। उन्होने रोकने की कोशिश की, लेकिन हम बच कर आगे बढ गए। नदी का पुल पार किया और आगे बढने पर मुझे लगा कि जिस सड़क से हम आए थे, वह सड़क नहीं है, हम किसी और रास्ते पर जा रहे हैं, क्योंकि यहाँ पर एक विद्र्युत निर्माण की युनिट भी दिखाई दी। गाड़ी रोक कर टुरिस्टर वाले से पूछा तो उसने बताया कि यह मार्ग पोखरा जाता है। हमने गाड़ी वापस की और पुन: उसी चौराहे पर आ गए जहाँ हड़ताली जमा थे। चौराहे से हमने गाड़ी सज्जे पासे मोड़ी तो कुछ लोग हल्ला करते हुए पीछे दौड़ने लगे। पाबला जी ने बैक मिरर में देखते हुए गाड़ी रोक ली। कुछ लोग मेरी खिड़की पर आए और कहने लगे कि "एक बेरामी है, उसे नारायणगढ़ तक ले जाईए।" मेरी समझ  में नहीं आया "बेरामी" क्या होता है। फ़िर उन्होने बताया कि कोई बीमार बूढा है जिसे नारायणगढ में इलाज करवाना है। मैने उन्हें गाड़ी में बैठ जाने कहा।
नारायणी नदी में गिरी जेसीबी  मशीन
हम नारायणगढ़ की ओर बढे। रास्ते में वह स्थान भी आया जहाँ पर जेसीबी लोडर नदी में गिरा हुआ था। हमने कार रोक कर उसकी फ़ोटो ली। लड़के ने बताया कि आज सब जगह हड़ताल और नेपाल के वाहन चलने नहीं दिए जा रहे। लगभग 10 बजे कुछ गाड़ियाँ फ़िर खड़ी दिखाई दी हमने उनके बगल से गाड़ी आगे बढाई, लौटते हुए एक कार वाले ने बताया कि आगे जाम लगा है, इसलिए हम रुकने के लिए होटल तलाश करने जा रहे हैं। हम आगे बढे तो जुगेड़ी के पास पुलिस थाना था, उसके सामने सिपाही खड़े थे तथा थाने के बराबर में ही एक होटल था। सिपाही ने गाड़ी आगे बढाने से मना कर दिया। वह लड़का बोला कि मैं इनसे बात करके आता हूँ। उसके प्रयास से भी गाड़ी आगे जाने नहीं दी। बताया कि भारतीय गाड़ियों के साथ तोड़ फ़ोड़ कर चालकों से साथ माओवादी मारपीट कर रहे है। लड़का और बूढा गाड़ी से उतर कर थाने के सामने बैठ गए और हमने गाड़ी होटल में लगा दी।
पाबला जी फ़ोटासन में
होटल अच्छा था, सुबह जल्दी चलने के कारण पेट भी गुड़गुड़ा रहा था, होटल मे प्रवेश करते ही टायलेट तलाशा। लौटने पर दिमाग हल्का हुआ, हाथ मुंह धोकर हम एक टेबल पर जम गए। ट्रैफ़िक खुलने की प्रतीक्षा करती अन्य सवारियाँ भी थी। बीयर की बोतल खोले समय पास कर रहे थे। नेपाली चैनल बंद के दौरान घूम धड़ाके की खबरें बता रहा था। सफ़र में 3 चीजे आवश्यक होती हैं, पहला ठहरने का सुरक्षित स्थान, दूसरा आवागमन का साधन और तीसरा खाना। मुझे तीनों आवश्यक चीजें यहाँ पर दिखाई दे रही थी। इसलिए ठहरने में कोई समस्या नहीं थी। हमने भी खाने का आडर दे दिया, आराम से खाते हुए टाईम पास कर रहे थे। वेटर भी स्मार्ट था, खाने की आपूर्ती फ़टाफ़ट करता था। खाने के बाद घड़ी देखी तो 12 बजे हुए थे। धूप इतनी चमकीली थी कि लग रहा था 2-3 बज गए। मैं वहीं बैंच पर लेट गया और झपकी आ गई।
होटल का वेटर
हल्ला सुनकर आँख खुली, जाम खुल गया चलो चलो। हमने फ़टाफ़ट अपना सामान उठाया और गाड़ी की तरफ़ दौड़े, सड़क पर ट्रैफ़िक सरक रहा था, पाबला जी ने कार एक बस के सामने डाल दी और हम भी लाईन में शामिल हो गए। थोड़ी दूर चलने पर ट्रैफ़िक फ़िर रुक गया। पाबला जी ने कहा कि गाड़ी फ़िर होटल में लगा लेते हैं।अब सैकड़ों गाड़ियों के बीच से अपनी गाड़ी निकाल कर पुन: होटल में लगाना मुझे जंचा नहीं क्योंकि गाड़ी होटल में ले जाने बाद फ़िर हम सैकड़ों गाड़ियों के पीछे चले जाते। जुगेड़ी और नारायणगढ़ के बीच रामनगर एवं चितवन का जंगल है, यहीं पर माओवादियों ने सड़क जाम कर रखी थी। यह स्थान जगेड़ी से लगभग 10 किलोमीटर दूर था। मैने गाड़ी में ही सीट सीधी कर ली और सो गया। गर्मी बहुत ज्यादा थी। पाबला जी गाड़ी से नीचे उतर कर सवारियों से बात करने लगे।
जाम के दौरान मोबाईल पर चुटकुले पढते गिरीश भैया और पाबला जी
नेपाल में अभी तक मैने एक भी सरदार नहीं देखा था। पता नहीं क्यों नेपाल तक सरदारों की पहुंच नहीं थी। नेपाल के लोगों को सरदार की पहचान नहीं है, वे पाबला जी को बाबा जी कह कर संबोधित कर रहे थे। गत हिन्दू राष्ट्र होने के कारण दाढी वाले और पगड़ीधारी इन्हें साधू महाराज ही लगते होगें। इसलिए बाबाजी का संबोधन जारी था। शाम 4 बजे ट्रैफ़िक खुला। गाड़ियाँ सरकती हुई आगे बढने लगी। चितवन के जंगल में पहुचने पर गाड़ियों के टूटे हुए शीशे सड़क पर दिखाई दिए। माओवादियों ने हमारे एक दिन का सत्यानाश कर कर दिया और लुम्बिनी देखने की हमारी योजना की भ्रूण हत्या हो चुकी थी। जाम का असर हमें नारायणगढ़ के बाद भी दिखाई दिया।
नेपाल की तरफ़ से दिखती भारतीय सीमा (सोनौली)
शाम ढलने लगी, नारायणगढ़ के साथ पहाड़ियाँ पीछे छूट रही थी। हम सीमा की ओर निरंतर बढ़ रहे थे, सीमा से पहले एक रास्ता बुटबल होते हुए भैरवाह जाता है तथा दूसरा रास्ता और है जो सीधे ही भैरवाह जाता है, हम इसी रास्ते पर चल रहे थे। भैरवाह से पहले पुलिस ने गाड़ी रोकी, कांच फ़ूटने का कारण पूछा, गाड़ी के कागजात देखे तथा कहा कि सीट बेल्ट बांध लो। नेपाल में सीट बेल्ट बांधना अनिवार्य है। हम पूरे नेपाल का सफ़र करके आ चुके थे, किसी ने सीट बेल्ट बांधने के लिए नहीं टोका। जब सीमा 20 किलोमीटर बची है, तब पुलिस वाला सीट बेल्ट बांधने का कानून समझा रहा था। पाबला जी ने कहा कि बांध लो और मैने सीट बेल्ट बांध ली। जब हम भैरवाह सीमा पहुंचे तो एक व्यक्ति ने गाड़ी के कागजात देखे और उसमें एक पेपर फ़ाड़ कर रख लिया। सीमा पर एक स्थान पर नम्बर प्लेट जमा करवाई। भारतीय सीमा में प्रवेश करने पर सीमा सुरक्षा बल के जवान ने थोड़ी पूछताछ की और हम भारतीय सीमा में प्रवेश कर नौतनवा की ओर बढ गए।

नेपाल यात्रा आगे पढें…………

9 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भूत यात्रा सुन्दर चित्र यायावरी

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  2. फोटासन और बाबाजी, ज्ञान में बढ़ोत्तरी :-)

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  3. पढ़ कर अच्छा लगा ललित जी !! नेपाल यात्रा हमारी भी हो गई आपके साथ- साथ !!

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  4. अभी-अभी नेट खोला, नेपाल के इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ कर कुछ जगह ठहाका मार कर हंसने मन हुआ, कुछ जगह मेरी 'पोल' भी खोल दी? खैर, यही तो है वृत्तांत, सच्चा वृत्तांत

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  5. बहुत ही बढ़िया चित्रण ...वह भी सचित्र इसलिए चित्रण शब्द ही प्रयोग करना सही है ....फोटासन वैगरह तो ठीक है, मगर सबसे अच्छी बात आपने भारतीयों के लिए लिखी है वह है "लगभग 70 किलोमीटर तक तथा आते वक्त भी कोई भी लोटाधारी दिखाई नहीं दिया। भारत में तो प्रवेश करते ही पता चल जाता है कि हम भारत में हैं। सड़क के किनारे और रेलपटरियों पर शौच करना यहाँ के नागरिकों का परम धरम है और इसे कर्तव्य मान कर श्रद्धापूर्वक निपटाया जाता है।" सबकीय (सबक लेने योग्य) है .....पढ़कर मजा आ गया ....

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