गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

अद्भुत काष्ठ शिल्प कौशल : पशुपतिनाथ

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
गोरखपुर के होटल के रुम के फ़र्श पर जलप्लावन से पानी आने के कारण गिरीश भैया के कपड़े भीग चुके थे, थोड़ा बहुत हमारा बैग गीला हुआ था। पाबला जी का सूटकेश गाड़ी में खड़ा रखा था। उन्होने कपड़े निकाले तब पुराने जमाने की याद आ गयी। पहले सभी घरों में आलमारी या पेटी इत्यादि तो होती नहीं थी। इसलिए लोग मटकी में बाहर आने-जाने वाले कपड़े रख लेते थे। साल छ: महीने में कहीं जाना होता था तो कपड़े निकाले जाते थे। उनकी सलवटें ही बता देती थी कि कितने दिनों तक उन्हें हंडियाशयन करना पड़ा है। कपड़ों की हालत ठीक वैसी ही थी जैसी हंडिया में रखे कपड़ों की होती है। अस्तरी करने का कोई साधन नहीं था। मैने कहा कि ऐसे ही पहन लिए जाएं, वैसे भी वर्तमान सलवटें वाले कपड़े का फ़ैशन चल रहा है।

नयानाभिराम भूदृष्यावलि
रेस्टोंट में पहुंचे तो नाश्ता कम भोजन अधिक टाईप का कार्यक्रम चल रहा था। रविन्द्र जी ने पहले ही चेता दिया था कि नाश्ता डट कर कर लीजिएगा। नाश्ते में आलू के पराठे और दही की जगह पूरी और छोले के साथ जलेबीबाई थी। पूरी और छोले देख कर मन भर गया। एक पूरी से ही भूखेच्छा पूर्ण हो गई। ब्लॉगर डटे हुए थे और हम उखड़ चुके थे। वातानुकूलित बस होटल के द्वारे डटी हुई थी। नाश्तोपरांत ब्लॉगर शनै: शनै: अपना स्थान ग्रहण कर रहे थे। जब हम बस में पहुंचे तो सामने की सीटों पर कब्जा हो चुका था इसलिए हमने पीछे की सीटें ग्रहण की। सामने की सीट से चलती गाड़ी में छायाचित्रकारी करने में आसानी रहती है। लेकिन मुझे अधिक फ़र्क नहीं पड़ना था क्योंकि मैं छायाचित्र लेते वक्त जुम का भरपूर इस्तेमाल करता हूँ।
वातानुकूलित चलयान में चिट्ठाकार

ब्लॉगर, ब्लॉगराधीश एवं सम्मानाधिक्षक के स्थान ग्रहण के पश्चात आज की यात्रा प्रारंभ हुई। बस में साऊंड सिस्टम लगा हुआ था। उसे मनोज पाण्डे जी के सहयोगी पाण्डे जी ने संभाला तथा काठमाण्डू के विषय में जानकारियाँ देन लगे। काठमांडू का प्राचीन नाम काष्टमंडप था। एक ही वृक्ष की से मंडप निर्माण होने के कारण इस स्थान का नाम का काष्ठ मंडप पड़ा। कालांतर में अपभ्रंश के रुप में काठमांडू जाना जाता है। इसे कांतिपुर भी कहते हैं। सबसे पहले हम पशुपति नाथ के द्वारे पहुंचे। नेपाल की पहचान पशुपति नाथ के कारण ही है, ये न होते तो नेपाल कहाँ होता क्या पता। हिन्दू तीर्थयात्री पशुपतिनाथ के ही दर्शन करने नेपाल पहुंचते हैं। यहाँ पहुंचने पर भी आम भारतीय मंदिरों जैसा दृष्य दिखाई दिया। वही माला, मोती, पूजन सामग्री की दुकानें सजी हुई थी। नेपाल की अधिकतर दुकानों में मालिक नहीं मालकिनें ही दिखाई दी। 
सतत कमेंट्री चालु आहे

भगवान पशुपतिनाथ की पूजा के लिए मैने 150 नेपाली मुद्रा की पूजन सामग्री खरीदी। हमारे मार्गदर्शक के रुप में मौजूद पाण्डे जी ने सभी को पूजन सामग्री एक ही स्थान से खरीदने की सलाह दी। इसका कारण वो जानें, पर हमने अलग जगह से खरीदी। बैग पाबला जी को थमाया और मंदिर प्रांगण में प्रवेश कर गए। मंदिर परिसर में कैमरे का प्रयोग वर्जित है। इसलिए मैं कैमरा साथ लेकर नहीं गया। मंदिर के मुख्य द्वार के बगल में स्वैच्छिक रक्तदान हो रहा था। नेपाली युवा रक्त दान कर रहे थे। मेरा भी मन हुआ कि एक युनिट रक्त दान कर ही दिया जाए। लेकिन मेरा रक्त इतना मीठा है कि ग्रहण करने के बाद लाभार्थी तो तब तक चक्कर ही काटते रहेगा। जब तक उसका पैट्रोल खत्म नहीं हो जाएगा। किसी को क्यों तकलीफ़ दी जाए यही सोच कर आगे बढ गया।
हमें काबू में करने के चक्कर में पंडा जी

मैने खरीदी हुई पूजन सामग्री मंदिर में चढाई। यहाँ के पुजारियों का हाल भी अन्य तीर्थों जैसा है। एक पंडा तो पूजा सामग्री की दुकान से ही मेरे पीछे पड़ गया था। उसका बस चलता तो वह जीते-जी ही मेरा पिंड दान करवा देता। लेकिन हमने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं, स्टील के बैरिंग के छर्रों से कंचे खेले हैं। थक हार उसने मेरा पीछा छोड़ दिया। मंदिर के वास्तु शिल्प में बौद्ध शैली का असर दिखाई देता था। मंदिर के पूर्व दिशा में गणेश जी का मंदिर है तथा नदी की तरफ़ एक अन्य मंदिर में शिवलिंग स्थापित है। यहाँ पंडे पुजारियों का जमावड़ा लगा रहता है, वे क्रमबद्ध रुप से अपने-अपने जजमानों का मुंडन करते हैं तथा इनके चंगुल में फ़ंसे दर्शनार्थी फ़ंसे-खुशी मुंडन करवा लेते हैं।
पशुपतिनाथ मंदिर (फ़ोटो-गुगल से साभार)

मंदिर परिसर में कैमरे का प्रयोग वर्जित है। लगभग बड़े मंदिरों में कैमरे का प्रयोग वर्जित कर दिया जाता है। सुरक्षा कारण बता कर इसका व्यावसायिक लाभ उठाया जाता है तथा मंदिर समिति द्वारा चित्र बेचे जाते हैं। मंदिर के मुख्यद्वार में प्रवेश करने पर पीतल निर्मित विशाल नंदी दिखाई देता है। धातू निर्मित इतना बड़ा नंदी मैने अन्य किसी स्थान पर नही देखा। लगभग 7 फ़ुट के अधिष्ठान पर सजग नंदी स्थापित है।  मंदिर पगौड़ा शैली में काष्ठ निर्मित है। मंदिर के शीर्ष पटल पर राजाज्ञा लगी हुई है तथा राजाओं के चित्रों के साथ द्वारा किए गए निर्माण की तारीखें भी लिखी हुई हैं। मंदिर के शीर्ष एवं दरवाजों पर सुंदर कलाकृतियों का निर्माण हुआ है। लकड़ियों पर भी बेलबूटों के साथ मानवाकृतियों की खुदाई की हुई है। भारवाहक, कीर्तिमुख का निर्माण दिखाई देता है। 
पशुपतिनाथ मंदिर एवं बागमती नदी (फ़ोटो-गुगल से साभार)

मंदिर की छत में लगी लकड़ियों पर भी सुंदर काष्ठ शिल्प का निर्माण हुआ है। इसके निर्माण कर्ता नेपाल के ही शिल्पी हैं। नेपाल में उन्नत किस्म की इमारती लकड़ी पाई जाती है। राजा के शासन काल  में यहाँ की इमारती लड़कियाँ भारत की काठमंडियों तक आती थी तथा भारत के ठेकेदार यहाँ जंगल काटने के ठेके लेते थे। इस काष्ठ शिल्प में मिथुन मूर्तियों का निर्माण किया गया है। जिसमें मैथुनरत स्त्री-पुरुषों को प्रदर्शित किया गया है। पशुपतिनाथ के दर्शनार्थी विग्रह की पूजा-पाठ के ध्यान में रहते हैं इसलिए मंदिर की शिल्पकला की ओर उनका ध्यान नहीं जाता। यहाँ का मिथुन शिल्प खजुराहो से कम नहीं है तथा लकड़ी में खोदी गई मिथुन मूर्तियाँ मुझे पहली बार देखने मिली। इस मंदिर में काम कला को काष्ठ कला में स्थान दिया गया है।  
काष्ठ मिथुन शिल्प -पशुपतिनाथ (फ़ोटो - गुगल से साभार)

जिज्ञासा होने के कारण  पूछने पर छोटे मंदिर के पास बैठे पुजारी ने बताया कि काष्ठ पर बनी 'पैगोढ़ा शैली' में मनुष्य के रति क्रिया को दर्शाया गया है। जब इंसान का विवाह होता है और पति पत्नी जब पहली बार संभोग करते हैं तो वो पशु रूप में हो जाते हैं। बाद में पति पत्नी का संभोग आसनों में बदलने लगता है। पत्नी पति को पाने लगती है, कामकला में आनंद आने लगता है। जब पति और पत्नी भोग विलास के उस चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाते है, जहां वो काम कला को काम क्रीड़ा में बदल लेते हैं तो पत्नी पति को नाथ के रूप में देखती है । इसीलिए मंदिर का नाम पशुपति नाथ है। इस दर्शन को प्रदर्शित करने के लिए मंदिर में काम कला पूर्ण मूर्तियों का निर्माण किया गया। इन दुर्लभ आकृतियों को मंदिर में इस लिए दर्शाया गया है ताकि मानव जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझा जा सके। 
नेपाल की वर्तमान दशा पर चिंतित नेपाली मानुष

पगौड़ा शैली में निर्मित इस मंदिर में चार द्वार हैं तथा दक्षिणी द्वार पर सोने की परत चढाई हुई है तथा अन्य तीन द्वारों पर चाँदी की पतरा चढा है। गर्भ गृह में स्थापित लिंग पंचमुखी है। पशुपतिनाथ लिंग विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पाँचवाँ मुख है। प्रत्येक मुखाकृति के दाएँ हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएँ हाथ में कमंडल है। प्रत्येक मुख अलग-अलग गुण प्रकट करता है। पहला मुख 'अघोर' मुख है, जो दक्षिण की ओर है। पूर्व मुख को 'तत्पुरुष' कहते हैं। उत्तर मुख 'अर्धनारीश्वर' रूप है। पश्चिमी मुख को 'सद्योजात' कहा जाता है। ऊपरी भाग 'ईशान' मुख के नाम से पुकारा जाता है। यह निराकार मुख है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है। काठमाण्डू में बागमति एवं विष्णुमति नदियों का संगम है। पशुपतिनाथ का मंदिर बागमति नदी के किनारे निर्मित है।
मंदिर प्रांगण में मुकेश सिन्हा जी 

अगर फ़ोटो लेने दी होती तो मंदिर की कलाकृतियों एवं निर्माण शैली का विस्तृत वर्णन किया जा सकता था। कैमरा होते हुए भी फ़ोटो न लेने देना मुझे बहुत अखर रहा था। यदि फ़िर कभी काठमांडू आना हुआ तो शासन से अधिकारिक तौर पर अनुमति लेकर फ़ोटो लेना है। मंदिर के सिंह द्वार के समीप ऊंचे अधिष्ठान पर कुछ स्तम्भ गड़े देखे। इन स्तंभों पर नेपाली देवनागरी में कुछ लिखा है। स्तंभों पर चाँद और सूरज बना हुआ है। पहले तो मैने सोचा कि ये सती स्तम्भ होगें। फ़िर ध्यान आया कि नेपाल के ध्वज में राज चिन्ह रुप में चांद सूरज को स्थान दिया गया है। अवश्य ही मंदिर के विषय में इन स्तंभों पर राजाज्ञा का अंकन किया गया होगा।
भोजपुरी गायक - सरोज सुमन  जी

मंदिर के पूर्व की तरफ़ के परकोटे से झांकने पर बागमति नदी दिखाई देती है। नेपाल के निवासी धार्मिक कर्मकांड एवं पिंडदान इत्यादि इसी नदी के तीर पर कराते दिखाई दिए। नदी के किनारे मुक्ति घाट बना हुआ है, यहाँ अंतिम संस्कार क्रिया होती है। इसके साथ मृतक संस्कार करवाने के लिए कई घाट बने हुए हैं। जिसका निर्माण शासकों ने कराया है। पुजारी ने बताया कि राजा राजेंद्र विक्रम की तीन रानियां थी। उन तीनों रानियों के नाम पर राजा ने काशी में मंदिर व घाट बनवाए। पहली रानी साम्राज्येश्वरी के नाम पर पशुपतिनाथ मंदिर, दूसरी रानी ललिता के नाम से ललिता घाट और तीसरी रानी राजराजेश्वरी के नाम पर ललिता घाट पर ही मंदिर का निर्माण करवाया।
पशुपतिनाथ विग्रह मधेश क्षेत्र के जिला सप्तरी के ग्राम विषहरिया

पशुपति नाथ का मंदिर मध्यप्रदेश के मंदसौर में भी है। इस स्थान पर भी श्रद्धालू पशुपतिनाथ के दर्शन करने आते हैं तथा नेपाल के मधेश क्षेत्र के जिला सप्तरी के ग्राम विषहरिया में भी स्व: बिहारीलाल देव द्वारा निर्मित पशुपति नाथ का मंदिर है। नेपाल के राजा राजेन्द्र विक्रम ने वाराणासी में भी 18 वीं सदी में पशुपति नाथ के मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर का शिल्प भी नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर जैसा ही बनाया। इसका निर्माण नेपाल के कारीगरों ने ही किया। इस मंदिर के काष्ठ स्तम्भों पर काम कलाओं का सुंदर चित्रण दिखाई देता है। मंदिर के स्तंभों पर काम कला के दुर्लभ आसनों का अद्भुत एवं रोचक अंकन किया गया है।

पशुपतिनाथ मंदिर के मुख्यद्वार पर ब्लॉगर ललित शर्मा (फ़ोटो-मुकेश सिन्हा)
दर्शनोपरांत मंदिर से बाहर निकलने पर मुकेश सिन्हा जी, सरोज सुमन जी, मनोज भावुक जी की तिकड़ी दिखाई दी। मुकेश जी ने कैमरा साथ ले रखा था। मैने उनसे एक चित्र लेने के लिए निवेदन किया। कम से कम पशुपति नाथ के द्वार पर ही एक चित्र हो जाए। मुकेश जी ने हमारा एक चित्र पशुपति नाथ मंदिर के द्वार पर लेकर मुझे कृतार्थ किया। वरना इस चित्र के लिए मुझे पाबला जी को ढूंढकर उनसे कैमरा लेना पड़ता। नेपाल में किसी का मोबाईल तो काम ही नहीं कर रहा था वरना यह व्यवस्था भी बन जाती। पूजा सामग्री वाली को उसकी डलिया लौटाई और अपनी पादूकाएं धारण कर बस की ओर चल पड़ा। रास्ते में अंतर सोहिल जी और उनके साथ आए हुए गुप्ता जी कोयला के इंजन की भांति धुआं उड़ाते हुए मिले। बस के समीप बैठ कर इनसे गप शप करके अन्य ब्लॉगर्स की प्रतिक्षा करने लगे।

अगले पड़ाव की ओर ब्लॉगर
हम साथियों की प्रतीक्षा कर रहे थे, सभी लोग एक एक करके बस में समाने लगे। तभी पता चला कि सुनीता यादव  जी का पर्स किसी ने मंदिर परिसर से उड़ा लिया है। ढूंढने पर भी नहीं मिला। पता चला कि पुलिस में रिपोर्ट करने पर भी समस्या उपस्थित हो सकती थी। क्योंकि नेपाल में हजार एवं पाँच सौ के भारतीय नोट प्रतिबंधित हैं। यदि पुलिस के पूछने पर बता दिया जाए कि पर्स में हजार और पाँच सौ के नोट थे पहले जुर्म रिपोर्ट लिखाने वाले पर ही दर्ज होगा। सुनीता जी लौट आई और कहा कि मैं भूल चुकी हूँ कि मेरा पर्स चोरी हो गया। सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। यही सुनीता जी के साथ भी हुआ। थोड़ी देर में वे सामान्य हो गई और उन्होने कहा कि पर्स चोरी होने की घटना को अब कोई याद न दिलाए। पशुपति नाथ के दर्शन करने में ही दोपहर हो गई। हमारा कारवां चल पड़ा अगले पड़ाव की ओर।

नेपाल यात्रा की आगे की किश्त पढें…… 

16 टिप्‍पणियां:

  1. मंदिर में चोरी , चोरों का प्रारब्ध है :) …
    काठमांडू के काष्ठ शिल्प पर रोचक जानकारी !

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  2. यात्रा वर्णन के शिल्पकार का कहना ही क्या …. खूबसूरत वादियों की, काष्ठ कला की जीवंत तस्वीरें , पशुपति नाथ कहलाने का रहस्य वहां के लिए बतौर सावधानी वर्जित बातें आदि का जीवंत चित्रण। हमको स्वयं ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हम ललित भाई के साथ हैं …. बहुत खूब

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  3. सुन्दर यात्रा विवरण. वहां मंदिर के पुजारी दक्षिण भारत के हैं ऐसा क्यों?

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  4. भाई ललित जी, मैं काठमांडो बहुत बार गया हूँ, पर आपके इस लेख द्वारा ऐसी अनेक जानकारियां मिली जिनसे मैं अनभिज्ञ था. आपने इसको लिखा भी बहुत रोचक तरीके से है जिससे कहीं भी ऊब नहीं होती. बधाई और धन्यवाद्

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  5. @ P.N. Subramanian ji

    इस मंदिर के पुजारी दक्षिण भारतीय हैं। मंदिर के पुजारियों को भट्ट कहा जाता है। मुख्य पुजारी मूल भट्ट कहलाता है। राजशाही के दौरान वह सिर्फ नरेश के प्रति जवावदेह होता था। पशुपतिनाथ मंदिर में आदि शंकराचार्य के जमाने से अबतक, इस मंदिर में दक्षिण भारतीय पंडित ही पूजा कराते आ रहे थे. नेपाल के राजा मानते थे कि दक्षिण भारतीय पंडितों की हिंदू धर्म के रिति रिवाज़ों पर अच्छी पकड़ होती है. इसके अलावा मान्यता थी कि नेपाल में किसी राजा की मौत के बाद, शोक मानाने के दौरान, कोई भी नेपाली पूजा नहीं कर सकता. इन्हीं वजहों से इस मंदिर में पूजा का भार हमेशा दक्षिण भारतीय ब्राह्मणों को ही सौंपा गयाl

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  6. सहज-सरल और बेहद रंजक शैली में लिखा गया यात्रा-वृत्तांत मंत्रमुग्ध हो कर पढ़ गया. पूरा परिवेश जीवंत हो कर सामने आ गया. यही है ललित-लेखन

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  7. पशुपति नाथ जी से दर्शन के साथ रोचक जानकारी भी आपने दी हैं..सफल यात्रा के बाद सचित्र लेखन लाभदायक रहा ..

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  8. रोचक शैली के साथ हर नई पोस्ट में नवीन शब्दान्वेषण दृष्टिगोचर होता है। मतलब ऐतिहासिक, सांस्कृतिक जानकारी के साथ हिंदी शब्दकोष में वृद्धि भी… ललित कला कौशल का सार्थक प्रदर्शन...

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  9. रोचक यात्रा विवरण, काष्ठ का बना काठमांडू। प्रेम का क्रमिक उद्भव की नवीन व्याख्या।

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  10. भगवान पशुपति नाथ की यात्रा और मन्दिर का आपने सुक्ष्म अवलोकन किया और फिर दूजों को भी अवगत कराया ..आपकी यात्रा सफल हुई ..

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  11. ललित भाई लगता है जरुर आप किसी पुरातात्विकविदों की सोहबत या अखाड़े से निकले हैं-आपकी आँखें वहां खुली रहकर उन चीजों को भी देख लेती हैं जिन्हें भला अंधश्रद्धा से मुंदी आँखें भला कैसे देख सकती हैं ?
    हिन्दू मंदिरों की परिधि पर कामक्रीड़ा का शिल्पांकन एक युग सत्य है जिसका साक्षात्कार आपकी खोजी आँखों ने की .......कामकेलि को दरवाजे पर ही त्यागकर ईश्वरीय भक्ति हो सकती है !

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  12. आपने वह देखा जो किसी ने नहीं देखा
    चलिए, अभी काठमांडू से वापस निकलना भी है

    बी एस पाबला ने हाल ही में लिखा है: नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा

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  13. नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर जग प्रसिद्ध है मन्दसौर मे पशुपतिनाथ अष्टमुखी है शानदार प्रस्तुति ललित भाई साहब

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