सोमवार, 23 नवंबर 2015

सम्राट अशोक से एक मुलाकात - कलिंग यात्रा

भुवनेश्वर एक ऐसा नगर है जहाँ हम कोई भी सड़क पकड़ कर किसी भी तरफ़ निकल जाएं दर्शनीय एवं पुरातत्वीय स्मारकों के दर्शन हो जाएगें। अब हम धौली जा रहे थे, जो भुवनेश्वर से लगभग किमी की दूरी पर है। चलते मेरे ध्यान में ध्यान में नहीं था कि यह महत्वपूर्ण स्थान है और इसके बिना मेरी भुवनेश्वर यात्रा अधुरी रह जाएगी। यह एक टेकरी/ डूंगरी पर स्थित है। ऑटो वाले ने डूंगरी से थोड़ी दूर पर ही उतार दिया। पैड़ियों से ऊपर जाने पर  स्तूपनुमा इमारत दिखाई दी। यह नई बनी प्रतीत हो रही थी। इसकी चारों दिशाओं में बुद्ध को विभिन्न आसनों में दिखाया गया है। पहली प्रतिमा धम्म परिवर्तन मुद्रा, दूसरी प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा, तीसरी प्रतिमा गणिका द्वारा खीर प्रदान करते हुए, चौथी प्रतिमा अभय मुद्रा, पांचवी प्रतिमा निर्वाण मुद्रा में स्थापित की गई है। इस स्तूप का निर्माण बौद्ध धर्मावलम्बियों द्वारा कराया गया है। बड़ी संख्या में लोग इस स्थान का भ्रमण करने आते हैं।
धौली स्तूप भुवनेश्वर 
धूप सिर पर चढ रही थी और भूख का समय भी हो गया था। शरीर की उर्जा चूक रही थी। इसलिए हमने लौटने की योजना बना ली। जल्दी ही ऑटो तक पहुंच गए। पहाड़ी से उतरते समय बांए तरफ़ एक स्थान को फ़ेंसिग से घेरा गया देख कर मैने ऑटो रुकवा लिया। उतरने पर देखा कि वहाँ पुरातत्व सर्वेक्षण का सूचना फ़लक लगा हुआ है अर्थात यह स्थान महत्वपूर्ण है इसे देखना जरुरी है। पता चला कि यहाँ सम्राट अशोक का शिलालेख है। बस इतना जानना था कि शरीर में चूकी हुई उर्जा पुन: आ गई और हम टेकरी पर चढ गए। यहाँ एक चट्टान को काटकर हाथी का शिरोभाग निर्मित किया गया है और इसी चट्टान पर एक बड़ा शिलालेख अंकित है। शिलालेख को कांच से ढक दिया गया है जिससे फ़ोटो स्पष्ट नहीं ली जा सकती। 
अशोक शिलालेख धौली 
यह शिलालेख सवा दो हजार वर्ष पूर्व  मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक द्वारा अंकित करवाया गया था। उसके कुल ३३ अभिलेखों में से यह एक प्राप्त अभिलेख हुआ हैं। इसे ब्राह्मी शिलालेख अशोक ने स्तंभों, चट्टानों और गुफ़ाओं की दीवारों में अपने २६९ ईसापूर्व से २३१ ईसापूर्व चलने वाले शासनकाल में खुदवाया था। अशोक के शिलालेख आधुनिक बंगलादेश, भारत, अफ़्ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल में जगह-जगह पर मिलते हैं और बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं। इस ब्राह्मी शिलालेख को 1837 में लेफ़्टिनेंट मार्कम किट्टो द्वारा ढूंढा गया था। इस शिलालेख में अशोक के चौदह अनुशासनों में से 11 को लिपिबद्ध किया गया है। कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ, उसने जनसाधारण पर अपनी सहृदयता की छाप छोड़ने के उद्देश्य से इस आदेश का प्रचार करवाया। इसमें लिखा है कि - 
कांच से घिरा हुआ शिलालेख 
1 - किसी पशु का वध न किया जाए और राजकीय पाकशाला एवं मनोरंजन उत्सव न किए जाएं। 
2 - मनुष्यों एवं पशुओं के चिकित्सालय खुलवाए जाएं एवं उसमें औषधि की व्यवस्था की जाए। मनुष्यों एवं पशुओं की सुविधा के लिए मार्ग में छायादार वृक्ष लगवाए जाएं एवं राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था कुंए खुदवा कर की जाए। 
3 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि प्रति पांच वर्ष पश्चात धर्म प्रचार के लिए जाएं। 
4 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि व्यवहार के सनातन नियमों यथा नैतिकता एवं दया का सर्वत्र प्रचार किया जाए। 
5 - धर्ममहामात्रों की नियुक्ति एवं धर्म एवं नैतिकता का प्रचार प्रसार किया जाए। 
6 - राजकीय पदाधिकारियों को स्पष्ट आदेश है कि सर्वलोकहितकारी कुछ भी प्रशासनिक सुझाव एवं सूचना मुझे प्रत्येक स्थान एवं समय पर दें।
7- सभी जाति एवं धर्मों के लोग सभी स्थानों पर रह सकें क्योंकि वे आत्म संयम एवं हृदय की पवित्रता चाहते हैं।
8-राज्याभिषेक के दसवें वर्ष अशोक सम्बोधि (बोध गया) की यात्रा कर धर्म यात्राओं का प्रारंभ किया जाए। ब्राह्मणों एवं श्रमणों का दर्शन एवं गरीबों के नैतिक कल्याण का प्रचार किया जाए।
9- दास तथा अनुचरों के प्रति शिष्टाचार का पालन करें, जानवरों के प्रति उदारता एवं ब्राह्मणो तथा श्रमणों के प्रति उचित व्यवहार करने का आदेश दिया गया।
10- अशोक ने घोषणा कि यश एवं कीर्ति के लिए नैतिकता होनी चाहिए।
11- धर्म प्रचारार्थ अशोक ने अपने विशाल साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर शिलाओं पर धम्म लिपिबद्ध कराया जिसमें धर्म संबंधी महत्वपूर्ण सूचनाओं का वर्णन है।
राजा एवं राणा  सम्मुख 
एक अन्य पृथक शिलालेख ;में अशोक तोशाली के महामत्तों को आदेश देता है कि सभी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान के लिए इच्छा करता हूं कि इहलोक एवं परलोक में उनकी सुख समृद्धि हो,उसी प्रकार सम्पूर्ण प्रजा के लिए मेरी यही इच्छा है। बिना उचित कारण के किसी को शारीरिक दंड, ईर्ष्या, क्रोध आदि दुर्गुणों से रहित निष्पक्ष मार्ग का अनुशरण करने का आदेश देता हूँ। तोशाली के महामात्रों को आदेश है कि सीमांत राज्यों के लोगों के हित - कल्याण को ध्यान में रखा जाए एवं उनपर अनुग्रह की नीति अपनाई जाए। -  इस तरह सम्राट अशोक से भेंट हो गई शिलालेख के माध्यम से, अब हम धौली से चलकर भुवनेश्वर अपने डेरे में पहुंच गए। जारी है आगे पढें…॥

3 टिप्‍पणियां:

  1. शिलालेख को हम नहीं देख पाये थे।

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  2. बहुत ही सुंदर लेख। भुवनेश्‍वर के बारे में नई जानकारी मिली।

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  3. P.N. Subramanian जी - शिलालेख डूंगरी की चढाई पर है, इसलिए दिख नहीं पाता। वो तो मेरी नजर अचानक पड़ गई। नहीं तो हम भी बैरंग ही लौटते खिसियाते हुए।

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