रविवार, 29 नवंबर 2015

चिल्का झील: प्रकृति का अनुपम उपहार - कलिंग यात्रा

सुबह जल्दी उठकर तैयार हो गए, आज हमें प्रसिद्ध चिल्का झील भ्रमण के लिए जाना था। यहाँ जाने के लिए बी एन होटल पुरी के समीप लक्जरी बसें उपलब्ध होती हैं, यह बस सेवा सप्ताह में चार उपलब्ध है। जिसकी टिकिट हमने रात को ही बुकिंग सेंटर से ले ली थी। पुरी से चिल्का का सातपाड़ा मीरजापुर क्षेत्र लगभग साठ किमी होगा। हम होटल से रिक्शा लेकर बस तक पहुंच गए। टिकिट में सीट नम्बर न होने के कारण कन्डेक्टर अपनी मर्जी अनुसार सवारी बैठा रहा था। बड़े ग्रुप को पहले सीट दे रहा था। हमारी रायपुर के लिए शाम 5 बजे ट्रेन होने के कारण हमें पहली बस से ही जाना और लौटना था। इसलिए हमने सीटों के नाम पर समझौता कर लिया। जहां उसने जगह दी, वहाँ बैठ गए। साढे सात बजे सुरेश पण्डा बस सर्विस चिल्का के लिए चल पड़ी। 
जल भरावन यंत्र से जल भरते हुए बिकाश बाबू
पुरी शहर से बाहर निकलते ही धान के खेत जहां तक नजर जाती वहां तक दिखाई दे रहे थे। हम खिड़की से प्रकृति का आनंद लेने लगे। तटीय क्षेत्र में मीलों तक खेत ही खेत दिखाई दे रहे थे। फ़सल पक कर ऐसे चमक रही थी मानों खेतों में सोना उग आया हो। आधा पौन घंटा चलने के बाद बस रुकी। यहां पर एक मंदिर है, जिसके दर्शन एवं जलपान के लिए बस रोकी जाती है। हमने सबसे पहले तो बड़ा जलेबी का नाश्ता किया, फ़िर मंदिर की तरफ़ चले। इस स्थान का नाम ब्रह्मापुर है। नारियल के गगनचुंबी पेड़ आसमान को छू रहे थे। एक स्थान पर घर के सामने मैने एक प्रतिमा देखी तो रुकना पड़ा। प्रतिमा के सिर पर गमला रखा था। देखते ही समझ आ गया कि तुलसी माला  है। इस क्षेत्र में तुलसी की प्रतिमा के सिर पर गमला रख कर तुलसी का पौधा लगाने की परम्परा मुझे लगभग सभी घरों में दिखाई दी।
मेरे देश की धरती, सोना उगले, उगले हीरे मोती
यहां से बस आगे चली तो थोड़ी देर बाद खेतों की जगह दलदली जमीन ने ले ली। दसियों किमी तक पानी भरी दलदली जमीन दिखाई दे रही थी। परन्तु मेरे जैसे व्यक्ति की घुमक्कड़ी के लिए यह आदर्श क्षेत्र दिखाई दिया क्योंकि यहाँ तरह-तरह की चिड़िया दिखाई दी। परबस होने के कारण मैं इनकी फ़ोटो भी नहीं ले सकता था। वरना आराम से फ़ोटो खींचते चलते। सरकारी आंकड़ों के हिसाब यहां सर्दियों में एक लाख से अधिक प्रवासी जल पक्षी एवं तटीय पक्षी आते हैं। यहां नलबाण पक्षी अभ्यारण्य भी है, जहाँ 158 प्रजाति के पक्षी पाए जाते हैं। इन पक्षियों के कारण इस इलाके का सौंदर्य देखते ही बनता है। चिल्का झील में महानदी की भार्गवी, दया, कुसुमी, सालिया, कुशभद्रा जैसी धाराएं भी समाहित होती हैं। इससे इसमें मीठे जल का संगम होता है। 
नारियल पानी खींचन प्रतियोगिता
नदियों एवं समुद्र के मिश्रित जल में ऐसे कई गुण हैं जो यहां के जलीय पौधों व जंतुओं के लिए लाभप्रद होते हैं। इसलिए यहां 95 प्रकार के प्रवासी पक्षी आते हैं, जो हजारों मील दूर साइबेरिया, बेकाल, मनचूरिया आदि से आकर यहां डेरा डालते हैं। बतख, नन्हें स्टिनर, सेंडरलिंग, क्रेन, गोल्डन प्लोवर, फ्लेमिंगो, स्टोर्क गल्स, सैड पाइपर्स और ग्रे पेलिकन यहां पाए जाने वाले प्रमुख पक्षी हैं। अक्टूबर-नवंबर में पक्षियों का आना शुरू होता है और दिसंबर-जनवरी में तो जगह-जगह पक्षियों के झुंड ऐसे दिखते हैं, जैसे उनकी अलग-अलग कॉलोनियां बसी हों। बैठा हुआ सोच रहा था कि कभी बाईक से सफ़र किया जाए तभी इसका भरपूर आनंद लिया जा सकता है। तभी मुझे पेंटेट स्टार्क का एक झुंड दिखाई दिया। इस तरह पक्षी देखते हुए सात पाड़ा के मीरजापुर पहुंच गए।
सातपाड़ा जेट्टी से नाव की ओर
यहां भोजन के लिए दो चार होटल हैं तथा बस वालों अपने-अपने होटल सेट कर रखे हैं। हमारे कंडेक्टर ने एक होटल में ले जा कर बस खड़ी की और सभी सवारियों को कहा कि - आप पहले खाने का आर्डर दे दें, अन्यथा आपको यहां खाना नहीं मिलेगा। जितने आर्डर दिए जाते हैं उतना ही खाना बनता है। कोई होटल वाला खाना बना कर नहीं रखता। उसका इतना कहना था कि लोग खाने का आर्डर देने लगे। मैने और बिकाश ने मीनू देखा तो पता चला कि दो आदमियों का खाना ही दो हजार का हो जाएगा और पेट भी नहीं भरेगा। हमने आर्डर नहीं दिया। ऐसा तो हो ही सकता कि खाना एक ही जगह मिले। चलो ढूंढ लेगें। कोई समस्या नहीं है। खाने का आर्डर देने के बाद हम जेट्टी की ओर चल पड़े।
जेट्टी से चिल्का झील का नजारा
जेट्टी के द्वार पर कई आदमी बहुत सारी टोपियां लेकर बैठे थे, जिन्हे 10-10 रुपए में किराए पर दे रहे थे। मैने ध्यान नहीं दिया। यहां चिल्का झील में प्रति बोट किराया 1200 से 1400 रुपए है जिसमें लगभग 16 किमी का सफ़र कराते हैं। सभी बोट डीजल इंजन से चलती हैं। हमारी बस वाली सवारियों ने शेयरिंग बोट ली, हम 14 लोग थे, प्रत्येक के हिस्से 125 रुपए आए। बोट में सवारी भर कर चालक ने नाव खोल दी। चिल्का झील में नाव का सफ़र करने का फ़ायदा यह है कि इसके उथले होने के कारण समुद्र जैसा भय नहीं लगता है। अगर जल में कूदेगे तो भी कमर तक ही पानी आएगा। इसकी अधिकतम गहराई तीन मीटर मानी गई है। थोड़ी दूर बोट चलने के बाद धूप का चमका लगने लगा। तब टोपी की याद आई, अगर एक हैट ले लेते तो इस धूप से बचा जा सकता था। पर अब तो सफ़र पर निकल चुके थे।
सीप में मोती, मोती में सीप
चिल्का झील का मजा यह है कि यहां कम पैसे लम्बी बोट राईडिंग हो जाती है। मैने किनारे पर बैठे पक्षियों की फ़ोटो लेने की कोशिश की, परन्तु बोट की स्पीड एवं हिलने के कारण चित्र लेना संभव नहीं हो रहा था।  थोड़ी देर चलने के उसने एक टापू पर बोट लगा दी। वहां पर दो लोग टोकरी लिए बैठे थे, एक ने लाल केकड़े दिखाई और दूसरा सीप वाले मोती बेच रहा था। जिसकी कीमत डेढ सौ रुपए बता रहा था। सीप फ़ोड़ने से उसमें से मोती निकलने की बात कह रहा था। उसने तीन सीप फ़ोड़े तब कहीं एक में से छोटा सा मोती निकला। आखिर में वह 20 रुपए में सीप देने को तैयार हो गया। पर मुझे तो हकीकत मालूम थी। हम कहां फ़ंसने वाले थे। बोट वाला वहां टाईम खराब कर रहा था। उसे डांट कर बोट आगे बढवाई।
यहाँ आकर जमीं आसमान एक हो जाते हैं
बोट फ़िर पानी में चलने लगी, लगभग एक घंटा चलने के बाद वह क्षेत्र आ गया जहां डाल्फ़िन दिखाई देती है। यहां बहुत सारी बोट मंडरा रही थी। तभी डाल्फ़िन ने गोता लगाया। लोग कैमरा साध रहे थे, पर वह तो जूम करने का भी समय नहीं दे रही थी। आखिर मैने इसका तोड़ निकाला और 4 स्नैप लिए। आखिरकार डाल्फ़िन मेरे कैमरे में कैद हो गई थी और लोग उसे ढूंढ रहे थे। चिल्का झील का सौंदर्य अपूर्व है, अद्भूत है, यहाँ मन रम जाता है आकर। इसकी सुंदरता इतनी मनमोहक है कि उड़ीसा के एक कवि को आजादी के आन्दोलन में गिरफ़्तार कर लिया गया तो उन्होने कहा "मुझे थोड़ी देर चिल्‍का के चित्रपट को निहार लेने दो, फिर तो अंधेरी कोठरी में रहना ही है।" यह अतिश्योक्ति नहीं है, सच में इसका सौंदर्य ही अद्भुत है। जो आकर्षित करता है।
सिर्फ़ मेरे ही कैमरे में कैद हुई डाल्फ़िन
डाल्फ़िन दर्शन के बाद भूख लगने लगी थी, हमने लौटने का कार्यक्रम बना लिया। सहयात्रियों की सहमती से चालक को लौटने का आदेश दिया। उसने नाव घुमा ली और हम वापस सातपाड़ा की ओर चल पड़े। रास्ते में एक स्थान पर रेतीला टापू आता हैं, यहा स्नैक्स की दुकाने लगी हैं। प्रत्येक नाव वाला यहाँ कुछ देर के लिए नाव किनारे लगाता है, यहीं पर नदियों की यह सम्मिलित धारा समुद्र में मिलती है। जो इस टापू से दिखाई देती है। मैन्ग्रोव की झाड़ियां के बीच लोग शंका दूर करने निकल पड़े, उन्हें फ़िर सकेला गया और हम वापस जेट्टी पर आ गए। चिल्का में नाव का यह सफ़र आनंददायक रहा। अगर खाने की सामग्री, पीने लिए पानी और हैट साथ रख लेते तो आनंद कई गुना बढ जाता।
सस्ता होटल 
रेस्टोरेंट में लोग खाने के लिए चल दिए, हमको भी भूख लग रही थी। हमने खाने ढूंढना शुरु किया। थोड़ा आगे चलने पर एक स्थान पर थाली वाले खाने का होटल मिल ही गया। उसने थाली 60 रुपए की बताई, हमने थोड़ा मोल भाव किया तो 50 पर आ गया। बढिया गर्मागर्म दाल, चावल, सब्जी, अचार, सलाद के साथ उसने खाना परोस दिया। दूबारा मांगने पर भात सब्जी इत्यादि भी दी। सौ रुपए में हमारा पेट भर गया। वहां हजार में नहीं भरने वाला था। होटल वाले को धन्यवाद देकर हम बस में आकर बैठ गए। वापसी का सफ़र जल्दी ही बीत गया।
सेल्फ़ी ले ले रे - रेत के टापू पर
एक सप्ताह की पुरी यात्रा से बहुत कुछ सीखने एवं देखने मिला। पर एक सप्ताह में कलिंग प्रदेश को देखने एवं समझने के लिए कम हैं, फ़िर कभी समय मिला तो तटीय क्षेत्र से अलग अन्य किसी क्षेत्र में कलिंग भ्रमण करना है, वैसे तो कलिंग हमारा सहोदर प्रदेश है, छत्तीसगढ़ के नक्शे में आधा प्रदेश उड़ीसा की सीमा से लगता है तथा अंग्रेजों के शासन काल में सम्बलपुर से छत्तीसगढ़ पर शासन किया जाता था।
चल खुसरो घर आपने
अंग्रेजों ने सम्बलपुर पुर को कमिश्नरी बना कर कमांडिंग ऑफ़िसर बैठाया हुआ था। 1800 ई में यहाँ मेजर ई रफ़सेज कमांडिग ऑफ़िसर था। बस चल रही थी और हम यात्रा के आनंद में डुबे था। बस वाले पुरी पहुंच कर ट्रेन के टाईम से आधे घंटे पहले ही स्टेशन के पास पहुंचा दिया और हम साप्ताहिक यात्रा सम्पन्न करके घर की ओर चल पड़े। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर-सुन्दर चित्रों और बारीकी से किये गए विश्लेषण द्वारा हम सभी ने भी आपके साथ-साथ यात्रा का आनंद लिया. अरे हाँ! आप लोग बहुत भाग्यशाली रहे जिन्हे डॉल्फ़िन ने दर्शन के साथ फोटो लेने का भी अवसर दिया .... आभार सहित शुभकामनाएं

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  2. नारियल पीवत होड़ में जो महिलाये थी वो कौन थी ?ह्म्म्म्म

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