मंगलवार, 9 अगस्त 2016

कंचन घाट ओरछा की छतरियाँ

आरम्भ से पढ़ें 
विरंची नारायण आज सुबह से ही आतंक फ़ैला रहे थे, आज ओरछा में दूसरा दिन था। अगर ओरछा वालों से पूछो कि यहाँ देखने के लिए क्या है? तो कहेंगे कि मंदिर के आगे और मंदिर के पीछे की सड़क पर ही सब कुछ है। यह वास्तविकता भी है, परन्तु यहाँ भ्रमण अध्ययन करने के लिए पुष्कल समय चाहिए। पर गर्मी के दिनों को छोड़ कर। वृंदावन लाल वर्मा जी ने ओरछा की बरसात का बढिया वर्णन किया है। अबकि बार ओरछा बरसात में ही देखना है। इस बरसात में तो टीकमगढ़ जिले में त्राहि-त्राहि मच गई थी। मुकेश जी समय से रेस्ट हाऊस पहुंच गए थे। आज का भ्रमण हमने छतरियों से प्रारंभ किया। 
बेतवा के कंचन घाट पर वीर सिंह की छतरी
बेतवा नदी के किनारे कंचन घाट पर बीर सिंह बुंदेला की छतरी है, यह छतरी तीन मंजिला है। बुदेंलों के इतिहास में वीर सिंह का कार्यकाल स्वर्णयुग कहलाता है। इनके कार्यकाल में ही जहाँगीर महल, नौबतखाना, फ़ूलबाग, लक्ष्मी नारायण मंदिर एवं हमाम जैसी भव्य इमारतों का निर्माण हुआ। यह छतरी तीन मंजिली है तथा बुंदेला स्थापत्य के आधार पर ही इसका निर्माण हुआ है। मेहराबों से छतों को सहारा देकर मध्यम में गुम्बद का  निर्माण किया गया है। पवित्र पावन बेतवा नदी इसके अधिष्ठान को छूते हुए बहती है। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
इसके साथ इन्हें छतरियों का समूह भी कहा जा सकता है। बेतवा के किनारे अन्य पन्द्रह छतरियां भी निर्मित हैं। यहाँ की अधिकांश छतरियां तीन मंजिली है, सूचना फ़लक पर मधुकर शाह, बीरसिंह देव, जसवंत सिंह, उद्वैत सिंह, पहाड़ सिंह आदि का नाम अंकित है। ये छतरियां पंचायतन शैली के मंदिरों जैसी बनी हुई हैं। चौकोर चबुतरे के मध्य में गर्भगृह एवं उसके चारों कोणों में खाली स्थान है, ऊपर जाकर यही अष्टकोणीय हो जाते हैं। इनमें गुंबद विशेष स्थान रखता है। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
यहां मध्यप्रदेश पुरात्त्व विभाग के एक चौकीदार मिला। उसने बताया कि छतरियों के समूह में निर्मित बगीचे की देखरेख वह स्वयं के खर्चे से करता है। यहां बहुत सुंदर उद्यान जैसा निर्मित कर दिया गया है। जिससे छतरियों की रौनक बढ गई है। यहां किसी धारावाहिक के फ़िल्मांकन की जानकारी भी मिली। इन छतरियों के गुम्बदों पर जटायू प्रजाति के गिद्धों ने अपना बसेरा बना रखा है। यहां गिद्ध देखकर अच्छा लगा। विगत कई वर्षों से मैने गिद्ध नहीं देखे थे। इनको यहाँ का वातावरण पसंद आ गया है और बेतवा नदी किनारे पर होने के कारन भोजन पानी भी उपलब्ध है।
बेतवा के किनारे छतरी के गुम्बद पर जटायू गिद्ध राज
एक आंकड़े के अनुसार 1990 के दशक में इस जाति का 97% से 99% पतन हो गया। जिसके कारण आज भारतीय गिद्धों का प्रजनन बंदी हालत में किया जा रहा है। खुले में यह विलुप्ति की कग़ार में पहुँच गये हैं। शायद इनकी संख्या बढ़ जाये। गिद्ध दीर्घायु होते हैं लेकिन प्रजनन में बहुत समय लगाते हैं। गिद्ध प्रजनन में 5 वर्ष की अवस्था में आते हैं। एक बार में एक से दो अण्डे पैदा करते हैं लेकिन अगर समय ख़राब हो तो एक ही चूज़े को खिलाते हैं। यदि परभक्षी इनके अण्डे खा जाते हैं तो यह अगले साल तक प्रजनन नहीं करते हैं। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
यही कारण है कि भारतीय गिद्ध अभी भी अपनी आबादी बढ़ा नहीं पा रहा है। पर्यावरण संतुलन के लिए गिद्धों का होना आवश्यक है और इनकी रक्षा होनी चाहिए, वरना यह भी डायनासोर की तरह विलुप्त प्रजाति की सूची में सम्मिलित हो जाएगें।ओरछा में अभयारण्य भी है, बेतवा नदी के दूसरे किनारे पर एक फ़ोटो पाईंट बना हुआ है। इस अभयारण्य में प्रवेश शुल्क लगता है। हमने इस स्थान पर पहुंच कर छतरियों के चित्र लिए। धूप अधिक होने के कारण फ़ोटोग्राफ़ी में आनंद नहीं आया। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
यहाँ से हम लाला हरदौल की समाधि पर गए।  छत्तीसगढ़ अंचल में हरदे लाला, हरदे बाबा के नाम से पूजित लोकदेवता के मूल स्थान से परिचित होऊं। ओरछा नरेश वीरसिंह देव बुंदेला के सबसे छोटे पुत्र हरदौल का जन्म सावन शुक्ल पूर्णिमा सम्बत 1665 दिनांक 27 जुलाई 1608 को दतिया में हुआ था। लाला हरदौल की ख्याति और उनके प्रभा मंडल का विस्तार भारत के कई राज्यों में हैं। जहाँ गाँव-गाँव में इनके चबूतरे स्थापित हैं और मान्यता है कि विपत्ति का निवारण इनके द्वारा होता है।
लाला हरदौल की समाधि
इतिहास में राज्य परिवारों में सत्ता के साथ षड़यंत्र भी चलते थे। इन षड़यंत्रों से हमेशा हानि ही हुई है। ऐसी ही एक कथा लाला हरदौल की है, जो उन्हें इतिहास में प्रसिद्ध कर लोक देवता के रुप में स्थापित करती है। इन्हीं में से एक है हरदौल की कहानी, जो जुझार सिंह (1627-34) के राज्य काल की है। दरअसल, मुगल जासूसों की साजिशभरी कथाओं के कारण् इस राजा का शक हो गया था कि उसकी रानी से उसके भाई हरदौल के साथ संबंध हैं। लिहाजा उसने रानी से हरदौल को ज़हर देने को कहा। रानी के ऐसा न कर पाने पर खुद को निर्दोष साबित करने के लिए हरदौल ने खुद ही जहर पी लिया और त्याग की नई मिसाल कायम की।
बेतवा के किनारे छतरी समूह
हरदौल अपनी बैठक से जहर सेवन कर घोड़े पर बैठकर निकल गए, थोड़ी देर बाद जहर ने असर किया, वे घोड़े से गिर गए और उनकी मृत्यू हो गई। जिस स्थान पर उनकी मृत्यू हुई वहाँ स्मारक बना हुआ है। एक गद्दी रखी हुई है, जिस पर घोड़े पर सवार हरदौल की प्रतिमा के साथ तलवारें रखी हैं। जब हम पहुंचे तो काफ़ी लोग यहाँ पर थे, वे उन्हें विवाह का निमंत्रण देने आए थे। मान्यता है कि लाला हरदौल को भात का निमंत्रण देने के बाद वे सब काज खुद ही संभाल लेते हैं। लोग इन्हें मांगलिक कार्यों का निमंत्रण देने आते हैं तथा विवाहोपरांत आशीर्वाद लेने (जोड़े की जात देने) भी जोड़े के साथ आते हैं। अब भोजन का समय हो रहा था, हम भोजन करने के लिए आ गए। जारी है… आगे पढें।

1 टिप्पणी:

  1. आपका आलेख से बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है. हमने भी सुना है कि लाला हरदेव को मानने वाले परिवार में भाभियाँ अपने देवर को आज भी 'लाला' का संबोधन देते हुए छोटे होने पर भी उनके चरण स्पर्श करती हैं.

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