रविवार, 22 जनवरी 2012

फ़ेसबुकिया कबूतरी की गुड मार्निंग -- ललित शर्मा

अहमदाबाद का सुबह का नजारा
सुबह साढे 5 बजे आँख खुली तो खिड़की से अंधेरा नजर आ रहा था। तब समझ आया कि यहाँ हमारे छत्तीसगढ की अपेक्षा दिन देर से निकलता है। खिड़की से नीचे झांक कर देखा तो स्ट्रीट लाईट जल रही थी। सुनसान सड़क शंहशाह की सवारी गुजरने का अहसास करा रही थी। अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर................। खिड़की से झांक कर हमने फ़िर बिस्तर पकड़ लिया। 7 बजे उठे तो थोड़ा प्रकाश देखने मिला। हम भी खुश हुए कि सुबह हो गयी। केयर टेकर को चाय की घंटी मारी। नामदेव जी भी उठ गए, उन्हे ड्यूटी पर लगाया जिससे वे जल्दी स्नान ध्यान कर लें उसके बाद हम कर लेगें। हमें तो कहीं जाना नहीं था, आज दिन भर आराम का ही मुड था। थोड़ी देर में चाय आ गयी।

कबूतर और कबूतरी (दुर्लभ चित्र)
हम बिस्तर छोड कर सोफ़े पे डट गए, जैसे ही खिड़की की तरफ़ देखा तो कल वाला कबूतर एक कबूतरी पटा लाया था। चोंच लड़ा कर प्रात: कालीन फ़ेसबुकिया गुड मार्निंग कर रहा था। हमें थोड़ी ईर्ष्या हुई, काश! हम भी कबूतर होते तो लाला जी मुंडेर पर ही बैठे रहते। बने रहते लोटन कबूतर, लाला जी की दूकान भी चलते रहती और कबूतरी भी गुटरगूँ करते रहती। कौउनु फ़रक नहीं पड़ने वाला था। तभी प्रेम चोपड़ा की एन्ट्री हो जाती है, उसे देखते ही कबूतरी फ़ुर्रर्र हो गयी, कबूतर बैठा रहा वहीं छज्जे पर। कितना खौफ़  है न प्रेम चोपड़ा का? यह किरदार चराचर जगत के सभी प्राणियों में पाया जाता  है। जैसे ललाईन के छज्जे के सामने बनवारी काका। दिन हो रात खिड़की खोले खांसता ही रहता है मुआ। चलो छोड़ो सुबह सुबह क्या झमेला ले बैठे। कबूतर जाने और कबूतरी जाने, हमे क्या लेना? हूँ ...........तो।

विनोद भाई
चाय समाप्ति पर कार्यक्रम बना कि नामदेव जी जाएगें दर्जी युवक-युवती परिचय सम्मेलन में और हम जाएगें विनोद भाई के घर पर। दोनो स्नानादि से निवृत्त होकर बीएसएनएल कालोनी पहुंचे, वहाँ रिदम एवं व्योम के साथ भाभी जी से भी मुलाकात हुई। चाय लेकर नामदेव जी युवक-युवती परिचय सम्मेलन मे चल दिए। हम और विनोद भाई गजल के काफ़िया मिलाने में लगे रहे। दिन भर बीत गया। नामदेव जी के पहुंचने पर शाम को कांकरिया तालाब घूमने निकले। अल्पना ने मुझे बताया कि अहमदाबाद में घूमने की एकमात्र जगह है। कांकरिया तालाब का निर्माण किसने कराया, क्यों कराया इसकी तो जानकारी नहीं ली। कांकरिया तालाब में प्रवेश करने के लिए 10 रुपए टिकिट लगती है। विनोद भाई ने अब्दुल कलाम जी जैसे लाईन में खड़े होकर टिकिट ली। हम लाईन के बाहर खड़े रहे, जब एक लाईन में लगा है दो क्यों लगे? दो लगने से भी टिकिट तो जल्दी मिलने से रही।

किसने मारी कंकरी कांकरिया तलाव में
कांकरिया तालाब काफ़ी बड़े इलाके में बना है। रात को तालाब के सब तरफ़ झमाझम रंगीन बल्बों का प्रकाश सुंदर दिखता है। हम पैदल ही निकल लिए तालाब के चक्कर लगाने के लिए। एक ने बताया की तालाब का पुरा चक्कर लगभग 4 किलोमीटर का है। तालाब का विकास एक पिकनिक स्थल की तरह किया गया। यहाँ गैस के बैलून से लेकर, टॉय ट्रेन एवं ओपन बसे भी हैं। जो पर्यटकों को तालाब का भ्रमण कराती हैं। गैस के गुब्बारे में चढकर आप अहमदाबाद का रात का नजारा देख सकते हैं। बताते हैं कि गुब्बारा फ़ूटने से कुछ लोग नीचे गिरकर उपर भी चले गए थे। तब इसे बंद कर दिया था। लेकिन अब गुब्बारे का सफ़र पुन: चालु है। तालाब के किनारे पर हनुमान जी का एक मंदिर भी दिखाई दिया। थोड़ी ही दूर पर शास्त्री जी भी खड़े थे। एक स्थान पर हल्का फ़ुल्का नाश्ता लिया और कांकरिया तालाब का हमारा चक्कर पूरा हो चुका था।

मैया रेल खिलौना लैइहौं -नामदेव जी
10 बज रहे थे, विनोद भाई ने कहा कि अब कहीं खाना खाने चलते हैं। संकल्प नाम के होटल में गए, वहां पहुंचने पर खाने के लिए लोग लाईन लगा कर बैठे थे। गजब मामला है, हम तो मुफ़्त की पंगत में इंतजार नहीं करते, काउंटर वाले ने हमे आधे घंटे का टाईम दिया। बाहर चेयर डाल रखी थी हम वहीं गपियाते बैठ गए। आधे घंटे बाद हमारा नम्बर आया, खाने का आडर दिया स्टीवर्ड को। सबसे पहले उसने एक धमेले जैसा फ़ाफ़ड़ा लाकर रखा। कहा कि होटल की तरफ़ से स्टाटर फ़्री है। भोजन लगते ही खाने लगे, तभी एक सब्जी में से बाल निकल आया। लम्बा बाल था, छोटा-मोटा होता तो पता ही नहीं चलता। मैनेजर को बुलाया, उसने माफ़ी मांगी लेकिन अब मुड किरकिरा हो चुका था।

होटल संकल्प - ढूंढो अन्य विकल्प
विनोद भाई पहले बता रहे थे इस रेस्टोरेंट की अहमदाबाद में चैन है। हमारी सब्जी से चैन निकलती तो कोई बात थी,  लेकिन निकला बाल और उसने मन का चैन खो दिया। आखिर में उसने आईसक्रीम दी। लेकिन बिल से सब्जी का चार्ज कम नहीं किया। इसलिए संकल्प की चैन के चक्कर में जाएं तो अपने रिस्क पर। यह एक ग्राहक का अनुभव है। दो बार बाहर भोजन किया, दोनो बार ही अनुभव सही नहीं रहा। इससे बढिया तो हमारे अमरू का ढाबा है, सब कूछ आँखों के सामने। भट्ठी, तवा, कड़ाही तेल, जो कुछ बन रहा है वह सामने है। आँखों के सामने बनवाओ और खाओ। एक ब्रिटिश सीरियल में और यू ट्यूब हाईजेनिक किचन के शेफ़ लोगों के विडियो देखने के बाद तो क्या मन करेगा इन हाईजैनिक फ़ुड वाले होटलों में। खाना अपने गेस्ट हाऊस के केयर टेकर का ही बढिया लगा। इसलिए अहमदाबाद जाने वाले संकल्प का विकल्प अभी से देख लें। संकल्प से सबक लेकर हम पहुंचे अपने गेस्ट हाऊस, आगे की कथा अगली पोस्ट में............आगे पढें

18 टिप्‍पणियां:

  1. शायद इसी तालाब की प्रसिद्धि कभी (मैत्री संविदा के जमाने में) आत्‍महत्‍याओं के लिए थी.

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  2. ललित भैया... सुबह-सुबह अहमदाबाद की इस गुनगुनी सैर के लिए धन्यवाद. अगले अंक का इंतज़ार रहेगा.

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  3. यह जीवंत यात्रा वृतांत .....और जिन्दगी के मेले ...!

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  4. बढिया चल रही है अहमदाबाद की सैर।

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  5. अहमदाबाद की सुहानी सुबह और विवरण अच्छा लगा ... अगले अंक का इंतज़ार है...

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  6. सुन्दर लगा. हम संकल्प लेते हैं, संकल्प में नहीं जायेंगे.

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  7. बढ़िया प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 23-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  8. बढ़िया प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 23-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  9. सुन्दर चित्रों से सजा रोचक वर्णन..

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  10. कहीं भी जाना हो तो आपकी पोस्ट पढकर जाना चाहिये। हर जगह की वास्तविकता ईमानदारी से बताते हैं। "जाको कछु ना चाहिये....." ।

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  11. ललित भाई विकास पुरुष मोदी जी से मिलने का कार्यक्रम है या नहीं...​
    ​​
    ​जय हिंद...

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  12. दादा घूम फ़िर के आते हो
    बहुत मसाला लाते हो

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  13. अहमदाबाद संकल्प का विकल्प तलाश कर ही जाना चाहिए ... बढ़िया वृतांत

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  14. समय रहे तो संन्यास आश्रम मे भी जाना ललित जी । संन्यास आश्रम, आश्रम रोड , एलिस ब्रिज, अहमदाबाद

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  15. गुजरात भ्रमण का आनन्द ले रहा हूँ आपके साथ. नेक्स्ट किस्त का इन्तेज़ार है !!!!

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