काव्य संग्रह विमोचन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
काव्य संग्रह विमोचन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

भई, कार्यक्रम हो तो ऐसा ----- ललित शर्मा

ई अब तो लिखना ही पड़ेगा कि कार्यक्रम हो तो ऐसा! अनिल पुसदकर ने एक महीने पहले फ़ोन कर के बताया कि उनकी कृति "क्यों जाऊं बस्तर? मरने! का विमोचन 31 मार्च को होना है, साथ ही यह भी कहा कि "31 मार्च को कहीं दूसरी जगह का कार्यक्रम न बनाना और कार्यक्रम में उपस्थित होना है। मैं निमंत्रण पत्र भिजवा रहा हूँ। मैने कहा कि - निमंत्रण पत्र की आवश्यकता नहीं है, आपका फ़ोन ही काफ़ी है। मैं समय पर पहुंच जाऊंगा। उसके बाद अनिल भाई भी व्यस्त हो गए विमोचन के इंतजाम में और हम भी अपनी निठल्लाई में लग गए। अनिल भाई से लगाव तो सदा से ही रहा है। उनकी साफ़गोई पसंद आती है। मन भेद कभी रहा नहीं।

पुस्तक विमोचन का प्रचार कार्य जोरों पर चल रहा था। 31 मार्च 2012 का वह दिन भी आ गया। पुस्तक के प्रकाशक सुधीर शर्मा जी का भी मैसेज आया था कि यह उनके प्रकाशन की 300 वीं पुस्तक है जरुर आना है। हम दोपहर 12 बजे ही पंहुच गए, भई कार्यक्रम अपना ही था, इसलिए जल्दी भी पहुंचना जरुरी था। पुस्तक का विमोचन छत्तीसगढ के यशस्वी मुंख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के हाथों होना था। स्थान मेडिकल कॉलेज का सभागृह था। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम 4 बजे होना था। हम (राहुल सिंह, जी के अवधिया, राकेश तिवारी, अरुणेश दवे) भी मेडिकल कॉलेज 4 बजे ही पंहुच गए। पंहुचते ही अनिल भाई मिले और हमने उन्हे शुभकामनाएं दी। व्यस्तता के बीच उन्होने हमें समय दिया। हमने अपना स्थान ग्रहण किया।

थोड़ी ही देर मे सभागृह खचाखच भर चुका था। नेता, अभिनेता, अधिकारी, कर्मचारी, आम नागरिक, खास नागरिक, डॉक्टर्स, यार दोस्त सभी, याने छोटे बड़े हर तबके से लोग पहुंच चुके थे। जितने लोग भीतर बैठे थे उतने ही बाहर खड़े थे। ऐसा वृहद और गरिमामय पुस्तक विमोचन समारोह मैने पहली बार देखा। यह सब अनिल भाई के व्यक्तिगत संबंधों का प्रताप था। उपस्थित जनों को देखकर इनके सामाजिक संबंधों के दायरे का पता चलता है। सभी लोगों से सहज भाव से मिलना और उसे आत्मीयता का अहसास करा देना अनिल भाई की खूबी है। जिसका परिचय कार्यक्रम में उपस्थिति से पता चलता है।

अनिल भाई के बचपन एवं स्कूल-कॉलेज के मित्रों ने मोर्चा संभाल रखा था। कार्यक्रम के मुख्यातिथि छत्तीसगढ के यशस्वी मुंख्यमंत्री डॉ रमन सिंह, मुख्य वक्ता राज्यसभा सदस्य तरुण विजय थे एवं विशेष अतिथि बस्तर के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा थे। कार्यक्रम 2 घंटे विलंब से शुरु हुआ। उपस्थित महानुभावों के द्वारा पुस्तक का विमोचन किया गया तथा पुस्तक पर चर्चा हुई।

मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस कार्यक्रम में आने के लिए कई लोगों ने मुझे मना किया। मुख्यमंत्री ने कहा यह कोई सरकारी आयोजन नहीं है। एक पत्रकार का आयोजन है इसलिये मैं यहां आया। उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूं ऐसे कार्यक्रम जगह-जगह आयोजित हो , स्वस्थ्य बहस हो और नक्सल समस्या का शीघ्र समाधान निकले। शीर्षक और मुद्दे पर कम चर्चा हुई, किन्तु अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर उन्होंने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई बडी़ बात नहीं है। सरकार ने नियम बना दिये हैं कि शहीद के परिजनों को तब तक पूरा वेतन दिया जायेगा, जब तक शहीद की उम्र रिटायर्ड तक पूरी नहीं हो जाती।

कार्यक्रम में महेन्द्र कर्मा ने कहा कि नक्सल समस्या अब अकेले कांग्रेस या भाजपा या फिर किसी एक पार्टी के बस की बात नहीं है। सबको मिलकर इसका समाधान खोजना होगा। सरकार को दांव पर भी लगाना पड़ सकता है। विशेष यह था कि अनिल भाई ने पुस्तक के कुछ अंश को पॉडकास्ट भी किया। गंभीर आवाज में पुस्तक का वाचन बहुत अच्छे ढंग से किया गया। अनिल भाई को मेरी तरफ़ से एक बार पुन: बधाई एवं शुभकामनाएं। ये सच है कि ऐसा पुस्तक विमोचन कार्यक्रम मैने कभी देखा नहीं।     

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

"मेरे दिल की बात" का विमोचन के बाद चले गुजरात की ओर -- ललित शर्मा

त्तीसगढ के यशस्वी ब्लॉगर साहित्यकार स्वराज्य करुण का नाम परिचय का मोहताज नहीं है,लगभग-35-40 वर्षों से उनकी सतत साहित्य साधना जारी है। एक दिन फ़ोन पर बताया कि उनका द्वितीय काव्य संग्रह "मेरे दिल की बात" प्रकाशित हो चुका है। उन्होने काव्य संग्रह के विमोचन के लिए तारीख तय करने कहा। हमने 15 दिसम्बर तारीख तय की। स्वराज्य जी ने कहा कि अशोक बजाज जी बंगले "चौपाल" पर ही एक छोटा सा कार्यक्रम किया जाए और कुछ ब्लॉगर मित्रों की उपस्थिति में काव्यसंग्रह का विमोचन किया जाए। ब्लॉगर के काव्य संग्रह का विमोचन एक ब्लॉगर के हाथ और ब्लॉगर्स के साथ हो। इससे बड़ी क्या बात हो सकती है। बस कार्यक्रम तय हो गया।


मुझे 16 दिसम्बर को गुजरात भ्रमण पर जाना था। हावड़ा से अहमदाबाद जाने वाली सभी गाड़ीयाँ रिशेडयुल चल रही हैं। रायपुर सुबह आने वाली गाड़ियां शाम को पहुंच रही हैं। इससे हावड़ा अहमदाबाद मार्ग पर चलने वाले यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए मैने एक सप्ताह पहले पुरी अहमदाबाद से अपना जाने का आरक्षण करवाया, पर 15 तारीख तक आरक्षण कनफ़र्म नहीं हुआ। इसलिए आपातकालीन कोटे से आरक्षण करवाने के लिए मुझे रायपुर डी आर एम कार्यालय से सम्पर्क करना था अर्थात रायपुर जाना तय था। दोपहर में डी आर एम ऑफ़िस से आरक्षण का पत्र देकर राहुल भाई के पास पहुंच गए। यहाँ पहुंचने पर सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक ज्ञान में वृद्धि हो ही जाती है। बैठे-बिठाए कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाता है। 

शाम को अरुणेश दवे जी का फ़ोन आने पर उन्हे राहुल भैया के आफ़िस में ही बुला लिया गया। थोड़ी देर बाद वरिष्ठ ब्लॉगर जी के अवधिया जी भी पहुंच गए। धीरे-धीरे ब्लॉगर साथी उपस्थित होने लगे। विमोचन का समय शाम 7 बजे का तय किया गया था। तब तक अशोक भाई भी चौपाल में पहुंच चुके थे। गिरीश पंकज, जी के अवधिया, राहुल सिंह, हबीब साहब, गुरबीर चावला, अरुणेश दवे, अल्पना देशपांडे एवं पिथौरा से उपस्थित श्रृंखला साहित्य मंच के प्रवीण प्रवाह, बंटी छत्तीसगढिया, शिवा मोहंती, शंकर गोयल  की गरिमामय उपस्थिति में "मेरे दिल की बात" का विमोचन भाई अशोक बजाज के द्वारा किया गया। सभी ने करतल ध्वनि से स्वराज्य करुण जी का स्वागत करते हुए काव्य संग्रह के विमोचन पर उन्हे ढेर सारी बधाईयाँ दी। स्वल्पाहार के दौर के पश्चात गिरीश पंकज जी ने नयी कविता और छन्द बद्ध कविता पर अपने विचार प्रगट किए। उपस्थित सभी साथियों ने भी अपने विचार इस कार्यक्रम के दौरान रखे। इस दौरान राज भाटिया, अर्चना चावजी, बीएस पाबला जी ने फ़ोन पर अपनी शुभकामनाएं दी।विमोचन कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात मैने चलते-चलते टिकिट का पी एन आर देखा तो टिकिट कन्फ़र्म हो चुकी थी। मतलब अब गुजरात का भ्रमण पक्का हो चुका था।

ठंड बढ चुकी है, इसका अहसास रात 9 बजे के बाद घर आने के दौरान रास्ते में हुआ। मैने रात विनोद गुप्ता जी को फ़ोन लगा कर गुजरात के मौसम के विषय में पूछा तो उन्होने बताया कि एक स्वेटर की ठंड है उधर। साथ ही एकाध कोट लाने की हिदायत भी उन्होने दे दी। अब कल सुबह 7-25 को हम अहमदाबाद पहुंचेगे, फ़िर तय किया जाएगा कि किधर घूमना है? गुजरात जाने का कार्यक्रम अगस्त माह से बन रहा था, लेकिन कुछ न कुछ अवरोध अवश्य उपस्थित हो जाता था। यात्रा टल रही थी, इस बीच कई जगह जाना पड़ा। मित्रों अब गुजरात का सफ़र जारी हो चुका है। अहमदाबाद में कोई ब्लॉगर मित्र हैं तो अवश्य जानकारी दें, उनसे मिलने का प्रयास किया जाएगा। रात उमड़त-घुमड़त विचार ने बताया कि नागपुर में भी अच्छी ठंड हो गयी है। रजाई का इस्तेमाल किया जा रहा है पर हल्की रजाई में ठंड नहीं रुक रही।  शरद कोकास भाई को भी नागपुर की शादी के दौरान ठंड लग गयी। फ़ोनिक चर्चा के दौरान उन्होने ठंड लगने की जानकारी दी। अब लेते हैं शार्ट ब्रेक और मिलते हैं अहमदाबाद में।