मेहता पाईंट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेहता पाईंट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 27 जनवरी 2013

जिन्दगी भर नहीं भूलेगी ........

रास्ते की बस्तियाँ सुनसान थी। ठंड अधिक होने कारण  लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर गरम हो गए थे। हम जंगल में भटक रहे थे। ये कैसी विडमबना है कि जंगल का आदमी शहर की तरफ़ भागता है और शहरी जंगल की तरफ़।  हम तो सभी जगह खुश रहते हैं। जहाँ जो मिल जाए वही चल जाए। एक यायावर की जिन्दगी यही होती है। जाहि बिधि राखे राम तेही बिधि रहिए। वीरान कच्चे रास्ते पर लक्जरी कार चलना ऐसा लगता है कि जैसे कार के साथ अत्याचार हो रहा है। मुझे ठंड लग रही थी। हम रेस्ट हाउस पहुचे तो चौकीदार तैयार था। उसने आकर गेट खोला और हम रेस्ट हाऊस के भीतर हुए। चारों तरफ़ बिजली की रोशनी थी। जहाँ तक बिजली की रोशनी थी वहीं तक दिखाई देता था उसके आगे अंधेर गुप्प था। 
विश्राम गृह मेहता पाईंट
मेहता पाईंट के इस रेस्ट हाऊस में दो भवन हैं। एक भवन में तीन कमरे हैं और दूसरे भवन में दो कमरे। जिनकी हालत खस्ता है। दो कमरे वाले भवन में पलंग बिछा  है जिस पर गद्दे लगे हुए थे। चौकीदार से चादर मंगाई तो उसे देखकर यहाँ ठहरने की हिम्मत नहीं हुई। हमारे पास कम्बल और चादर थी। साथ ही एक बालक की जिद के कारण हमें रुकना ही पड़ गया। चादरों की हालत देख कर लग गया था कि यहाँ का चौकिदार कितना अधिक कामचोर है। 10 रुपए के निरमा पावडर से चादर साफ़ हो सकती थी। लेकिन सरकारी मामला है, वह क्यों मगजमारी करे। पूछने पर कहने लगा कि अगर कोई बड़ा अधिकारी इधर आता है तो साहब लोग अम्बिकापुर से सारा सामान साथ ले आते हैं। यहाँ से कुछ भी लेने की जरुरत नहीं पड़ती। 
इस रात की सुबह नहीं
राहुल ने गाड़ी से उतरते ही कैम्प फ़ायर का मन बना लिया चौकीदार के साथ लकड़ियां लेकर आया और रेस्ट हाऊस के पीछे कुर्सियां और टेबल लगवाई। फ़िर कैम्पफ़ायर हुआ। खाने का कार्यक्रम शुरु हुआ। चौकीदार भी वहीं बैठ गया आगी तापने के एवं कैम्पफ़ायर का मजा लेने के लिए। कहने लगा कि आप पहले बता देते तो मैं खाना यहीं बना देता। क्योंकि कुक्कड़ कम पड़ गए। अब गांव में सब लोग सो गए होंगे इसलिए मिलने से रहे। हमें भी लगा कि पहले ही इंतजाम कर लिया होता तो ठीक था। लेकिन अब क्या करते जितने भी थे वहीं उदरस्थ किए। राहुल ने फ़िर माउथ आर्गन बजा कर ब्लंडर किया। हँसी मजाक के साथ कार्यक्रम चलते रहा। इतनी ठंड में खुले आसमान के नीचे भी बैठना बेवकूफ़ी ही है। 
कैम्प फ़ायर
रामसे बदर्स की फ़िल्म का चौकीदार अपनी चादर ओढ कर हमारे पास ही बैठ गया । रात गहराते जा रही थी, जंगली जानवरों की आवाजें आने लगी। सूनसान वीराने में हल्की सी आवाज भी दूर तक हवा में तैर जाती है। कार के एफ़ एम रेडियो पर रायगढ का प्रसारण चल रहा था। हम फ़ोन इन कार्यक्रम का आनंद ले रहे थे। एफ़ एम आने के बाद ग्रामीण अंचल में रेडियो का चलन एक बार फ़िर बढ गया। साथ ही गांव तक मोबाईल फ़ोन पहुचने के कारण फ़ोन इन कार्यक्रम काफ़ी सफ़ल हो रहे हैं। रात्रि का भोजन करने के बाद ग्रामीण रेडियो सुनते हुए अपनी फ़रमाईश का गाना सुनने के लिए फ़ोन लगाते रहते हैं। जिसका फ़ोन लग गया समझो उसकी तो बल्ले बल्ले हो गई। साथ ही फ़ोन करने वाला भी एंकर के साथ इतनी आत्मीयता से बात करता है जानों उसे बरसों से जानता हो। बस सुनसान स्थान पर कैम्प फ़ायर के साथ रेडियो का आनंद अद्भुत वातावरण बना रहा था।
आग की गर्मी के सहारे तिहारे पियारे
चौकीदार से मैने रेस्ट हाऊस की बुरी हालत के विषय में पूछा तो कहने लगा कि - सर क्या बताऊं आपको, इस साल में सिर्फ़ 3 बार ही यहां पर कोई रुका है आकर। अब आप लोग चौथे हैं जो यहाँ रात को ठहर रहे हैं। कोइ डर के मारे यहाँ रुकता ही  नहीं है। आस-पास भी 2-3 किलोमीटर तक कोई आबादी नहीं है, यदि कोई हादसा हो गया तो मुफ़्ते में मारे जाएगें। रात को जंगली जानवर आते हैं। बरहा और भालुओं की तो भरमार है। जब मेरी चौकीदारी यहाँ लगी तो सब खंडहर पड़ा था। उधर (मैदान की तरफ़ संकेत करते हुए) सब झाड़-झंखाड़ था। मेरे आने के बाद सब बिल्डिंग की मरम्मत हुई। एक बात बताऊं सर! यहाँ पर कई चुडैलों का डेरा है। मै कई बार सुना हूँ। छत पर धम-धम कूदने की आवाज आती  है। कमरों में छन-छन पायल की आवाज आती  है। मैं यहाँ पर अकेला रहता हूँ। एक साथी और है जो आ जाता है दोनो यहाँ रहते हैं। नहीं तो अकेला ही रहना पड़ता है।
स्वानानंद महाराज अपने चेले के साथ आग तापते हुए
हम लोग तो यहीं के रहने वाले हैं। किसी चीज से नहीं डरते। यहीं खाना बना लेते है और पड़े रहते हैं। दिन में घूमने वाले आते हैं और खा-पीकर घूम-घाम कर चले जाते हैं। रात को सिर्फ़ हम ही बचते हैं। वह धारा प्रवाह कथा कहे जा रहा और हम उसकी बात सुनते जा रहे थे। तो चुडैलें अभी भी हैं क्या? अभी नहीं हैं, एक बाबाजी यहां आकर रुके तो उन्होने भी कहा था कि यहां पर चुड़ैले हैं। बोले कि दूबारा आऊंगा तो इनका मंतर-तंतर से इलाज कर दुंगा। कुछ दिनों के बाद वे दुबारा आए तो उन्होने कुछ जादू मंतर किया । अब क्या किया वे ही जाने, तब से पायल बजने की आवाजें आना बंद हो गयी कहते हुए उसने धीरे से चादर के भीतर से गिलास निकालकर धीरे आगे सरका दिया। दो स्वानानंद महाराज भी आनंदित भए चौकिदार का प्रवचन सुन रहे थे।
लो हो गया अब कैम्प फ़ायर
फ़िर आगे कहने लगा कि ये पूरा ईलाका सरगुजा राजा का था। बूढे लोग बताते है कि कीर्ति राजा यहां पर शिकार खेलने आते थे तो हांका करने के लिए आस पास के सारे गांव वालों को जाना पड़ता था। जो जिस हालत में होता था उसे उसी हालत में जंगल में हांका करने जाना पड़ता था। अगर चुल्हे पर हंडी चढी है तो उसे भी वैसे ही छोड़ कर जाना होता था। जब तीन तरफ़ से हांका शुरु होता था तब राजा शेर का शिकार करते थे। मैट्रिक तक पढा-लिखा चौकिदार होशियार बहुत है। उसकी बाते चल रही थी और मुझे नींद आ रही थी। बिजली की रोशनी होने के कारण कोई समस्या नहीं थी। अगर बिजली चली जाती तो आग की रोशनी में भूत ही भूत दिखाई देते। मैं तो सोने चला आया कमरे में। पंकज पहले ही आकर सो गया था। राहुल कब तक उसकी कहानी सुनता रहा पता नहीं। निद्रा देवी भी कब तक प्रतीक्षा करती। उसे भी तो अपनी जिम्मेदारी  निभानी थी……… आगे पढ़ें 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

टाईगर पाईंट और मर्करी रिसोर्ट ... Mainpat


कमलेश्वरपु्र से सीतापुर जाने वाले मार्ग पर थोड़ी दूर जाने पर टाइगर पाईंट आता है। यहां छोटी पहाड़ी नदी पर एक झरना है जिसकी खाई में कभी शेर इत्यादि जंगली जानवर पानी पीने आते होगें। अब तो सिर्फ़ टाईगर नाम ही रह गया है। पर्यटक सोचते होगें कि टाईगर दिखेगा। लेकिन अब कहाँ टाईगर दिखाई देगें। नदी के पानी गिरने के स्थान पर रेलिंग लगा कर सुरक्षित कर दिया गया है। यह घाटी मनोरम दिखाई देती है। जब हम पहुचे तब धुंधलका होने लगा था और पहाड़ी की छाया घाटी पर पड़ने के कारण स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। राहुल और पंकज घाटी  में उतरना चाहते थे। उपर से गिरते हुए झरने के समीप खड़े होकर आनंद जो लेना था।
मैनपाट का गुगल व्यु
वे तीनों नीचे घाटी में उतर गए, मौसम में शीतलता आ रही थी। झरने के पानी गिरने से नीचे जंगल में  थोड़ी धुंध भी बन रही थी। मै और विष्णु उपर ही रह गए। नीचे उतरने से ठंड लगने की समस्या थी और मैं अपने साथ कोई गर्म कपड़े नहीं लाया था। लेकिन मैनपाट की ठंड का अहसास होने लगा था। कुछ लोग वहां पिकनिक मना रहे थे। पास ही एक मंदिर बना हुआ था। लोगों ने बड़े हंडे चढा रखे थे। किसी का खाना बन रहा था तो कोई भोजन करके पत्तलें समेंट रहा था पत्तलें और डिस्पोजल गिलास यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। इंसान की अजब फ़ितरत है, जहां भी जाएगा वहीं गंदगी फ़ैलाएगा। इससे तो जानवर ही भले हैं जो गंदगी साफ़ करते  हैं। इस सुंदर प्राकृतिक स्थल को प्लास्टिक से पाट रखा है।
टायगर प्वांईट पर टायगर 
लैला मजनु की सयुंक्त औलादों के कारनामों के तो क्या कहने। पत्थर तो पत्थर ग्वारपाठे के पत्तों पर भी दिल चिपका रखा  है। साथ ही विरदावली लिख रखी  है। जैसे जब कभी भी यह सभ्यता नष्ट होगी तो आने वाली नयी सभ्यता को इनकी प्रेम कहानी पत्तों पत्तों पर लिखी मिलेगी फ़ासिल्स के रुप में। मैं कुछ यही सोच रहा था इस स्थान पर, तभी साथी भी आ गए घाटी में से घूम कर, बोले बहुत ठंड है  नीचे। अच्छा हो गया आप उपर ही रह गए। अब मैं इन्हे मना करता तो मानते नहीं। आज कल के छोकरों का यही रोना है। मनमानी ही करते हैं। अब संध्या नास्ते के लिए समोसे निकाले गए। समोसों  की चटनी उम्दा थी। सभी के हिस्से दो-दो समोसे आए। सांझ होने को थी अब हमे लौटना था कमलेश्वरपुर की ओर।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल तुम्हारा जाने हे
राहुल के सिर पर सुबह से ही मैनपाट में रात्रि विश्राम करने का भूत सवार था। मैनपाट के हालात देखते हुए मेरा रुकने का मन नहीं था और  न ही विष्णु सिंह और उसका साथी रुकना चाहता था। राहुल ने जिद पकड़ ली कि उसे मैनपाट में ही रुकना है वरना अपने दोस्तों को क्या मुंह देखाएगा कि मैनपाट गया और वहां रात नहीं रुका। बात मुंह दिखाने तक पहुंच गयी थी। हमारे रुकने की व्यवस्था मेहता पाईंट स्थित विश्राम गृह में की गयी थी। हम सब एक बार यह स्थान देखना चाहते थे। टाईगर पाईंट से मेहता पाईंट दक्षिण दिशा की ओर है। कमलेश्वरपुर से लगभग 7-8 किलोमीटर की दूरी होगी। ढूंढते हुए हम मेहता पाईंट पहुचे तो सूर्यास्त होने को था। 
रेस्ट हाऊस में पहुंचने पर कोई दिखाई नहीं दिया। 
टाईगर प्वाईंट की ढलती हुई सांझ
थोड़ी देर तक आवाज देने पर एक चौकीदार निकल कर आया और आते ही बोला कि यहाँ के नल की मोटर खराब हो गयी है और सुबह आपको नहाने के लिए पानी नहीं मिलेगा। राहुल को तो रात मैनपाट में काटनी थी। वह इस स्थिति में भी तैयार था। हमने थोड़ी देर रुक कर प्राकृतिक नजारे का आनंद लिया। दाई तरफ़ सूर्यास्त हो रहा था। बड़ा ही मनमोहक दृश्य था। अंदाजा लग गया था कि जब सुबह होगी तो घाटी में बाईं तरफ़ सूर्योदय होगा। ऐसा दुर्लभ नजारा कम ही स्थानों पर मिलता है जब एक तरफ़ सूर्यास्त हो और सुबह दूसरी तरफ़ सूर्योदय हो। सामने घाटी में छोटा सा बांध दिखाई दे रहा था। सूरज की लालिमा पहाड़ों से होते हुए घाटी तक जाना चाहती थी।
पिकनिक के अवशेष टाईगर प्वाईंट पर
यह दृश्य देख कर मैने भी यहीं रात्रि विश्राम करने का मन बना लिया। यहाँ दो भवन हैं एक में 2 कमरे हैं और दूसरे में तीन चार कमरे बने हुए हैं। लेकिन रुकने के लायक कोई व्यवस्था दिखाई  नही दी। फ़िर भी हम चौकीदार को वापस आने की कहकर विष्णु सिंह एवं उसके साथी को तिब्बती कैंप नम्बर 1 के समीप स्थित बस स्टैंड छोड़ने के लिए आए। वापस अम्बिकापुर जाने का  कोई साधन तो दिखाई नहीं दिया। तभी एक बोलेरो वाले से चर्चा करने पर वो विष्णु सिंह एवं उसके साथी को  अम्बिकापुर ले जाने को तैयार हो गया। वे जब बोलेरो में बैठ गए और  वह चल पड़ी तब हमने राहत की सांस ली। क्योंकि उन्हे रात अम्बिकापुर में किसी मित्र के यहाँ शादी में जाना था।
मर्करी रिसोर्ट की छोलदारी का इंटिरियर
रेस्ट हाऊस में खाना बनाने की व्यवस्था नहीं होने के कारण अब हमें खाना ढूंढना था। पूछने पर पता चला कि थोड़ी दूर पर मर्करी रिसोर्ट है अब खाना वहीं मिल सकता है। हम मर्करी रिसोर्ट पहुचें। बरसाती नाले के किनारे पर 6 टैंट (छोलदारी) लगा कर रुकने का इंतजाम किया गया है। किचन एवं रेस्टोरेंट बांस से बनाया हुआ है। रेस्टोरेंट की टेबल एंव कुर्सियां भी बांस की ही हैं। पूरा इंटीरियर ही बांस का बनाया हुआ है। सामने लॉन में कुछ टेबल और कुर्सियाँ लगा रखी हैं। रात रुकने के लिए एक स्विस कॉटेज का किराया 1800 रुपए बताया। बार्गेनिंग करने पर 1500 तक बात पहुच गयी। एक बैड अलग डालने के 300 रुपए अतिरिक्त लगेगें। हमने छोलदारियाँ देखी, उनमें लैट्रिन-बाथरुम अटैच था। साथ ही एसी की व्यवस्था भी थी।
मर्करी रिसोर्ट का रेस्टोरेंट
हमने खाना पार्सल करने का आदेश दिया और तब तक चाय की व्यवस्था करने कहा। मैनपाट में यही एक मात्र रेस्टोरेंट हैं जहाँ खाना मिल सकता है। चाय में शुगर फ़्री डालने कहा तो वेटर के मैनेजर ने भी असमर्थता जता दी। इससे मुझे पता चल गया कि इस रिसोर्ट का क्या स्तर है। सिर्फ़ नाम का ही रिसोर्ट लगा। पूछने पर पता चला कि बाकी सब व्यवस्था हो जाएगी लेकिन शुगर फ़्री नहीं मिलेगी। चाय लेकर आया तो वह ठंडी पड़ी थी और बाहर का टेम्परेचर लगभग 3-4 डिग्री के आस पास था। ठंडी चाय की घुंट लेते ही खोपड़ी घूम गयी। मन ही मन सोचा कि कहाँ फ़ंस गए आकर। एक तरफ़ सरकार मैनपाट नहीं देखा तो क्या देखा के बोर्ड लगा रही है और इधर मैनपाट पहुंचने पर ये हालात हो रही है।
मेहता प्वाईंट का सूर्यास्त
हमने खाने का पार्सल लिया। बिल पूछने पर थोड़ा मंहगा ही लगा। अब मैनपाट में जब और दूसरी जगह खाना नहीं मिलना है तो एकाधिकार रहेगा ही। जो भी जिस भाव में मिल जाए लो और मौज करो। हम अपने रेस्ट हाऊस  की तरफ़ चल पड़े। रात के लगभग साढे आठ बज रहे थे। मैनपाट सुनसान पड़ा था। जहाँ पर हमें रुकना था वहाँ दो-तीन किलोमीटर तक बस्ती का कोई नाम निशान नहीं था। आस पास भी कोई आबादी नहीं थी। एक तरफ़ खाली मैदान और दूसरी तरफ़ खाई के साथ जंगल और जंगली जानवर। चौकीदार भी रामसे बदर्स की पुरानी हवेली के चौकीदार जैसा ही था। अब जो होगा सो देखा जाएगा। रात तो यहीं गुजारनी है।