शनिवार, 4 अप्रैल 2015

शांगरी-ला : भूटान यात्रा - अंतिम किश्त

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सिलीगुड़ी में सुबह हुई, शहर घूमने का कार्यक्रम बना। सिलीगुड़ी में काफ़ी हिन्दी भाषी लोग भी रहते हैं और यहीं से नार्थ ईस्ट के लिए सभी गाड़ियाँ जाती है। गंगटोक, दार्जलिंग जाने वालों को यहीं आना पड़ता है। गोवाहाटी के लिए भी यहां से बस सेवा है। हमारी गाड़ी रात को न्यूजलपाईगुड़ी से थी। सिलीगुड़ी में चाईना मार्केट है और ऐसी ही एक मार्केट बस स्टैंड में भी है जहाँ वही सामान मिलता है जो चाईना मार्केट में मिलता है। हमने कुछ गर्म शाल खरीदे। नार्थ ईस्ट का डिजाईन कुछ अलग होता है और काफ़ी सुंदर भी दिखता है। इसलिए सोचा कि यादगार के तौर पर ले लिया जाए। क्योंकि भूटान में तो कैमरे के लिए सेल और चार्जर लेने में ही 1800 खर्च हो गए थे। वहां यह समान काफ़ी मंहगा मिला। अगर मुझे वहाँ पर ड्यूरो सेल मिल जाते तो दो ढाई सौ में ही काम चल जाता और 500 का सामान 1800 में नहीं खरीदना पड़ता।
सिलीगुड़ी में डाभ का स्वाद
मार्केट से लौटकर भोजन किया और बाकी साथी बागडोगरा एयरपोर्ट मार्केट चले गए और मैं होटल में ही बैठा रहा। ये अंधेरा होने पर पहुंचे। मुझे 5 घंटे बैठे बैठे गुजारने पड़े। इनके आते ही हम आटो लेकर न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंच गए। सिलीगुड़ी से न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है और यही एकमात्र है स्टेशन है जो उत्तर पूर्व को भारत से जोड़ता है। न्यू जलपाईगुड़ी में हमारी ट्रेन लग चुकी थी। मैने खाना नहीं नहीं खाया था। स्टेशन पर ही जल्दी से चावल और सब्जी लेकर खाई और ट्रेन में सवार होते ही ट्रेन अगली मंजिल की ओर चल पड़ी।
न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन
सुबह हम 9 बजे हावड़ा जंक्शन में पहुंचे। यहां रिटायरिंग रुम में रुम के लिए इंतजार करना पड़ा। बिना नहाए धोए दिन की शुरुवात करना ठीक नहीं लगता पर मजबूरी थी। क्या करते, कुछ देर बाद नम्बर आया तो पता चला कि रुम चार्ज 1200 रुपए है। हमें तो सिर्फ़ सामान ही रखना था और फ़्रेश होना था। अब फ़्रेश होने के लिए सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करना पड़ा और सामान क्लार्क रुम में रख कर हम हावड़ा स्टेशन की जेट्टी की ओर चल दिए। हमारे साथियों को हावड़ा पुल देखना था और ऐसे स्थान की टिकिट लेनी थी जिसका स्टीमर हावड़ा पुल के नीचे से गुजरता हो। 5-5 रुपए में हमने गोलाघाट की टिकिट ली और हावड़ा ब्रिज की खूब फ़ोटुएं खींची।
लैंडमार्क ऑफ़ कोलकाता हावड़ा ब्रिज
इसके पश्चात कुछ अन्य स्थान देखने के लिए बाबू घाट की ओर चल पड़े। स्टीमर ने हमें बाबू घाट छोड़ा और सड़क पर आकर हम बिछड़ गए। भूटान में ठंड के कारण न ठीक से पानी पीया जा रहा था और न ठीक भोजन कर पाया था। बाबू घाट की पटरी पर स्ट्रीट फ़ुड की दुकाने हैं, जहां मैने देखा कि एक स्थान पर गर्मागर्म चावल, दाल, 3 सब्जी, चटनी सलाद के साथ भोजन दिया जा रहा है। बस मैने वहीं बेंच संभाल ली और पेट भर भोजन किया आत्मा तृप्त हो गई। पैसे देते समय मूल्य पूछा तो होटल वाले ने सिर्फ़ 40 रुपए लिए। इस 40 रुपए के भोजन में वह आनंद आया जो 15 दिनों के फ़ाईव स्टार के ढकोसलों में नहीं आया। इसके बाद बस से मैं हावड़ा आकर साथियों का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद वे भी आ गए और हम अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए शालीमार स्टेशन आ गए।
घाटशिला रेल्वे स्टेशन
शालीमार से हमारी ट्रेन सही समय पर चल पड़ी। मैं अपनी बर्थ पर थोड़ी देर के लिए सो गया। हल्ला गुल्ला होने के बाद नींद खुली तो पता चला कि ट्रेन किसी स्टेशन में खड़ी है और यह अब आगे नहीं जाने वाली। मैने स्टेशन मास्टर से पूछा तो पता चला कि आगे राउरकेला पास कहीं पर कोई विधायक रेल की पटरियों पर अपने सर्मथकों के साथ बैठे और रेल रोको आन्दोलन चला रखा है। सवारियों को ट्रेन छोड़ने की सलाह बार बार माईक से दी जा रही थी। एलाऊंस किया जा रहा था कि यह ट्रेन वापस शालीमार जाएगी और जिन्हें वहां जाना है वह इस ट्रेन से जा सकते हैं और जिन्हे नहीं जाना है वे ट्रेन छोड़ दे। हम झारखंड के सिंहभूम जिले के घाटशिला प्रखंड में थे।
बिलासपुर - आखिर छत्तीसगढ़ पहुंच गए
हमारे साथी तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या किया जाए। पर मैने ट्रेन छोड़ना तय कर लिया था और अपना सामान लेकर प्लेटफ़ार्म की बेंच पर बैठ गया। वे भी कुछ देर में स्थिति को समझ कर आ गए। घाट शिला में रिश्तेदारों को फ़ोन किया और वे हमें लेने के लिए स्टेशन आ गए। इस तरह नेता जी एवं रेल्वे विभाग की कारस्तानी के कारण हमें जबरदस्ती एक दिन और 2 रात घाटशिला में गुजारनी पड़ी। इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं था। अगले दिन हमने कुर्ला हावड़ा की टिकिट ली और रात को घर पहुंचे। खुबसूरत भूटान की खुबसूरत यात्रा करके लौट आए। मुझे नेपाल से भूटान बहुत ही अच्छा लगा। कभी समय मिला तो कुछ दिन भूटान में और गुजारना चाहुंगा। आखिर इसे "सांगरिला" (स्वर्ग भूमि) जो कहते हैं। 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बाबूघाट की पटरी पर लिए गए भोजन से मिली संतुष्टि की अनुभूति हो रही है. लगभग 60 साल पहले शांग्रीला नामकी बिस्कुट आया करती थी उनके क्रीम क्रेकर लाजवाब हुआ करते थे

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  2. यह जानकार कि नेपाल से भूटान बहुत अच्छा है ..सैर करने को मन में उत्सुकता जागी है.. ..अभी फिलहाल यात्रा वृतांत पढ़कर ही संतोष करना पड़ रहा है ....

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  3. शुरू से अंत तक सारी की सारी यात्रा एक साथ ही पढ़ ली...

    पोस्ट अच्छी लगी...धन्यवाद

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  4. चित्रों के साथ सुंदर यात्रा वर्णन

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  5. नेपाल से भूटान बहुत अच्छा है तो फिर जाना ही पड़ेगा एक बार

    बढ़िया रहे सारे संस्मरण

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  6. नेपाल से भूटान बहुत अच्छा है तो फिर जाना ही पड़ेगा एक बार
    pabla ji mujhe bhi le chalna

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  7. चलिए बनाये प्रोग्राम हम भी तैयार है भूटान जाने को

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