मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

तेरहवीं सदी में नारी क्रांति : कलिंग यात्रा


अन्य चक्रों में भी पूर्व चक्रों में उत्कीर्ण प्रतिमाओं की पुनरावृत्ति की गई है। कुछ वर्षों पूर्व 20 रुपए के लाल नोट पर एक चक्र को प्रकाशित किया जाता रहा है। मंदिर की भीत्ति में उत्कीर्ण प्रतिमाओं को देखते हैं तो लगता है कि मेला लगा हुआ है, विषय भिन्नता के साथ सामाजिक समरसता का संगम यहाँ दिखाई देता है। यह मंदिर कलिंग स्थापत्य एवं मूर्ति शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रतिमाओं में स्त्री एवं पुरुष का केश विन्यास लगभग एक सा ही दिखाई देता है। अगर स्तन और उन्नत पुष्ट नितंब न हो तो पुरुष प्रतिमा भी स्त्री प्रतिमा जैसी दिखाई देती है। बिकाश को कई बार पुरुष प्रतिमा में स्त्री दिखाई दी। असल में कलिंग क्षेत्र में पुरुष भी बालों का जूड़ा बनाते हैं और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मैने चिल्का की यात्रा में बिकाश को दिखाया। तेरहवीं शताब्दी से लेकर अभी तक ग्रामीण अंचल में स्त्री पुरुषों के केश विन्यास में अधिक बदलाव नहीं आया है।
पुरुष केश विन्यास
कोणार्क, जैसा की शब्द से ही प्रतिध्वनित होता है कि यहाँ कोण की बात हो रही है। चंद्रभागा नदीं यहाँ से लगभग डेढ मील की दूरी पर समुद्र में मिलती है और वहाँ पर एक कोण बनता है। इस कोण के बनने के कारण इस स्थान का नाम कोणार्क प्रचलित होकर कालांतर रुढ़ हो गया और सूर्य मंदिर भी कोणार्क के नाम स्थापित हो गया। हमने देखा है कि तटीय क्षेत्र में निवास करने वाले लोग कम वस्त्र धारण करते हैं या खुले वस्त्र धारण करते हैं। समुद्र किनारे की उमस भरी खारे पानी से व्याप्त आद्र वायू देह पर चिपचिपापन पैदा करती है। पशीने के कारण वस्त्र देह से चिपकने लगते हैं। इसलिए समुद्र तटीय लोग उपरी बदन खुला एवं कमर पर कटि वस्त्र के साथ कांधे पर उत्तरीय धारण करते हैं। प्रतिमाओं में इसका चित्रण बखुबी किया गया है। कोणार्क के गाईड पर्यटकों को कटिवस्त्र के स्थान स्कर्ट बताकर गुमराह करते हैं। 
कटि वस्त्र
प्राचीन काल में चमड़े की जूतियों का अविष्कार हो गया था। परन्तु शिल्पकार देवी देवताओं एवं अन्य प्रतिमाओं को जूते चप्पल धारण किए नहीं प्रदर्शित करते। सभी प्रतिमाओं को नंगे पैर ही दिखाया जाता है। रमण करती नायिका की ऊंचाई बढ़ाने के लिए उसे नायक के पंजो पर खड़ा कर दिया जाता है, जिससे उसकी ऊंचाई बढ़ जाए और सौंदर्य अलंकरण में वृद्धि हो। देव प्रतिमाओं में सिर्फ़ सूर्य को ही पिंडलियों तक का बूट या जूता धारण किए हुए दिखाया जाता है। कापालिकों, साधुओं, यति जतियों के पैर भी नंगे दिखाए जाते हैं। सूर्य के अतिरिक्त किसी अन्य देवता या मनुष्य को चरण पादूका धारण किए हुए चित्रित नहीं किया जाता। वैसे आज भी धार्मिक स्थलों में जूते-चप्पल धारण कर प्रवेश करना वर्जित है। प्राचीन काल में नंगे सिर मंदिरों में प्रवेश नहीं किया जाता था। आज भी ग्रामीण अंचल में ठाकुर देव के समक्ष सिर पर पागा या रुमाल रख कर ही जाने की परम्परा देखी है।
सूर्य द्वारा लांग बूट धारण
एक प्रतिमा में स्त्री को ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण किए प्रदर्शित किया गया है। जबकि खड़ाऊ वानप्रस्थ या सन्यास धारण किए हुए पुरुष ही धारण करते हैं। सन्यासी एवं गृहस्थ के दोनों एक लिए पृथक पृथक खड़ाऊ का निर्माण होता था। गृहस्थ के लिए काष्ठ पर सामने कपड़े या चमड़े की पट्टी लगा दी जाती थी और सन्यासी के लिए अंगुठे एवं अंगुली के बीच फ़ंसने वाली काष्ठ कील होती थी। इसके निर्माण के पीछे का विज्ञान बताया जाता है कि अंगुठे एवं तर्जनी के मध्य की नस का संबंध मनुष्य की कामेंद्री से होता है। काष्ठ कील वाली खड़ाऊं पहनने से उस नस पर हमेशा दवाब बना रहता है जो कामोत्तेजना को मंद करता है और साधु-सन्यासी में काम विकार का उद्वेग पैदा नहीं होता। 
स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी का खड़ाऊ धारण करना
तेरहवीं सदी में स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण करना क्रांतिकारी ही माना जाएगा। अभी तक तो पुरुषों द्वारा ही खड़ाऊ धारण की जाती थी। पाश्चात्य युरोप के देशों में भी सोलहवीं सदी तक स्त्रियों द्वारा ऊंची एड़ी के जूते धारण करने की शुरुवात भी नहीं हुई थी। इससे एक बात तो निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों को इस सदी तक पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त थे तथा पुरुष उनके आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते थे। राजा लांगुल नृसिंह देव ने अपने खजाने से सूर्य मंदिर निर्माण करने का आदेश स्वमाता से ही पाया था और उसने मंदिर निर्माण पर अमल भी किया। प्रतिमाओं से एक बात और निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों परदा नहीं करती थी। किसी भी प्रतिमा में परदा या घुंघट दिखाई नहीं देता। 
राज नृसिंह देव उनकी माता जी
अप्सराओं, गणिकाओं एवं नायिकाओं ने कोई परदा या घूंघट नहीं रखा है। एक प्रतिमा में राजा नृसिंह देव की माता ने सिर पर पल्लू धारण कर रखा है। यह राजकुल की गरिमा का प्रतीक भी है। स्त्रियों को कार्य की स्वतंत्रता थी प्रतिमाओं में कहीं पर उत्श्रृंखलता दिखाई नहीं देती। स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण करने के कुछ कारणों पर विचार किया जा सकता है। पहला - उच्च घराने की होने के कारण फ़ैशन परस्ती मानी जा सकती है। दूसरा - कामेंद्री को शिथिल कर सन्यास धारण करने का अभ्यास भी हो सकता है। तीसरा - पुरुष समाज के समक्ष स्त्री अधिकार के लिए चुनौती भी माना जा सकता है। जिससे पुरुष समाज इसे मान्यता दे। स्त्री द्वारा खड़ाऊ धारण करने के कार्य को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह एक नारी क्रांति का सूत्रपात माना जा सकता है। जारी है आगे पढ़ें……।

3 टिप्‍पणियां:

  1. यानि की पुराने समय में लोग चप्पल धारण नहीं करते थे तो क्या उनके पैरो में गर्मी की लू नहीं लगती थी ?या सिर्फ शिल्पकार ने किसी मूर्ति को चप्पल नहीं पहनाई । मेरे विचार से तो हम मन्दिरो में चप्पल इसलिए नहीं लेजाते की क्योकि चप्पल द्वारा गन्दगी अंदर न जा सके। इसीलिए हमारे गुरुद्वारों में बहार की तरफ पानी के होद होते है जिनसे गुजरते ही अपने आप पैरो की सफाई हो जाये।

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