बुधवार, 31 अगस्त 2016

अजंता की गुफ़ाओं की सैर

अजंता (अजिंठा लेणी) की दूरी एलोरा से लगभग 101 किलोमीटर है, हम एलोरा से घाट चढ़ कर अजंता पहुंचे। जो एलोरा देखने जाता है वह अजंता भी पहुचता है। मेरी यह यात्रा 1994 के दौरान की है, और चित्र भी उसी समय के रोल कैमरे से खींचे गए हैं।

यहाँ चट्टानों को काटकर बनाए गए बौद्ध गुफ़ा मंदिर व मठ, अजंता गाँव के समीप, उत्तर-मध्य महाराष्ट्र, पश्चिमी भारत में स्थित है, जो अपनी भित्ति चित्रकारी के लिए विख्यात है।

औरंगाबाद से 107 किलोमीटर पूर्वोत्तर में वगुर्ना नदी घाटी के 20 मीटर गहरे बाएँ छोर पर एक चट्टान के आग्नेय पत्थरों की परतों को खोखला करके ये मंदिर बनाए गए हैं।

गुफ़ाओं के इस समूह की खुदाई पहली शताब्दी ई. पू. और सातवीं शताब्दी के बीच दो रूपों में की गई थी- चैत्य (मंदिर) और विहार (मठ)। यद्यपि इन मंदिरों की मूर्तिकला, ख़ासकर चैत्य स्तंभों का अलंकरण अद्भुत तो है, लेकिन अंजता की गुफ़ाओं का मुख्य आकर्षण भित्ति चित्रकारी है। 

इन चित्रों में बौद्ध धार्मिक आख्यानों और देवताओं का जितनी प्रचुरता और जीवंतता के साथ चित्रण किया गया है, वह भारतीय कला के क्षेत्र में अद्वितीय है।
अजंता की गुफ़ांए
घोड़े के नाल की आकार की अजंता लेणी
अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म द्वारा प्रेरित और उनकी करुणामय भावनाओं से भरी हुई शिल्‍पकला और चित्रकला से ओतप्रोत हैं, जो मानवीय इतिहास में कला के उत्‍कृष्‍ट ज्ञान और अनमोल समय को दर्शाती हैं।

बौद्ध तथा जैन सम्‍प्रदाय द्वारा बनाई गई ये गुफाएं सजावटी रूप से तराशी गई हैं। फिर भी इनमें एक शांति और अध्‍यात्‍म झलकता है तथा ये दैवीय ऊर्जा और शक्ति से भरपूर हैं।

दूसरी शताब्‍दी डी. सी. में आरंभ करते हुए और छठवीं शताब्‍दी ए. डी. में जारी रखते हुए महाराष्ट्र में औरंगाबाद शहर से लगभग 107 किलो मीटर की दूरी पर अजंता की ये गुफाएं पहाड़ को काट कर विशाल घोड़े की नाल के आकार में बनाई गई हैं।

अजंता में 29 गुफाओं का एक झुंड बौद्ध वास्‍तुकला, गुफा चित्रकला और शिल्‍प चित्रकला के उत्‍कृष्‍तम उदाहरणों में से एक है।

इन गुफाओं में चैत्‍य कक्ष या मठ है, जो भगवान बुद्ध और विहार को समर्पित हैं, जिनका उपयोग बौद्ध भिक्षुओं द्वारा ध्‍यान लगाने और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्‍ययन करने के लिए किया जाता था।

गुफाओं की दीवारों तथा छतों पर बनाई गई ये तस्‍वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्‍न घटनाओं और विभिन्‍न बौद्ध देवत्‍व की घटनाओं का चित्रण करती हैं।

इसमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं हैं, जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं, ये एक संत थे जिन्‍हें बुद्ध बनने की नियति प्राप्‍त थी।

ये शिल्‍पकलाओं और तस्‍वीरों को प्रभावशाली रूप में प्रस्‍तुत करती हैं जबकि ये समय के असर से मुक्‍त है। ये सुंदर छवियां और तस्‍वीरें बुद्ध को शांत और पवित्र मुद्रा में दर्शाती हैं।
अजंता की गुफ़ांओं में ललित शर्मा
लेखक के पार्श्व में अजंता लेणी
सह्याद्रि की पहाडि़यों पर स्थित इन गुफाओं में लगभग 5 प्रार्थना भवन और 25 बौद्ध मठ हैं। इन गुफाओं की खोज आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके दल द्वारा सन् 1819 में की गई थी। 

वे यहाँ शिकार करने आए थे, तभी उन्हें कतारबद्ध 29 गुफाओं की एक शृंखला नज़र आई और इस तरह ये गुफाएँ प्रसिद्ध हो गई।

घोड़े की नाल के आकार में निर्मित ये गुफाएँ अत्यन्त ही प्राचीन व ऐतिहासिक महत्त्व की है। इनमें 200 ईसा पूर्व से 650 ईसा पश्चात तक के बौद्ध धर्म का चित्रण किया गया है। 

अजंता की गुफाओं में दीवारों पर ख़ूबसूरत अप्सराओं व राजकुमारियों के विभिन्न मुद्राओं वाले सुंदर चित्र भी उकेरे गए है, जो यहाँ की उत्कृष्ट चित्रकारी व मूर्तिकला के बेहद ही सुंदर नमूने है।

अजंता की गुफाओं को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक भाग में बौद्ध धर्म के हीनयान और दूसरे भाग में महायान संप्रदाय की झलक देखने को मिलती है। हीनयान वाले भाग में 2 चैत्य और 4 विहार है तथा महायान वाले भाग में 3 चैत्य और 11 विहार है।

ये 19वीं शताब्दी की गुफाएँ है, जिसमें बौद्ध भिक्षुओं की मूर्तियाँ व चित्र है। हथौड़े और छैनी की सहायता से तराशी गई ये मूर्तियाँ अपने आप में अप्रतिम सुंदरता को समेटे है।
अजंता की गुफ़ांए
अजंता की गुफ़ांए

अजन्ता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही, गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16, 17 शेष है। इन 6 गुफाओं में गुफा संख्या 16 एवं 17 ही गुप्तकालीन हैं। अजन्ता के चित्र तकनीकि दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखते हैं।

इन गुफाओं में अनेक प्रकार के फूल-पत्तियों, वृक्षों एवं पशु आकृति से सजावट का काम तथा बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं के चित्रण का काम, जातक ग्रंथों से ली गई कहानियों का वर्णनात्मक दृश्य के रूप में प्रयोग हुआ है।

ये चित्र अधिकतर जातक कथाओं को दर्शाते हैं। इन चित्रों में कहीं-कही गैर भारतीय मूल के मानव चरित्र भी दर्शाये गये हैं। अजन्ता की चित्रकला की एक विशेषता यह है कि इन चित्रों में दृश्यों को अलग अलग विन्यास में नहीं विभाजित किया गया है।

अजन्ता में 'फ़्रेस्को' तथा 'टेम्पेरा' दोनों ही विधियों से चित्र बनाये गए हैं। चित्र बनाने से पूर्व दीवार को भली भांति रगड़कर साफ़ किया जाता था तथा फिर उसके ऊपर लेप चढ़ाया जाता था।

अजन्ता की गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण ‘मरणासन्न राजकुमारी‘ का चित्र प्रशंसनीय है। इस चित्र की प्रशंसा करते हुए ग्रिफिथ, वर्गेस एवं फर्गुसन ने कहा,- ‘करुणा, भाव एवं अपनी कथा को स्पष्ट ढंग से कहने की दृष्टि‘ यह चित्रकला के इतिहास में अनतिक्रमणीय है। 
अजंता की गुफ़ांए
अजंता की गुफ़ाओं का अनुपम दृश्य
वाकाटक वंश के वसुगुप्त शाखा के शासक हरिषेण (475-500ई.) के मंत्री वराहमंत्री ने गुफा संख्या 16 को बौद्ध संघ को दान में दिया था। 

गुफा संख्या 17 के चित्र को ‘चित्रशाला‘ कहा गया है। इसका निर्माण हरिषेण नामक एक सामन्त ने कराया था। 

इस चित्रशाला में बुद्ध के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से संबधित चित्र उकेरे गए हैं। 

गुफा संख्या 17 में उत्कीर्ण सभी चित्रों में माता और शिशु नाम का चित्र सर्वोत्कृष्ट है। अजन्ता की गुफाऐं बौद्ध धर्म की ‘महायान शाखा से संबधित थी।

अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के चित्रों की चमक हज़ार से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी आधुनिक समय से विद्वानों के लिए आश्चर्य का विषय है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं को इन चित्रों में अभिव्यक्त किया गया है।

चावल के मांड, गोंद और अन्य कुछ पत्तियों तथा वस्तुओं का सम्मिश्रमण कर आविष्कृत किए गए रंगों से ये चित्र बनाए गए।

लगभग हज़ार साल तक भूमि में दबे रहे और 1819 में पुन: उत्खनन कर इन्हें प्रकाश में लाया गया। हज़ार वर्ष बीतने पर भी इनका रंग हल्का नहीं हुआ, ख़राब नहीं हुआ, चमक यथावत बनी रही।

कहीं कुछ सुधारने या आधुनिक रंग लगाने का प्रयत्न हुआ तो वह असफल ही हुआ। रंगों और रेखाओं की यह तकनीक आज भी गौरवशाली अतीत का याद दिलाती है।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सरगुजा की कैलाश गुफ़ा


छत्तीसगढ़ प्रदेश का प्राकृतिक सौंदर्य अद्वितीय होने के साथ यहाँ का इतिहास भी उतना ही समृद्ध है। प्रदेश के सरगुजा अंचल हरित वनों, पर्वतों, नदियों का सौंदर्य रमणीय है। प्रत्येक स्थान पौराणिक इतिहास से भरा पुरा है और यहाँ सुरम्यता रमणीय है। रायपुर से हम इस अंचल के कैलाश गुफ़ा क्षेत्र के पर्यटन के लिए चल पड़े। रायपुर से अम्बिकापुर 358 किलोमीटर की दूरी पर है। इस नगर की पूर्व दिशा में सामरबार नामक स्थान पर 80 किलोमीटर की दूरी पर कैलाश गुफ़ा स्थित है। हम अम्बिकापुर से बतौली होते हुए पठार पर पहुंचे, यहाँ से जंगल के रास्ते पर चलते हुए गायबुड़ा नामक ग्राम से बांए सड़क पर चलकर कैलाश गुफ़ा तक पहुंचे। गायबुड़ा से सड़क सीधी पंडरापाट होते हुए बगीचा एवं जशपुर चली जाती है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थान महत्वपूर्ण है। 

यहाँ आदिवासी समाज के संत रामेश्वर गहिरा गुरु जी ने प्राकृतिक गुफ़ा की चट्टानों को तराश कर वर्तमान रुप दिया है। कैलाश गुफ़ा के नीचे झरना बहता है, जहाँ स्थानीय लोग धार्मिक कर्मकांड सम्पन्न करते हैं। इस स्थान पर आने के पश्चात मन को शांति मिलती है और मनुष्य के प्रकृति से जुड़ जाता है। 

इस स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य एवं महत्ता को देखते हुए गहिरा गुरु जी ने अपनी उपासना के लिए चयन किया। सघन वन के बीच आश्रम, गुफ़ाएं, कल-कल करता झरना एवं पक्षियों का मधुर स्वर में आगंतुकों का स्वागत मन को मोह लेता है। ऐसा लगता है कि शहरी भाग दौड़ के से थोड़ा अलग रह कर दो चार दिन इस प्राकृतिक स्थल पर व्यतीत किए जाएं।


प्रकृति से एकाकार होने के लिए यह बहुत ही आदर्श स्थान है। यहाँ श्रद्धालुओं, दर्शनार्थियों एवं पर्यटकों का बारहों मास आना लगा रहता है। यह खुबसूरत स्थान अपने साथ अनेक पौराणिक कथाओं को भी समेटे हुए है। वर्षा काल में इस स्थान की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। झरना अपने पूरे यौवन पर होता है, वनांचल में छोटे-मोटे वन्य प्राणी भी दिखाई देते हैं। हमें इस सुंदर स्थान का भ्रमण कर अपूर्व आनंद की अनुभूति हुई। सांझ तक यहाँ रहने के पश्चात हम पंड्रापाट से बगीचा होते हुए मैनपाट के अपने अस्थाई डेरे सैला रिजोर्ट में लौट आए।