बुधवार, 26 दिसंबर 2012

सिनेमा सिनेमा ............ ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
सुरंग टीला के बाएं तरफ़ रेस्टाहाऊस के बाजु से कारीडोर बना है। जो दक्षिण दिशा में स्थित सभी उत्खनित भवनों एवं स्थानों तक लेकर जाता है। एक बार कारीडोर से चल पड़े तो बिना गाईड के सभी स्थानों का भ्रमण हो जाता है। हम भी कारीडोर से चल पड़े। बिन जांवर कैइसे भांवर छत्तीसगढी फ़िल्म में आदित्य सिंह ने छोटा सा पात्र निभाया है। बस यहीं से फ़िल्मों पर चर्चा चल पड़ी। छत्तीसगढी फ़िल्मों का सफ़र छोटा ही है। छत्तीसगढी की पहली फ़िल्म कही देबे संदेश सिनेमा घरों में चली तो खूब लेकिन कमाई नहीं कर सकी। 35 बरसों के बाद फ़िर से छत्तीसगढी सिनेमा 2000 में मोर छंईया भूईंया फ़िल्म के आने के बाद जागा। नवीन राज्य के निर्माण का समय था। छत्तीसगढी भावनाओं का जोश उफ़ान पर और उसी समय इस फ़िल्म का प्रदर्शन होना मोर छंइया भूंईया को तगड़ी सफ़लता मिली और 25 हफ़्ते चली। इसके बाद मया इत्यादि एक-दो सफ़ल फ़िल्में आई, जिन्होने व्यावसाय किया। बाकी सभी फ़िल्में पिट गयी और सप्ताह भर में ही टाकिजों से उतर गयी।

हिन्दी फ़िल्मों का भी एक जमाना था, कैसी भी फ़िल्में टाकिज में लग जाए, 25 हफ़्ते तो निकाल ही देती थीं। फ़िल्मों की सफ़लता का पैमाना उसके 25 हफ़्ते तक टाकीज में टिक जाना ही माना जाता था। टाकिजों में टिकिटें ब्लेक होती थी। लोग लुट-पिट कर भी फ़िल्म देखना चाहते थे। कईयों  की तो आदत में शुमार था फ़िल्म का पहला शो देखना। कई तो इतने दीवाने थे कि दिन भर में 4 शो देखकर आधी रात के बाद घर पहुंचते थे। लेकिन वह समय ऐसा था जब फ़िल्में समाज को ध्यान में रख कर बनाई जाती थी। खुलेपन और गंदगी का दौर नहीं था। धार्मिक, पारिवारिक एवं भुतिया फ़िल्मों के 25 हफ़्ते चलने की गारंटी होती थी। रामायण, हर हर महादेव, वीर हनुमान, संत ज्ञानेश्वर, सांई बाबा, जय संतोषी माँ, राजा भरथरी जैसी फ़िल्मों के शो हाऊस फ़ुल हुआ करते थे। साथ ही यह भी था कि धार्मिक, पारिवारिक, ऐतिहासिक फ़िल्में देखने के लिए युवाओं को घर से छूट मिल जाया करती थी साथ ही फ़िल्म की टिकिट के पैसे भी। वयस्कों के लिए रामसे बदर्स की हारर फ़िल्में मर्दानगी दिखाने का अवसर देती थी।

पारिवारिक और साफ़ सुथरी फ़िल्में बना करती थी। राजश्री बैनर्स और जैमिनी की फ़िल्में हुआ करती थी। राजश्री बैनर अब छोटे परदे पर आकर दूरदर्शन के लिए कार्यक्रम बना रहा है।  यशराज बैनर्स की पारिवारिक फ़िल्में टाकीजों में चलने की गारंटी हुआ करती थी। मैने गिनी-चुनी फ़िल्में ही देखी  हैं। जिनके नाम उंगलियों पर ही गिना सकता हूँ। तीसरी कसम, दिल अपना और प्रीत पराई, मुगले आजम, सिकंदर पोरस, धरती कहे पुकार के, गीत गाता चल, बालिका वधु, मदर इंडिया, आवारा, बंदनी, शोले, मेरा नाम जोकर, आग, बरसात(पुरानी) ज्वार भाटा, सूरज, साहब बीबी और गुलाम, काश्मीर की कली, दुश्मन, जंगली, शोले, संत ज्ञान ज्ञानेश्वर, हर हर महादेव, जय संतोषी माता, मै तुलसी तेरे आंगन की, दरवाजा, खूनी हवेली, हिन्दुस्तान की कसम इत्यादि फ़िल्में देखी। 

दूरदर्शन पर रविवार को आने वाली फ़िल्में बिना मध्यान्ह के ही लगातार देखीं। फ़िल्मों का शौक तो था, परन्तु हमारे गाँव में फ़िल्म देखने का साधन नहीं था और न ही मुझे इतनी छूट थी कि अन्य साथियों की तरह रायपुर के टाकीजों में फ़िल्म देख आऊँ। पहले गांव में कभी-कभी टुरिंग टाकिज के द्वारा फ़िल्में दिखाई  जाती थी।  कभी सरकार की तरफ़ से भी फ़िल्म दिखाने वाले आते थे। रात 8 बजे बस स्टैंड में अपनी गाड़ी खडी करके उसके पीछे परदा लगाते और प्रोजेक्टर से फ़िल्में दिखाया करते थे। एक बार तो इस मुफ़्त की फ़िल्म के चक्कर में पिटाई भी खाने की नौबत आ गयी। फ़िल्म और उपन्यास दो ऐसी चीजे हैं कि एक बार शुरु हो जाए फ़िर चाहे कितना ही काम पड़ा हो, जब तक अंजाम तक नहीं पहुच जाए तब तक वह काम होना नहीं है। इसे ही फ़िल्मों और उपन्यासों का चस्का कहते थे।

एक बार रात को पापा के लिए सरदर्द की गोली "आनंदकर" लेने जाना पड़ा रास्ते में फ़िल्म का प्रदर्शन हो रहा था। फ़िल्म का नाम था हिन्दुस्तान की कसम। फ़ौजियों की लड़ाईयाँ और बन्दुक टैंक गोले चल रहे थे। रात के लगभग 8 बजे थे। फ़िल्म देखने के लिए भीड़ लगी हुई थी। मै भी अपनी सायकिल किनारे पर लगा फ़िल्म का आनंद लेने लग गया। हीरो हीरोईन पहचान में नहीं आते थे पर गाने बड़े अच्छे चल रहे थे। हीरो के डायलाग के साथ दर्शक ताली और सीटी बजाते। समय का पता ही न चला। पापाजी मुझे ढूंढते हुए घर से बस स्टैंड आ चुके थे। उनके सिर में दर्द था, इसलिए मुझे रात में टेबलेट लाने के लिए बाड़ा से निकलने की अनुमति मिली थी। फ़िल्म देखने के चक्कर में दुकान भी बंद हो चुकी थी। अब उन्होने गुस्से में आकर दो थप्पड़ लगाए और दोनो घर आ गए। उसके बाद शायद एक सप्ताह मैं उनके सामने नहीं आया।

तब लोगों को फ़िल्मों का चस्का अधिक था। क्योंकि इसके अतिरिक्त सस्ता मनोरंजन का साधन अन्य कोई दूसरा नहीं था। फ़िल्म देखने लिए दाम भी देने पड़ते थे। फ़िर मुफ़्त का सिनेमा आ गया दूरदर्शन के रुप में। दूरदर्शन  की सौगात दिल्ली के बाद सीधे रायपुर को मिली। उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल थे। जयपुर, मुजफ़्फ़रपुर और रायपुर से एक साथ प्रसारण शुरु हुआ। हमारे गाँव के स्कूल के एक टीवी का सेट मिला। उसे चलाने के लिए एक गुरुजी नियुक्त किया गया। शाम 5 बजे ही टीवी स्कूल के बरामदे में रख दिया जाता। लोग घर से अपनी बोरियाँ, दरी आसन इत्यादि पहले से ही लाकर बिछा देते। कोई अपनी कुर्सियाँ घर से ले आता। इस तरह सारा गाँव सामूहिक रुप से फ़िल्म का आनंद उठाया करता था।

वर्तमान में इतने सारे चैनल आ गए टीवी पर कि दिन भर में सैकड़ों फ़िल्में दिखाई जाती है और आदमी हाथ में रिमोट लिए सिर्फ़ चैनल ही बदलता रहता है। मनोयोग से फ़िल्में भी नहीं देख पाता। जैसे ही कोई विज्ञापन आता है, वह चैनल बदल देता है। फ़िल्मों का चलन भी कम हो गया। शायद ही कोई फ़िल्म हो जिसने 5 हफ़्ते भी टाकिजों में पूरे किए हों। सौ-सौ करोड़ के बजट की फ़िल्में बनती हैं और धूम धाम से टाकिजों में लगती हैं। फ़िर उतरती कब हैं इसका पता ही नहीं चला। कुछ वर्षों पूर्व माधुरी दीक्षित और सलमान खान की हम आपके हैं कौन 25 सप्ताह रायपुर के टाकिज में चली। पहले तीन-चार सप्ताह तो हर हर महादेव या रामायण जैसी फ़िल्में टुरिंग टाकिजों में चल जाया करती थी। टीवी ने सिनेमा के दर्शकों का अपहरण कर लिया।

कुछ दिनों पूर्व फ़ेसबुक पर पानसिंह तोमर फ़िल्म का बहुत हल्ला मचा था। मैने सोचा कि कभी समय मिलेगा तो देख लेगें टाकिज में जाकर। कुछ दिनों के बाद टाकिज में गया तो वह फ़िल्म कब उतरी उसका पता ही नहीं चला। पहले तो फ़िल्में लगने और उसके उतरने की पूर्व सूचना रिक्शे में लगा भोंपू बता जाया करता था कि फ़लां फ़िल्म का अंतिम शो अंतिम दिन कब है? दर्शकों का स्वाद भी बम्बई के निर्माता निर्देशकों ने खराब कर दिया। आज की फ़िल्में तो सपरिवार बैठ कर देखना ही कठिन है। बच्चे देख रहे होते हैं तो माता पिता को देख कर उन्हे चैनल बदलना पड़ता है, अगर माता पिता देख रहे होते  हैं तो बच्चों के आने पर वे चैनल बदल कर समाचार देखने लग जाते हैं। फ़िल्मों का सत्यानाश  हो गया है। न देखो तो ही सुखी रहोगे।

किसी जमाने में निर्माता निर्देशक फ़िल्मों को समाज के चरित्र निर्माण का जरिया समझते थे और फ़िल्में भी उसी मर्यादा में बना करती थी और चला भी खूब करती थी। कई फ़िल्में तो साल भर तक एक ही टाकीज में चली। हिन्दी सिनेमा में एक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु हुआ, जंजीर लेकर एंग्री यंग मैन आ गाए। टाकिजों में ढिशुम ढिशुम और मार धाड़ वाली फ़िल्मे हिट होने लगी। इसके साथ ही फ़िल्मों में धीरे से ब्लात्कार दृश्यों के रुप में सेक्स का भी तड़का लगने लगा। अधिक कमाई करने के चक्कर में दर्शकों का जायका खराब किया फ़िल्म निर्माताओं ने। अनावश्यक रुप से देह दर्शन के सीन डाले गए, नाभि प्रदर्शना हीरोईनें पैदा हो गयी। जब नाभि प्रदर्शन से काम नहीं चला तो लगभग निर्वस्त्र होकर ही पर्दे पर आने लगी। इससे समाज में विकार पैदा हुए। समाज में बढते अपराधों के मूल में आंशिक रुप से हिन्दी सिनेमा को प्रभावकारी माना जा सकता है।

फ़िल्म निर्माता नग्नता दिखाने के प्रश्न पर दलील देते दिखाई देते हैं कि जो दर्शक देखना चाहता है वही हम दिखाते हैं। यह तो वही बात हुई जैसे अंग्रेजों ने पहले मुफ़्त में चाय पीना सिखलाई फ़िर लोगों को चाय की लत लगा कर चाय बगानों से धन कमाने लगे। पहले लोगों को मुफ़्त में सिगरेट पिलाई गई, फ़िर सिगरेट बनाने की फ़ैक्टरी लगाकर लोगों की जेबें खाली कराई गयी। नैतिकता भी कोई चीज होती है, संस्कार भी कुछ होते हैं। लेकिन मुंबईया निर्माताओं की नोटों की हवस ने इन्हे सर्वभक्षी बना दिया है। इन्हे तो सिर्फ़ पैसा चाहिए। चाहे समाज का सत्यानाश  हो जाए। समाज रसातल में चला जाए। क्योंकि इनका देवता तो सिर्फ़ पैसा ही है। ऐसा नहीं है कि दर्शक इनकी चाल नहीं समझ रहे हैं। अरबों रुपए के बजट की फ़िल्में पिट रही हैं। शहरों में टाकिजों  को जमींदोज करके मॉल बनाए जा रहे हैं। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री रसातल में चली जाएगी।

मै भी किस फ़िल्मी चक्कर में पड़ गया। जाना था जापान पहुंच गए चीन सुकू सुकू, हाय मै करुं क्या सुकू सुकू। अरे भाई करना कुछ नहीं है। हम तीन तिलंगे अभी महानदी किनारे के आश्रम में पहुच गए हैं, वहाँ का हाल बस जारी हो रहा है …… कहीं जाईएगा नहीं …… मिलते हैं छोटे से विश्राम के बाद लौट कर …… सफ़र जारी है ……।

(नोट:- समस्त फ़ोटो नेट से लिए गए हैं, किसी को आपत्ति होगी तो हटा दिए जाएगें।)

12 टिप्‍पणियां:

  1. सुरंग टीला के बाजू का रास्‍ता कहां जा खुला... एकदम, खुल जा सिम सिम.

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  2. गजब की फ़िल्मी यात्रा दो झापड़ के साथ

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  3. यह तो ट्रेलर है। साफ लग रहा है कि पिक्‍चर अभी बाकी है।

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  4. समाज के चरित्र को रसातल में ले जाने की दोषी तो है ही!!

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  5. किस फ़िल्मी चक्कर में पड़ गये आज आप...यात्रा वृतांत के बीच क्‍या वि‍ज्ञापन का दौर था ये....अच्‍छा था..

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  6. चलिए २ थप्पड़ के साथ ही सही फिल्म तो देख ली आपने, हमने तो शादी से पहले सिर्फ सफ़ेद हाथी, बिन माँ के बच्चे दो ही फिल्म देखी थी. अब समझता है कि क्यों नहीं देखने मिलती थी पिक्चर.सफ़र जारी रखिये... शुभकामनायें

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  7. बिना टिकट, सिनेमाघरों के सैर।
    समाज के चरित्र, मर्यादा, ढिशुम ढिशुम, नाभि प्रदर्शन, समाज का सत्यानाश................. गजब का ब्रेकिंग न्युस है सर जी|

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  8. ललीत जी नमस्कार
    पूर्व में हुई चर्चा के अनुसार आपके ब्लाग 'ललीत डॉट कॉमÓ के 'सिनेमा सिनेमाÓ शिर्षक के लेख को 'दौर हिंदी फिल्मों काÓ शिर्षक से भास्कर भूमि में प्रकाशित किया गया है। इस लेख को आप भास्कर भूमि के ई पेपर में ब्लॉगरी पेज नं. 8 में देख सकते है। हमारा ई मेल एड्रेस है।www.bhaskarbhumi.com
    धन्यवाद
    नीति श्रीवास्तव

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  9. जब से टीवी में फिल्मों की बाढ़ सी आ गयी, देखने की रुचि कम हो गयी। अच्छी फिल्मों की ललक तो फिर भी बनी रही।

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