मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' -- ललित शर्मा

जीभ गई स्वाद गया, आँख गयी संसार गया। संसार को देखने के लिए आँखों की जरुरत है। जिसकी आँखें नहीं उसे लाचारी का जीवन जीते देखा है, वह कहीं न कहीं कि्सी और पर आश्रित होकर जीवन बिताता है। किसी की आँखे जन्म से ही नहीं होती, वह संतोष कर लेता है कि ईश्वर को यही मंजूर था, जिसकी आँखे थी और किसी की लापरवाही से उसकी रोशनी चली गयी तो उसका जीवन कंटकाकीर्ण हो जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ छत्तीसगढ के बालोद नेत्र शिविर में। ज्ञात हो कि छत्तीसगढ स्वास्थ्य संचनालय द्वारा 1 सितम्बर से 30 सितम्बर तक प्रदेश स्तर पर "नेत्र ज्योति मेले" का आयोजन किया गया था। यह मेला सभी ब्लॉक मुख्यालयों पर आयोजित था। नेत्र शिविर में मरीजों की नेत्र जाँच से लेकर मोतियाबिंद का आपरेशन भी किया गया। एक नेत्र चिकित्सक मित्र को फ़ोन लगाया तो उसने कहा कि "अभी सीजन है, लूवाई (फ़सल कटाई) चल रही है।" कहने का तात्पर्य यह था कि वह आँखों के आपरेशन में व्यस्त है।

नगर के धर्मादा संस्थाओं एवं शासकीय सहयोग से नेत्र शिविर का आयोजन होता है। जिसमें गरीब तबके लोग आँखों का इलाज कराने आते हैं। उनके पास निजी अस्पतालों में जाकर इलाज कराने के लिए धन नहीं होता। इसलिए नेत्र शिविर से लाभ उठाते हैं। बालोद के नेत्र शिविर में चिकित्सकों  की लापरवाही से लगभग 40 मरीजों की आँख की रोशनी चली गयी। उनकी आँख में संक्रमण होकर मवाद भर गया। अब बिगड़ी हुई आँख का कहीं इलाज संभव नहीं है। इसका दुखदाई पहलू यह है कि शासन इस आँख फ़ोड़ू काँड को गंभीरता से नहीं ले रहा है। लापरवाह चिकित्सकों को बचाने की कोशिश उच्च स्तर पर जारी हैं। गरीब का हर जगह मरण है। तीन चार डॉक्टर मिल कर दो दिवसीय शिविर में 300 से अधिक आँखों का आपरेशन कर डालते हैं। तो इसे लुवाई की संज्ञा देने में कोई बुराई नहीं है। संक्रमित शल्य उपकरण जब एक आँख से दूसरी आँख में लगेगें तो उसका दुष्परिणाम सामने आएगा ही।

डॉक्टरों को सरकार ने प्राईवेट पैक्टिस करने का अधिकार दे रखा है, अधिकांश डॉक्टरों ने अपने परिजनों के नाम से निजी नर्सिंग होम खोल रखे हैं और सरकारी नौकरी करते हुए धड़ल्ले से निजी पैक्टिस जारी है। सरकारी अस्पताल को खाला का घर समझ रखा है, जब मनचाहे आओ और जाओ। तनखा तो पक ही जाएगी। कुछ डॉक्टर मंत्रियों के चहेते हैं, हमेशा शहर में ही पदस्थ रहना चाहते हैं। उच्चाधिकारियों के नोटिस और मेमो का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। "सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का होए"। एक उच्चाधिकारी ने कहा कि - मास्टर और डॉक्टर का ट्रांसफ़र करना सबसे कठिन होता है। क्योंकि इनके संबंध किसी न किसी नेता या उच्चाधिकारी से होते हैं। इन पर हाथ डालते ही तुरंत उनकी पैरवी आ जाती है। इसलिए इन्हे न छेड़ें तो ही ठीक है।

लापरवाही से 40 गरीब मरीजों की आँख की रोशनी चली गई, इसके लिए अभी जिम्मेदारी तय नहीं हुई है। लापरवाही से इलाज करके किसी का अंग-भंग कर देना बड़ा अपराध है। मरीज डॉक्टर पर विश्वास करके अपनी जान उसके हाथ में सहर्ष सौंप देता है। प्राण बचाने वाला भगवान समझ कर उसकी वंदना भी करता है। पर पैसे की पीछे भागते डॉक्टरों ने लोगों का यह भ्रम तोड़ दिया। अब इन्हे भगवान समझने वाला जमाना चला गया। एक हाथ दे और एक हाथ ले। लापरवाही का आचरण करने वाले इन चिकित्सकों पर भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अंग-भंग का अपराध दर्ज कर इन्हे जेल भेजा जाना चाहिए और प्रभावितों को उचित मुआवजा इनके वेतन से दिया जाना चाहिए। जिससे अन्य लापरवाह डॉक्टरों को सबक मिल सके। भविष्य में लापरवाही के प्रति सचेत रहें।

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23 टिप्‍पणियां:

  1. 40 गरीब मरीजों की आँख की रोशनी चली गई ...sir ji aajkal log khuda ko bhi rasta bhula dete hai ....kaba to pahch hi jayege chahe dekhave ke liye hai sahi jo ki is don me bada prachlit hai .....ye laparvahi doctors ki nahi un garibo ki hai unka dos garib hona hai....

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  2. उचित कार्यवाही ज़रूरी है..... ऐसी गलतियाँ लोगों का पूरा जीवन खराब कर रही हैं......

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  3. भारत में अब इलाज के नाम पर तो सिर्फ कसाईगिरी बची है|

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  4. ऐसे कई किस्से देखने में आ गये हैं...मुफ्त की समाजसेवा कई बार बहुत महँगी पड़ जाती है!

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  5. kai baar aesa hota hei ...bechare garib hi iska khamiyanja bhugatte hei ?

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  6. ह्रदय विदारक घटना पर आपका आलेख विचारणीय है. सच तो यह है कि सरकार की ओर से नेत्र-ज्योति मेलों का आयोजन जन-कल्याण की एक अच्छी भावना से किया गया था ,सरकार ने डाक्टरों को ये तो नहीं कहा था कि नेत्र शिविरों में लापरवाही बरतो और लक्ष्य पूर्ति के लिए आनन-फानन में ऑपरेशन कर दो लेकिन डाक्टरों ने ऐसा ही किया. दरअसल इस आर्थिक युग में हर इंसान में सेवा-भावना विलुप्त हो रही है . डाक्टरों को शायद ऐसा लगा होगा कि कहाँ सरकार ने निःशुल्क नेत्र शिविर में ड्यूटी लगा दी, इतना वक्त हम प्रायवेट प्रेक्टिस में देते तो अच्छी आमदनी होती . अधिकाँश सरकारी डाक्टरों की आज ऐसी ही मानसिकता है ! हर बात में मुनाफे की मनोवृत्ति देश और समाज के लिए घातक साबित हो रही है.

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  7. बड़ी नाइंसाफी है. ८० के दशक में एक नेत्र शिविर देखा था. मोतिअबिंद को निकालने के तरीके को देख रोंगटे खड़े हो गए थे.

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  8. गल्‍ती कभी भी किसी से भी हो सकती है। संकम्रण ऐसी चीज है कि कब और कहाँ हो जाए पता नहीं चलता है। जब प्रतिवर्ष ही मेला लगता है तो केवल एक वर्ष ही आपरेशन बिगड़ जाना केवल डॉक्‍टरों की ही लापरवाही नहीं हो सकती। अनेक बार बड़े नर्सिंग होमों में भी आपरेशन सफल नहीं होता। मेरी सास तो कोमा में चले गयी थीं और तीन दिन ही जीवित रह पायी। जबकि उनका आपरेशन निजी अस्‍पताल में कराया गया था। वैसे यह भी सच है कि पैसे कमाने की भूख आज बढ़ती ही जा रही है जिस कारण सेवा का मिशन कहीं दूर चला गया है।

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  9. बहुत दुखदायी है भाई ...किसको कहें और क्या कहें समझ नहीं आ रहा है ....!

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  10. शिविर लगाना और मरीजों को मुफ्त सेवा देने तक तो ठीक है पर इस तरह की लापरवाही से किसी के जीवन में अंधकार कर देना बहुत बड़ा अपराध है और इसका शिकार गरीब और मजबूर ही बनते हैं.... ऐसी गलतियों पर अंकुश लगाना भी सरकार का कर्त्तव्य है... इस ओर उचित और तत्काल कदम उठाना जरुरी है....
    आपने बहुत ही ज्वलंत विषय पर अपने विचार लिखकर अच्छा और सार्थक प्रयास किया है... आभार

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  11. apne sahi muddha uthaya hai..uttarakhand me bhi aisa hi kuch hota hai.mahine ke ek din sarkari van aati hai jo shayad sabhi prakar ke upkardon se less hoti hai.3.4.doctor bhi hote hai.dur daraj ke log 2din pahle hi jutna suru ho jate hai aur natija shifar......sabhi ko ek si bimari,eksi dava de kar nikal jaate hai next block ki aur.....

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  12. पेशे के प्रति इमानदारी बची ही कहाँ है.जो चिकित्सा ही अछूता रहेगा.

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  13. इस तरह के नेत्र चिकित्सा शिविर बहुत बार हम लोगों ने बहुत बार आयोजित किये हैं ...कभी भी कोई समस्या नहीं आई ... कुछ लापरवाही का मामला लगता है ... जिनके साथ यह दुर्घटना घटी नि:संदेह हृदय विदारक है .. उचित कार्यवाही तो ज़रूर होनी चाहिए ...

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  14. चिकित्सकों ने चिकित्सा को सेवा नहीं शुद्ध व्यापार मान लिया है। शिविर तो क्या प्राइवेट में भी यही हाल है। बस इसका पेमेंट भी लिया जाता है।

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  15. हथ के बदले हाथ और आंख के बदले आंख का इस्लामिक सिद्धाअंत मुझे कभी कभी सही नजर आने लगता है

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  16. बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना है ।
    बेशक लापरवाही तो हुई है ।
    क्या शिविर में भी पैसे लेकर उपचार किया जाता है ?

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  17. टारगेट पूरा करने के लिए डाक्‍टरों ने जो किया वह शर्मनाक है।
    इन पर मुकदमा चलना चाहिए और इनका डाक्‍टरी लाईसेंस रद्द कर देना चाहिए।

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  18. बहुत दुर्भाग्‍यपूर्ण घटना है .. मेरी दादी जी ने भी पहले आंख के मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद उस आंख की रोशनी खो दी थी .. जबकि उनका प्राइवेट अस्‍पताल में इलाज हुआ था .. दूसरे आंख के ऑपरेशन तक जीवन जीने में उन्‍हें काफी मुश्किल हुई थी .. फिर उनके दूसरे आंख का ऑपरेशन करते वक्‍त हमारे गांव के नेत्र चिकित्‍सक ने खास सावधानी बरती थी .. और दूसरे आंख का सफल ऑपरेशन हुआ।

    जिन्‍होने हमारी दादीजी के दूसरे ऑख का ऑपरेशन किया .. वे झारखंड सरकार में नौकरी करने के बाद भी एक संस्‍था से जुडे हैं .. और प्रत्‍येक शनिवार उनके हाथ से ऑपरेशन करवाने के लिए कतार लगी रहती है .. जैन समाज के सहयोग से चलनेवाले इस अस्‍पताल में दूर दूर से लोग आते हैं .. उक्‍त जिम्‍मेदार डॉक्‍टर साहब को हमारे गांव के आसपास के लोग भगवान की तरह पूजते हैं .. पर हमारे एक मित्र ने अपनी माताजी का इलाज उन्‍हीं के प्राइवेट क्लिनिक में पूरे खर्चे से करवाया .. मरीज की न सिर्फ आंख की रोशनी गयी .. वरन इन्‍फेक्‍शन इस कदर फैल गया कि उस आंख को निकालने की जरूरत आ गयी .. इसे लापरवाही कहा जाए या दुर्भाग्‍य .. नहीं समझ में आ हरा .. मद्रास में लंबे समय तक उनका इलाज हुआ .. एक आंख को निकालकर वहां पत्‍थर लगवाने पडे .. पर दूसरे आंख का ऑपरेशन सफल रहा .. और लाखों के खर्च के बाद उनका जीवन सामान्‍य हुआ .. पैसे और प्रभाव वाले तो किसी तरह उपाय निकाल लेते हैं .. उन गरीबों का तो कोई सहारा नहीं !!

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  19. चिंतनीय घटना,निंदनीय घटना..

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  20. यह हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि प्रायः रक्षक ही भक्षक बन बैठे हैं, बाड़ ही खेत को खा रही हैं।

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  21. chikisa ko dhandha bana diya hai doctors ne ..mein sochati hu kya sach me inhe aisa paisa falta hai.

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  22. रोंगटे खड़े कर देने वाली पोस्ट है साहेब.

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