शुक्रवार, 6 जून 2014

कल्याण आश्रम अमरकंटक


चीं चीं चीं चीं ……… की ध्वनि से आँखें खुल गई, लगा कि सुबह हो गई। आँख खुली तो दिखा चलभाष पर कोई याद कर रहा है। नम्बर पर निंगाह पड़ी तो झुंझलाहट आई ब्लॉग़र भी कब सोते हैं कब उठते हैं पता नहीं? जबलपुरिया ब्रिग्रेड के ब्रिगेडियर गिरीश बिल्लौरे जी का बातचीत का आहवान था। अल सुबह उनका डिंडौरी आने का निमंत्रण था। कहने लगे कि अमरकंटक तक आ गए तो डिंडौरी पहुंच जाओ। दो दिन यहाँ घुमक्कड़ी कर के चले जाना। हमने कहा कि अभी नर्मदे हर  कर लेते हैं फ़िर सोच कर बताते हैं। सुबह के 5 बजे ही नींद खुल गई, बाहर निकल कर देखा तो उजाला हो गया था। कल्याण आश्रम परिसर में बने हुए मंदिर एवं उसके बगीचे की छटा मनमोहक थी। इसकी एक फ़ोटो हमने फ़ेसबुक पर लगाकर दिन की शुरुआत की।
आवासीय परिसर से दिखाई देता मंदिर
चड्डा जी पहले ही उठ गए थे, शायद आरती की घंटिका की आवाज सुनकर नींद खुल गई। हिमाद्री मुनि सुबह ही उठकर दैनिक उपासना में लग जाते हैं। चड्डा जी कैमरा लेकर बाग बगीचे की फ़ोटो खींच रहे थे, हमने भी अपना कैमरा उठा लिया क्योंकि फ़ोटो खींचने के लिए सुबह और शाम का समय ही श्रेयकर होता है। बगीचे में तरह-तरह के फ़ूल खिले हुए थे। दूब की हरियाली की छटा देखते ही बन रही थी। मंदिर को विभिन्न रंगों से सजाया गया है। विशाल परिसर में निर्मित मंदिर के वास्तु पर उड़ीसा शैली का प्रभाव दिखाई देता है।  मंदिर के एक तरफ़ अन्न सत्र बना हुआ है। जहां नियत समय पर भोजन की व्यवस्था की जाती है। 
कल्याण आश्रम का भव्य मुख्य द्वार
मंदिर के समक्ष तिमंजला आवासीय भवन है। जिसकी लम्बाई लगभग 300 फ़ुट होगी। मध्य में बगीचा बनाकर इसे सुंदर रुप प्रदान किया गया है। आश्रम के विशाल द्वार के दोनो तरफ़ शार्दुल बनाए गए हैं और मंदिर के सामने दो द्वारपालों की प्रतिमा भी बनी हुई है। मुख्य द्वार के बांए तरफ़ पुस्तकालय एवं एवँ दांए तरफ़ सुरक्षा व्यवस्था के साथ दान ग्रहण करने का काऊंटर भी बना है। इसके साथ पूजा सामग्री एवं रत्न विक्रय करने की दुकान भी दिखाई दी।
मेघों से आच्छादित मंदिर शिखर 
कुछ चित्र लेने के बाद स्नान करके नर्मदे दर्शन करना था। आश्रम के विषय में चड्डा जी से बात शुरु हो गई। रात को जब हम आए तो चड्डा जी ने आश्रम के व्यावस्थापक हिमाद्री मुनि से भेंट करवाई, इस आश्रम की देख-रेख की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधो पर है। कल्याण आश्रम द्वारा सीबीएसई से संबंधित भव्य विद्यालय कल्यानिका संचालित होता है। इसके साथ ही उन्होने स्नातक स्तर पर कोई तकनीकि कोर्स भी चलाने की बात कही। आश्रम के द्वारा अस्पताल भी चलाया जाता है, चिकित्सकों की कमी होने के कारण सिर्फ़ बाह्य चिकित्सा लाभ ही मरीजों को मिल पाता है। किसी भी संस्था को चलाने के लिए लगन की आवश्यकता होती है, फ़िर संसाधन तो जुड़ते चले जाते हैं।
विद्यालय परिसर
इस आश्रम के निर्माण के विषय में चड्डा जी ने एक बात और बताई - जब अजीत जोगी शहडोल के कलेक्टर थे तब अमकंटक में कोई बड़ी डकैती पड़ गई। जिसकी जाँच करने के लिए वे भी एस पी के साथ आए। रात को जब इस जगह से निकले तो देखा कि एक साल के पेड़ के नीचे बाबाजी धूनी रमा कर बैठे हैं तभी बरसात के ओले गिरने लग गए। बाबा जी अपने स्थान से हिले नहीं, उन्होने ओलावृष्टि से बचने के लिए अपनी जटाओं को मुंह के सामने कर लिया, जिससे मुंह पर चोट न लगे। यह देख कर अजीत जोगी आगे बढ गए और रेस्ट हाऊस चले गए।
आवासीय परिसर एवं उपवन
सुबह की सैर के वक्त उनके मन में धूनी रमाए बाबा जी से मिलने की इच्छा जगी। वे इधर ही चले आए, देखा तो बाबा जी वर्षा से शीतल हुई धूने की अग्नि को पुन: प्रज्जवलित करने के प्रयास में लगे हैं। अजीत जोगी ने उनसे नाम पूछा तो उन्होने कल्याण बाबा बताया। अमरकंटक आने का प्रयोजन नर्मदा दर्शन एवं साधना करना बताया और कहा कि दो-चार दिन रुक कर चले जाएगें। जोगी जी ने उनसे रुकने का आग्रह किया तो उन्होने ठहरने के लिए झोपड़ी इत्यादि की समस्या बताई। 
नर्मदा तट को जाता रास्ता एव साल वृक्षों की दीवार
जोगी जी ने उन्हें झोपड़ी बनवाकर देने का आश्वासन दिया और पूछा कि आश्रम के लिए कितनी जमीन चाहिए। बाबा जी ने इशारा कर के बताया तो जोगी जी ने उतनी जमीन का नक्शा सिगरेट की पन्नी पर खींच कर उनके नाम करने का आदेश एस डी एम तहसीलदार को कर दिया। पटवारी ने जमीन नापकर प्रतिवेदन संबंधित अधिकारियों को भेज दिया और इस तरह कल्याण आश्रम की नींव पड़ी। आश्रम निर्माण के उपरांत बाबाजी सूखे हुए साल के वृक्ष के नीचे ही तपस्या करते थे। उन्होने आश्रम में प्रवेश नहीं किया था। तब रायपुर स्थित रामकृष्ण आश्रम के संचालक स्वामी आत्मानंद अमरकंटक पधारे। उन्होने बाबा जी से निवेदन किया कि अब आत्म साधना बहुत हो गई, आपकी आवश्यकता समाज को है और आप जनकल्याण के कार्यों में अपने को समर्पित कीजिए। तब बाबा जी ने उनका आग्रह मान कर आश्रम प्रवेश किया और जनकल्याण के कार्य प्रारंभ हो गई। साधना के साथ जनकल्याण का कार्य भी प्रारंभ हो गया। जो आज विशाल रुप में हमारे सामने दिखाई देता है। संकल्प शक्ति में बहुत बल होता है, जो मानव से देवता सदृश्य महान कार्य करवा देता है। ……… आगे पढें।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बाबाजी बारे में पहली बार जाना. आभार आपका.

    उत्तर देंहटाएं
  2. "संकल्प शक्ति में बहुत बल होता है, जो मानव से देवता सदृश्य महान कार्य करवा देता है। "
    सार्थक सन्देश और बहुत सुन्दर चित्रों के साथ रोचक विवरण ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही है, संकल्प शक्ति में बहुत बल होता है

    चित्र भी हैं शानदार

    उत्तर देंहटाएं
  4. बाबा जी अल्मोड़ा से ही हैं । उनका एक आश्रम जो डोल आश्रम लमगड़ा के नाम से जाना जाता है पर भी है । बाबा जी यहाँ आते जाते रहते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं