शनिवार, 19 मार्च 2016

रानी तारामती का कुतुबशाही प्रेम: दक्षिण यात्रा-4

बारहदरी से थोड़ी दूर पर देवी का प्राचीन मंदिर है, इसके द्वार पर महाकाली मंदिर लिखा हुआ है। इसका नाम मदन्ना मंदिर है। अब्दुलहसन तानाशाह के एक मंत्री के नाम पर इसका नामकरण किया गया है। यहां महाकाली ग्रेनाईट की बड़ी चट्टानों के बीच विराजित हैं, जिन्हें अब पत्थरों की दीवार से घेर कर मंडप बनाकर उसमें लोहे का द्वार लगा दिया गया है। इस प्राचीन दुर्ग को वारंगल के हिन्दू राजाओं ने बनवाया था, देवगिरी के यादव तथा वारंगल के काकातीय नरेशों के अधिकार में रहा था। इन राज्यवंशों के शासन के चिन्ह तथा कई खंडित अभिलेख दुर्ग की दीवारों तथा द्वारों पर अंकित मिलते हैं। अवश्य ही देवी का यह मंदिर हिन्दू राजाओं ने स्थापित किया होगा। जिसे कालांतर में मुस्लिम शासकों ने किसी अज्ञात भयवश नहीं ढहाया होगा।
किले के शीर्ष पर मस्जिद के पीछे स्थित मद्नन्ना का महाकाली मंदिर 
आगे चलकर जब हम मस्जिद के पीछे से नीचे उतरते हैं तो यहाँ रामदास का कोठा है। इसे अम्बर खाना कहा जाता है। इसका निर्माण 1642 में अब्दुल्ला कुतुबशाह ने करवाया था। नजदीक ही किले की अंदरूनी दीवार है जो पूर्णतः अजेय है। इस दीवार का निर्माण बेहद बुद्धिमत्ता से पत्थरों से किया गया है एवं पत्थरों की दरारों को गच्चों से भरा गया है। यह एक मजबूत आयताकार भवन है, इसके अंदर जाने का एक कृत्रिम द्वार है। वास्तव में इसका निर्माण भंडारगृह के लिए किया गया था किंतु अबुल हसन कुतुबशाह (1672–1687) के दौरान इसे कारागार में बदल दिया गया। भद्राचल रामदास शाही खजाने के खजांची थे। कहा जाता है कि जब शाही खजाने के दुरूपयोग का आरोप लगा था तब उन्हें इसी कैदखने में बंद किया गया था। किलवट यानी शाही निजी कक्ष। यह छोटा किंतु किले के वास्तुशिल्प का सबसे खूबसूरत हिस्सा है।
महाकाली मंदिर के समक्ष मस्जिद
इतिहास की ओर चलते हैं तो ज्ञात होता है कि किले के साथ कई ऐतिहासिक कथाएं जुड़ी हैं। राजा प्रताप रूद्रदेव काकतीय राजवंश के राजा थे। उनके राज्यकाल के समय, सन् 1143 ई. में  एक गड़ेरिए ने इस पहाड़ी पर किला बनाने सुझाव दिया। उसके सुझाव पर, यह किला पहाड़ी पर बनाया गया।  गोल्ला का अर्थ गड़रिया और  पहाडी को कोण्डा कहते है। इसीलिये इसका नाम 'गोल्लकोण्डा' रखा गया। सन् 1663 में इसी वंश के राजा कृष्णदेवराय ने एक संधि के अनुसार 'गोलकोण्डा' किले को बहमनी वंश के राजा मोहम्मद शाह को दे दिया। बहमनी राजाओं की राजधानी गुलबर्गा तथा बीदर में थी। राज्य में, उनकी पकड़ भी अच्छी न थी।
अंबरखाना
उनके पांच सुबेदार बहमनी राज्य की अस्थिरता के कारण मौके का लाभ उठा कर स्वतंत्र हो गये। इसके एक सूबेदार कुली कुतुबशाह नें 1518 में गोलकोण्डा में मे अपनी सल्तनत कुतुबशाही  स्थापित की। 1518 से 1617 तक कुतुबशाही वंश के सात राजाओं ने गोलकोण्डा पर राज किया। पहले तीन राजाओं ने गोलकोंडा किला का पुन: निर्माण राजमहल और  पक्की इमारतें बनावायी। 1587 में चौथे राजा मोहम्मद कुली कुतुबशाह ने अपनी प्रिय पत्नी भागमती के नाम से भाग्यनगर नामक शहर बसाया। इसे अब हैदाराबाद कहा जाता है। 1687 तक हैदराबाद इन राजाओं की राजधानी थी। 1656 में औरंगजेब ने गोलकोण्डा और हैदराबाद पर हमला किया। सुलतान अब्दुल्ला शाह की हार हुई सुलतान अब्दुल्ला की ओर से गुजारिश करने पर दोनों में संधि हुई। जिसकी एक शर्त पूरी करने के लिए सुल्तान की बेटी की शादी औरंगजेब के बेटे मोहम्मद सुल्तान से की गयी।
किले का वाईड एंगल व्यू
कुतुबशाही का अब्दुल हसन तानाशाह 1687 में सातवां राजा था। उस समय औरंगजेब ने दूसरी बार गोलकोण्डा पर हमला किया। आठ महिनों तक औरंगजेब गोलकोंडा जीतने में सफलता नहीं मिली। लेकिन कुतुबशाही सेना का नायक अब्दुल्ला खान पन्नी बागी हो गया। उसने रात के समय किले का दरवाजा खोल दिया। अब्दुल हसन तानाशाह बंदी बनाया गया। चौदह साल बाद जेल में उसका देहांत हुआ। इस प्रकार कुतुबशाही का अंत हुआ और गोलकोण्डा पर मुगलों का शासन आरंभ हुआ। कुतुबशाही समाप्त होने के उपरांत मुगल साम्राज्य की ओर से कई सूबेदार हैदराबाद में रखे गये। लेकिन 1737 ईस्वी में मोहम्मद शाह के समय मुगलों की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई। इसका फायदा उठाते हुए  निज़ाम-उल-मुल्क आसिफ जाह-1 स्वतंत्र बन गया और स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। इस वंश के सात राजाओं में, आखरी राजा ने नवाब मीस उस्मान अली खान ने 1947 तक हैदराबाद पर राज्य किया।
किले का दीवान-ए-आम और उसकी ओर जाती पैड़ियाँ
समय-समय शासकों ने इसमें अपनी सुविधानुसार निर्माण किया, तब कहीं जाकर आज यह किला विशाल स्वरुप लिए खड़ा है।यहाँ के महलों तथा मस्जिदों के खंडहर अपने प्राचीन गौरव गरिमा की कहानी सुनाते हैं। दुर्ग से लगभग आधा मील उत्तर कुतबशाही राजाओं के ग्रेनाइट पत्थर के मकबरे हैं जो टूटी फूटी अवस्था में अब भी विद्यमान हैं। फतेह मैदान से पोटला बुर्ज जाने के रास्ते में एक कटोरा घर है। चूने और पत्थरों से निर्मित यह घर अब खाली पड़ा है। किंतु कुतुबशाही के स्वर्णिम काल में यह इत्र से भरा रहता था जो अंतःपुर की महिलाओं के लिए होता था। असलाहखाना यानी शस्त्रागार, एक आडम्बरहीन, किंतु किले की एक प्रभावशाली इमारत है। यह तीन तलों में बना है। तारामती मस्जिद कुतुबशाही शासनकाल के वास्तुशिल्प का बेहतरीन नमूना है। यह हिंदू और मुगल शैली का मिला–जुला नमूना है। इसके अतिरिक्त दो मीटर चौड़ाई का एक स्थान है, जहाँ बारह छोटे–छोटे मेहराब बने हैं।
रानी तारामती महल एवं मस्जिद
गोलकुंडा किला के अवशेषों में कुतुबशाही साम्राज्य के कई शासकों के शासनकाल के दौरान बने विभिन्न महल तत्कालीन वास्तुकला के सबसे खूबसूरत नमूनों में से हैं। इनमें से कुछ महल पाँच से छह तलों तक के हैं। इनमें जनाना कोठरी, आमोद–प्रमोद के बगीचे, झरने आदि प्रमुख हैं। ऐसे सभी निर्माणों में चमकीले संगमरमर पत्थरों की कारीगरी, फूलों और पत्तियों की नक्काशी और चमकीले बेसाल्ट पत्थरों के परत का इस्तेमाल किया गया है। यह सारी कारीगरियाँ कुतुबशाही शैली की विशेषता हैं। अनेक खूबसूरत धार्मिक इमारतें भी कुतुबशाही शासनकाल में बनी थीं, जो वास्तुशिल्प के दिलचस्प पहलुओं को अंकित करती हैं। इनमें बहमनी बुर्ज के निकट बनी एक विशाल मसजिद है। इसमें एक खुला प्रांगण और एक प्रार्थना–कक्ष हैं।

किले में जाने के लिए बनाई गई पैड़ियों के निर्माण में मेहराब का प्रयोग
इसका क्षेत्रफल उत्तर से पश्चिम की ओर 42 मीटर एवं पूर्व से पश्चिम की तरफ 45 मीटर है। आंगन के बीचों बीच तीन कब्रे हैं। कब्रों के गुंबज पर उकेरी गयी इबारतों के अनुसार यह इब्राहिम कुतुबशाह के मंत्री मुस्तफाखान के बेटों की है। आयताकार प्रार्थना कक्ष में एक मेहराबनुमा छत है। खूबसूरती से तराशे गये इस मुहराबनुमा छत में पवित्र कुरान की आयतें बेमिसाल सुलेख में खुदी हुई हैं। प्रार्थना–कक्ष की दीवारें गचकारी कला को दर्शाती हैं। इस प्रार्थना कक्ष के उत्तरी और दक्षिणी दीवारों 7X4 मीटर के दो छोटे–छोटे कक्ष भी हैं। यह सीधे आँगन में खुलती है। सीढ़ियाँ दोनों कमरों से मसजिद के छत तक जाती है। इसके दक्षिणी दीवार के बीचोंबीच एक अंदर जाने का रास्ता है जिसमें एक दीवार पर एक पर्शियन शिलालेख है।
पर्सियन शिलालेख :)
किले का भ्रमण कर मैं नीचे उतर रहा था और आँखे पाबला जी को ढूंढ रही थी। मैं उन्हें द्वार के समीप छोड़ कर गया था पर वे दिखाई नहीं दे रहे थे। कुछ जोड़े एकांत सेवन करते हुए दिखाई दे रहे थे। इस तरह के प्राचीन स्मारक नवयुगलों के प्रेमालाप के आदर्श स्थान बन गए हैं। भारत में किसी भी प्राचीन स्मारक में चले जाईए, ये दिखाई देते हैं क्योंकि दस रुपए की टिकिट में इससे सुरक्षित स्थान कहीं दूसरी जगह नहीं मिल सकता। तभी पाबला जी नीचे जाते हुए दिखाई दिए। यहाँ एक सैलानियों की टोली गाईड के साथ जमी हुई थी। नीचे पहुंचने पर गला सूखकर चिपका जा रहा था। सबसे पहले एक छोटी कोल्ड्रिंक से प्यास बुझाई।
कुतुबशाही शव स्नानागार
बालाहिसार द्वार के समीप ही एक छोटी तोप रखी है। इन छोटी छोटी तोपों ने अपने कार्यकाल में युद्ध में बहुत कहर ढ़ाया है। कई युद्धों में इनका इस्तेमाल हुआ है। आज समय निकल जाने पर इनकी उपयोगिता खत्म हो गई और कभी लोग इन्हें माथे पर धरते थे, आज ये उपक्षित पड़ी हुई हैं। मुख्यद्वार के थोड़ी ही दूरी पर एक ईमारत है, जिसे शवस्नान गृह बताया गया है। कुएं के आकार के इस खंड का निर्माण पारसी या तुर्की शैली में किया गया है। इसका उपयोग शाही परिवार के शवों को नहलाने के लिए किया जाता था। शवों के नहलाने के लिए इस स्थान पर चबूतरा भी बना हुआ है, जिस पर रखकर शवों को सुपुर्देखाक से पहले स्नान कराया जाता था।
संग्रह में रखा हुआ बड़ा ताला
लौटते समय द्वार के बांई ओर लकड़ी की कांच लगी पेटियों में किले से प्राप्त वस्तुएं रखी हुई हैं, जिसमें चीनी के बर्तनों के साथ,  सील, मुहरें, कुछ सिक्के, कुछ कागज की कतरनों के साथ एक बड़ा ताला भी रखा हुआ है, जिसकी लम्बाई डेढ फ़ुट होगी। इस्का इस्तेमाल किसी बड़ दरवाजे पर किया जाता होगा। यहाँ ताले का कुंड़े वाला भाग ही रखा है। हम द्वार से बाहर निकल आए और गोलकुंडा के किले का भ्रमण एक छोटी सी अवधि में सम्पन्न हुआ क्योंकि हमारे पास अधिक समय नहीं था वरना इसे देखने में ही तीन दिन लग सकते हैं। यहाँ से हमने जीपीएस वाली बाई को इलेक्ट्रानिक सिटी बंगलोर का पता दिया और हमारी स्मार्ट कार अगले पड़ाव की ओर चल पड़ी। जारी है, आगे पढें …

8 टिप्‍पणियां:

  1. कहीं भी जायें भ्रमण तभी पूरा होता है जब उस स्थान के बारे में कुछजानें .....और भाई ललित तो केवल जानना ही पर्या्त नही समझते उसका विस्तृत अध्ययन कर सबको उसके बारे में अवगत कराते हैं...एक महान शिल्पकार ...बधाई भाई व आभार भी

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  2. कहीं भी जायें भ्रमण तभी पूरा होता है जब उस स्थान के बारे में कुछ जानें .....और भाई ललित तो केवल जानना ही पर्याप्त नही समझते उसका विस्तृत अध्ययन कर सबको उसके बारे में अवगत कराते हैं...एक महान शिल्पकार ...बधाई भाई व आभार भी

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  3. आपने तो घुमाने के साथ साथ पूरी इतिहास बताकर, ज्ञानवर्धन कर दिया

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  4. किले का जीवांत वर्णन अद्भुत है।

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  5. किले का इतना विस्तृत विवरण, अपनी आँखों से देखने के बजाय आपको बढ़ना ज्यादा बेहतरीन लगा। हैदराबाद में अकसर मस्जिदों के साथ में मंदिर देखने को मिल जाते हैं ।चार मीनार के बराबर में भी एक छोटा सा मंदिर है। जिसे देखकर आश्चर्य लगता है

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  6. ऐतिहासिक जानकारी के साथ घूम-फिर कर तत्समय के दौर में डुबकियां लगाना अच्छा लगा .. धन्यवाद!

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  7. जय मां हाटेशवरी...
    आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये दिनांक 20/03/2016 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
    चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर...
    आप भी आयेगा....
    धन्यवाद...

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  8. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " एक 'डरावनी' कहानी - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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