गुरुवार, 17 मार्च 2016

वो सत्रह घंटे : दक्षिण यात्रा-2

आरम्भ से पढ़ें 
त श्री अकाल का संदेश सुबह 4 बजे मेरे चलभाष पर आ गया। मतलब पाबला जी भिलाई से अभनपुर की ओर प्रस्थान कर चुके थे। भिलाई से अभनपुर 60 किमी की दूरी पर है। मैने भी उनके पहुंचते तक तैयारी कर ली। मालकिन ने भी रास्ते के लिए खाना बना दिया। सुबह सवा पाँच बजे हमने अभनपुर से बंगलोर के लिए माता जी का आशीर्वाद लेकर यात्रा का श्री गणेश कर दिया। अभी अंधेरा ही था, रायपुर और भिलाई के बीच उजाला होने लगा, दिन निकलने वाला था। भिलाई से निकलते हुए पाबला जी मन एक बार फ़िर घर की तरफ़ जाने का हुआ, फ़िर उन्होने इरादा बदल कर गाड़ी हाईवे पर डाल दी। ठीक दो घंटे के बाद हमने सुबह सवा सात बजे राजनांदगाँव के बाद तुमड़ी बोड़ के गुरुनानक ढाबे में चाय पी। तुमड़ी बोड़ से डोंगरगढ़ के लिए रास्ता जाता है। 
सफ़र का प्रारंभ अभनपुर
मुकेश के पुराने गानों एवं जीपीएस वाली बाई के निर्देशों के तहत सपाटे से गाड़ी आगे बढ़ती गई। रायपुर नागपुर हाईवे फ़ोर लाईन होने के बाद से मैने कार द्वारा इस सड़क पर सफ़र नहीं किया था, तो अंदाजा था कि 12 से एक बजे के बीच नागपुर पहुंच जाएगें। पर हाईवे पर सपाटे के साथ गाड़ी एक सौ बीस की स्पीड से चल रही थी रास्ता जल्दी तय हो रहा था। हम सवा आठ बजे महाराष्ट्र की सीमा में प्रवेश कर गए। हमें नागपुर से संध्या जी के यहाँ का बना खाना लेना था। इसलिए उन्हें समय 12 से एक बजे के बीच का बताया गया था। हमारी गाड़ी लगभग साढ़े नौ बजे भंडारा के पास पहुंच चुकी थी। इससे लगा कि साढे दस बजे तक किसी भी हालत में नागपुर पहुंच जाएगें। 
तुमड़ी बोड़ ढाबा छत्तीसगढ़
हमने वहीं नाश्ता करने का निर्णय लिया। होटल वाले से दही होने की जानकारी ली, मिलने पर मटर के पराठे निकाल कर वहीं पर बैठ कर खाए। इस प्रक्रिया में आधा घंटा लग गया। इसके बाद नागपुर बायपास से हम शहर के बाहर ही बाहर निकल लिए। यह बायपास बुटीबोरी वाले रोड़ में जामठा के पास मिल जाता है। यहीं पर हमें खाना मिल गया। यहां से हम बारह बजे आगे बढे। हिंगणघाट होते हुए हमें आज रात हैदराबाद पहुंचना था। एक बजे के बाद भूख लगने लगी। हम भोजन करने के लिए हाईवे के किनारे नीम, बरगद, पीपल, महुआ आदि किसी छायादार वृक्ष की तलाश करने लगे। परन्तु एक घंटे तक तलाश करने पर भी हमें कहीं पर मनवांछित वृक्ष नहीं मिला। हर तरफ़ कीकर की ही झाड़ियाँ नजर आ रही थी। जिसके नीचे बैठने की सोच कर बचपन में लगाई डॉक्टर की सारी सुईयाँ याद कर तशरीफ़ सिहर जाती है।
सपाटे की सड़क
आखिर दो बजे एक ढाबे के पास नीम का एक वृक्ष दिखाई दिया, जिसके नीचे छाया में एक गाड़ी वाला सोया हुआ था। हमें यही स्थान उपयुक्त लगा भोजन के लिए। गाड़ी वृक्ष के नीचे लगा कर, छाया में चादर बिछाकर हमने आराम से भोजन किया। जब मनचाहा हो जाए तो उससे अच्छी तृप्ति और कोई नहीं हो सकती। भोजन के बाद हमने तीन बजे फ़िर सफ़र शुरु किया। यहाँ से हैदराबाद लगभग 400 किमी था। बीच में लगभग 50 किमी की सड़क का निर्माण अधूरा होने के कारण गति धीमी हो गई। इसके बाद आगे चलकर पांडुरकवड़ा होते हुए आदिलाबाद के बायपास से गुजरे। देखा जाए तो विदर्भ के इस इलाके में वर्षा आधारित फ़सल ही हो सकती है। सिंचाई के कोई साधन दिखाई नहीं दे रहे थे और न ही हरियाली। चारों तरफ़ झाड़ झंखाड़ एवं सूखा दिखाई दे रहा था।
दोपहर का भोजन कुड़ूए नीम की छांव में
हम एशियन हाईवे 43 पर चल रहे थे। एशियन हाईवे बनने के बाद यह पता चलना कठिन हो गया है कि हम किस गाँव से गुजर रहे हैं। क्योंकि इसकी गति इतनी अधिक है कि गांवों की तरफ़ ध्यान ही नहीं जाता। कामारेड्डी पहुंचने पर दिन ढल गया। चौड़ी सड़क गाड़ी सपाटे से चलती है और एक टोल से दूसरे टोल के बीच का सफ़र तेजी से कट जाता है। 45 रुपए के टोल से शुरु हुई यात्रा 103 रुपए तक पहुंच गई। ये टोल रोड़ भी नोट को कागज बनाने की मशीन हो गए हैं, आप उन्हें नोट दो और ये आपको उसके बदले में एक छोटी सी पर्ची थमा देते हैं। हमने टोल रोड़ की सारी पर्चियाँ जमा करना शुरु कर दिया था। टोल देते ही पर्ची गाड़ी के टूल बाक्स में पहुंच जाती थी। यह पर्चियों का गुल्लक बन गया था।
अब जबेलियाँ दिखने लगी।
पाबला जी ने हैदराबाद बंगलोर रोड़ पर शहर से बाहर होटल बुक करवा रखा था। आज हमने लगभग 872 किमी और 17 घंटे लगातार कार ड्राईव की। हम रात को 10 बजे होटल में पहुंच गए।  होटल पहुंच कर खाना खाया। इस यात्रा के दौरान सभी होटलों में नेपाली या असमी स्टाफ़ ही दिखाई दिया। नेपाल में भूकंप से हुए नुकसान के बाद बड़ी संख्या में नेपाली बाहर काम करने निकल गए। भाषा की समस्या होने के बाद भी ये नौकरी कर कुछ धन अर्जित करने के लिए जद्दो जहद कर रहे हैं। रात को सुबह जल्दी बंगलोर निकलने के लिए प्लान बनने लगा। पर गोलकुंडा का किला देखने का मुड बन गया तो तय किया गया कि किला नौ बजे खुलता है इसलिए होटल से आठ बजे चला जाए और रास्ते में ही नाश्ता किया जाए। किला देखकर बंगलोर के लिए प्रस्थान किया जाए। जारी है, आगे पढ़ें 

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत तेज़ चले आप लोग । ईको के लिए 120की स्पीड बहुत है मेरे हिसाब से

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  2. यात्रा करने व यात्रा वर्णन में आपका कोई सानी नही..भाई को तहे दिल से बधाई...

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  3. 120 तो बहुत ज्यादा हो जाता है ! कती रेल बणा राक्खी थी !

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  4. 120 तो बहुत ज्यादा हो जाता है ! कती रेल बणा राक्खी थी !

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  5. नमस्कार ललित भाई।
    872 किलोमीटर ओर 17 घंटे में काफी चले आप, चलाने वाला थके ना थके पर सवारी अवश्य ही थक गई होगी।

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. पेड़ की छाया माँ के आँचल के समान सुकून देती है,सच में आपका यात्रा विवरण जीवंत सा लगता है,हमें इतने अच्छे से सैर कराने के लिए आपको नमन ,अगले पोस्ट की प्रतिक्षा में ....

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  8. शानदार यात्रा चल रही है ललित जी।

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  9. शानदार यात्रा चल रही है ललित जी।

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  10. विदर्भ में सुखा पड़ा है।मस्त सफर चल रहा है

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  11. तुमड़ीबोड़ चाय ,रास्ता डोंगरगढ़, हमारे पास का है सिर्फ दो लोग ही इतना लंबा रास्ता तय कर लेते हो गुरूजी लाजवाब है।

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