बुधवार, 7 सितंबर 2016

हिंगलाज माता का बलोचिस्तान से छत्तीसगढ़ का सफ़र


सरगुजा भ्रमण के दौरान सुरजपुर जिले के प्रतापपुर के प्राचीन मंदिरों का छायांकन किया। यहाँ राजा के बनवाए हुए कई मंदिर हैं जो सतत पूजित हैं। साथी अजय चतुर्वेदी एक स्थान पर मुझे ले गए जो अम्बिकापुर रोड़ पर एक रिहायशी मकान के पीछे था। 

यहाँ चबूतरे पर गोल पाषाण की एक चट्टान रखी है। इसे उन्होनें "हिंगलाज" माता का स्थान बताया। जिसे देख कर मैं चकित रह गया। चकित होने का कारण भी था। जिस तरह ग्रामीण अंचल में देवगुड़ी होती है और ठाकुर देवता बिना किसी छत के चबूतरे विराजते हैं उसी तरह "हिंगलाज" माई भी यहां विराजमान थी। 

छत्तीसगढ़ में मैने अन्य किसी स्थान पर हिंगलाज माता की विराजित होना नहीं पाया। न हि कहीं उत्खनन में उनकी कोई प्रतिमा प्राप्त होने की जानकारी मुझे है। पूछने पर पता चला कि प्रतापपुर के सभी देवता रक्सेल राजाओं की रियासत के पूर्व से हैं। उस समय यहाँ गोंड़ राजाओं का शासन होता था।
हिंगलाज माता प्रतापपुर सरगुजा छत्तीसगढ़
मेरी जानकारी में हिंगलाज माता के 3 तीन स्थान, पहला पाकिस्तान के बलोचिस्तान में, दूसरा उड़ीसा के तालचर से 14 किमी की दूरी पर और तीसरा वाराणसी की एक गुफा क्रीं कुण्ड में बाबा कीनाराम द्वारा स्थापित हिंगलाज माता की प्रतिमूर्ति है। 

पाकिस्तान के बलोचिस्तान राज्य में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में स्थित हिंगलाज माता मंदिर हिन्दू भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र और प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है। 

पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया. मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था. 

यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं।
गुफ़ा में बिराजी हिन्गलाज माता बलोचिस्तान पाकिस्तान

वैसे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में माता सेवा में गाए जाने वाली पारम्परिक सेवा गीतों (जस गीत) में माता हिंगलाज का उल्लेख आता है तथा देवी के मान्य रुपों के साथ हिंगलाज माता की आराधना भी की जाती है। महामाई की आरती में भी हिंगलाज माता का स्मरण किया जाता है। यथा -

गढ़ हिंगलाज में गड़े हिंडोला
लख आये लख जाए
लख आये लख जाए
माता लख आए लख जाए
एक नइ आवय लाल लगुंरवा
जियरा के परान अधार
महामाई ले लो आरती हो माय
गुफ़ा में बिराजी हिन्गलाज माता बलोचिस्तान पाकिस्तान में भक्तगण
सारंगढ बिलासपुर रोड पर भटगाँव के समीप देवसागर में हिंगलाज माता है, सुना है सारंगढ राजा कही से ला रहे थे तो वही विराजमान हो गई।छिन्दवाड़ा जिले में हिंगलाज का भव्य मंदिर है।यह आदि संस्कृति के मातृ पूजा का ही एक रूप है...

मातृ पूजा या शक्ति पूजा भारतीय संस्कृति की मुख्यधाराओं में से एक है और लोक संस्कृतियों में झलक मिलती है...नाम, स्थान और भाषा भिन्न हो सकती है..जैसे छत्तीसगढ़ में हिंगलाज माता को बंजारी, बूढीमाई, माई, महामाई, इत्यादि कहा जाता है। 

यह प्रायः अनगढ़ शिला खंड के रूप में पाई जाती है। सुतियापाठ (सहसपुर लोहारा से करीब 15 km दूर) पहाड़ ऊपर हिंगलाज माई बिराजी हैं यहाँ दुर्गम रास्ता तय करके पहुंचा जा सकता है। इसके समीप गहरी सुरंग हैं और नदी भी प्रवाहित होती है। 

अब किस तरह हिंगलाज माता बलोचिस्तान से छत्तीसगढ़ का सफ़र तय करते हुए लोकगीतों में समाहित हुई और अन्य देवी के साथ आराध्य हुई, यह शोध का विषय है। इसके साथ ही सरगुजा के प्रतापपुर के अलावा अन्य स्थानों पर मिलना भी कम रोचक नहीं है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक जानकारी ।
    हिंगलाज में तुम्ही भवानी , जाकी महिमा न जात बखानी ।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नीरजा भनोट और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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  4. रोचक, उपरोक्‍त पदों के अतिरिक्‍त..
    कामें पोताबो मईया दिल्‍ली ओ सहर ला
    कामे पोताबो हिंगलाजे हो माय
    चंदन पोताबो हो मईया दिल्‍ली ओ सहर ला
    बंदन पोताबो हिंगलाजे हो माय
    कई ओ कोसन के दिल्‍ली ओ सहर हा
    कई वो कोसन हिंगलाजे हो माय
    आदि इत्‍यादि जस गीतों और माता सेवा में हिंगलाज माता का वर्णन आता है।

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