गुरुवार, 1 सितंबर 2016

उदयगिरि की प्राचीन गुफ़ाएँ

विश्व हिन्दी सम्मेलन के बाद 13 सितम्बर 2015 को सांची होते हुए उदयगिरि जाना हुआ। उदयगिरि विदिशा से वैसनगर होते हुए भी पहुँचा जा सकता है। नदी से यह गिरि लगभग 1 मील की दूरी पर है। पहाड़ी के पूरब की तरफ पत्थरों को काटकर गुफाएँ बनाई गई हैं। इन गुफाओं में प्रस्तर- मूर्तियों के प्रमाण मिलते हैं, जो भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। 
उदयगिरि में ललित शर्मा
गुफ़ा नम्बर 5 वराह अवतार
उत्खनन से प्राप्त ध्वंसावशेष अपनी अलग कहानी कहते हैं।उदयगिरि को पहले नीचैगिरि के नाम से जाना जाता था। कालिदास ने भी इसे इसी नाम से संबोधित किया है। १० वीं शताब्दी में जब विदिशा धार के परमारों के हाथ में आ गया, तो राजा भोज के पौत्र उदयादित्य ने अपने नाम से इस स्थान का नाम उदयगिरि रख दिया।
उदयगिरि
गुफ़ा नम्बर 4
गुफा संख्या - 5 वाराह गुफा के नाम से जाना जाता है तथा उदयगिरि की समस्त गुफाओं में सर्वश्रेष्ठ है। इसे पांचवी छठी शताब्दी की माना जाता है। वास्तव में यह पहाड़ी को काटकर एक दालान के रुप में बनाई गई है, जो २२ फीट लंबी तथा १२ फीट ८ इंच ऊँची एवं ३ फीट ४ इंच पत्थर में भीतर की ओर गहरी है।
उदयगिरि वराह अवतार
वराह अवतार

यहाँ पत्थर को काटकर बनाई गई वाराह अवतार की मूर्ति पूरे भारत में सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक मानी जाती है। मूर्ति का मुख भाग वाराह के रुप में है तथा शेष हिस्सा मानवाकृति का है। बलिष्ठ भुजाएँ, मांसल जंघाओं तथा सुडौल बनावट ने मूर्ति को बल, शौर्य तथा सुंदरता का प्रतीक बना दिया है। मूर्ति पीतांबर पहने हुए है तथा साथ- साथ कंठहार, वैजयंतीमाला तथा कंगन भी उत्कीर्ण किये गये हैं।
उदयगिरि जैन मंदिर
उदयगिरि 
बांये पैर को मुकुट पहने किसी विशेष व्यक्ति के हृदय पर रखा हुआ दिखलाया गया है, जिसके मस्तक के ऊपर विशाल १३ फणों वाला नाग स्थित है। वह वाराह की स्तुति करने की मुद्रा में है। इस विशेष व्यक्ति की पहचान के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्धान इसे राजा बताते हैं, तो कुछ देवता या विष्णु की मूर्ति। मुझे यह शेषनाग की प्रतिमा लगी क्योंकि कुंडली मारे शेषनाग पर वराह ने अपने चरण स्थिर कर रखे हैं। 
उदयगिरि शेष शैया पर विष्णु
शेष शैया पर विष्णु
पुराणों के अनुसार वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस से पृथ्वी का उद्धार किया था। अतः कुछ विद्वान इसे हिरण्याक्ष की मूर्ति मानते हैं। परंतु मूर्ति का मुख असुर सदृश नहीं दिखलाया गया है। मूर्ति के ऊपर नाग फणों का घेरा होने के कारण लोग इसे पाताल का स्वामी भी मानते हैं या फिर समुद्रराज। वाराह के बायीं ओर स्तुति करती हुई दिखाई गई रानी, संभवतः नीची की मूर्ति की राजमहिषी हो सकती हे।
उदयगिरि राजनिवास
राज निवास के भग्नावशेष
वाराह के कंधे पर नारी रुपी पृथ्वी को दिखलाया गया है। पृथ्वी के दोनों पैर नीचे लटके हुए दिखाए गये हैं। अंग- प्रत्यंग में करुणा भाव दिखलाया गया है। चोली में स्थित पुष्ट पयोधर पृथ्वी की पोषणात्मक शक्ति के प्रतीक हैं। नीचे स्थित लेटे अवस्था में दिख रही मूर्ति के पीछे स्थित कलश लिए देवता वरुण का प्रतीक प्रतीत होता है। साथ में दिखाई दे रही दो जल- धाराएँ गंगा तथा यमुना की प्रतीक हैं, जो स्वर्ग से नीचे की तरफ अवतरण करती हुई दिखाई गई हैं। 
उदयगिरि का प्रस्तर स्तंभ
भग्न प्रस्तर स्तंभ
गंगा तथा यमुना को अपने- अपने वाहन मकर तथा कच्छप पर दिखलाया गया है। ऊपर अप्सराएँ दिखाई गई हैं तथा बाई ओर पाँच पंक्तियों में यक्ष, किन्नर, गंर्धव व मरुत गणों को स्तुति- गान करते हुए दर्शाया गया है। ऊपरी पंक्ति में दिख रहे गंधर्व के हाथों में स्थित वायलिन जैसा वाद्य यंत्र इस बात के साक्ष्य हैं कि ऐसे यंत्र की उत्पति भारत में ही हुई होगी। दांयी ओर यक्ष व महर्षिगण चार पंक्तियों में दर्शाये गये हैं। ब्रह्मा तथा नंदी वाहन समेत शिव को सबसे ऊपरी पंक्ति में दर्शाया गया है।
उदयगिरि शिकारगाह
ग्वालियर स्टेट द्वारा निर्मित शिकारगाह
उदयगिरि की पहाड़ी पर शंख लिपि के बहुत सारे लेख हैं। इसके साथ ही एक गुफ़ा में प्रस्तर निर्मित किरिट धारित शेष शैया पर विष्णु को शयन करते हुए दिखाया गया है। आगे चलने पर पहाड़ी पर एक विशाल भवन के भग्नावशेष हैं, जिसके समक्ष विशाल प्रस्तर स्तंभ भग्न पड़ा है। इससे आगे बढने पर ग्वालियर स्टेट द्वारा निर्मित शिकार गाह भी है, जो अभी सलामत है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. खूब सैर कर लेते हैं आप .. हमारे भोपाल से उदयगिरि नज़दीक है फिर भी हमारे लिए अभी तक बहुत दूर ही है ... खैर इसी बहाने हम भी पढ़-देख तसल्ली कर लेते हैं ...
    बहुत अच्छी जानकारी मिली यात्रा संस्मरण में ... धन्यवाद ..

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