बुधवार, 21 दिसंबर 2016

कुकुर कोटना : खारुन नदी की रोमांचक पदयात्रा

चलते-चलते बन्नु सिंह अपनी कथा कहता जा रहा था "मुझसे धनी कोई नहीं है, ये पत्थर देखो। एक-एक पत्थर कितना मंहगा है। ये पेड़ देखो, जिसे दीमक खा रही है, यह कितना मूल्यवान है। जंगल वाले ही सारा जंगल काट कर ले गए। अब तो जलाऊ के लायक भी लकड़ी नहीं दिखाई देती। 

बन्नु सिंह और नारायन साहू
फ़ालतू का काड़ी-कचरा उगा हुआ है। अगर इन पत्थरों को ही गाड़ी मोटर में भर के शहर ले जाए तो लाखो-कड़ोरों रुपए के हैं। उधर देखो साहब, पेड़ों पर चारों तरफ़ नोट ही नोट लटके हैं। एक-एक पत्ता सौ-सौ का नोट है। अब बताओं आप, मुझसे अमीर कौन है? ये सारा जंगल मेरा है और मैं इसका मालिक हूँ। मेरे ही धन को लोग चोरा कर ले जा रहे हैं।" 
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हमारी अमानत
मैं बन्नु राम की बात सुनकर उससे सहमत होता हूँ, जंगल के मालिक तो वे ही हैं जो उनसे प्यार करते हैं, उसकी रखवाली करते हैं। जंगल कटने एवं खत्म होने का दर्द वही महसूस कर सकता है, जिसका जीवन उसके साथ जुड़ा है। जिस पेड़ को मैने लगाया है, उसे काटने की हिम्मत मैं जुटा नहीं पाता। इसके कारण मेरे घर परिसर में कई महावृक्षों ने विस्तार ले लिया है, जो अब हानि भी पहुंचा रहे हैं। फ़िर तो बन्नु सिंह जंगल का ही आदमी है। 
पथरीली नदी घाटी
वह मुझे मुक्त कंठ से एक रेलो गीत सुनाता है। जो जंगल में गूंजता है और मैं उसे रिकार्ड करता हूँ… "साय रेलो रे रेलो रे रेलो, नदी नादर निहिर निहिर ताघर ता, ओSS रोहुर झुहुर झुहुर बाजेर तिहिर तोर। गांवे रे गांवे रे घुमेर बाबू कहे नादर तोर। ओSS नादर लोहर लोहर लोघर तोर।" सुनसान जंगल में उन्मुक्त कंठ से गाया हुआ गीत बिना साज के ही सुहाना लग रहा था तथा आनंद दे रहा था। पहले रेडियो में बस्तर के रिलो गीतों का रायपुर से प्रसारण होता है, एक अरसे के बाद बन्नु सिंह के मुंह से गीत सुना। बन्नु सिंह के गीत मुझे जंगल के साथ जोड़ रहे थे। 
एक पड़ाव कुकुर  कोटना
वनवासी के गीतों ने मेरे अंतरमन को वन के साथ एकाकार कर दिया था, पर कदम उबड़-खाबड़ पत्थरों पर पड़ते हुए सावधान थे। सफ़र चल रहा है बलखाती इठलाती कुंवारी नदी के साथ। अइरी बुड़ान के बाद हम जिस स्थान पर पहुंचे, साथियों ने इस स्थान का नाम कुकुर कोटना बताया। यहाँ चट्टान को काटकर दो ढाई फ़ुट चौड़ी नाली सी बनाई हुई है। पहले जंगल में शिकार करने वालों के कुत्ते इस स्थान पर पानी पीने आते थे। कोटना के आगे थोड़ी गहराई है, इन चट्टानों के नीचे काले केकड़े छिप रहते हैं, एक साथी केकड़े पकड़ने के लिए पानी में उतर गया। 
कुकुर कोटना पर दोपहर का भोजन पानी
सूर्य सिर पर चढ गया था, हमने अपने खाने की पोटली खोल ली। रामकुमार के घर से बनाकर लाई हुई अंगाकर रोटी सभी लोगों ने आपस में बांट ली। अंगाकर रोटी छत्तीसगढ़ का पारम्परिक भोजन है। रोटी इतनी बड़ी होती है कि एक रोती चार आदमियों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है। कुकुर कोटना पर बैठकर भोजन समाप्त करते तक साथी ने कई केकड़े पकड़ कर अपने झोले के हवाले कर लिए। दोपहर का भोजन इतमिनान से हो गया। जारी है… आगे पढें।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगा लेख पढकर ।जंगल में अद्भुत शक्ति व शांति का अनुभव होता है ।

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  2. अच्छा लगा लेख पढकर ।जंगल में अद्भुत शक्ति व शांति का अनुभव होता है ।

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