मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

"माल प्रैक्टिस" का जमाना ------- ललित शर्मा

कहावत है कि अस्पताल, थाना, कचहरी व्यक्ति अपनी खुशी से नहीं जाता। मजबूरी में ही जाना पड़ता है। व्यक्ति को जीवन में चिकित्सकों से पाला पड़ता ही है, शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा मिले जिसे डॉक्टर के पास न जाना पड़ा हो,चिकित्सा को विश्वास का पेशा माना गया है और चिकित्सक को भगवान। मरीज अपने प्राण चिकित्सक के हाथ में सहर्ष सौंप देता है। समाज में यह पेशा प्रतिष्ठा का माना जाता है, अगर हम किसी भी व्यक्ति से पूछे तो सबसे पहले वह अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना चाहता है। उसके पश्चात अन्य पेशे के विषय में सोचता है। पहले और वर्तमान के चिकित्सकों की कार्य प्रणाली में अत्यधिक बदलाव देखा जा रहा है।

पहले डॉक्टरी के पेशे को सेवा भाव के से किया जाता था, डॉक्टरों का कार्य मरीज की सेवा सुश्रुषा करके स्वास्थ्य प्रदान करना था। वर्तमान में चिकित्सा का पेशा व्यावसायिकता की पराकाष्ठा पर पहुंच चुका हैं। इनकी कारगुजारियाँ और स्थिति यह है कि अब मरीज मजबूरी में ही इनके पास जाना चाहता है तथा एक बार किसी नर्सिंग होम या अस्पताल में भर्ती हुए तो समझ लो सारा बैंक बैलेंस खत्म। ॠण लेकर ही इनकी जेब भरनी पड़ेगी। ऐसा नहीं है कि मैं सभी चिकित्सक समाज को एक तुला पर ही तौल रहा हूँ, कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो पूर्वजों से मिले उत्तम संस्कार के द्वारा मानवीय मूल्यों को समझ कर पेशे की पवित्रता कायम रखे हुए हैं।

एक डॉक्टर मित्र से इस विषय पर चर्चा हो रही थी, तो उन्होने कहा कि अब डॉक्टर "माल प्रैक्टिस" पर उतर आए हैं। इनसे ही मुझे प्रैक्टिस के नए तरीके के विषय में पता चला। साथ ही "माल प्रैक्टिस" क्या होती है, इस विषय में भी। मानवता को दरकिनार कर लूटने में लगे हुए हैं। एक मित्र ने बताया कि उनकी पत्नी को बच्चा होने वाला था, नर्सिंग होम लेकर गए, वहाँ डॉक्टर ने सभी पैथालाजिकल, सोनोग्राफ़ी एवं अन्य टेस्ट कराए। उसके पश्चात पेशेंट को अकेले में समझाया गया की पेट में बच्चे ने गंदा पानी पी लिया है और पॉटी कर सकता है, जिससे जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा है। इसलिए सिजेरियन आपरेशन तुरंत करना पड़ेगा। 20,000 रुपए जमा करवा दीजिए। मित्र ने रुपए जमा कराए और ऑपरेशन के फ़ार्म पर हस्ताक्षर कर दिए। थोड़ी देर बाद बिना ऑपरेशन के ही उनकी पत्नी ने बच्चे को जन्म दे दिया। जच्चा-बच्चा दोनो स्वस्थ्य थे। ईश्वर ने डॉक्टर के षड़यंत्र को विफ़ल कर दिया।

वर्तमान में अतिरिक्त कमाई के लालच में 90% जच्चाओं के सिजेरियन ऑपरेशन कर दिए जाते हैं,"माल प्रैक्टिस" जोरों पर है। बच्चे के जन्म लेने के तीसरे-चौथे दिन उसकी त्वचा हल्की पीली दिखाई देती है। तब उसे तुरंत पीलिया बता कर नीले प्रकाश में रख दिया है। जहाँ 1000 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक प्रतिदिन का चार्ज वसूला जाता है। जच्चा और बच्चा दोनो से "माल पैक्टिस" चालु है। "माल प्रैक्टिस" करने वाले डॉक्टरों ने चिकित्सा जैसे पावन पेशे को बदनाम कर दिया। अस्पताल जाने के नाम पर जेब और रुह दोनो काँप जाती है। प्राण बचे न बचे पर अस्पताल का चार्ज ले ही लिया जाता है। किडनी एवं शरीर के अन्य अंग चोरी से निकालने के समाचार मिलते ही रहते हैं।

सिजेरियन ऑपरेशन के बाद अब महिलाओं की बच्चे दानी निकालने का काम जोरों पर चल रहा है। किसी महिला को कमर के नीचे थोड़ा सा भी दर्द हुआ तो समझ लो बच्चे दानी निकलवाने की सलाह डॉक्टर तुरंत दे देते हैं। 25-30 साल की महिलाओं की बच्चे दानी बेधड़क निकाली जा रही है। भले ही फ़िर उस महिला को जीवन भर भुगतना पड़े। गर्भाशय निकालने के इस दुष्कृत्य में ग्रामीण स्वास्थ्य रक्षकों के रुप में तैनात "मितानिन" मुख्य तौर पर सम्मिलित हैं। निजी नर्सिंग होम संचालकों ने इन्हे मोबाईल बांट रखे हैं, साथ ही गर्भाशय आपरेशन के प्रत्येक मरीज पर 1000 से 2000 रुपए का का कमीशन तय है। कुछ दिनों पूर्व समाचार था कि मृत शरीर को वेंटिलेटर पर रख कर हजारों रुपए वसूल लिए गए। डॉक्टर का कहना था कि मशीनों का चार्ज तो लेना ही पड़ेगा। मरीज चाहे बचे या न बचे। इस पेशे से संवेदनाएं समाप्त होती जा रही हैं। गरीब आदमी का तो मरण ही है। सरकार ने चिकित्सा बीमा योजना शुरु की है इसमें भी ये घोटाला करने से बाज नहीं आ रहे। मरीज के चिकित्सा बीमा की राशि को ध्यान में रख कर बिल बनाया जाता है। एक ही झटके में उसका सारा बीमा बैलेंस खाली कर दिया जाता है।

सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा नागरिकों को भी जागरुक होने की आवश्यकता है। अगर मरीज को उपभोक्ता के तौर पर देखा जा रहा है तो इन डॉक्टरों से दुकानदार जैसा ही व्यवहार होना चाहिए तथा सजा निश्चित की जानी चाहिए। चिकित्सकीय लापरवाही से हुई मौत पर हत्या का अपराध दर्ज होना चाहिए। लापरवाही के कारण कभी किसी के पेट में कैंची, गॉज बैंडेज या तौलिया छोड़ने जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी। इनकी लापरवाही की सजा तो मरीज को ही भुगतनी पड़ती है।

29 टिप्‍पणियां:

  1. "सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा नागरिकों को भी जागरुक होने की आवश्यक्ता है।"

    अजी ललित जी, सरकार भला कभी किसी अच्छे काम की ओर ध्यान देती है? इतना ही गनीमत होगा कि नागरिकगण जागरूक हो जाएँ!

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  2. जी
    ज़रूरी है
    क्या करें सरकार के कान अन्य बात सुन ने में बिज़ी हैं

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  3. आपने बहुत अच्छा लिखा है , आज हकीकत बन कर उभरी है यह समस्या । समाज मानो संवेदन शून्य होता जा रहा है । पहले धनिक वर्ग बड़े बड़े कार्य धर्मार्थ ही कराया करते थे, आज उनका प्रतिशत जनसंख्या की तूलना में कम प्रतीत होता है , साथ ही प्राथमिकताएं भी बदलीं हैं । सरकार ऐसे ही लोगों को प्रत्यक्ष - परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है , उन्हें ही सस्ती दरों में जमीन दे रही है , उन पर नियंत्रण बिल्कुल नहीं रख पा रही है , आगे न जाने और कैसी भयावह स्थिति का सामना करना पड़े नहीं मालूम ।

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  4. भागवान मौत देदे लेकिन डॉक्टर के पास ना भेजे |

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  5. मैं बड़ा हताश होता हूं जब यह पढ़ने को और लिखने को मिलता है कि "आम आदमी को जागरुक होना पड़ेगा". क्या कर लेगा जागरुक होकर वह. उसके जागरुक होने भर से डाक्टर यह मालप्रैक्टिस बन्द कर देंगे! नहीं. आम नागरिक की जगह जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को जागरुक होना पड़ेगा, क्योंकि उन्हीं के पास ताकत है यह सब बन्द कराने की..

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  6. सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा नागरिकों को भी जागरुक होने की आवश्यक्ता है। अगर मरीज को उपभोक्ता के तौर पर देखा जा रहा है तो इन डॉक्टरों से दुकानदार जैसा ही व्यवहार होना चाहिए तथा सजा निश्चित की जानी चाहिए।

    जी हाँ मैं आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ... ज्वलंत समस्या ...

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  7. सिर्फ डॉ ही नहीं हरेक पेशेवर को इमानदारी से काम करना चाहिए, भ्रस्टाचार का कोई पैमाना नहीं होता| चाहे कम को या ज्यादा बेईमानी कोरी बेईमानी ही होती है|

    आभार एक जागरूक पोस्ट के लिए|

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  8. ललित भाई,
    दिल्ली और मेरठ के बीच मोदीनगर कस्बा आता है...वहां एक अस्पताल का नाम है...WELCOME NURSING HOME...

    अब और कुछ कहने को रह जाता है क्या...

    जय हिंद...

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  9. bhtrin post lekin aese chikitskon ke khilaaf chikitsaa prichaln adhiniyam 2002 ke tahat shikaayt ki jaa skti hai jo shi saabit hone par doktr saahb ghr beth skte hain . akhtar khan akela kota rajsthan

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  10. राम बचाए, डॉक्‍टर-अस्‍पताल से.

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  11. वाकई यह सेवा अब एक स्वार्थी व्यवसाय का रूप ले चुकी है .चिंतनीय.
    अच्छा लिखा है आपने.

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  12. माल शब्द कौन सा लिया है आपने हिंदी का या अंग्रेजी का वैसे दोनो ही फ़िट बैठते हैं

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  13. मेरे पुत्र को पेट में दांई ओर दर्द हुआ । डाक्टर ने तत्काल 15,000 रु. खर्च बताकर हास्पीटल में एडमिट कर अपेंडिक्स का आपरेशन करने की अनिवार्यता बता डाली । संयोगवश चार दिन बाद मेरा 50वां जन्मदिन था मैंने कहा हम पांच दिन बाद आकर यह आपरेशन करवाएँ तो ? तो फिर मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है डाक्टर ने बेरुखी से जवाब दिया । हम घर आ गये सामान्य दवा-गोली से दर्द ठीक हो गया और आज उस घटना को 10 वर्ष बीत गये उस आपरेशन की कोई आवश्यकता ही नहीं पडी ।
    ये घटना भी इनकी लूट-खसोट की कार्यवाही बताने के लिये ही यहाँ बता रहा हूँ ।
    वैसे आजकल डाक्टर्स ने आपरेशन और नार्मल डिलिवरी के रेट एक समान ही कर दिये हैं । लेकिन पीलिया जैसे मुद्दों पर डराकर अतिरिक्त जेब तो मरीज की फिर भी खाली करवा ही रहे हैं ।

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  14. आजकल अस्पतालों में डाक्टर नहीं कसाई बैठते है

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  15. मैंने एक डाक्टर के मूह से ये सुना था 'पिछले साल जैसा वायरल का सीजन इस बार भी लग गया तो वारे न्यारे हो ज्यांगे'.....:)

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  16. सटीक ! शब्द भी मळ-प्रेक्टिस की जगह माल-प्रेक्टिस बनकर कमाल कर गया ! वाकई में आज मळ-प्रेक्टिस माल-प्रेक्टिस बन गया है , सिर्फ माल के लिए ही तो इन्सान इस कदर गिर जाता है !

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  17. सरकार को ध्यान देना तो चाहिये....मगर देती कहाँ है...

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  18. आज की ज्वलंत समस्या का सार्थक एवं प्रभावी चित्रण, वाकई जागरूकता मरीज के साथ साथ जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों में आना चाहिए और साथ ही मानवीय संवेदना भी...आभार !!

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  19. आपकी बात बिल्कुल सच है...... और यह भी आज के समय की सच्चाई है की संवेदनाएं तो बची ही नहीं हैं.... पर अफ़सोस होता है क्योंकि डॉक्टर अगर संवेदनशील नहीं तो समझना चाहिए की वो इस पेशे के काबिल ही नहीं ....सार्थक पोस्ट

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  20. अरे भाई , डॉक्टरों को इतनी गालियाँ मत दो । पैसा जितना लेलें लेकिन जान तो वही बचाते हैं ।
    उनका क्या जो पैसे लेकर जान ले लेते हैं । और किस किस का नाम लें । यहाँ तो सारा संसार ही भ्रष्ट है ।

    वैसे जो डॉक्टर २०-३० लाख रूपये देकर प्राइवेट मेडिकल कॉलिज से डिग्री हासिल करेगा , वो क्या करेगा ।
    जब तक ये डॉक्टर्स बनाने की फैक्टरियां चलती रहेंगी , बेचारी जनता यूँ ही पिसती रहेगी ।
    कृपया इसे भ्रष्ट डॉक्टर्स की तरफदारी न समझें । सिक्के में दो पहलु होते हैं ।

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  21. Absolutely right,majority doctors are indulging in malpractices.Ihave always opposed this,as a Doctor i feel it is criminal ,I wrote a poem on malpractice by doctors about 6 months back.

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  22. हम अपने देश मे किस किस को दोष दे, जिस पेशे मे देखो हर तरफ़ लुट मची हे, पहले भारत मे ड्रा० को भगवान का दर्ज दिया जाता था, ओर एक ड्रा० होता भी अच्छा था कोई कोई लालची होता था, आज के जमाने मे कोई कोई अच्छा होता हे बाकी ९०% लालची, बडे बडे कलिनिक,एयर कंडिशन यह सब कहा से बनते हे, आम ओर सीधे साधे लोगो को गलत सलत बिमारियां बता कर ओर उन का पैसा लुट कर ही तो... लानत हे जी इन सब पर

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  23. मुझे साधारण खांसी हुई थी और डाक्टर इंडोस्कोपी के लिये कहने लगे. मुझे आश्चर्य हुआ . जब मैंने अपने परिवार के सदस्य डाक्टर को बताया , उन्होंने पांच दिन की दवाई दी खांसी गायब और लंबे समय तक नहीं हुई. बाद में पता चला उन डाक्टर ने इंडोस्कोपी की नई मशीन खरीदी थी जिसका खर्चा निकालना था ।
    कडवा सच सामने लाने के लिये आभार ।

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  24. गहन विषय पर चिन्ता व्यक्त की है ...आज डाक्टर सेवा भाव से कम , पैसे कमाने से ज्यादा संतुष्ट होते हैं ...जनता को खुद ही सचेत रहना होगा ...लेकिन परेशानी में जो डाक्टर कहेगा वो भी चुपचाप मानना पड़ जाता है ..

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  25. सार्थक पोस्ट है भईया...
    भारतीय नागरिक की टिप्पणी ओर चिंता विचारणीय है...
    सादर...

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