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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

भानगढ के भूतों की सच्चाई

भानगढ़ का राजप्रासाद
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भानगढ़ राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का अभ्यारण के एक छोर पर स्थित है। इतिहास अधिक पुराना नहीं है। 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसका जन्म होता है और 19 वीं शताब्दी में अवसान हो जाता है। इस समय दिल्ली पर मुगलों का शासन था और दिल्ली के तख्त पर अकबर गद्दीनशीं था। आमेर के कछवाहा राजपुत राजा भारमल ने गद्दी संभालने के बाद अकबर के दरबार में प्रवेश पाया और अपनी पुत्री हरखा बाई का विवाह अकबर से करना स्वीकार किया। विवाह के बाद राजपूतों ने इसे छोड़ दिया और हरखा बाई कभी लौट कर आमेर नहीं आई। भारमल के पुत्र राजा भगवंत दास ने संभवत: इस इलाके पर अपनी पकड़ बनाए रखने लिए इस किले का निर्माण 1573 में कराया। भारमल का प्रपौत्र एवं भगवंत दास के पुत्र राजा मानसिंह ने भी अकबर के दरबार में उच्च स्थान प्राप्त किया। 

राजप्रासाद के भग्नावशेष
भानगढ़ के बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यह आबाद रहा। राजा भगवंत दास ने यह गढ़ अपने छोटे बेटे माधौ सिंह को दिया। माधौसिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। छत्रसिंह एवं उसके पुत्र 1630 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। विक्रम संवत 1722 में इसी वंश के हरिसिंह ने गद्दी संभाली।इसके साथ ही भानगढ की चमक कम होने लगी। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने समीप ही अजबगढ़ बनवाया और वहीं रहने लगा। यह समय औरंगजेब के शासन का था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसने अपने बाप को नहीं छोड़ा तो इन्हे कहाँ छोड़ता। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान हो गए, जिन्हें मोहम्मद कुलीज एवं मोहम्मद दहलीज के नाम से जाना गया। इन दोनों भाईयों के मुसलमान बनने एवं औरंगजेब की शासन पर पकड़ ढीली होने पर जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन्हे मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा माधो सिंह के वंशजों को गद्दी दे दी।

मंगला माता मंदिर
केशवराय मंदिर में स्थित शिलालेख में संवत १९०२ उत्कीर्ण है। इससे यह सत्यापित होता है कि १६७ वर्ष पूर्व अर्थात अंग्रेजों के आने के बाद तक यह नगर आबाद था| भानगढ़ के उजड़ने के पीछे आक्रमण या दुर्घटना जो भी कारण रहा होगा वह संवत 1902 के पश्चात का है। भानगढ़ उजड़ने के कई कारण किंवदंतियों के माध्यम से जनमानस में प्रचलित हैं। जिसमें सिंधु शेवड़े के प्रतिशोध की कहानी चटखारे लेकर सुनाई जाती है। रानी रत्नावती को सिंधु शेवड़ा पाना चाहता था और उसने तंत्र मंत्र का प्रयोग करके इस नगर को उजाड़ दिया। दूसरी जन श्रुति है कि 1720 में आमेर के राजा जयसिंह ने इसे अपने राज्य में मिला लिया था। मुगलों के दौर में राजस्थान में उनके आक्रमण हुए और भयानक युद्द भी हुए। लेकिन मुगलों का आक्रमण भानगढ़ पर हुआ दिखाई नहीं देता। नगर के भीतर जितने मंदिर हैं सभी सही सलामत हैं। अगर मुसलमानों का आक्रमण हुआ रहता तो मंदिर सलामत नहीं मिलते।

शेवड़ों का धूणा
तीसरी किंवदंती भानगढ़ को जयपुर विस्थापित करने के विषय में सुनाई जाती है। अंग्रेजों के शासन काल में जयपुर के राजाओं ने भानगढ़ नगर को जयपुर विस्थापित किया होगा। इस तर्क पर मैं सहमत हूँ, क्योंकि 18 वीं सदी में मराठों एवं पिंडारियों के आक्रमण के कारण राजपुताना त्रस्त हो गया था। इसलिए सारी शक्ति को एकत्र कर जयपुर में स्थापित करने की दृष्टि से भानगढ़ नगर का विस्थापन संभव है। पूर्ववर्ती राजाओं एवं बादशाहों द्वारा अपनी राजधानी को विस्थापित एवं स्थानांतरित करने के अनेकों उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। इस तरह भानगढ़ के विस्थापन का कारण सामरिक कारण रहा होगा। तब से यह नगर उजड़ गया और यहाँ दुबारा कोई बसने नहीं आने के कारण देख रेख के अभाव में यह नगर खंडहर बन गया होगा। इस इलाके में पानी की कमी थी। जिसके कारण यहाँ अकाल की स्थिति बन जाती थी। कहते हैं कि 1783 में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें भूख प्यास से काफ़ी लोग त्रस्त होकर काल का ग्रास बन गए। अकाल के कारण फ़ैली महामारी से भानगढ़ उजड़ गया। यहाँ के निवासी भानगढ़ छोड़ कर चले गए।

असमाजिक तत्वों की उपस्थिति 
भानगढ़ उजड़ने के बाद यहाँ असामाजिक तत्वों का बसेरा हो गया। वीरान स्थान पर पहाड़ियों के बीच स्थित यह नगर अपराधियों के छिपने के लिए उत्तम था। उनके द्वारा ही यहाँ भूत प्रेतों की कहानियाँ गढ़ी गई होगीं। जिससे कि आस पास के क्षेत्र के लोग भानगढ़ के खंडहरों की तरफ़ न आए और उनकी गतिविधियाँ निर्विघ्न जारी रहें। गड़े धन के प्रति लोगों का लगाव सदैव रहा है। यहाँ पर भी गड़े खजाने की खोज में लोग आते होगें तथा खजाने को प्राप्त करने के लिए नान प्रकार की तांत्रिक क्रियाए करने के कारण भय का वातावरण निर्मित होता होगा। वर्तमान में भी असामाजिक तत्वों की उपस्थिति के चिन्ह भानगढ़ में दिखाई देते हैं। दारु की खाली बोतलें एवं डिस्पोजल गिलास यत्र तत्र बिखरे पड़े है। दिन रात समूचा किला तांत्रिकों एवं बाबाओं के हवाले रहने के कारण यहाँ भय का वातावरण बना रहता है।

चौकीदार से चर्चा
वर्तमान में मोस्ट हंटेड प्लेस (घोर भूतिया स्थान) में पर्यटकों की रुचि बढती जा रही है। चमत्कार एवं भूत प्रेतों से संबंधित कहानियाँ रोमांच पैदा करती हैं और पर्यटक रोमांचकारी स्थानों पर जाकर उस रोमांच को अनुभव करना चाहता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृति होने के कारण वह ऐसे स्थानों पर सत्यता की परख करने लिए पहुंचता है। वर्तमान में पर्यटकों के शौक में बदलाव दिखाई दे रहा है। पूर्व में लोग तीर्थ स्थानों का पर्यटन करते थे तथा वर्तमान में प्राकृतिक दृष्यों के साथ कौतुहल वाले स्थानों पर सैर करने जाते हैं। जैसे हम भी भानगढ़ की सच्चाई की खोज में 15 सौ किलो मीटर की दूरी तय करके पहुंच गए। मुझे भानगढ़ में कोई भी भूतिया आभास  नहीं हुआ। जैसे अन्य स्थानों को देखा वैसा ही यह भी लगा। भूतों की कहानी सिर्फ़ वातावरण में तैरती है। जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता।

अनंत से आता प्रकाश
आधुनिक युग में जहाँ तक बिजली पहुंच गई है वहाँ तक के सारे भूत प्रेत अंधेरे क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए हैं। भूत अंधेरे में ही लोगों को दिखाई देते हैं। क्योंकि लोगों की मानसिकता ही वैसी बन गई है। अंधेरा होते ही अज्ञात का भय उत्पन्न हो जाता है और उसे भूत प्रेत दिखाई देने के साथ विचित्र आवाजें भी सुनाई देने लगती हैं। यही स्थिति भानगढ़ की है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ झाड़ियों में जंगली जानवर विचरण करते हैं। किसी पर्यटक के साथ रात को कोई दुर्घटना न हो जाए इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यहाँ दिन ढलने के बाद प्रवेश पर पाबंदी लगा रखी है। सर्वे के 16 चौकीदार यहाँ कार्य करते हैं, किसी ने भी भूत प्रेतों को यहां पर नहीं देखा। इससे यही सत्यान्वेषण होता है कि व्यक्ति अपने भीरुपन को घर में छोड़ कर आए और उन्मुक्त होकर भानगढ़ के पुरावशेषों की सैर करे तो बहुत आनंद आएगा। ……… आगे पढ़ें

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

भानगढ़ का मंदिर शिल्प

भूतिया कुंए का पानी पीते रतन सिंह जी
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सोमेश्वर मंदिर से दांई तरफ़ चलने पर घनी झाड़ियाँ है तथा इधर कोई रिहायसी निर्माण कार्य नहीं है। यहाँ पर शेवड़ों की मढियाँ और समाधियाँ है तथा एक भवन के बाहर शिवलिंग स्थापित है और भवन के भीतर गणेश जी। कहते हैं कि यहीं पर शेवड़े (शव साधक तांत्रिक) तांत्रिक उपासना करते थे। जो चेला दर चेला चली आ अही है। धूणे के पास एक छोटा सा कुंआ है, जिस पर डिब्बा और रस्सी रखी हुई थी। गढ में काम करने वाले मजदूर इसी कुंए से पानी पीते हैं। हमें भी प्यास लग रही थी। भरत सिंह ने पानी निकाला तथा हमने बारी-बारी से अपनी प्यास बुझाई। कुंए का जल शीतल होने के साथ मीठा भी था। इस दौरान चौकीदार हमारे साथ ही चल रहा था। झाड़ियों के बीच से हम रास्ता बनाते हुए टीले पर चढे। यह मंगला देवी का मंदिर था। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है। बलुए पत्थर से निर्मित मंदिर की कलात्मकता देखते ही बनती है। 

मंगला माता मन्दिर
भानगढ़ के मंदिरों में मुझे कहीं पर भी मिथुन  मूर्तियाँ दिखाई नहीं दी। जिस तरह अन्य प्राचीन मंदिरों में दिख जाती है। किसी भी प्राचीन मंदिर बहुत सारी नहीं तो एक मिथुन मूर्ति मिलती ही है। अगर मानव मिथुन मूर्तियाँ नहीं प्राप्त होती तो उनकी जगह पशु मिथुनरत मूतियाँ उत्कीर्ण होती हैं। प्रतीत होता है कि पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में मिथुन मूर्तियों का निर्माण शिल्पकारों ने बंद कर दिया होगा। जबकि प्राचीन काल में मिथुन मूतियों के निर्माण के पीछे मान्यता थी कि मंदिरों में मिथुन प्रतिमाएं बनाने के कारण उस पर तड़िक प्रकोप नहीं होता तथा वे मिथुन मूर्तियों को मंदिर में उत्कीर्ण कर जनता के लिए एक कौतूक पैदा करना चाहते थे। मिथुन मूर्तियों के निर्माण के पीछे अन्य कारण भी बताए जाते हैं। यहाँ मिथुन मूर्तियों के न होने से लगता है कि मिथुन दृश्यों का कौतुक जन सामान्य की निगाह में समाप्त हो गया था।

केशवराय मंदिर के पार्श्व में मंगला माता मंदिर
मंगला देवी मंदिर के गर्भगृह की प्रतिमा गायब है। इसके वितान पर 16 वाद्यकों का चित्रण है। संगीत में प्रयोग में आने वाले तत्कालीन वाद्यों का चित्रण शिल्प की समृद्धता का परिचायक है। इसके द्वार पर भी प्रतिहारों का अंकन है. इस मंदिर से थोड़ी दूर पर केशव राय का मंदिर है, इस मंदिर के गर्भ गृह में भी प्रतिमा नहीं है। गर्भ गृह के द्वार पर दंडधारी प्रतिहारों का ही अंकन है. इस मंदिर में कोई विशेष शिल्पकारी नहीं है। कहते हैं कि इन मंदिरों की प्रतिमाएं तत्कालीन राजा जयपुर ले गए थे। यहाँ पर हमने कुछ देर विश्राम किया। चौकीदार ने चर्चा के दौरान बताया कि यहाँ आर्कियोलाजी के 16 चौकीदार 4-4 की पाली में काम करते हैं। किसी को भी कभी कोई भूत प्रेत नहीं दिखाई दिया और न ही कोई आवाजें सुनाई दी। उसका कहना है कि लोगों ने इस तरह की अफ़वाहें उड़ा रखी हैं। उसने बताया कि एक बार मंगला माता के मंदिर तरफ़ आते हुए उसे शेर मिल गया था। हाथ में लालटेन लिए दो चौकीदार साथ थे और मंगला माता के मंदिर तरफ़ जा रहे थे। अचानक झाड़ियों में से शेर निकल कर सामने आ गया। उनकी तो घिघ्गी बंध गई। थोड़ी देर बाद शेर चला गया। यहाँ भूत प्रेतों की बजाए जंगली जानवरों का अधिक डर है।

भानगढ के यात्री
इस किले में 5 द्वार हैं जिन्हें हनुमान द्वार, फ़ुलवारी द्वार, अजमेरी द्वार, दिल्ली द्वार तथा लुहारी द्वार के नाम से जाना जाता है। 5 शताब्दी पूर्व भानगढ़ के समीप से अजमेर और दिल्ली जाने वाला मार्ग रहा होगा। इसलिए इन द्वारों का दिल्ली और अजमेरी द्वार नामकरण किया गया होगा। लुहारी द्वार से संबंधित कथानक है कि इस द्वार के समीप लुहारों की बस्ती थी। इस स्थान पर आज भी लौह मल के बड़े बड़े ढेर पड़े हैं। राजा को आयुधों के निर्माण के लिए सिद्धस्थ लुहारों की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्हे अलग बस्ती बनाकर बसाया गया होगा। इन लुहारों के वशंज समीप के गांवों में रहते हैं। गढ की प्राचीर के ये द्वार दूर-दूर स्थित हैं। भानगढ का क्षेत्र काफ़ी बड़ा है, इसे एक दिन में देख पाना संभव नहीं। जंगली जानवरों की आमद के कारण यहाँ पर रात्रि में भ्रमण करने अनुज्ञा नहीं दी जाती तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रात्रि में किसी भी संरक्षित स्मारक में जाने की अनुमति नहीं देता। इसमें भानगढ़ की कोई विशेष बात नहीं है। 

चलते चलते यात्रा समापन  चित्र
भानगढ़ से भ्रमण कर हम अब वापस जयपुर की ओर चल पड़े। मुझे अलवर से खैरथल जाना था और अन्य साथियों को जयपुर। चौकीदार से चर्चा होने पर उसने बताया कि 5 बजे आश्रम एक्सप्रेस दौसा से खैरथल जाने के लिए मिल सकती है। अगर आप 5 बजे तक दौसा स्टेशन तक पहुंच गए तो खैरथल जाने के लिए यह बढिया साधन है। भानगढ से दौसा लगभग 22 किलो मीटर की दूरी पर है। प्रदीप जी ने जल्दी ही मुझे दौसा स्टेशन पहुंचा दिया। यहाँ से मैने खैरथल की टिकिट ली। क्योंकि अगले दिन मुझे अलवर का बाला किला देखना था। एक घंटे प्रतीक्षा करने के पश्चात आश्रम एक्सप्रेस प्लेट फ़ार्म पर लगी। अंधेरा हो चुका तथा थोड़ी ठंड भी बढ चुकी थी। यह समय राजस्थान में अच्छी ठंड का था और मैने छत्तीसगढ़ के वातावरण के हिसाब से एक पतली सी स्वेटर ले रखी थी। खैरथल पहुंचते तक सिकुड़ कर आधा रह गया था। ...... आगे पढ़ें .......... 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

भूतों का भानगढ़

मोडा सेठ की हवेली
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भानगढ़ के उजड़ने के पीछे कई कहानियाँ है, जिनमे सिंधु शेवड़े और भूतों की कहानी अधिक प्रसिद्ध हो गई। मैं भानगढ को भिन्न नजरिए से देख रहा था। लोग यहाँ भूतों की तलाश में आते हैं। वो भूत जिन्हें किसी ने देखा नहीं, सिर्फ़ किस्से बनकर रह जाते हैं। भानगढ़ को जितना अधिक नुकसान जिंदे भूतों ने पहुंचाया, उतना किस्से कहानियों में प्रचलित भूतों ने नहीं। भानगढ़ कोई अधिक पुराना कस्बा नहीं है, 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसे राजा भगवंत दास ने बसाया था। इसके बाद राजा मान सिंह के भाई माधो सिंह ( अकबर के दीवान)  ने अपनी रियासत की राजधानी बनाया। जब कोई राजा राजधानी बसाता था तो उस स्थान को सामरिक दृष्टि से सुदृढ़ मान कर ही निर्माण कार्य करवाता था। क्योंकि पड़ोसी राजाओं की कब साम्राज्यवादी नीति का शिकार हो जाए, कब राजधानी पर आक्रमण हो जाए इसका पता नहीं चलता था। क्योंकि ये युद्ध बैर, विद्वेश की दृष्टि से नहीं होते थे, साम्राज्य विस्तार की दृष्टि से किए जाते थे।

त्रिपोलिया द्वार
भानगढ़ खंडहर हो चुका है, लेकिन यहाँ के सभी मंदिर सुरक्षित हैं और अपनी गरिमा के साथ खड़े हैं। इससे प्रतीत होता है कि कभी मुसलमानों ने इस पर आक्रमण नहीं किया। अगर मुसलमान आक्रमण करते तो मंदिर को सबसे पहले हानि पहुंचाते। इसके उजड़ने का कारण हिंदु राजाओं की ही आपसी प्रतिद्वंदिता रही होगी। जिन्होने गढ पर आक्रमण कर उसे धराशायी किया होगा तथा दैवीय आपदा के भय से मंदिरों को नहीं छेड़ा होगा। दूसरी श्रेणी के सुरक्षा घेरे के मुख्य द्वार को त्रिपोलिया द्वार कहते हैं। इस द्वार से आगे बढने पर दांई तरफ़ बलुआ पत्थर से नागर शैली में ऊंचे अधिष्ठान पर निर्मित गोपीनाथ जी का मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर में गर्भ ग़ृह में कोई भी देव प्रतिमा नहीं है। गर्भ गृह के निर्माण को देख कर प्रतीत होता है कि यहाँ विष्णु के ही किसी अवतार का विग्रह रहा होगा।

गोपीनाथ जी का मंदिर
मंदिर शिल्प मनमोहक है। मंडप के वितान सुंदर पद्माकृति का अंकन के साथ १६ तरह के वाद्यों के साथ वाद्यकों का भी चित्रण किया गया है। द्वार पट पर विष्णु के दशावतारों का अंक है, तथा शीर्ष पर गणेश जी विराज मान हैं तथा नीचे की चौखट में कल्प वृक्ष का अंकन है। बाईं तरफ़ के झरोखे में उमामहेश्वर को स्थान दिया गया है, इस मूर्ति के आधार पर नागरी लेख है और दाईं तरफ़ के झरोखे में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के द्वार पर सुंदर वल्लरियों, लता पुष्पों का अंकन है तथा सिरदल पर हाथी, घोड़ों एवं ऊंटों को स्थान दिया गया है। विग्रह नहीं होने के कारण मंदिर में पूजा नहीं होती। इस मंदिर से आगे बढने पर भग्नावशेषों में एक छतरी दिखाई देती है। चारों तरफ़ की दीवालों में आले बने हुए हैं तथा छतरी के उपर स्थानक मुद्रा में महावीर की प्रतिमा दिखाई देती है। इससे प्रतीत होता है कि यह जैन मंदिर रहा होगा तथा महल के प्रांगण में स्थित होना इसे विशिष्ट बनाता है। जाहिर है कि राजा ने जैन व्यापारियों को अपने राज्य में विशिष्ट स्थान दे रखा होगा।

घरठ
जैन मंदिर से महल की ओर आगे बढने पर एक घरठ दिखाई देती है। कभी इसका उपयोग निर्माण कार्य में चूना मिलाने के लिए किया गया होगा। लेकिन यह अभी तक यथावत है। कई स्थानों पर इसे हटा दिया जाता है तथा घरठ का गोल पत्थर ही मिलता है। प्रतीत होता है कि नगर उजड़ने से पूर्व तक यहाँ निर्माण कार्य जारी था। यहाँ पर्यटकों ने पत्थर के छोटे-छोटे घरों के प्रतीक बना रखे है।मान्यता कि जिसका मकान नहीं होता वे ऐसी मनौती करते हैं जिससे खुद का मकान हो जाता है। महल में प्रवेश करने पर बारहदरी दिखाई देती है। जिनके समक्ष कमरे बने हुए हैं। किवंदन्ती है कि यह महल सात मंजिला था, महल के पीछे पहाड़ी स्थित है। निर्माण विधि के अनुसार यह महल सातमंजिला नहीं दिखाई देता। उस काल में राज प्रसादों में कई चौक हुआ करते थे, जिनसे गुजरने के बाद  ही रनिवास तक प्रवेश किया जाता था। हो सकता है कि इस महल के 7 खंड रहे हों। जिसके कारण इसे सतखंडा महल कहा जाने लगा हो।

राजमहल का प्रवेश एवं पार्स्व में राजमहल
महल के उपर की मंजिल में रनिवास था, रनिवास के चिन्ह अभी भी मिलते हैं। रनिवास में कमरों के साथ शौचालयों का निर्माण हुआ है। उपर की मंजिल पर जाने के बाद बाईं तरफ़ रत्नावती का मंदिर बताया जाता है। इस मंदिर में कोई विग्रह नहीं है। लेकिन धुंवे से दीवारे काली हो चुकी है। अवश्य ही कोई तांत्रिक प्रयोग यहाँ पर होता दिखाई देता है। सिंदुर और पूजा की सामग्री हमें यहां पर मिली। रनिवास में स्थित इस मंदिर में अवश्य ही राजपरिवार की कुल देवी का मंदिर रहा होगा। क्योंकि राजा अपनी कुलदेवी का स्थान निवास में ही रखते थे। राजस्थान एवं अन्य प्रदेशों में मुख्य निवास में देवी का "थान" बनाने की परम्परा दिखाई देती है। मूर्तियों के चोरों ने मंदिर के विग्रह को चुरा लिया होगा इसलिए कालांतर में जन सामान्य में रत्नावती के मंदिर का नाम प्रचलित हो गया होगा।

महल के भग्नावशेष एवं रत्नावती का मंदिर
महल के निचले तल में तहखाना है, जहाँ घोर गुप्प अंधकार रहता है। हमने इस तहखाने की भी पड़ताल की। तहखाने की पैड़ियों पर बहुत सारी कबूतरों की बीट पड़ी थी। अंधेरा इतना गहरा है कि दो पैड़ियों के बाद रास्ता दिखाई नहीं देता। इस स्थान के विषय में अफ़वाहें फ़ैलाई गई है कि यहाँ पर कैमरे का शटर काम नहीं करता। किन्ही कारणों से यहाँ मैग्नेटिक फ़िल्ड का निर्माण होने से वह कैमरे को प्रभावित करता है इसलिए उसका शटर काम नहीं करता और फ़ोटो नही लिए जा सकते। इसके कमरों में भूतों की आवाजें आने की कहानियाँ चटखारे लेकर सुनाई दी जाती हैं, परन्तु हमें तो कोई आवाज सुनाई नहीं थी तथा न ही भय का अहसास हुआ। अगर किसी स्थान पर नकारात्मक शक्ति होती है तो वह अवश्य ही मनुष्य की चेतना को प्रभावित करती है और अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाती है। यहाँ मुझे किसी भूत प्रेत के अस्तित्व का अहसास नहीं हुआ।

सोमेश्वर महादेव मंदिर
राजमहल से बाहर निकलने पर कुंए दिखाई देते हैं, जो कि अब कचरे से पाट दिए गए हैं। इसके बाईं तरफ़ सोमेश्वर महादेव का मंदिर है। कहते हैं कि इसे सोमनाथ नाई ने बनवाया था। इस विशाल मंदिर के समीप कुंड बना हुआ है जहाँ पानी पहाड़ से रिसकर आता है। अभी इस पानी में गंदगी हो गई है, कभी यह कुंड निर्मल खनिज जल से भरा रहता होगा। इस मंदिर का निर्माण भी बलुई पत्थर से हुआ है। मंदिर में शिवपरिवार विराजित है तथा नंदी के साथ गणेश की सवारी मूषक महाराज भी विराजित हैं। नंदी संगमरमर पत्थर से बना है और मूषक काले पत्थर से। मैने पहली बार नंदी के साथ मूषक की स्थापना कहीं पर देखी है। इससे पहले नंदी के साथ मूषक की स्थापना  मुझे कहीं देखने नहीं मिलती। इस मंदिर का द्वार भी अलंकृत है। गढ में यह मंदिर सतत पूजित है।

सोमेश्वर महादेव मंदिर का गर्भ गृह
पहले राजा और सेठ जैसे धनी मानी लोग ही मंदिर, प्याऊ, तालाब \इत्यादि का निर्माण करवाते थे। यहाँ पर किसी नाई द्वारा मंदिर बनवाना हैरत में डालता है। सबसे बड़ी बात यह हैं कि मंदिर राजमहल की परिधि के भीतर है। बिना राजा की सहमति के इस स्थान पर मंदिर नहीं बनाया जा सकता। किसी नाई द्वारा महल परिसर में मंदिर बनाने के निर्णय से राजा की ठकुराई को भी ठेस पहुंच सकती थी। लेकिन इस मंदिर के निर्माण की अनुमति देने से राजा की सहिष्णुता का परिचय मिलता है। राजा अपनी प्रजा के लिए निष्ठावान एवं दयालु था। तभी इस स्थान पर सोमेश्वर नाई द्वारा मंदिर बनाया जा सका। भानगढ के समीप स्थित अजबगढ में सोमेश्वर नाई द्वारा निर्मित "सोम सागर" का जिक्र भी सुनाई देता है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के खल्लारी (खल्वाटिका) में देवपाल नामक मोची ने विष्णु मंदिर बनवाया था। मोची द्वारा उस काल में मंदिर बनवाया जाना बड़ी घटना था। इससे शासकों की सामाजिक उदारता का पता चलता है। ..........  आगे पढ़ें ....