गुरुवार, 18 अगस्त 2016

रहस्यमय टायगर मोनेस्ट्री की ट्रेकिंग : पारो भूटान

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सुबह तैयार होकर हमने टायगर मोनेस्ट्री जाना तय किया। बस हमें वहां तक छोड़ आएगी फ़िर बाकी साथियों को पारो घुमाकर शाम को हमें वापस लेने आ जाएगी। इसे भूटान की रहस्यमय मोनेस्ट्री माना जाता है। यह भूटानी पर्यटकों  का प्रमुख आकर्षण है। यह मठ पारो से उत्तर दिशा में 12 किमी की दूरी पर है, पारो से यहाँ पहुंचने में आधा घंटा लगता है। इस स्थान को ताकसंग कहते हैं।  ताकसंग से टाइगर नेस्ट तक जाने के लिए ट्रेकिंग करनी पड़ती है। पहाड़ की चोटी पर स्थित यह मोनेस्ट्री 3120 मीटर (10240 फ़ुट) की ऊंचाई पर है। पहाड़ के किनारे पर बना हुआ यह मठ चारों तरफ़ घूमते बादलों से ढका रहता है। यहाँ तक पहुंचना ही रोमांचक अहसास कराता है।
बादलों से घिरी हुई दिखाई देती टायगर मोनेस्ट्री
विदेशी यात्री तो पारो हवाई अड्डे से सीधे यहाँ पहुंच कर ट्रेकिंग आरंभ कर देते हैं और मोनेस्ट्री की यात्रा करके लौट जाते हैं, उनके लिए भूटान में मुख्य आकर्षण यह मोनेस्ट्री ही है। जो भूटान यात्रा पर गया और उसने यह मोनेस्ट्री नहीं देखी, तो उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, जो प्राकृतिक सौंदर्य नहीं देख पाया। मोनेस्ट्री के लिए चढाई ताकसंग से प्रारंभ होती है, पहाड़ की तराई में यह स्थान है, यहाँ पोनी भी मिलते हैं जो आधी चढाई ( कैफ़ेटेरिया ) तक पहुंचाते हैं, फ़िर आपको अपने दम पर ही आगे बढना पड़ता है।

टायगर मोनेस्ट्री
अब जरा टाईगर मोनेस्ट्री का इतिहास जानते हैं, इस स्थान की खोज आठवीं सदी में भारतीय गुरु पद्म संभव ने की थी, वे तिब्बत से लाए गए थे। किंवदन्ति है कि सम्राट पूर्व पत्नी येशे सोग्याल स्वेच्छा से गुरु रिम्पोचे (पद्म संभव को कई नामों से जाना जाता है) की शिष्य बन गई और खुद को बाघिन के रुप में बदल लिया और गुरु रिम्पोचे को अपनी पीठ पर सवार कर इस स्थान पर लेकर आई। कहते हैं कि यह बाघिन दुर्गम गुफ़ा तक उड़ कर पहुंची और गुरु रिम्पोचे को यहाँ तक पहुंचाया।
कैफ़ेटेरिया से टायगर मोनेस्ट्री
यहाँ आठ गुफ़ाएं है, जो भिन्न भिन्न गुरुओं के नाम से जानी जाती है। आठवीं सदी में यहाँ आकर गुरु पद्मसंभव (रिम्पोचे) ने तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन और तीन घंटे के लिए प्रचंड ध्यान साधना की।  भूटान में बौद्ध धर्म प्रारंभ करने का श्रेय इन्ही पद्म संभव को दिया जाता है। यहाँ की मोनेस्ट्री में बुद्ध के साथ इनकी प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती है। इन्हें द्वितीय बुद्ध कहा जाता है। बुद्ध की प्रतिमा एवं इनकी प्रतिमा में सिर्फ़ मूंछो का ही अंतर है, इनके मुख पर पतली मूंछे बनाई जाती है और इन्हें भूटान का संरक्षक देवता माना जाता है।

टायगर मोनेस्ट्री की ट्रेकिंग पर अंकित मिश्रा
गुरु पद्मसंभव ने घाटी में आकर इसे बुरी ताकतो से निजात दिलाई और पवित्र किया। इनके सम्मान में त्यौहार आयोजित किया जाता है, यह त्यौहार पारो घाटी में मार्च या अप्रैल के दौरान मनाया जाता है। वर्तमान में दिखाई देने वाले मठ का निर्माण तेनजिन राब्ग्ये ने 1692 में कराया। तेनजिन राब्ग्ये के रुप में गुरु पद्म संभव का पुनर्जन्म माना जाता है, उन्हें भी उतनी ही मान्यता और सम्मान मिला। कहा जाता है कि तेनजिन के पास ऐसी शक्ति थी कि वे थोड़े से भी भोजन से हजारों भक्तों को संतुष्ट कर देते थे। चाहे कितने ही भक्त आ जाएं, वे अपनी छोटी सी थाली से सबको भोजन बांटते और भोजन खत्म नहीं होता था और उनके प्रभाव से फ़िसलन भरी इस घाटी में कभी कोई फ़िसलकर नहीं गिरा।
अपन पोनी पर
बस वाला हमें ताकसग तक छोड़ कर चला गया। चढाई के प्रारंभ में भूटानी महिलाएं दुकान लगा रखी हैं, यहां पहाड़ की चढाई के लिए सहयोगी सामान मिलता है, जैसे पानी एवं स्टिक (नुकीली लाठी)। हमने स्टिक 50 रुपए में खरीदी। यहाँ हर चीज मंहगी है, जो सामान भारत में 10 रुपए का मिल जाता है, उसकी कीमत यहाँ 100 रुपए मान कर चलिए। कोई भी दुकानदार इससे कम में सामान देने को तैयार नहीं होता। यहाँ सामान के भाव सौ से शुरु होते हैं।
टायगर मोनेस्ट्री
हमने नौ बजे ट्रेकिंग प्रारंभ कर दी। हमारे साथ इस ट्रेकिंग में रायपुर से बिकास शर्मा, अंकित मिश्रा, नवीन तिवारी, ललित वर्मा एवं टीकाराम वर्मा जी थे। बजरंग बली का स्मरण करके चढाई प्रारंभ कर दी गई। अन्य यात्रियों के दल भी साथ चल रहे थे, जो फ़्रांस, अमेरिका, जापान, इंडोनेशिया, भारत, फ़िलिपिंस से आए हुए थे। उनके साथ गाईड और पोनी भी थे। रास्ते में प्राकृतिक पेयजल की व्यस्था भी है, जहां आप पहाड़ से आ रहे मिनरल वाटर (शुद्ध खनिज जल) का सेवन कर सकते हैं।

बाईकर हरकिशन लाल मेहता के संग
एक किमी चलने के बाद चढाई प्रारंभ हो गई। चढाई में मेरा दम फ़ूलने लगा तो बिकास एक घोड़े वाले को पांच सौ रुपए में तय करके ले आया। ये आगे बढ गए और मैं घोड़े पर सवार होकर चल पड़ा। घोड़े वाले ने कैफ़ेटेरिया तक पहुंचा दिया और कहा कि घोड़ा यहीं तक जाता है, इसके आगे आपको पैदल ही जाना होगा। मुझे लग रहा था कि इस ऊंचाई तक स्वास्थ्य साथ नहीं देने वाला तो बिकास और अंकित को आगे भेज कर मैं कैफ़ेटेरिया में ही रुक गया। मोनेस्ट्री तक पहुंचने के लिए पतली सी पगडंडी है, जिस पर संभल कर चलना होता है, अगर पैर फ़िसला तो हजारों फ़ूट गहरी खाई में राम नाम सत्य समझो। चीड़ के सघन वन से रास्ता गुजरता है।

रास्ते में भारत से आए हुए कई दल मिले। एक दल में कुछ कॉलेज के लड़के लड़कियां थे। वे आगे चलने पर अपने दल की एक लड़की को छोड़ कर आगे चले गए, वो लड़की चलने के लिए संघर्ष कर रही थी। पर आगे नहीं बढ़ पा रही थी। आगे पहुंचे पर उनका दल मिला। पूछने पर वो बोले कि वह अपने आप आ जाएगी। चिंता करने की  जरुरत नहीं है। मैं कैफ़ेटेरिया में ही बैठा रहा, बिकाश और अंकित मोनेस्ट्री की ओर चले गए। इनका मुझे तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ा। यह कैफ़ेटेरिया बहुत मंहगा है। एक चाय के एक सौ तीस रुपए लगते हैं, भोजन के साढे पांच सौ। 

फ़्रांसिसी फ़्रेंड के साथ लौटते हुए
मैं कैफ़ेटेरिया में बैठ कर फ़ोटो खींचने लगा। यहाँ विदेशों से कई दल आये हुए थे। वो भी यहां बैठकर मोनेस्ट्री की फ़ोटों खींच रहे थे। इनके साथ भूटानी गाईड भी थी। थोड़ी देर बाद एक उड़िया स्त्री पहुंची, उसने सिर पर भीगा हुआ रुमाल डाल रखा था। चेहरे से लग रहा था कि पीड़ा में हैं। पूछने पर पता चला कि पोनी से गिरने के कारण चोट लग गई। गनीमत रही कि खाई में नहीं गिरी। इसके साथ बेटी और पति भी थे, वो इसे छोड़ कर मोनेस्ट्री चले गए। इसके बाद बंगाली दादा के साथ एक व्यक्ति आए, उन्होने परिचय कराया। ये बाईकर हरकिशन लाल मेहता थे, इन्होने बाईक से विश्व भ्रमण किया है। इनके नाम तीन बार गिनिज वर्ड रिकार्ड भी है। अच्छा लगा इनसे मिलकर, आधा घंटा साथ रहे और बातचीत भी हुई। 
टायगर मोनेस्ट्री के रास्ते में मार्केट
एक कोल्ड ड्रिंक भी पी। तब तक  हमारा यात्री दल भी आ गया। यहीं एक फ़्रांस की महिला से भी परिचय हुआ, हम साथ साथ, धीरे धीरे नीचे की ओर चल पड़े। लाने के लिए घोड़ा था परन्तु लौटना तो पैदल ही था। नीचे पहुंचने पर बिकाश बाबू ने दुकानों से कुछ सामान खरीदा, मैने भी एक हंटिंग नाईफ़ लिया। जंगल यात्रा के समय जरुरत पड़ती है। उसके बाद हमारी बस आ गई और हम अपने रिसोर्ट में पहुंच गए। जारी है...  आगे  पढ़ें 

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह शानदार नज़ारे ललित जी 👌👌

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  2. जै हो, मौका मिला तो टाइगर मॉनेस्‍ट्री जाने का प्रयास रहेगा...

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  3. बहुत अच्छा है पर ऐसा लगता है कि थोड़ा लेख बडा होना चाहिए पढ़ने में छोटा लगता है जल्दी समाप्त हो जाता है ।

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "साक्षी ने दिया रक्षाबंधन का उपहार “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. थोड़ी सी ही सही लेकिन ट्रैकिंग तो पढ़ने को मिली। :)

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