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मंगलवार, 28 जून 2011

सास-बहु गैस-चुल्हा विमर्श -- ललित शर्मा

गैस सिलेंडर के मुल्य में वृद्धि की खबर सुनकर सभी तरफ़ हाय-तौबा मच गया। अरे 2-4 रुपए बढाने की बात हो तो चल भी जाए, परन्तु यहां 50 रुपए बढा दिए गए। मोहल्ले की औरतों में भी गंभीर चर्चा चल पड़ी।  वे सरकार को लानत-मलानत भेजने लगी।चुन्नु की मम्मी कह रही थी कि-"इससे अच्छी तो बाजपेयी की सरकार थी, जब चाहो तब सिलेंडर मिल जाता था और उसने दाम भी नहीं बढाए। इस सरकार के आते ही मुए मंत्रियों की नजर सबसे पहले गैसे सिलेंडर पर ही पड़ी।" रुप्पु की मम्मी बोली-"हाँ! इनको मुफ़्त की गैस मिल जाती है जलाने के लिए, क्या पता चले इन्हें घर-गृहस्थी चलाना कितना मुस्किल है, इस मंहगाई के जमाने में। मंहगाई दिनों-दिन बढते जा रही है। लोग त्रस्त हो गए हैं इस मुई सरकार से। हमने तो ये सोच कर वोट नहीं दिया था कि हमारा ही गला कटेगा?"

"हम औरतों को सुनता ही कौन है? जब मनमोहन सिंह ने सरकार संभाली थी तो इनकी पत्नी ने टीवी पे कहा  कि वे गैस सिलेंडर का रेट कम करने के लिए कहेगीं उनसे। इसका फ़ल यह मिला की रेट कम करने के बजाय बढा दिया। एक तरफ़ तो आधी आबादी को बराबरी का दर्जा देने के की बात कहते हैं दुसरी तरफ़ बीबी की ही नहीं सुनते, क्या खाक आधी आबादी की सुनेगें।"-चुन्नु की मम्मी बोली। तभी कामवाली सहोदरा बीच में कूद पड़ी-"बहुत मंहगाई हो गयी है बीबी जी, अब मेरे से 500 सौ रुपए में झाड़ू पोंछा नहीं होता, 200 बढाओ तो ही बात बने। गैस सिलेंडर तो मुझे भी लाना पड़ता है, रेट तो सभी के लिए बढा है।" सहोदरा के अल्टीमेटम ने रुप्पु की मम्मी के पेशानी पर बल ला दिए। एक बार दिल्ली से किसी चीज का रेट बढता है तो यहाँ दूधवाला, कामवाली, धोबी, दुकानदार, सब्जीवाले, मोह्ल्ले का गोरखा सभी अपनी मजदूरी बढा देते हैं और रुप्पु के पापा की तनख्वाह तो नहीं बढती। गुस्से में बोली -" लगता है अब तो चूल्हा ही जलाना पड़ेगा।"

इनकी बातें परछी में खाट पर बैठे-बैठे प्रभाती दादी सुन रही थी, बोली -" बहु तु जुग-जुग जीए, पहली बार दिमाग से मेरे मन की बात की है तुने। अरे मैं बरसों से झीख रही हूँ कि मुझे गैस की रोटी नहीं चाहिए, खाने से पेट में अफ़ारा हो जाता है, गैस बन जाती है। रात भर नींद नहीं आती। चुल्हे की रोटी बनाए तो कुछ बात बने। भला मनमोहन सिंह का, हम बुढों का ख्याल तो किया, गैस सिलेंडर का रेट बढा कर। मैं तो कहती हूँ कि 1000 रुपए करदे, हमें चुल्हे की रोटी तो खाने मिलेगी। फ़िर दिन भर खतरा लगा रहता है कि कब सिलेंडर फ़ूट जाए और घर तबाह हो जाए। देखा नहीं क्या तुने,पप्पी की शादी में किस तरह सिलेंडर में आग लग गयी थी, पूरे मोहल्ले में हड़कम्प मच गया था। मुझे तो लगा कि मर गयी तो उपर जाउंगी, बच गयी तो जेल जाना होगा। अच्छा हो इस मुए सिलेंडर से पीछा छूट जाए।"

इतना सुनते ही रुप्पु की मम्मी बिदक गई-" आपको तो बस इंतजार रहता है जली कटी सुनाने का। इधर सिलेंडर का रेट बढ गया है और आपको खुशी हो रही है। मैं नहीं जलाने वाली चूल्हा, चाहे कुछ भी हो जाए, कह देना अपने बेटे से। सिलेंडर का रेट भी बढ गया और हमें ही बद्दुआ दे रही हो कि रेट 1000 हो जाए। चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियाँ कहाँ से आएगीं? कौन चूल्हे में अपना मुंह फ़ूंकेगा? वो जमाना निकल गया, जब देखो तक खिचड़ी में अपनी ही चम्मच घुमाते रहती हो। हमेशा रायता फ़ैलाने को तैयार रहती हो।

प्रभाती ताई को रुप्पु की मम्मी की बातें तीर सी लगी-"मैं तो मनमोहन सिंह को ही आशीर्वाद दूंगी, उसने तुम्हारे जैसी बहुओं को सीधा करने का सही इंतजाम किया है जो दिन भर खाट तोड़ते रहती है, तुम्हारी उमर में तो सबके उठने के पहले 5 किलो अनाज पीस लेती थी। फ़िर गाय भैंस का काम अलग से। तुम लोग करती क्या हो, अगर हाथ से कुछ करना पड़ जाए तो जान पे बन आती है, कभी ब्लेड प्रेसर बढता है और कभी कुछ, देखो मुझे 80 बरस की हो गयी, कोई अलेड बलेड नही है। मैं तो कहती हूँ कि सिलेंडर का रेट इतना हो जाए कि लोग खरीद ही नहीं सकें। हमारे जैसे बुढों को चूल्हे के खाने का तो सुख मिलेगा।

रामकली दादी ने भी सुर में सुर मिलाया-" जब से गैस घर में घुसी है तब से हमेशा पेट में अफ़ारा बना रहता है, गैस हो जाती है, बहु चुल्हे पे रोटी सेक दे कहती हूँ तो सुनती ही नहीं है। ठंड के दिनों में हम बूढों की मुसीबत बढ जाती है, पहले चूल्हे से घर गरम रहता था, अलाव, पूर, गोरसी जला लेते थे, सेकाई भी हो जाती थी, नींद भी आ जाती थी। यही एक सहारा था बुढों का वह भी गैस ने खतम कर दिया। जिसको भी देखो वही सुगर ब्लेड का मरीज हो गया है। दिन भर गोलियां खाते रहते हैं। मैने तो कभी जिन्दगी भर में सुई नहीं लगवाई। चूल्हे के खाने के स्वाद का मुकाबला गैस क्या करेगी? हमारी तरफ़ से तो अच्छा हुआ जो गैस का रेट बढ गया। भला हो सरकार का। चुन्नु और रुप्पु की मम्मियों ने देखा कि मामला बढ रहा है, गुजरे जमाने के रेड़ियो बंद नहीं होने वाले, दोनो अपने-अपने घर की ओर खिसक गयी-"गैस का रेट बढा कर मनमोहन सिंह ने सही नहीं किया, हमारा वोट तो अब भूल जाए, उसे मिलने से रहा..........। गैस का रेट क्या बढा, अब घर चुल्हा और गैस वाली दो पार्टियों में बंट चुका था