शनिवार, 3 मार्च 2012

महुआ संग महका मधुमास -- ललित शर्मा

वैदिक काल में चैत मास को मधुमास कहा जाता है, वैदिक वांग्मय में मधुमास की चर्चा है। ऋग्वेद के ऋषि मधुरस से सराबोर हैं, ‘हवाएं मधुमती हैं, जलों में मधु है, धरती-आकाश मधु से भरे हुए हैं, सब तरफ मधुरस है, मधुप्रीति है।’ मधुमास में पूरी प्रकृति मधु छंदस् है। भारतीय इतिहास के महानायक श्रीराम के जन्म की मंगल मुहुर्त भी यही मधुमास है। तुलसीदास ने लिखा, ‘नवमी तिथि मधुमास पुनीता/शुकुल पक्ष अभिजित हर प्रीता।’ चैत्र का आगमन मंगल भवन है। राम जन्म की बेला, नवरात्र की शक्ति उपासना। लहलहाती फसल, महकते वन उपवन। चैत्र माह ही राम के राज्याभिषेक के लिए भी चुना गया था। राजा दशरथ ने वशिष्ठ और वामदेव से कहा था, ‘चैत्रं श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पित काननः/यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोप कल्पयताम्।चैत्र का मास श्रीमान है, वन उपवन पुष्पित हैं, राम के राज्याभिषेक की तैयारी हो’
यही अवसर महुआ के फ़ूलने और फ़लने का होता है, महुआ फ़ूलने पर ॠतुराज बसंत के स्वागत में प्रकृति सज-संवर जाती है, वातावरण में फूलों की गमक छा जाती है, संध्या वेला में फूलों की सुगंध से  वातावरण  सुवासित हो उठता है, प्रकृति अपने अनुपम उपहारों के साथ ॠतुराज का स्वागत करती है।आम्र वृक्षों पर बौर आने लगते हैं, तथा महुआ के वृक्षों से फूल झरने लगते हैं। ग्रामीण अंचल में यह समय महुआ बीनने का होता है। महुआ के रसीले फूल सुबह होते ही वृक्ष की नीचे बिछ जाते हैं। पीले-पीले सुनहरे फूल भारत के आदिवासी अंचल की जीवन रेखा हैं। आदिवासियों का मुख्य पेय एवं खाद्य माना जाता है। महुआ के फूलों की खुशबू मतवाली होती है। सोंधी-सोंधी खुशबू मदमस्त कर जाती है।
यह उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में बड़े पैमाने में होता है। इसका वैज्ञानिक नाम मधुका लोंगफोलिआ है। हिन्दी में महुआ, संस्कृत में मधूक, मराठी में माहोचा, गुजराती में महुंडो, बंगाली में मोल, अंग्रेजी में इलुपा ट्री, तमिल में मधुर्क, कन्नड़ में इप्पेमारा नाम से जाना जाता है। यह तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष है जो लगभग 20 मीटर की ऊँचाई तक बढ़ सकता है। इसके पत्ते आमतौर पर वर्ष भर हरे रहते हैं। इसे औषधीय प्रयोग में लाया जाता है। प्राचीन काल में शल्य क्रिया के वक्त रोगी को महुआ रस का पान कराया जाता था। टूटी-फूटी हड्डियाँ जोड़ने के वक्त दर्द कम करने के काम भी आता था। आज भी ग्रामीण अंचल में इसका उपयोग होता है। जचकी में जच्चा को प्रजनन के वक्त दर्द कम करने के लिए महुआ का अर्क पिलाया जाता है।
एक तरह से हम कहें तो महुआ आदिवासी जनजातियों का कल्प वृक्ष है। मार्च-अप्रेल के माह में महुआ के फूल झरते हैं। ग्रामीण महिलाएं टोकनी लेकर भोर में ही महुआ बीनने चली जाती हैं। दोपहर होते तक 5 से 10 किलो महुआ बीन लिया जाता है। महुआ से बनाया हुआ सर्वकालिक, सर्वप्रिय पेय मदिरा ही है, हर आदिवासी गाँव में महुआ की मदिरा मिल जाती है। इसका स्वाद थोड़ा कसैला होता है पर खुशबू सोंधी होती है। चुआई हुई पहली धार की एक कप दारू पसीना लाने के लिए काफ़ी होती है। इसकी डिग्री पानी से नापी जाती है मसलन एक पानी, दो पानी कहकर। महुआ की रोटी भी बनाई जाती है, रोटी स्वादिष्‍ट बनती है पर रोज नहीं खाई जा सकती। एक जगह मैंने महुआ के लड्डू भी खाए थे, बड़े स्वादिष्ट थे।
कालिदास ने कुमारसंभव के विवाह प्रकरण में पार्वती का श्रृंगार महुआ फूल से करने का उल्लेख है। 18 वीं शताब्दी में टीकमगढ के राजा ने एक रुक्का जारी करवाया था, जिसमें किसी भी व्यक्ति द्वारा महुआ वृक्ष काटने को घोर अपराध की श्रेणी में रखा गया तथा प्राण दंड तक की सजा तय की थी। छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाले शिलालेखों में भी मधुपदर, मधुक वृक्ष का जिक्र आया है (बकौल श्री जी एल रायकवार)। महुआ के वृक्ष को सम्मानीय माना गया है लेकिन इसमें देवताओं का वास नहीं माना जाता इसलिए इसे वन वृक्ष मानकर शास्त्रों में पूजा पाठ से पृथक कर दिया गया है। पूजा, ग्राम्य वृक्षों की होती है जैसे पीपल, बरगद, नीम इत्यादि। आंवला भी वन वृक्ष है लेकिन अब इसे ग्राम वृक्ष का दर्जा मिल गया और इसकी भी पूजा होने लगी। महुए की ताजी कटी लकड़ी भी जलाई जा सकती है।
महुए की मादक गंध से भालू को नशा हो जाता है, वह इसके फूल खाकर झूमने लगता है। जंगली जानवर भी गर्मी के दिनों में महुआ के फूल खा कर क्षुधा शांत करते हैं। कई बार महुआ बीनने वालों की भिडंत भालू से हो जाती है। महुआ संग्रहण से ग्रामीणों को नगद राशि मिलती है, यह आदिवासी अंचल के निवासियों की अर्थव्यवस्था का मुख्य घटक है। मधूक वन का जिक्र बंगाल के पाल वंश एवं सेन वंश के अभिलेखों में आता है, अर्थात मधूक व्रृक्ष की महिमा प्राचीन काल में भी रही है। वर्तमान में महुआ से सरकार को अरबों रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। अदिवासी परम्परा में जन्म से लेकर मरण तक महुआ का उपयोग किया जाता है। जन्मोत्सव से मृत्योत्सव तक अतिथियों को महुआ रस पान कराया जाता है। अतिथि सत्कार में महुआ की प्रधानता रहती है।  महुआ कि मदिरा पितरों एवं आदिवासी देवताओं को भी अर्पित करने की परम्परा है, इसके लिए महुआ पान से पूर्व धरती पर छींटे मार कर पितरों को अर्पित किया जाता है। यह परम्परा कब से आ रही है मेरे लिए अज्ञात है।
महुआ के फूलों का स्वाद मीठा होता है, फल कड़ुए होते हैं पर पकने पर मीठे हो जाते हैं, इसके फूल में शहद के समान गंध आती है, रसगुल्ले की तरह रस भरा होता है। अधिक मात्रा में महुआ के फूलों का सेवन स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता, इससे सरदर्द भी हो सकता है, महुआ की तासीर ठंडी समझी जाती है पर यूनानी लोग इसकी तासीर को गर्म समझते हैं। कहते हैं कि महुआ जनित दोष धनिया के सेवन से दूर होते हैं। औषधीय गुणों से भरपूर है। महुआ, वात, पित्त और कफ़ को शांत करता है, वीर्य धातु को बढ़ाता है और पुष्ट करता है।पेट के वायु जनित विकारों को दूर कर फोड़ों, घावों एवं थकावट को दूर करता है। खून की खराबी, प्यास, स्वांस के रोग, टीबी, कमजोरी, नामर्दी (नपुंसकता) खांसी, बवासीर, अनियमित मासिक धर्म, अपच एवं उदर शूल, गैस के विकार, स्तनों में दुग्ध स्राव एवं निम्न रक्तचाप की बीमारियों को दूर करता है।
वैज्ञानिक मतानुसार इसके फूलों में आवर्त शर्करा 52.6%, इक्षुशर्करा 2.2%, सेल्युलोज 2.4%, अल्व्युमिनाईड 2.2%, शेष पानी एवं राख होती है। इसमें अल्प मात्रा में कैल्शियम, लौह, पोटास, एन्जाईम्स, अम्ल भी पाए जाते हैं। इसकी गिरियों से में तेल का प्रतिशत 50-55 तक होता है। इसके तेल का उपयोग साबुन बनाने में किया जाता है। घी की तरह जम जाने वाला महुआ (या डोरी का कहलाने वाला) तेल दर्द निवारक होता है और खाद्य तेल की तरह भी इस्‍तेमाल होता है। मुझे महुआ के फूलों की गमकती सुगंध बहुत भाती है। मदमस्त करने वाली सुगंध महुआ की मदिरा सेवन करने के बजाए अधिक भाती है। मौसम आने पर महुआ के फूलों की माला बनाकर उसकी सुगंध का दिन भर आनंद लिया जा सकता है, फ़िर अगले दिन प्रात:काल नए फूल प्राप्त हो जाते हैं। 
ग्रामीण अंचलों में संग्रहित महुआ वर्ष भर प्राप्त होता है, जिस तरह लोग अनाज का संग्रहण करके रखते हैं, उसी तरह महुए को भी संग्रहित करके रखा जाता है तथा वर्ष भर उपयोग एवं उपभोग में लाया जाता है। महुआ की मदिरा रेड वाईन जैसे ही होती है। रेड वाईन में पानी सोडा नहीं मिलाया जाता उसी तरह महुआ में भी पानी सोडा नहीं मिलाया जाता। बसंत के मौसम में महुआ का मद और भी बढ़ जाता है। ऐसे ही महुआ को भारत के आदिवसियों का कल्प वृक्ष नहीं कहा जाता । यह  आदिवासी  संस्कृति का मुख्य अंग भी है। इसके बिना आदिवासी संस्कृति की कल्पना ही नहीं की जा सकती। आइए इस मधुर मधुमास के अवसर पर मधूकरस का आनंद मधुक पुष्पों के संग लिया जाए।

31 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत संयम बरता है आपने इस महुआ-चर्चा में.

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  2. बिलकुल सही कहा है आपने, महुआ आदिवासी जनजातियों का कल्प वृक्ष है, आदिवासी परम्परा में इसका बहुत महत्त्व है... जानकारी से भरा आलेख...

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  3. आदिवासी संस्कृति का प्रमुख अंग है महुआ !
    रोचक जानकारी !

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  4. जनजीवन करीब सा लगता है महुआ ..... जानकरी बड़ी अच्छी दी आपने इस वृक्ष के विषय में ....

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  5. महुआ के फूल वाकई बड़े ही खूबसूरत हैं।महुआ के विषय में यहाँ बहुत अच्छी ही और नयी जानकारी भी मिली। आभार.

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  6. कब पिला रहे हो महुआ का रस?

    महुआ का नाम ही सुना था
    इस विस्तृत जानकारी के लिये धन्यवाद

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  7. सार्थक एवं सारगर्भित लेख...
    हार्दिक बधाई..

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  8. @अन्तर सोहिल - बस थोड़ा सा टैम और लगेगा। यहां से सांपला तक पाईप लाईन बिछवा रहा हूँ। टोंटी खोलते ही मिल जाएगी :)

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  9. अद्भुत जानकारीपूर्ण लेख है भाईसाहब ...आभार आपका !!

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  10. महुआ पर एक सारगर्भित आलेख. महुआ बीनते भालुओं से मुठभेड़ की बड़ी रोचक कहानियां भी प्रचलित हैं.

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  11. महुवा शब्द में ही नशा सा आने लगता है...

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  12. चैत्र मास हमारे देश में बहुत ही शुभ माना गया हैं ..हलकी -हलकी ठंडक और बहती पुरवाई ..यह ऋतू हमेशा से कवियों और प्रेमियों के लिए सौगात लेकर आई हैं ..मन मयूर सा चंचल हो थिरकने लगता हैं ...महुआ की खुशबु से जंगल में भी मंगल हो जाता हैं और टेसू के फूल से सारी धरा श्रृंगार करती प्रतीत होती हैं ......इसीलिए इसे मधुमास कहा गया हैं.....

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  13. यही अवसर महुआ के फ़ूलने और फ़लने का होता है, महुआ फ़ूलने पर ॠतुराज बसंत के स्वागत में प्रकृति सज-संवर जाती है, वातावरण में फूलों की गमक छा जाती है, संध्या वेला में फूलों की सुगंध से वातावरण सुवासित हो उठता है, प्रकृति अपने अनुपम उपहारों के साथ ॠतुराज का स्वागत करती है।आम्र वृक्षों पर बौर आने लगते हैं, तथा महुआ के वृक्षों से फूल झरने लगते हैं। mahuwa aur aadiwasi sanskriti ka khubsurat chitran ewm jankari ke liye badhai..

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  14. saari vanaspatiyaan adbhut chamatkaari hain...bas jaroorat hai upyog karne ke tareeke ki.....madhumaas me "mahua" kaa parichay praapt hua ...sundar rachnaa
    kyaa karen mahua se moh nahi rakh paaye

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  15. BEAUTIFUL AND NICE POST WITH DEEP
    KNOWLEDGEFUL INCLUDING MEDICINAL
    THOUGHT. WELL DESIGNED SUPERB POST.
    THANKS.

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  16. महंआ आदिवासियों का कल्पवृक्ष है।
    बिल्कुल सही विचार हें आपके।

    रोचक और ज्ञानवर्धक लेख।
    लेख का लालित्य स्पष्ट है।

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  17. भई वह ! पढ़कर ही नशा सा होने लगा है । :)

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  18. वाहssss महुआ माहौल में मदमस्‍त हो गए, दिनो बाद बड़े गुरूजी के लायक पोस्‍ट लिखे, भैया मजा आ गया। सच कहा आपने कि महंआ आदिवासियों का कल्पवृक्ष है। केन्‍द्र में बैठे तथाकथित समाज सेवी ठेकेदारों द्वारा ए.सी.रूम में बैठकर ये कहा जाता है कि आदि‍वासी समाज का पिछड़ेपन का मुख्‍य कारण शराब है, फिर अरबो खरबो के वारे न्‍यारे करते हैं समाज सेवा के नाम पर। मेरा निजी विचार है कि आदिवासी और पेड़ो का रस फल फूल कंन्‍द एक दुसरे के सम्‍पूरक है।

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  19. महुआ आदिवासियों की जीवान शैली में रचा बसा है। बहुत रोचक जानकारियों से युक्त पोस्ट।

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  20. महुआ आदिवासियों की जीवान शैली में रचा बसा है। बहुत रोचक जानकारियों से युक्त पोस्ट।

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  21. mahua ke phalon ko gaon me sadak kinare bikate dekha hai.iski khushaboo bahut madhur lagti hai ..rochak jankari abhar.

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  22. आदिवासी संस्कृति के बारे में अच्छी जानकारी ... महुआ के बारे मेँ कुछ जानकारी घाटशिला प्रवास के दौरान हुई थी ...

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  23. अच्छी और ज्ञानवर्धक पोस्ट लगी .

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  24. महुआ शब्द ही अपने आप में नशा है .. शायद इसके नाम से ही इसकी महक ध्वनित हो उठती है इसलिए .
    .महुआ की महक एक बार मिल जाए तो इसे जीवन से हटाना मुश्किल है बहुत सुन्दर लिखा आपने . !

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