गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

चलती का नाम गाड़ी : भूटान

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चपन में भूटानी परियों की कहानियाँ पढते थे और इसे अब डेग्रन का देश कहा जाता है। इसे देखने की उत्सुकता तो अरसे से थी परन्तु चढे हुए दिमागी पारे ने रोमांच और उत्साह का बंटाढार कर दिया। कोच में पहुंच कर देखा तो ये तीन विराजमान थे। किसी के आने न आने का इन्हें कोई फ़िक्र ही नहीं था। मैने अरविंद से कहा कि अगर ये फ़ोन नहीं रही तो तुम तो जवाब दे सकते थे। तीन घंटे की प्रताड़ना से बना हुआ नजला गिरने लगा। मन हल्का होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ज्यों ज्यों बात निकलते जा रही थी त्यों त्यों तापमान बढ़ते ही जा रहा था। 

मैने भी ठान लिया कि अब सफ़र के दौरान से इनसे बात ही नहीं करनी है और जैसे अन्य अजनबी हैं वैसे ही व्यवहार इनके साथ भी किया जाए। रही बात वापसी की टिकिट की तो वह मैं तत्काल में भी बनवा लुंगा। अब इनके साथ जाना भी नहीं है सोच कर अपनी बर्थ पर सो गया। इन्होने कोई मेरी टिकिट मुफ़्त में तो कराई नहीं है। फ़िर इतना तमाशा करने की क्या जरुरत थी। बरसों का एक संबंध फ़ालतू की रार की भेंट चढ़ता जा रहा था। 

सुबह आँख खुली तो किसनगंज दिखाई दिया। बिहार का यह वही किसनगंज है जो बंगलादेशी घूसपैठियों का स्वर्ग कहा जाता है। कौन बंगला देशी और कौन देशी, इसका यहाँ पता ही नहीं चलता। वातावरण में ठंडक थी। एक चाय पीने के बाद हिन्दी का अखबार खरीदा। बाहर कोहरा घना छाया हुआ था। इस हिसाब से लग रहा था कि हमारी ट्रेन न्यू जलपाई गुड़ी विलंब से पहुंचने वाली है। मैने अपना मोबाईल बंद कर पावर बैंक में चार्जिंग में लगा रखा था। हमारी भूटान यात्रा यहीं से प्रारंभ होने वाली थी। न्यू जलपाई गुड़ी आने से पहले मैने फ़ोन चालु किया तो उस पर किसी रजत मंडल का फ़ोन आया। उन्होने हमें प्लेट फ़ार्म से बाहर आने को कहा, जहाँ वे हमारा इंतजार कर रहे थे। फ़िर उन्होने दुबारा फ़ोन करके कोच नम्बर पूछा और स्वयं ही कोच पर आने का संदेश दिया।

अब हम बंगाल में थे। हमारे साथी गगन शर्मा जी ने जीवन के लगभग 35 वर्ष बंगाल में गुजारे हैं, इसलिए अच्छी बंगाली बोल लेते हैं। इसका फ़ायदा हमें मिला भी। पर पंजाबी टोन में बंगाली बोलने और सुनने का मजा भी कुछ और ही है। हम न्यू जलपाई गुड़ी पहुंच चुके थे। कोच से बाहर निकलते ही चियां (चिड़िया का बच्चा) चहचहाने लगा। फ़ोन उठाकर देखा तो रजत मंडल का ही फ़ोन था। वह मेरे सामने ही खड़ा था। साईन बोर्ड देख कर उसने मुझे पहचान लिया। हम अपना सामान लेकर स्टेशन के बाहर आ गए। वहाँ उसने एक क्वालिस गाड़ी तैयार कर रखी थी। ड्रायवर ने हमारा सामान कैरियर पर बांध लिया और रजत मंडल हमें नाश्ता करवाने ले चला।

न्यू जलपाई गुड़ी स्टेशन के बाहर निकलते ही थोड़ी दूर पर छोटे छोटे भोजनालयों की कतार बनी हुई है। जिसमें सभी तरह का भोजन मिलता है। हमें एक भोजनालय में ले जाया गया। वहाँ नाश्ते में पुरी, दाल और छोले थे। हम तो हमारे यहाँ मिलने वाला नाश्ता सोच कर आए थे। हमारे यहाँ तो पूरी दाल, सब्जी चावल इत्यादि भोजन की श्रेणी में आता है। झक मार कर हमें यही भोजन करना पड़ा। मेरे पास घर से लाए हुए मटर के पराठे। जिसे बेटी ने बड़े ही स्नेह के साथ तैयार किए थे। मैने डेढ पराठा खाया और बाकी साथियों को दे दिया। दही पराठा खा कर आत्मा तृप्त हो गई। अब हम आगे का सफ़र करने लायक हो गए थे। हमने गाड़ी होटल के समीप ही मंगवा ली और लगभग साढ़े दस बजे न्यू जलपाईगुड़ी से फ़्यूशलिंग (Phuentsholing) की ओर प्रस्थान कर गए। यह हमारा पहला था दल, अभी अन्य यात्रियों का दूसरा दल उत्तर प्रदेश से पहुंचने वाला था।

हमारी यात्रा प्रारंभ हो गई, हम सड़क मार्ग से फ़्यूशलिंग की ओर जा रहे थे। सड़क के किनारे चाय के बगान दिखाई दे रहे थे तथा पथरीली नदियां भी रास्ते में दिखाई दे रही थी। हमारा ड्रायवर भी नेपाली मूल का युवक था। बात चीत से पता चला कि वह भी पहली बार फ़्यूशलिंग जा रहा है। ड्रायवर भी नया था और हम भी। दोनो का नयापन एक सा था। इसलिए कोई खतरा भी नहीं। कुछ घंटे चल कर हम जयगाँव पहुंचे। यह भारतीय सीमावर्ती कस्बा है और खूब चहल पहल दिखाई देती है। 

रेल्वेक्रासिंग पर ट्रेन आने के कारण गेट बंद दिखाई दिया। कुछ देर के लिए हमें यहाँ रुकना पड़ा। हमारी गाड़ी के समीप ही नीली ट्री शर्ट पहने कुछ मोटरसायकिल सवार भी रुके। उनकी टी शर्ट पर "से नो टु ड्रग" लिखा था। यह अपील करने वाले संगठन का नाम जयगाँव वेलफ़ेयर आर्गेनाईजेशन भी लिखा था। भूटान प्रवेश करने वाले सीमावर्ती कस्बे के प्रारंभ में ही भनक लग गई कि इस सीमा पर भी अनैतिक कार्य हो रहे हैं और यहाँ के युवा ड्रग डीलरों एवं पैडलरों की चपेट में हैं। सीमाक्षेत्र में पहुंचने पर चारों तरफ़ कोलाहल सुनाई दिया। नेपाली बंगाली दलालों की भीड़ ग्राहक फ़ंसाने के हथकंडे अपना रही थी। इस गांव में होटल भी बहुत सारे दिखाई दिए। सोच कि समय मिलने पर ड्रग की महामारी के संबंध में स्थानीय लोगों से चर्चा की जाएगी।
भारतीय सीमा से भूटान का प्रवेश द्वार
जयगांव से ही एक द्वार के माध्यम से भारत एवं भूटान सीमा में प्रवेश किया जाता है। हमें एक रात फ़्यूशलिंग के होटल में रुकना था और अन्य साथियों के आने के पश्चात ही सबको थिम्पू की ओर रवाना होना था। सीमा पर एक युवक अपनी कार से हमें होटल मिडटाऊन तक पहुंचाने के लिए राजी हो गया। उसके पीछे पीछे हमने प्रवेश द्वार से फ़्यूशलिंग कस्बे के माध्यम से भूटान में प्रवेश किया। प्रवेश द्वार के दोनो तरफ़ डेग्रन के चित्र हमारा स्वागत कर रहे थे। अब हम विदेशी धरती पर थे। अचानक लगा की भूटान में प्रवेश करते ही सब कुछ बदल गया। वेशभूषा के साथ वातावरण भी। चारों तरफ़ साफ़ सफ़ाई एवं शांति दिखाई दी। कोलाहल का कहीं नाम ओ निशान नहीं। जबकि प्रवेश द्वार के उस पार मच्छी बाजार सा कोलाहल सुनाई दे रहा था। साफ़ समझ में आता है कि निजाम के साथ सब कुछ बदल जाता है। हम होटल मिडटाऊन में पहुंच चुके थे। ....... जारी है, आगे पढ़ें 

8 टिप्‍पणियां:

  1. प्रांरभ बहुत सुन्दर है, इंतज़ार है आगे की यात्रा का

    धन्यबाद

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  2. निज़ाम के साथ सब कुछ बदल जाता है.......हा हा हा अच्छा है। बहुत सुन्दर प्रस्तुतीकरण।

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  3. बढिया!अागे की किश्त का इंतजार है।

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  4. बहुत सुंदर शुभारम्भ .... शुभकामनाएं

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  5. अनजान राहों के अपने ही मज़े हैं

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