बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

सैर कर गाफ़िल … भूटान

सैर कर गाफ़िल दूनिया की, जिन्दगानी फ़िर कहाँ …… सैलानियों के लिए यह आदर्श वाक्य हो गया है। देशाटन और पर्यटन करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का मन करता है परन्तु इसके रास्ते में रोड़े भी बहुत अधिक हैं। घर द्वार से निकलते निकलते भी कोई न कोई काम आ ही जाता है जो आपकी यात्रा को प्रारंभ ही नहीं होने देगा। ऐसी स्थिति में नफ़ा-नुकसान देखे बिना गाफ़िल हो कर  ही यात्रा को अंजाम देना पड़ता है। बस सब तरफ़ से आँखें बंद कर लो और चल पड़ो अपने मनचाहे स्थान की ओर, तभी यात्रा सम्पूर्ण होती है। वरना जीवन में पहेलियों के इतने जंजाल होते हैं कि एक को सुलझाते ही उसमें से दूसरी उलझन जन्म लेती दिखाई देती है।

मेरी पुस्तक "सरगुजा का रामगढ़" प्रकाशन के अंतिम दौर पर थी, तभी रविन्द्र प्रभात जी का फ़ोन आया कि अबकि बार ब्लॉग़र सम्मेलन भूटान में हो रहा है और आपकी स्वीकृति चाहिए। भूटान का नाम सुनकर मैने अपनी स्वीकृति दे दी। क्योंकि कई महीनों से बिकास और मेरे बीच भूटान भ्रमण को लेकर मंथन चल रहा था। जाना वह भी चाहता था और मैं भी। परन्तु कोई "साईत" नहीं निकल रहा था। रविन्द्र जी के फ़ोन से हमें भूटान यात्रा को लेकर गंभीरता से सोचना पड़ा। मैने जल्दबाजी में ही पुस्तक पूर्ण की एवं उसका प्रकाशन भी हो गया। अब मुद्दा विमोचन को लेकर टंगा हुआ था। इस पुस्तक का विमोचन हमारे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के द्वारा होना पूर्व में ही तय हो गया था। अब उनकी तरफ़ से तिथि का निर्धारण होना था। समय धीरे धीरे सरकता जा रहा था।

इसी बीच छत्तीसगढ़ के अन्य मित्र भी इस यात्रा में सम्मिलित हो रहे थे। जिनमें गगन शर्मा, गिरीश पंकज, अल्पना देशपान्डे इत्यादि। मैं भूटान यात्रा सड़क मार्ग से तय करना चाहता था इसलिए पाबला जी को फ़ोन लगाया। तो उन्होने बताया कि पापा की तबियत ऊक-चूक रहती है, अगर ठीक लगा तो चलेगें। अर्थात तय नहीं था उनका जाना। रविन्द्र जी ने परमिट के फ़ार्म भेज दिया। इधर अल्पना भी सपरिवार तैयार हो रही थी। उसका सही जवाब नहीं आ रहा था और टिकिट करवाने में विलंब होता जा रहा था। मैने गगन शर्मा जी  को टिकिट करवाने कह दिया और अल्पना को अल्टीमेंटम दे दिया। फ़ार्म भेजने के बाद टिकिट करवाने की जिम्मेदारी उसकी थी। मुझसे यहीं पर बड़ी चूक हो गई। अपनी टिकिट अलग ही करवानी थी। यही चूक आगे चल कर मानसिक यंत्रणा का कारक बन गई।

हमारी यात्रा रायपुर स्टेशन से हावड़ा मुंबई मेल द्वारा 12 जनवरी 2015 को शाम को प्रारंभ होनी थी। सब कुछ तय समय के हिसाब से चल रहा था। परन्तु कुछ न कुछ व्यवधान मानव जीवन में आते ही रहते हैं। छोटे भाई कीर्ति की एक महीने से तबियत ठीक नहीं थी। शाम को उसको टेबलेट लेने के लिए ध्यान दिलाना पड़ता था। वरना भूल जाता था। नगर पंचायत के चुनाव भी चल रहे थे और एक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक का दायित्व भी इसी दौरान संभालना पड़ा। कुल मिला कर उलझने बढती ही जा रही थी। नगर पंचायत चुनाव में ताऊ जी के पुत्र पार्षद का चुनाव जीत चुके थे और उन्हें 13 तारीख को उपाध्यक्ष के लिए चुनाव लड़ना था। उनका कहना था कि 13 को शाम की फ़्लाईट से कलकत्ता चले जाना, जिससे अपने साथियों से मिल जाओगे और यहाँ का चुनाव भी निपट जाएगा।

मैने अल्पना को वर्तमान स्थिति से अवगत करवा दिया और कह दिया कि शाम की फ़्लाईट से चल कर दार्जलिंग मेल के समय पर सियालदाह स्टेशन पर मिल जाऊंगा। उसने नाराजगी जाहिर की और मैने अपनी सफ़ाई दी। यहीं से बात से बिगड़नी प्रारंभ हो गई। उसके बाद मैने इन्हें सैकड़ों बार कॉल किया लेकिन फ़ोन पर कोई जवाब नहीं आया। 13 तारीख को दोपहर 1 बजे भाई के विजय होने का समाचार आ गया और छोटा भाई कीर्ति, भतीजा, छोटू और बेटा उदय मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आ गए। शाम 4/15 के इंडिगो विमान से सफ़र तय कर 5/40 को दमदम हवाई अड्डे पर पहुच गया। यहाँ पहुच कर भी अल्पना को फ़ोन लगाया तो कोई जवाब नहीं आया। क्योंकि मेरी आगे की टिकिट तो उनके साथ ही सम्मिलित थी। न ही उन्होने मुझे कायदे से मेरा सीट नम्बर दिया। इसके पीछे मुझे सिर्फ़ अपनी अहमियत सिद्ध करने का भाव ही समझ में आया। आएगा साला खुद पड़ गिर और ढूंढेगा अगर साथ जाना है तो।

मैं हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर सियालदाह स्टेशन की ओर चल पड़ा। मेरा टैक्सी ड्रायवर हिन्दी भाषी और बिहार के गया जिले का निवासी था। बहुत अच्छी हिन्दी बोलता था और पढने लिखने का शौकीन था। उससे चर्चा करते हुए 22 किलोमीटर का रास्ता कट गया और सियालदाह स्टेशन पहुंच गया। इस स्टेशन पर बहुत ही भीड़ भाड़ थी। सामान ढोकर थोड़ा आगे बढने पर पता चला कि कल संक्राति है और गंगासागर जाने वालों का मेला लगा हुआ था। इसलिए अत्यधिक भीड़ दिखाई दे रही थी। सारे तीरथ बार बार, गंगासागर एक बार। स्टेशन पहुंचा तो 7 बजे थे। मैने एटीएम के पास अपना डेरा लगा लिया। क्योंकि मेरे पास टिकिट भी नहीं थी जो प्लेटफ़ार्म पर पहुंच सकता। मैने एक प्लेटफ़ार्म टिकिट खरीदी और इनका इंतजार करने लगा। इन लोगों ने मुझे इस तरह से बांध दिया था कि मैं मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहा था। गुस्से का स्तर शनै शनै बढते जा रहा था। 

आठ बजे मैने गगन शर्मा जी फ़ोन लगा कर वस्तु स्थिति बताई तो उन्होने कहा कि वे 9 बजे प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएगें। इस बीच मैने घर से लाया हुआ भोजन कर लिया। वादे के अनुसार गगन शर्मा जी नौ बजे पहुंच गए। हमारी ट्रेन दार्जलिंग एक्सप्रेस दस बजे थी। गगन शर्मा जी ट्रेन एवं टिकिट की स्थिति देखने गए और मैं अपने स्थान पर ही बैठा रहा। आज अपने आप को बहुत ही मजबूर समझ रहा था। अब दिमाग सनकने के कगार पर था। चार्ट लगने में थोड़ा समय था। चार्ट लगते ही हमने देखना शुरु किया तो मेरा नाम ही नहीं दिखाई दिया। अब मैने तय किया की सामान्य टिकिट लेकर ट्रेन में ही सीट की व्यवस्था कर लुंगा। मै सामान्य टिकिट लेकर लौटा तो गगन शर्मा जी ने बताया कि मेरी टिकिट बी-3 में है और उन लोग अपनी सीट पर बैठ चुके हैं। अब पारा और अधिक चढ गया। इधर सामान्य टिकिट के पैसे फ़ालतु लग गए। मैने दौड़ कर टिकिट कैंसिल कराई और किसी तरह अपने कोच में पहुंचा। इसे कहते हैं कर भला तो हो बुरा…………। आगे पढ़ें 

11 टिप्‍पणियां:

  1. और जा अकेले. मैं जाय बर कहें त कछु जवाब नै डे रहे ना.. ओकरे बर सब भुगते हस... :)

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  2. Prakash - अब रद्दा ल देख डरेन गा, दूनो झिन मसक देबो कभु। नइ देखे रहिबे त संसो रहिथे। :)

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  3. सफर में कई अड़चन आ जाती हैं फिर भी सफर तो सफर है ..
    बढ़िया प्रस्तुति ..
    सरगुजा का रामगढ़" पुस्तक प्रकाशन पर हार्दिक बधाई !

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  4. आपकी मुश्किलात भरी सफ़र की दास्तान पढने में हमें तो मजा आ रहा है

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  5. आशा है ट्रेन में बैठने के बाद दिक्कतें खत्म हो गई होंगी

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  6. अंत भला तो सब भला :) उम्मीद है आगे का सफर कुछ कम मुश्किल भरा रहा होगा :) . आपने छाछ भी फूंक फूंक कर पी होगी न . :)

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  7. ओह बहुत मुश्किल हुई होगी …चलिए इसी का नाम ज़िन्दगी है। शुभकामनाएं

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  8. उफ़! कहा था की मुझे साथ ले चलो पर आपको तो प्लेन में जाना था । अब भुगतो...

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  9. होता है होता है
    कभी कभी ऐसा भी होता है

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