शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

भूटान में पहला दिन : भूटान यात्रा 3

प्रारम्भ से पढ़ें 
मिड टाऊन होटल पांच मंजिला था। रुम औसत दर्जे के ही थे। हमारे पहुंचने तक गरम पानी आना बंद हो गया था। होटल के साथ बार रुम भी अटैच था और उसके पीछे तरणताल भी। उपर कमरे की खिड़की से तरण ताल का पानी नीला और सुंदर दिखाई दे रहा था। कुछ बच्चे पानी में उछल कूद कर रहे थे। उनके साथ दो-चार बड़े बच्चे भी थे। मेरी इच्छा तरणताल में कुछ समय गुजारने की थी परन्तु वातावरण में ठंडक थी और सांझ ढलने के साथ टेम्परेचर भी  मायनस में जाने वाला था। पर कुछ जुगाड़ लगा कर मैने तरणताल में छलांग लगा ही दी। ओह … पानी इतना ठंडा था कि एक बार तो सांस बंद होने को आ गई। जल्दी जल्दी पानी में हाथ पैर मारे और इस कोने से उस कोने तक 5 बार तैराकी की। शरीर में कुछ गर्माहट बनी। पर पानी बर्फ़ जैसा ही रहा।
होटल मिड टाऊन एवं गगन शर्मा जी
हमारे साथी मुझे पानी में तैरते देख कर उत्साहित हो गए। पूछने लगे पानी कैसा है? मैने कह दिया कि गुनगुना है और थोड़ा जलकिलोल करके दिखाया तो उन्हे विश्वास हो गया। अब वे भी धड़ाम धड़ाम। कूदते ही उनकी नानी याद आ गई। बहुत ठंडा पानी है, आपने धोखा दिया है शर्मा जी। अरे मैने तुम्हें कहा धोखा दिया। अगर मैं कहूंगा तो तुम बिल्डिंग से कूद जाओगे क्या? जब तक व्यक्ति के मन में इच्छा का अंकुरण नहीं होता तब तक वह किसी काम को नहीं करता। तुम्हारे मन में थी स्वीमिंग पुल में नहाने की इच्छा। बस उसे मैने थोड़ी सी हवा दी है। इतनी देर में तरणताल का केयर टेकर आ गया और चिल्लाने लगा कि यहाँ तैरने के लिए ड्रेस कोड है, आप लोग कुछ भी पहन कर कूद गए पानी में। भाई हमने तो अंडर वियर पहन रखी है, अब बिकनी वाला कास्ट्यूम ये लोग कहां से लाएं। इसी में काम चलाओ। ठंड के कारण अधिक देर पानी में नहीं रहे। मै तो रुम में आकर बिस्तर में घुस गया और एक नींद जम कर ली। अगलों की राम जाने।
फ़्यूसलिंग की सुहानी सांझ 
जब नींद खुली तो सूरज अस्ताचल की ओर जा रहा था। होटल की बालकनी से नदी के किनारे डूबता हुआ सूरज बहुत ही खूबसूरत छटा बिखेर रहा था। शनै: शनै: रात हो रही थी। खाने के समय तक गिरीश पंकज जी भी आ चुके थे। उनका कहना था कि उत्तर प्रदेश वालों की ट्रेन 9 घंटे विलंबित है इसलिए मुझे बस से भेज दिया। रात को ठंड बढ चुकी थी और केटरिंग वाले ने सब्जी, दाल सब में मीठा डाल दिया था। एक तरह का गुजराती खाना बना दिया। मेरा मन नहीं था खाने का। होटल का रेस्टोरेंट भी बंद हो चुका था। अब खाने में कोई मजा नहीं रहा। मैने अपने पास रखे कुछ फ़ल खाए और बिस्तर के हवाले हो गए। रात को सोना भी जरुरी है। आगे के सफ़र का कुछ पता नहीं था। हमें सोने के पहले बता दिया गया था कि सुबह 7 बजे यहां से बस थिम्पू के लिए रवाना हो जाएगी। सभी को समय पर ही तैयार रहना है।
फ़्युशलिंग का प्रवेश द्वार
सुबह रुम में चाय दी गई। इस होटल के सभी कर्मचारी भारतीय ही थे। मैने अपनी आई डी देकर भूटान का एक टुरिस्ट सिम मंगवाया। इसमें 220 रुपए खर्च हुए। होटल के मैनेजर ने बताया कि इस सिम में आपका नेट भी चलेगा और सिम की वैलीडिटी एक माह थी। नेट चलने की बात सुनकर मैं खुश हो गया कि सभी से सतत सम्पर्क बना रहेगा। पर आखिर में यह एक छलावा ही निकला। कहीं पर भी नेट नहीं चला और 220 रुपए गए मुफ़्त में ही पानी में। उत्तर प्रदेश से आने वाला दल रात को पहुंच चुका था, इसमें पूर्व परिचित डॉ रामबहादूर मिश्र जी, रणधीर सिंह सुमन जी और मनोज पाण्डे जी ही थे। बाकी सभी नए लोग थे। जिनसे मैं परिचित नहीं था। परिचय से पहले व्यक्ति नया ही होता है। परिचय पश्चात सौ जान-पहचान एवं रिश्तेदारियाँ निकल आती है। यही हमारी भारतीयता और भारतीय संस्कृति है।
श्री ओमप्रकाश जयंत, डॉ राम बहादूर मिश्र, श्री बिसम्भर शर्मा, श्री गिरीश पंकज, श्री रणधीर सिंह सुमन, डॉ अशोक गुलशन, डॉ विनय दास, श्री समर बहादुर एवं निसिहर जी
नाश्ते के उपरांत सभी का सामान बस में चढ़ा कर बांद दिया गया। सभी ने बस में अपना स्थान ग्रहण कर लिया। अब छत्तीसगढ़ एवं उत्तर प्रदेश को मिलाकर कुल 18 नग सवारियाँ हो चुकी थी, ट्रैवल एजेंट रजत मंडल हमारे साथ ही थे। इस तरह भूटान यात्रा के लिए कुल 19 लोगों का परमिट बना था जो थिम्पू और पारो की 15 जनवरी से 18 जनवरी तक 4 दिन की यात्रा करेगा। यह परमिट में दर्ज किया गया था। हमारी बस अब थिम्पू के लिए चल पड़ी। थोड़ी दूर जाने के बाद रास्ते में जांच चौकी आई। जहाँ हम सब के परमिट की जांच कर मुहर लगाई गई । अब इससे आगे बस चल पड़ी। बस में बहुत ही अधिक विस्फ़ोटक सामग्री भरी हुई थी। एक-एक कवि बड़े परमाणू बम की मारक क्षमता रखता है। :) सारे असलहा जांच बच गया :)। अगर भूटान के अधिकारियों को पता चलता कि कवि आ रहे हैं तो शायद परमिटानुमति ही नहीं मिलती। इतनी सारी विस्फ़ोटक सामग्री के सामने भूटान की क्या बिसात है? :)
भूटान के सहचर - कुछ जागते कुछ ऊंघते
सफ़र के दौरान काव्य गोष्ठी का आयोजन भी कर लिया गया। जिसके संचालन की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी गई। इस बहाने एक दूसरे के साथ परिचय भी हो रहा था और उनकी काव्य प्रतिभा का भी स्वाद मिल रहा था। ये सभी हिन्दी भाषा के साथ अवधि के भी अच्छे कवि थे। कार्यक्रम का प्रारंभ गिरीश पंकज जी की गजल से किया गया। इसके पश्चात ओमप्रकाश जयंत, डॉ अशोक गुलशन, डॉ विनय दास, श्री बिसम्भर शर्मा,  निसिहर जी, कुसुम वर्मा, के साथ गगन शर्मा जी ने भी पुराने गीत गाए। अरविंद देशपांडे में भौंक कर कुत्ते की मिमिक्री कर के सबका मनोरंजन किया। मैने भी एक दो हिन्दी छत्तीसगढ़ी कविताएं मौका पाकर पेल दी। इस तरह मनोरंजन के साथ सफ़र कटते रहा। हमारा रास्ते का खाना पैक करके लाया गया था। एक स्थान पर सभी लोग खाना दिया गया। लोगों ने खाने बाद खाली पैकेट वहीं पर फ़ेंक दिए तो वहां रहने वाले भूटानी नाराज हो गए। उसने डिब्बा लाकर दिया और सारा कचरा उसमें फ़ेंकने कहा। यह भारत नहीं है कि कहीं भी हग दिए और मूत दिए।
चलित काव्य गोष्ठी में कुसुम वर्मा जी सोहर गाते हुए
भूटान में पर्यावरण की तरफ़ विशेष ध्यान दिया जाता है। यहाँ सावर्जनिक स्थानों पर कचरा फ़ैलाने पर कठोर दंड दिया जाता है जिसमें जुर्माने के साथ सश्रम कारावास की भी सजा है। अब हमारे भोले साथियों को कौन सा भूटान के कानूनों का इल्म था। जहाँ खाए, वहीं फ़ेंके। आखिर में सभी ने अपना कचरा समेट कर डिब्बे के हवाले किया। भोजनोपरांत हम थिम्पू की ओर बढ़ चले। पहाड़ी रास्ते को किलोमीटर में नहीं, घंटे मे नापा जाता है। 4 घंटे के सफ़र के बाद सभी की बैटरी डाऊन हो गई और सीटों से लग गए। सफ़र लम्बा था। थिम्पू प्रवेश करने के पूर्व एक स्थान पर पुन: परमिट चेक किए गए और मुहर मार कर विदा किया गया। यहाँ पर जांच चौकी वाले देखते हैं कि पर्यटकों के अलावा कोई अवांछित तत्व भूटान में प्रवेश न कर जाए। मजदूर टाईप के व्यक्तियों को भूटान में प्रवेश नहीं दिया जाता। क्योंकि ये भूटान में आकर मजदूरी करने लगते हैं और यहाँ की नस्ल को भी बिगाड़ते हैं। भूटान का शासन अपनी नस्ल की शुद्धता के विषय में अत्यधिक जागरुक है।
हमारी बस का पायलट परम्परागत भूटानी वेष में, संग डॉ विनय दास जी
आखिरकार हमने थिम्पू में प्रवेश कर लिया। उस समय सांझ हो रही थी। हमारा अस्थाई निवास एक ऊंची पहाड़ी पर बना वांगचुंग रिसोर्ट था। यह रिसोर्ट ताबा में स्थित है। सुंदर ब्लू पाईन के वृक्षों से घिरा रिसोर्ट बहुत ही सुंदर है। इसके साथ इसमें एक कांफ़्रेस हाल भी है। रिसोर्ट में पहुंचने के बाद हमें अपने-अपने रुम की चाबियाँ थमा दी गई। रुम भी बहुत सुंदर डेकोरेटेड थे। प्रत्येक रुम में हीटर वाला बेड एवं चाय की केटली के साथ आवश्यक सभी वस्तुए उपलब्ध थी। हमारे पहुंचने से पूर्व फ़्लाईट से आने वाले साथी भी पारो से आ चुके थे। पहुंचते ही शाम को नास्ते का इंतजाम था। इस दौरान ही अन्य पुराने साथियों से भेंट हुई, जिसमें संपत मुरारका जी, सुनीता यादव जी, कृष्णकुमार यादव जी, रविंद प्रभात जी एवं उनकी बेटी जवांई थे। इंदौर से प्रकाश हिन्दूस्तानी जी, दिल्ली से ब्लॉगर सर्जना शर्मा जी एवं सिलचर से प्रो नित्यानंद पाण्डे एवं उनकी धर्मपत्नी शुभदा पाण्डे जी भी थी। सभी से परिचयोपरांत बताया गया कि आज कोई कार्यक्रम नहीं है, शाम को आपको मार्केट घुमाया जाएगा, फ़िर खाना और सोना ही है, बाकी कार्यक्रम अगले दिन किया जाएगा।
कल के बिछड़े हुए हम आज यहाँ आ के मिले ( ललित शर्मा-सुनीता यादव-कृष्ण कुमार यादव)
थिम्पू की मार्केट अधिक बड़ी नहीं है, होटल ताज से लेकर मुख्यचौराहे तक सड़क एक तरफ़ दुकाने बनी हुई हैं। जिनमें अधिकतर मालकिने ही दिखाई देती हैं। जैसी अन्य टुरिस्ट स्थानों पर दुकाने होती है वैसी ही मुझे यहाँ भी दिखाई दी। सामान का मुल्य भी सामान्य से अधिक दिखाई दिया। मेरा कैमरा काम नहीं कर रहा था इसलिए मुझे सेल लेने थे। आखिर मोल भाव करने के बाद मुझे 800 रुपए में 4 सेल लेने पड़े। मुझे कैमरा चालू करना बहुत ही आवश्यक था। बाजार में गर्म कपड़ों का मूल्य भी बहुत अधिक था। सुनीता ने एक-दो लेदर के जैकेट खरीदे। मुझे तो बच्चों का नाप ही याद नहीं रहता। इसलिए बाहर से कोई भी सामान खरीदने का रिस्क नहीं लेता। धीरे-धीरे बाजार घूमते हुए रात होने लगी और बस ड्रायवर का फ़ोन आने लगा। नई जगह में किसी तरह एक स्थान पर एकत्रित हुए और पुन: रिसोर्ट में आ गए। ……… जारी है, आगे पढ़ें 

6 टिप्‍पणियां:

  1. चलचित्र की भांति चल रही है आपकी यह भूटान यात्रा। पर्यावरण की तरफ़ हम भारतियों को भी अत्यंत ध्यान देने की आवश्यकता है... बहुत सुंदर वर्णन, जारी रखिये। शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक साथ तीनो भाग पढ़े है . आगे का इंतज़ार है

    उत्तर देंहटाएं
  3. bhutan ke bare me achchi jankari dene ke liye shadhuvad / age bhi asi jankari prkasit krte rhe /

    उत्तर देंहटाएं
  4. "...पहाड़ी रास्ते को किलोमीटर में नहीं, घंटे मे नापा जाता है..."

    एकदम सही

    उत्तर देंहटाएं
  5. बढ़िया यात्रा चल रही है।आज ही सारे भाग एक साथ पढ़े

    उत्तर देंहटाएं