मंगलवार, 9 जनवरी 2018

मिट्टी का कूकर : छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के बालोद जिला मुख्यालय से लगभग दस किमी दूर दिसम्बर 2010 में एक गांव में कुम्हार परिवार से मिलने गया था। गांव का नाम भूल रहा हूँ। उस कुम्हार ने मिट्टी के भाण्डों को नवोन्मेष कर नया रुप दिया था। 

उपरोक्त चित्र में दिख रहा मिट्टी का कूकर उसने तैयार किया था, जो धातु के कूकर जैसे ही कार्य करता है एवं इसमें पकाया गया भोजन माटी की सौंधी खुश्बू लिए होता है।
औद्योगिकरण ने सबसे अधिक चोट भारत के परम्परागत शिल्प पर की, जबकि यह हमारी प्राचीन अर्थ व्यवस्था की रीढ़ था। इसके एवज में मशीनें खड़ी की और परम्परागत शिल्प को मटियामेट कर दिया। 
जो कुशल हाथ अद्भुत कृतियों को गढ़ते थे वे जीवनयापन करने के लिए परम्परागत व्यवसाय को त्याग कर मजदूरी कर रहें हैं। आजादी के बाद की सरकारें अंग्रेजों की परिपाटी पर चली और परम्परागत शिल्प व्यवसाय चौपट हो गया।
नये शोध आने पर अब लोग पुनः जागरूक होते दिखाई दे रहे हैं, शहरों में मिट्टी के तवे बिकते दिखाई देते हैं। यह पता नहीं कि लोग इनकी खरीदी ड्राइंग रुम की शोभा बढ़ाने के लिए करते हैं या भोजन पकाने के लिए। 
वैसे भोजन पकाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग स्वास्थ्य एवं देश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है। मिट्टी के बर्तनों में चूल्हे की धुंगिया खुशबू के साथ बने भोजन का कहना ही क्या है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. पारम्परिक शिल्पकारों के दर्द को महसूस करता बहुत अच्छी जानकारी भरा आलेख। सचमुच मिट्टी के तवे खूब बिकते हुए दिखाई दे रहे हैं। बिगड़ते स्वाथ्य और जीवन शैली फिर लौटेगी उसी माटी के पास। आस और विश्वास जगाते रहिए अपने विचारों से। शुभकामनाएं....

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ऐतिहासिकता को जीवंत बनाते वृन्दावन लाल वर्मा : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. बहुत अच्छी बात कही जी आपने

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