शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

स्नानाबाद से सीधा प्रसारण --------------- ललित शर्मा

3म नम: शिवाय, नम: शिवाय, नम: शिवाय, हर हर गंगे, हर गंगे। स्नान हो रहा है, एक लोटा पानी डालते ही विचार उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। बरसाती बादल की तरह बस फ़ट पड़ने को तैयार। सावन मास के आखरी दिन नित्य की तरह अपना जलमस्तकाभिषेक स्वयं कर रहा हूँ। कोई देवाधिदेव महादेव तो नहीं जो कोई भी भक्त आकर स्नान करा जाएगा। महादेव भाग्यशाली हैं, पंच स्नान दस स्नान से भी कुछ फ़र्क नहीं पड़ता बरसात के मौसम में। यहाँ तुच्छ मानव को ठंडे जल से ही छींक आ जाती है। कसाईखाने में जाने की नौबत आ जाती है। बरसात तो आखिर बरसात है, न आए तो रोना पीटना मच जाता है, आ जाए तो समस्या खड़ी हो जाती है। पर आना जरुरी है, नहीं तो भूखों मरने की नौबत आ जाती है।

अति किसी भी चीज की वर्जनीय है। अतिवृष्टि, अतिप्रेमासक्ति, अति धनवृष्टि, अतिज्ञानदृष्टि, अति अल्पज्ञता, अतितृष्णा, अतिकृपणता, अतिदरिद्रता अतिक्षुधा, अति, अति आदि आदि आदि पागलपन की निशानी है। कुछ लोगों को लोकैषणा पागल कर देती है तो कुछ को वित्तैषणा। वित्तैषणा में व्यक्ति सर्वभक्षी हो जाता है। लोकैषणा उसे अंधा बना देती है। प्रेमासक्ति सांप को भी रस्सी बना देती है। हर हर गंगे हर गंगे, बालों को एक हाथ से रगडते हुए एक लोटा जलाभिषेक और हो जाता है। सब चलचित्र सा चल रहा है। स्नानागार नहीं, यह चिंतन केंद्र हो गया। सारे विचार यहीं लोटे के जल के साथ लोटते हैं। हर हर गगें हर गंगे…… 

कल्पनाएं, परिकल्पनाएं, अल्पनाएं रक्काशाओं का रक्स घुंघरुओं की लयबद्ध ताल ध्वनि के संग भंवरे की गुंजन सुनाई देती है, गुन गुन करता भंवरा पराग कणों के लालच में फ़ूलों पर मंडरा रहा है। फ़ूल का मन भी सांवले सलोने भंवरे को देख कर प्रसन्न हो गया। पराग कणों के लालच में फ़ूलों की देह सहला रहा है। फ़ूल लाल हो कर पराग कण छोड़ देगा। दोनो ही बेवफ़ा हैं, फ़ूल ने पराग कण छोड़े और भंवरे ने चुराए और उड़ गया दूसरे फ़ूल की ओर।

तृष्णा और क्षुधा के साथ कैसी वफ़ा की उम्मीद? दोनों की ही जरुरत है। तितलियाँ कौन सी कम हैं? जो भंवरे ने किया, वही तितलियों ने किया। फ़ूल के जिस्म को सहलाया और भिगोया, धोया, निचोया और हो गया। संसार यही है, स्वार्थ सिद्धी योग जीव-जंतु, थलचर, नभचर, चलचर, उभयचर सभी को आता है। इसे सीखने के लिए किसी बाबा की दरकार नहीं। प्रकृति और आवश्यकता सब सीखा देती है। नव जातक को कौन दूध पीना सिखाता है, वह स्वयं ही आँखे बंद किए हुए स्तन ढूंढ लेता है और अपनी क्षुधा शांत कर लेता है। हर हर गंगे, हर हर गंगे……

एक लोटा जल और सिर पर पड़ते ही फ़ेसबुकिया बु्ड्ढे-बुढिया,छोरे-छोरी, छिछोरे-छिछोरी दिखाई देने लगे। फ़ेसबुक पर इतना अधिक प्रेम-इश्क उमड़ रहा है कि लोगों की रगों से फ़ूट-फ़ूट कर बह रहा है। कोई दवा नहीं जो रगों से फ़ूटते फ़ेसबुकिया प्रेम को थक्का बना कर जमा दे, रोक ले। बुढापे में अल्हड़ पहाड़ी नदी सा बहता प्रेम बड़े-बड़े भाखड़ाओं को भी धराशायी करता उफ़नती कोसी की तरह पार तोड़ता फ़ेसबुकिया मैदानों की तरफ़ दौड़ रहा है तबाही मचाने के लिए। इसके रास्ते में आने वाले कई महल दोमहले धराशायी हो गए।

भोर से ही भिक्षुक निकल पड़ते हैं कमंडल लेकर, जहाँ चैट की बत्ती हरी देखी, "लाईक भिक्षाम देहि" और "कमेंट भिक्षाम देहि" के अतिरिक्त कुछ सुनाई-दिखाई नहीं देता। जिन्हे हम जानते हैं उन्हे तो बिना कहे लाईक दे आते हैं पर जिन्हे नहीं जानते वे भी आकर अपना पेज टिका देते हैं। "प्लीज एक लाईक दीजिए" साला लाईक नहीं हुआ, गुडमार्निग का चुम्मा हो गया। कम से कम ब्रश तो कर लो यार, दांतो की सड़न दूरियां बढा रही है। क्लोज अप का जमाना है। फ़िर लाईक, इश्क, प्यार, चुम्मा, सब मिल जाएगा, थोड़ा माउथ फ़्रेशनर इस्तेमाल किए करो। हर हर गगें हर गंगे……

फ़ेसबुकिया कबूतर और कबूतरी किसी भी मुंडेर पर गुटुर गुं कर लेते हैं पर कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी, साम्यवादी, पुंजीवादी, अन्नावादी, बाबावादी, धर्मनिरपेक्षतावादी दलों के दल के दल मौजूद हैं। बिना दलों के इनकी बात कही-सुनी नहीं जाती। किसी की वाल पर हमला भी होता है तो लगता है कि वियतनाम पर अमेरिका ने फ़िर से कारपेट बमिंग कर दी। धड़ाम-धड़ाक-धुम-धड़ाम के अलावा सदवचन @%$#@%& भी सुनाई देते हैं। किसी दूसरे ग्रुप में यही शहीदी विचारवान साथ में वड़ापाव खाते दिख जाते हैं एक कटिंग चाय के साथ।

वाह रे फ़ेसबुक, एक भाई साहब सामयिक दृष्टि से अपना चिंतन प्रतिदिन संध्या काल में लिखते हैं। उनकी पोस्ट तो कुंवारी ही रह जाती है। कमेंट करना बहुत बड़ी बात है, लाईक किए बगैर ही लोग निकल लेते हैं। उनकी पीड़ा का अहसास तब होता है जब कोई रुपसी अपनी प्रोफ़ाईल फ़ोटो बदलती है तो वाह-वाह और लाईक करने वालों की लाईन लग जाती है। अगर किसी सुंदरी ने दो लाईने लिख दी समझिए केंवाच सी खुजली सम्पूर्ण वातावरत में फ़ैल जाती है। लोग कंघे लेकर अपनी खुजाल मिटाने निकल पड़ते हैं। ऐसे में सदवचन लिखने वाले सज्जन को गहन पीड़ा होना स्वाभाविक है। हर हर गगें हर गंगे…… 

ऐसे में अदम गोंडवी याद आते हैं। प्रेम का रोग, भरे पेट का बुद्धिविलास है, जिसके पेट में रोटी न हो, वह क्या खाक प्रेमार्थ और नयनों की भाषा समझेगा? उसे मुंडेर पर बैठी कबूतरी की गजल कैसे पसंद आएगी? चाहे उसने कितना भी खुश्बू वाला अफ़गान स्नो पोत रखा हो और उसकी खुश्बू मीलों तक जा रही हो। उसे तो सिर्फ़ गर्म रोटी की ही महक खींच ले जाती होगी मीलों दूर, चाहे रोटी महक पाने के लिए उसे दिन-रात हथौड़ा बजाना क्यों न पड़े।

अदम कहते हैं - गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे, पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें। देखने को दे उन्हे अल्लाह कम्प्यूटर की आँख, सोचने को कोई बाबा बाल्टीवाला रहे। फ़ेसबुक पर कभी रोटी की चिंता की गजल-कविता नहीं पढी। सोचता हूँ क्या रोटी की भूख बोल्ड नहीं हो सकती? अगर खाने को रोटी न मिले और पेट भूखा रहे तो क्लीन बोल्ड होने में भी समय नहीं लगता। भूख, गरीबी, मुफ़्लिसी, टूटे छप्पर नंगापन, तन की पीड़ा व्यक्त करती कविताओं को तालियाँ बहुत मिलती हैं, पर रोटी नहीं मिलती। "एक फ़ेसबुकिए को दुनियां में यायावर क्या चाहिए, एक नेट, एक लैपी, 100 कमेंट 500 लाईक हरदम रहे।" हर हर गंगे हर गंगे………

आंख बंद किए लोटे पर लोटा उड़ेल रहा हूँ, कितना पानी गंगा जी में बह गया पता ही नहीं चला, क्योंकि जब कोई पुरस्कार-सम्मान वितरण का दृश्य सामने आता है तो कंट्रोल ही नहीं होता। दिखाई देता है कुटिल मुस्कान लिए पुरस्कार-सम्मान दाता और अनुग्रहित कमान सी कमर झुकाए फ़र्शी सलाम ठोकता पुरस्कार का आकांक्षी दरिद्र भाव लिए प्राप्तकर्ता। पुरस्कार लेखक के जमीर को खरीद लेता है, मुंह पर ताला लगा देता है। बार-बार सुनना पड़ता है उसे फ़ुंफ़कार कि हमने आपको सम्मानित किया, जब आपका कोई सम्मान नहीं था। सम्मान के विषधर सांप को गले में लपेटे वह ठगा सा खड़ा देखते रहता है और उसके सामने द्रौपदी का चीर हरण हो जाता है।


कितना बेबस नपुंसक बना देता है एक सम्मान? सम्मान देकर जमीर खरीदने वालों का बाजार गर्म है तो जमीर बेचकर सम्मान पाने वाले भी कम नहीं। जैसे गर्म गोश्त के सौदागर एक रात का सौदा करके नोच लेते हैं बदन को, उसे एक रात की कीमत तो पूरी वसूलनी है। ये  सिर्फ़ एक रात ही नोचते हैं , पुरस्कार-सम्मान देने वाले तो जर खरीद गुलाम समझ लेते हैं। छुटभैयों का सम्मान पत्र कोई पद्मश्री तो नहीं, जिस लौटाने की घोषणा करके कोई भी सुर्खियों में आ जाएगा या स्वर्ण पदक नहीं जिसे बेचकर एक वक्त की रोटी जुटा लेगा… मोबाईल बजने लगता है………जब भी बाथरुम में होता हूँ किसी को मेरी याद तभी आती है। …चेहरे पर साबुन लगाए झट-पट तौलिया लपेटे बाहर आता हूँ………हेल्लो हेल्लो हेल्लो……और फ़ोन कट जाता है…… हर हर गगें हर गंगे……

24 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया...मारक व्यंग्य...भाई facebook की बातों को बहुत संजीदगी से लेने की जरूरत नही लगती मुझे निरापद नशा है,बिलकुल निरापद भी नहीं पर थोड़ी देर को इस बज़्म में बैठ कर आदमी ज़माने की तल्खियों से दूर जा बैठे तो बुरा क्या है....पुरुस्कार वितरण समारोह का दृश्य सजीव लगा बात भी सही लगी पर पुरुस्कार चाहते तो सभी हैं..

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  2. बढ़िया...मारक व्यंग्य...भाई facebook की बातों को बहुत संजीदगी से लेने की जरूरत नही लगती मुझे निरापद नशा है,बिलकुल निरापद भी नहीं पर थोड़ी देर को इस बज़्म में बैठ कर आदमी ज़माने की तल्खियों से दूर जा बैठे तो बुरा क्या है....पुरुस्कार वितरण समारोह का दृश्य सजीव लगा बात भी सही लगी पर पुरुस्कार चाहते तो सभी हैं..

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  3. हा हा हा..."सुबह से ही भिक्षुक निकल पड़ते हैं कमंडल लेकर".......बाप रे ! बढ़िया व्यंग्य है...

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  4. आज शब्दों से अंगार टपक रहे हैं, यह बह जाना आवश्यक है..

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  5. बड़ी फुर्सत में लिखी है पोस्ट .
    आज काफी मसाला है .
    एकदम झक्कास !

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  6. स्नानाबाद से सीधा प्रसारण... वाह! क्या बात है... लेकिन...

    सिर में ठंडी गिर रही, जब पानी की धार।
    किन राहों फिर आ रहा, वाणी में अंगार॥ :))))

    सादर।

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  7. '... फ़ूलों पर मंडरा रहा है। फ़ूल का मन भी सांवले सलोने भंवरे को देख कर प्रसन्न हो गया। पराग कणों के लालच में फ़ूलों की देह सहला रहा है। फ़ूल लाल हो कर पराग कण छोड़ देगा। दोनो ही बेवफ़ा हैं, फ़ूल ने पराग कण छोड़े और भंवरे ने चुराए और उड़ गया दूसरे फ़ूल की ओर।'
    -फ़ूलों से आपका मतलब fools से है या फूलों(पुष्पों)से ?

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  8. आपका अंदाज़ निराला है समझाने का ,
    मै तो समझा भैया ,
    किसी को क्या समझाने का
    खुबसूरत ही नहीं बहुत गज़ब . बधाई

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  9. सिर पर पानी की धार विचारों की धाराप्रवाह नदी बन गयी .
    वस्तुस्थिति पर गहन दृष्टि !
    बेहतरीन !

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  10. ललित लालित्‍य बाथरूम सीन.

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  11. जहाँ चैट की बत्ती हरी देखी, "लाईक भिक्षाम देहि" और "कमेंट भिक्षाम देहि".........लाल बत्‍ती, हरा बत्‍ती, पीला बत्‍ती, नीला बत्‍ती भर भर कर हास्‍यचासनी में डुबोकर बत्‍ती दे गए :)

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  12. स्नानाबाद से बड़े ही मज़ेदार और लाजवाब चिंतन के साथ बाहर आना हुआ, अगली बार से मोबाईल साइलेंट करके जाया कीजिये तो डिस्टर्ब नहीं करेगा पता नहीं शायद और भी कुछ लेकर आते इसी ने गड़बड़ कर दी...:)
    अनूठा अंदाज़...

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  13. एक बार फिर से करारा व्यंग्य......समझने वाले समझ गए जो ना समझे वो .....

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  14. bahut sahi sateek karara vyangy samay ke mang ke Anuroop.. badhai shubhakamanayen ...

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  15. स्नानाबाद से आपका वैचारिक भ्रमण पसंद आया शिव जी , बारिश, फूल भौरे से चल कर फेसबुक और सम्मान तक । भई वाह । फोन ऑफ कर के बातरूम में घुसिये तब स्नान भी चैन से होगा और विचार धारा भी खंडित न होगी ।

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  16. बहुत ही बढ़िया व्यंग्य !
    हर -हर गंगे !

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  17. कितना बेबस नपुंसक बना देता है एक सम्मान? सम्मान देकर जमीर खरीदने वालों का बाजार गर्म है तो जमीर बेचकर सम्मान पाने वाले भी कम नहीं। जैसे गर्म गोश्त के सौदागर एक रात का सौदा करके नोच लेते हैं बदन को, उसे एक रात की कीमत तो पूरी वसूलनी है। ये सिर्फ़ एक रात ही नोचते हैं , पुरस्कार-सम्मान देने वाले तो जर खरीद गुलाम समझ लेते हैं।......kya baat kyaa baat kyaa baat

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  18. पद्म श्री के लिये फ़िट हो ..
    भाभी से पूछ लेना

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