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सोमवार, 19 नवंबर 2012

चचा छक्कन और चोर पार्टी की सदारत

सुबह की सैर के वक्त चचा छक्कन दिखाई दे गए, दुआ सलाम के साथ हाल-चाल खैरियत का आदान-प्रदान हुआ। "क्या बताएं मियाँ महंगाई ने हालत ख़राब कर दी, जीना मुहाल हो गया। वैसे भी खानदानी होने के चलते हम सरकार की किसी भी एपीएल, बीपीएल जैसे योजना के खांचे में फिट नहीं होते। ऊपर से खुदा के फजल से दर्जन भर बच्चों की फ़ौज तैयार हो गयी। कोई गरीब मानने को तैयार ही नहीं होता। ऐसे में हमारे जैसे निठल्ले साहित्यकार का तो सवा सत्यानाश समझिये। कभी-कभार एक दो मुशायरे कवि सम्मलेन मिल जाते थे, वे भी छद्म श्री की भेंट चढ़ गए। जिसकी छाती पर बिल्ला लटक गया, समझो उससे बड़ा ठेकेदार कोई नहीं। सारे के सारे धन के स्रोतों का प्रवाह उसकी जेब में जाकर गिरता है। गोया उनकी जेब ना हुई,बंगाल की खाड़ी हो गई।" चचा ने जाफरान की खुश्बू का फव्वारा मुंह से छोड़ते हुए कहा। 
"बजा फ़रमाया चचा आपने, कुछ ऐसा ही अपना भी हो गया है। 4 साल से इंटरनेट का कुंजी पटल खटखटाते जेब में छेद हो गया। ऊपर से महंगाई ने तो कनिहा ही तोड़ कर रख दिया है। एक काम करिए, किसी राजनैतिक पार्टी के मेम्बर बन जाइये। फिर धीरे से एकाध पद ले लीजिये, सत्ता वाली पार्टी हो तो पौ बारह जानिए। आपकी जेब भी बंगाल की खाड़ी से कम न रहेगी। फिर हम भी तो हैं आपके साथ ही, जिसकी भी जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने कहेगें, आपके आदेश का पालन करते हुए, तत्काल कर दी जाएगी।" मैंने चचा की जेब में झांकते हुए कहा। "चलो उस पुलिया पर बैठ कर चर्चा करते हैं, तुम्हारी सलाह पर गौर किया जाएगा।" चचा ने कहा।  पुलिया पर झाड़-पोंछ कर बैठने के बाद चचा ने जेब से खैनी निकाली और घिसने लगे। खैनी घिसने का मतलब था की वे चिंतन में व्यस्त थे। थोड़ी देर बाद मुझे खैनी दी और डिबिया जेब के हवाले की।
चलो मियाँ अब तुम्हारी सलाह मान लेते हैं, वैसे भी हम कुछ ढीठ किस्म के इन्सान हैं. एक बार जो सोच लिया वह सोच लिया। ठीक है चचा फिर मिलते हैं ब्रेक के बाद। इस मुलाकात के बाद हम अपने काम में लग गए और चचा अपने नए धंधे में। अपनी व्यस्तताओं के चलते एक-डेढ़ बरस में चचा से मुलाकात ही नहीं हुई।  एक दिन चचा के घर के बाहर बड़ी सी होर्डिंग लगे देखी। उसमे लगी फोटो में चचा ने कलफ लगी अचकन और शेरवानी पहनी हुई थी, ऐनक के पीछे से नूर टपक रहा था। चचा की आदमकद फोटो थी और बड़े नेताओं की छोटी। मैंने एक सरसरी निगाह डाली और आगे बढ़ गया। लौटते हुए मेरी निगाह होर्डिंग पर पड़ी तो गायब थी। मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया।
अगले दिन मुझे सुबह की सैर के वक्त चचा मिल गए। दुआ सलाम के बाद खैरियत पूछने पर उन्होंने मुझे ही निशाने पर ले लिया - आप भी कमाल करते हैं मियाँ, मुझे फंसा कर खुद रफूचक्कर हो लिए, उस दिन के बाद आज खैर-खबर ले रहे हो। अरे कौन सा पहाड़ टूट पड़ा चचा, जो सुबह-सुबह ही फायर हुए जा रहे हो- मैंने चचा से आँख मिलाते हुए कहा। अरे मत पूछो हमारा हाल, वो तो हम ही जानते हैं या उपर बैठा वो जानता है। सालों ने जीना हराम कर दिया, इससे तो निठल्ले ही भले थे- चचा ने पैजामे से ऐनक पोंछते हुए कहा। कुछ तो बताओगे चचा, सियासी पार्टी में तो सभी चांदी काट रहे हैं। जिनको खाने का सऊर नहीं वो भी छिलके समेत केला गटक रहे हैं। जिनके पास भुनाने को कभी दाने नहीं थे वे भाड़ के मालिक बने बैठे हैं और एक आप हैं जो मुझे ही लानत-मलानत  जा रहे हैं।
जब यही बात यही बात है तो सुनो, चचा ने आँखों पर ऐनक लगते हुए कहा - मंत्री जी के चेले ने कहा कि चचा अब आप अध्यक्ष बन गए हैं चोर पार्टी के, कम से कम अपने नेताओं को खुश करने के लिए एक दो होर्डिंग ही लगवा दो। उसमे आपकी फोटो भी रहेगी और नेताओं की भी। इससे आपके नंबर बनने के चांस बढ़ जायेगे और मंत्री जी की गुड बुक में आपका नाम दर्ज हो जायेगा। मियाँ, यहाँ के सियासी दांव-पेंच हमारी समझ से बाहर थे। हमने होर्डिंग बनवा कर लगाव दी। होर्डिंग लगवाने के एक घंटे के बाद ही छुटकू नेता जी का फोन आ गया। बोले कि बहुत बड़े नेता बनते हो चचा, होर्डिंग में अपनी फोटो बड़ी और हमारी फोटो छोटी लगवा दी। कहीं ऐसा न हो आपके पर कतरने पड़ें। हमने तुरंत होर्डिंग उतरवा दी। तभी एक नेता और पहुँच गए, वो कहने लगे कि चचा होर्डिंग हटवाने के बाद दूसरी बनवा कर लगवाइए। 
अब हमने जो होर्डिंग बनवाई, उसमे अपनी फोटो छोटी लगाई, पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं को सिर पर बैठाया। लोकल नेताओं की फोटू लगवाई। मंत्री जी और अध्यक्ष जी की फोटो लगवाई। होर्डिंग लगते ही मंत्री जी का फोन आ गया, बोले कि इतनी जल्दी बड़ी सियासत सीख गए चचा। हमारे विरोधी की फोटो बड़ी और हमारी छोटी लगाई है, हमें नीचा दिखाने के लिए, देखो कहीं आपकी लुटिया न डूब जाये। अब मियाँ हमने फिर होर्डिंग उतरवाई, दूसरी बनवाई, इसमें मंत्री जी और अध्यक्ष जी की फोटो बराबर करके लगवाई, फीते से नाप कर। होर्डिंग लगते ही जेलर के जासूस फिर सक्रिय हो गए। अध्यक्ष जी का फोन आया, क्या मजाक बना रखा है चचा आपने। मंत्री बड़ा होता है या संगठन का अध्यक्ष ? हमने उसे टिकिट दी है तब मंत्री बना है और हमारी फोटो आपने मंत्री के बराबर लगवा दी। हम आपको सस्पेंड करते है। समाचार कल के अख़बारों में देख लेना।
हमारी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। बड़ी देर तक घिघियाए, अध्यक्ष जी हमें गरियाते रहे, फनफनाते रहे। बड़ी  मुस्किल से माने और हम सस्पेंड होने से बच गए। हमने होर्डिंग फिर उतरवा दी। अगले दिन मंत्री जी का फोन आ गया कि होर्डिंग क्यों हटवाई? हमने कहा कि कल के तूफान में होर्डिंग उड़ गयी। मंत्री जी ने कहा कि होर्डिंग फिर बनवाई जाये। उनका आदेश सुनते ही हमारी तो पुतलियाँ फिर गयी और गश आ गया। चुन्नू की अम्मा ने हमें लुढकते देख लिया और पानी के छींटे मारे तब होश आया। होश में आते ही हमने अपना इस्तीफा लिख दिया और अध्यक्ष जी को भेज दिया। हमें छक्कन मियाँ  ही बने रहने दिया जाए। साल भर से ढक्कन बने हुए थे। ये सियासत भी बड़ी गन्दी चीज है मियाँ। होर्डिंग की फोटो से ही इनके कद बड़े-छोटे हो जाते हैं, लानत है इन पर। लाहौल बिला कुव्वत, लौट कर बुद्धू घर को आए। बंगाल की खाड़ी तो नहीं बनी हमारी जेब, हाँ! कंगाल की खाड़ी जरुर हो गयी। अब हम किसी के चक्कर में नहीं फंसेंगे, हम भले और हमारा कुनबा भला।

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

अपन खाथे गूदा गूदा, हमला देथे बीजा बीजा --- ललित शर्मा

छत्तीसगढ की विद्युत व्यवस्था चरमरा गयी है, सरपल्स बिजली होने का दावा करने वाले राज्य में विगत 4 दिनों से अघोषित विद्युत कटौती का सामना करना पड़ रहा है, बिजली कब जाती है इसका पता नहीं। आज रात भर बिजली बंद रही, मंत्रियों के बंगले पर दिन में भी स्ट्रीट लाईट जल रही है और गाँव कस्बों में रात में भी बिजली नहीं। इससे आक्रोश बढता जा रहा है। नवरात्रि का उत्सव चल रहा है, गाँव कस्बों में दुर्गा पूजा चल रही है, दुसरी तरफ़ बच्चों के तिमाही इम्तिहान जारी है। ऐसे समय में बिजली उपलब्ध न होने के कारण बच्चों की पढाई में व्यवधान उत्त्पन्न हो रहा है।

अम्बेडकर मंगल भवन सिविल लाईन रायपुर के पास की जलती हुई स्ट्रीट लाईट 4 बजे दिन
जनता पड़े भाड़ में नेताओं को तो अपना सुख चाहिए, खैर जनता ने चुन कर भेजा है इतना हक तो बनता है यार  :)। विद्युत व्यवस्था सुधरे तो फ़िर मिलते हैं, नयी पोस्ट के साथ। नवरात्रि पर्व की शुभकामनाएं एवं बधाई।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

बुधवार, 28 सितंबर 2011

तू मेरी खुजा और मैं तेरी खुजाऊँ --- ललित शर्मा

देश आजाद होते ही राजतंत्र, लोकतंत्र में बदल गया। नए जनराजा ने सत्ता संभाली। सत्ता सुख के साथ राजाओं के सुख एवं अधिकार भी जनता तक पहुंचे। राजतंत्र में प्रत्येक सुख राजा एवं उसके रागियों के लिए उपलब्ध होते थे। राजा प्रसन्न हो जाता था तो वह सुख कभी-कभी मुंहलगे को भी मिल जाता था। इसमें एक सुख खुजली करने का सुख था। खुजली का सुख तो सिर्फ़ खुजाने वाला जानता है। खुजली को भी एक राज रोग ही माना जाता है। खुजाते हुए जो आनंद की अनुभूति होती है, उसे तो सिर्फ़ खुजाने वाला ही जानता है। लोकतंत्र में प्रजा को भी खुजाने की छूट है। जिस तरह तख्त तक आम जन की पहुंच हो गयी उसी तरह खुजली के द्वार आमजन के लिए खुल गए हैं।

रचनाकारों को खुजली के बड़े भाई दाद की जरुरत होती है। खाज तो थोड़ी देर खुजाने का सुख देती है लेकिन दाद होने पर लम्बे समय तक खुजाने का सुख लिया जा सकता है, यह दीर्घकालिक आनंद देता है। इसकी मीठी-मीठी खुजली के तो क्या कहने। आनंद बयान करने के लिए शब्द नहीं मिलते, मान कर चलिए गुंगे के गुड़ जैसी बात है। खुजली चलती रहती है तो नयी-नयी रचनाओं का जन्म हो जाता है। बिना खुजली के कैसी रचना? और कोई रचना छप गयी तो समझिए खुजली मोहल्ले भर को आनंद देती है। क्योंकि रचनाकार के साथ मोहल्ले का भी नाम जुड़ा होता है। खुजाने का सुख मोहल्लेवालों को भी मिलता है। भले ही खुजा-खुजा  कर लहूलुहान हो जाएं, लेकिन खुजाएगें जरुर।

खुजाने के लिए नाखून जैसे अस्त्र भगवान ने दिए हैं। अगर नाखून न हो कैसे खुजाएं? कहावत है कि गंजे को नाखून नहीं दिए भगवान ने, नहीं तो खुजा-खुजा कर खोपड़ी लहूलुहान कर लेता। अब गंजे की खोपड़ी दूसरा कौन खुजाएगा, उसे खुद ही खुजानी पड़ेगी। इसके लिए बाजार में नाखून भी आ गए हैं। तरह-तरह के रंगबिरंगे नाखून लगाओ और जी भर के खुजाओ। हाँ नाखून काटने की सुविधा नहीं मिलेगी, क्योंकि ये नाखून बढते ही नहीं हैं। चलो बढ जाएं तो पीठ खुजाने के काम आएं, बड़ी समस्या तब होती है जब पीठ खुजाती है। इसकी खुजली मिटाने के लिए तो जर्मन मेड लट्ठ ही कारगर होता है। पीठ की खुजली उसी से मिटती है।

अब खुजाने वालों की क्या कथा बताएं, एक से एक खुजाने वाले पड़े हैं। कोई मतलब से खुजाता है कोई बेमतलब के। मेरे साथ एक मित्र दिल्ली आए, बड़े नेताओं से मिलने के लिए। हम जहाँ भी थोड़ा आराम से बैठते, वे मुंह, कान से लेकर हाथ-पैर सब खुजा डालते। मैने दो चार जगह देखा, फ़िर रहा नहीं गया। यार जहाँ भी बैठो वहीं खुजाने लगते हो, कम से कम जगह तो देख लिए करो, साले अपने साथ हमें भी खुजली बांट रहे हो। तो दूसरे मित्र ने कहा कि-“ इसको वो खुजली वाली खुजली नहीं है, ये तो सिर्फ़ यह चेक करने के लिए खुजाता है कि अमल का नशा उतरा तो नहीं है।“ अमल का नशा उतरा याने हरकत बंद। 

खुजली का सबसे बड़ा वेयर हाऊस सत्ता का केन्द्र दिल्ली बना। सत्ता के गलियारों में तरह-तरह के खुजली वाले मिल जाएगें। कुछ तो मौका पाते ही खुजाने लगते हैं। इनको बस खुजाने से मतलब, चाहे किसी की भी खुजाएं। मूड़ खुजाने से लेकर सब खुजा डालते हैं। कुछ लोगों को तो चलते-चलते खुजाने की बीमारी होती है। जहाँ दिखे नेता जी उनकी खुजाना शुरु कर देते हैं। नेता जी मंत्री की खुजाते हैं, मंत्री जी प्रधान मंत्री की खुजाते हैं। जब प्रधानमंत्री को मैडम का बुलावा आता है तो सबसे पहले मूड़ खुजाते हैं फ़िर दाढी खुजाते हैं, उसके बाद हाजिरी बजाने जाते हैं। दिल्ली की खुजली गाँव में पंच-सरपंच तक पहुंच गयी है। यहाँ भी ये खुजाते ही रहते हैं। कुछ तो खुजा-खुजा कर ही बड़े-बड़े पदों तक पहुंच गए हैं। कुछ की इन्होने खुजा खुजा कर वाट लगा दी है। जिनकी वाट लग गयी वे कोने में खड़े-खड़े सोचते रहते हैं कि अब किसकी खुजाई जाए जिससे कुछ खुजाने लायक ठिकाना तो मिल जाए। कुछ तो खुजाने में इतने माहिर हो गए कि खुजली श्री ही पा गए।

कुछ लोगों को खुजली सिर्फ़ पंगा लेने के लिए होती है। दिन भर बैठे गुंताड़ा लगाते रहते हैं कि आज किसकी खुजाएं जिससे पंगा हो और उनकी खुजली मिटे। ऐसे लोगों की कमी नहीं है। हम भी कु्छ परजीवी टाईप के लोगों से परिचित हैं, जो कभी इधर-कभी उधर झांकते फ़िरते हैं कि किधर पंगा लिया जाए या पंगा कराया जाए, जिससे उनकी दिमागी खुजली मिटे, अगर वे साक्षात सामने मिल जाएं हमें तो हाथ-गोड़, मूड़-कान, पीठ-पेट की  खुजली भी मिट जाए। कुछ लोग तो जब तक बंदर जैसे खुजा नहीं लेते नहाने की सोचते ही नहीं। जब खुजाने में खर्र खर्र की आवाज ना आए नहाने का क्या मतलब? तब तक पंगे लेते रहो और खुजली मिटाते रहो। पंगे की खुजली वालों के लिए एकमात्र दवाई जालिम लोशन ही है ये मान कर चलिए। जब तक आप जालिम नहीं बन जाएगें, तब तक ये जालिम मानते नहीं है।

कु्छ लोगों की उंगलियाँ तो दिन भर नाचती हैं। अगर पाकिटमारी करते तो दिन भर में खूब कमाते। इसमें खेल उंगलियों का ही होता है। उंगलियों के पोर इतने संवेदनशील होते हैं कि इनके स्पर्श से ही पता चल जाता है कि किसकी जेब में कितना माल है। उंगलियों की खुजली मिटाने के लिए पाकिटमारी सही रास्ता नहीं है। अच्छा भला आदमी खुजाल के चक्कर में अपराध की ओर न मुड़ जाए, यही सोचकर कम्पयुटर के कीबोर्ड का अविष्कार हुआ होगा। खटाखट उंगलियाँ चलाओ और खुजली मिटाओ। कीबोर्ड का सिपाही उंगलियों में चल रही खुजली मिटाने के लिए कीबोर्ड पर खटाखट उंगलियाँ चलाता है, स्पर्श सुख से उंगलियों की खुजाल मिटती है और धड़ा-धड़ टाईप भी होते चला जाता है। आम के आम और गुठली के दाम, खुजाल भी मिटी और एक पोस्ट भी तैयार हो गयी।अगर कीबोर्ड न हो तो उंगलियों की खुजली कैसे मिटे यह एक यक्ष प्रश्न है।

लोकतंत्र में खुजाने का अधिकार सबको है और सभी को खुजली का समान वितरण होता है। आज तक किसी ने शिकायत नहीं की है, किसी ने धरना, प्रदर्शन आन्दोलन नही किया कि उसके हिस्से की खुजली कोई बेच खाया या नकली मस्टररोल बना कर खुद हजम कर गया। खुजली के लिए बजट में भी कोई अतिरिक्त प्रावधान नहीं किया जाता। जिस तरह अमेरिकन गेंहूँ के साथ कांग्रेस(गाजर) घास चुपचाप बंट गयी देश में। उसी तरह खुजली भी आम बजट के साथ बराबर हिस्सों में स्वत: बंट जाती है। जिसकी जितनी औकात उसको उतनी ही खुजली का कोटा अपने आप मिल जाता है। अगर खुजली के इस आनंद का पता वित्त मंत्री को चल गया तो इस पर मनोरंजन कर तत्काल लगा दिया जाएगा। तू मेरी खुजा और मैं तेरी खुजाऊँ, मतलब खुजाऊँ। खुजाने का अनंत सुख लेना है तो खुजाना ही पड़ेगा। जब तक खुजली पर मनोरंजन टैक्स नही लगा है, तब तक खुजा खुजा कर खुजली का असली सुख लें। 

चित्र - गुगल से साभार