गुरुवार, 3 मार्च 2011

प्राचीन पद्म तीर्थ राजिम कुंभ की एक दिन की सैर

माघ की पूर्णिमा और छत्तीसगढ का प्राचीन राजिम मेला। दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। त्रिवेणी संगम  का स्थान प्रयाग जैसा ही महत्व रखता है।

बचपन में जब माघ की पूर्णिमा आती थी तो दो दिन पहले से ही बैल गाड़ियों का रेला लग जाता था। 20-20 बैल गाड़ियों की कतारें चलती थी। बैलों के गले में बधी घंटियों की सुरम्य ध्वनि मन को प्रफ़ुल्लित कर  देती  थी।

बसंत का मौसम आल्हादित करता था। बैल गाड़ियों के नीचे बंधी लालटेन अहसास कराती थी कि बैल गाड़ियों का काफ़िला यात्रा पर है। आगे वाली बैल गाड़ी के पीछे सभी बैल गाड़ियाँ कतार में चली जाती थी।

महिला, पुरुष, बच्चे सब अपने घर गृहस्थी का सामान लाद कर चलते थे। माघ पुर्णिमा की  सुबह बैल गाड़ियाँ चित्रोत्पला गंगा यानी महानदी के किनारे अपना डेरा डाल देती थी।

बैलों के लिए चारे पानी एवं आराम की व्यवस्था की जाती थी। दो गाड़ियाँ मुझे दिख ही गयी। एक परिवार हंसता हुआ बैलगाड़ी के मजे लेते हुए जा रहा था।

इसके बाद पहट को सभी  महिलाएं नदी स्नान कर राजीव लोचन भगवान एवं कुलेश्वर महादेव के दर्शन करने जाती थी।

तब तक पुरुष खाना बना कर रखते थे। जब महिलाएं स्नान एवं दर्शन करके आती थी तब पुरुष एवं बच्चे मेला घुमने एवं दर्शन करने जाते थे।

जब 3-4 बजे पुरुष मेला घूम कर आ जाते थे तब महिलाएं अपनी दैनिक उपयोग की वस्तुए खरीदने जाती थी।

इस तरह मेला शिव रात्रि त्तक चलता था। नदी की ठंडी-ठंडी रेत पर रात को ढोलक और झांझ-मंजीरे के साथ भजन और रामायण की चौपाईयों का आनंद लिया जाता था, नौजवान सर्कस एवं टूरिंग टॉकिज की तरफ़ चल पड़ते थे।

एक से एक धार्मिक फ़िल्में मेले का आकर्षण बढा देती थी। हम भी अपनी सायकिल से मेले का आनंद लेते थे। माघ पुर्णिमा से शिवरात्रि तक आज भी मेला चलता है, लेकिन वह बात नहीं रही अब।

रात को मेला तो देख लिया था, अब दिन में भी देखना था। सो तीन बजे हम फ़टफ़टिया से चल पड़े मेले की ओर।

रास्ते में एक भी बैलगाड़ी नजर नहीं आई। मुंह पर स्कार्फ़ बांधे सैकड़ों लांग ड्राईव वाले जोड़े दिखे। जोड़ा तो हमारा भी था बुढउ माट साब के साथ, 3 महीने में रिटायर होने  वाले हैं। सोचा कि इन्हे भी कुलेश्वर महादेव के दर्शन करा दें।

पहले मेला नदी के उस पार राजिम में भरता था। अब नदी में उत्सव स्थल बन जाने के कारण कुलेश्वर महादेव एवं लोमश ॠषि आश्रम तक भीड़ आ जाती है।

साधु संतों के लिए विशाल डोम बना कर आवास व्यवस्था की गयी थी। कुछ लाल बत्ती वाले हाई प्रोफ़ाईल साधु दिखे तो कुछ सिर्फ़ दाल-भात वाले भी। कोई काहू में मगन कोई काहू में मगन।

लोमश ॠषि आश्रम के परकोटे के अंदर नागा साधुओं ने कब्जा जमा रखा था। नगं-धड़ंग-दबंग भभूति रमाए, मोर पंखी  से आशीष बांट रहे थे।

कुंभ मेला शुरु होते ही दूसरे दिन देशी साधु एवं परदेशी साधुओं में खुले आम चिमटे चले थे। जिसमें से कुछ घायल हुए, कुछ बच गए। पुलिस केस भी हुआ। लेकिन नागा लोगों का कौन क्या बिगाड़ सकता है?

जिन्हे अपने वस्त्रों का भी मोह नहीं है। गांजा  की धुआं उड़ रही  थी, चिलम की धोंकनी जारी है, गुट बना कर बम बम भोले का उद्घोष हो रहा है,

चिलम को प्रणाम करते ही एक साधु ने कहा - "जय जय भोले शंकर, कांटा गड़े न कंकर, बैरी दुश्मन को तंग कर। जिसने नहीं पी गांजे की कली, उस लड़के से लड़की है भली। तोड़ दुश्मन की नली,  बम बम कहकर एक गहरा सुट्टा लगाया और ढेर सारा धुंआ उगला, जो हवा में फ़ैल गया। इनकी चेलियाँ भी इर्द-गिर्द घूम रही थी।

मैं किसी नागा साधू से चर्चा करना चाहता था, फ़ोटो लेना चाह रहा था। अब इनके मुंह कौन लगे? कब भड़क जाए क्या भरोसा। लेने के देने पड़ जाएं।

आश्रम में इनकी थाह लेने लगा। वापसी में गेट के पास तख्त पर आसन लगाए एक नागा साधु अपने 10-15 चेलों के साथ टिके हुए थे।

उसके सामने ही एक युवा नागा बाबा जमे हुए थे। उसकी आँखों में चमक एवं सम्मोहकता थी। मैं उसकी ओर ही बढ लिया। उन्होने अपना नाम सनतपुरी बताया और पास ही बिठा लिया।

भभूत लगाई, हम भी कवचित हो गए, मतलब अदृश्य बख्तरबंद धारण कर लिया। बाबा से पूछ कर एक दो फ़ोटो ली। एक सिपाही डंडा लिए खड़ा था। मैने उससे फ़ोटो खींचने कहा तो वह बोला-कमांडर साहब देख रहे हैं। देखते रहे कमांडर हमने माट साब से फ़ोटो ले्ने कहा।

उन्होने भी फ़ोटो की वाट लगा दी। जैसे तैसे काम के लायक एक दो फ़ोटो खींच ही गयी। बाबा जी  को 10 का एक नोट चढाया और हम बाहर खिसक लिए।

कुंभ में सरकारी सेवकों द्वारा साधुओं की डटकर सेवा हो रही थी। सुरक्षा व्यवस्था भी तगड़ी थी। धरम मंत्री के दूत तैनात थे। प्रदेश की किरकिरी नहीं होनी चाहिए।

कोई साधु नाराज न हो, क्योंकि प्रायोजित कार्यक्रम में सबका ध्यान रखना आवश्यक है, स्व स्फ़ूर्त कार्यक्रम में तो स्वयं की व्यवस्था से आना होता है। 

मुझे लगा की मेले का आनंद नहीं  रहा। सिर्फ़ व्यवसायिकता रह गयी, राजिम मेले ने कुंभ का स्वरुप लेते ही प्राण त्याग दिए, मेला तो मिलता है लेकिन आत्मा नहीं मिलती।

एक चाय वाले की दुकान में चाय पी्ने का  मन हुआ तो उसका पता मैने पूछा। उसने धर्म नगरी दामा खेड़ा से आना बताया। सूरत से अखंड बेवड़ा नजर आ रहा था।

मैने पू्छा-धर्म नगरी में दारु मिलती है क्या? नहीं मिलती- उसने कहा। तो तुम कहां से पीते हो? घर में छुप कर पी लेते हैं जिससे साहेब को पता मत चले। उससे चाय पी  कर आगे बढ लिए।

एक स्थान पर विभिन्न मंत्रालयों की प्रदर्शनी लगी हुई थी। अवलोकन करते हुए भंडार ग़ृह के टैंट में पहुंचे, वहाँ मु्ख्यमंत्री एवं अशोक बजाज के आदमकद फ़्ले्क्स लगे थे।

चित्रावलियाँ सजी थी, लेकिन किसी भी फ़्लेक्स में हमारी फ़ोटो नहीं मिली। मिलती भी कैसे? इतना समय तो हम देते ही नहीं है कि अध्यक्ष महोदय के गोदाम  निरीक्षण-परीक्षण के दौरे पर फ़ोटो लेने के वक्त साथ रहें।

कभी रहे भी हैं तो सक्रीय कार्यकर्ता सामने आ जाते हैं, जिससे उनकी सक्रीयता दिखे। चलो कोई बात नहीं, फ़िर कभी। आगे भी कुंभ होते रहेगें। लगते रहेगें जिन्दगी के मेले। वन विभाग के टेंट में धान से भूसे को प्रेस करके ठोस इंधन बनाया गया था तथा उसके उपयोग की सिगड़ी भी रखी थी।प्रयास अच्छा है।

स्वास्थ्य विभाग के टेंट में डॉक्टर तो मिले नहीं, सिर्फ़ कर्मचारी ही थे। कौन इनसे मगजमारी करे? आगे बढ गए। बाहर आते ही एक बहु चर्चित फ़ारेस्ट गार्ड मिल गया। यह हमेशा ही अपने कारनामों से निलंबित रहा है, इसे एक स्टार लगाए देख कर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन मैं जल्दी ही सभंल गया क्योंकि ऐसे ही महान लोगों की जरुरत वि्भाग को होती है।

नदी के किनारे एक लुंगी कुरते में मूसल सा लेकर बैठा था। नजदीक जाने पर पता चला की रामकंद है। अक्सर हमने मेले में इसके पतले-पतले स्लाईस खाए हैं।

रामकंद उड़ीसा के नरसिंह नाथ में पाया जाता है। इसे बरसों रखा जा सकता है। सुब्रमणियम राव ने इसके फ़ायदे भी बताए, इसका सेवन करने से बवासीर भगंदर, गैस अफ़ारा आदि रोगों में फ़ायदा मिलता है।

उसकी फ़ोटो लेने लगा तो कहने लगा - ले लीजिए फ़ोटो, सबकी अपनी-अपनी दुकानदारी है, पेट लगा ही है। फ़िर उसने दैनिक भास्कर के एक समाचार की कटिंग निकाल कर दिखाई, जिसमें उसके एवं रामकंद के वि्षय में जानकारी छापी थी किसी संवाददाता ने।

आजकल कोई फ़ोटो भी मुफ़्त में नहीं देता, उसके लिए भी कुछ दे्ने पड़ते हैं, इसलिए अपना मोबाईल कैमरा सही है। चुपके से काम कर जाता है। हवा भी नहीं लगती।

घर लौटते हुए, धान की लाई (खील) के गुड़ चढे उखरा लेने नहीं भूले, यही मेले की मिठाई होती है। पहले मेले में गन्ने (कुसियार) आते थे। लेकिन अब नहीं दिखे, जलेबी शक्कर पारा भी कम ही दिखे।

हाँ  5 रुपए में भोजन देने वाले दाल-भात सेंटर भरपुर थे, इनकी संख्या 50 से उपर बताई जा रही थी। लेकिन मुझे तो खाली ही नजर आए।

शायद ही कोई जाता होगा खाने। फ़िर भी व्यस्था चोखी समझी जाए। महाशिवरात्रि पर्व पर कुंभ मेले का समापन है।

सभी देवता निज धाम को प्रस्थान करेंगे। छोड़ जाएगें पावन नदी में अपना कुड़ा करकट मल-मुत्र। जिसे झेलेंगे हम ही और हमारी आने वाली पीढी।

पुराने पुल के पास नया पुल बन रहा है। शायद अगले साल 10 किलो मीटर का फ़ालतु चक्कर नहीं काटना पड़ेगा। शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने बड़े ही सरल शब्दों में अपने उद्गार प्रगट किए। 

22 टिप्‍पणियां:

  1. महा शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ
    हर हर बम बम

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  2. फोटुओं की तरह ही स्‍पष्‍ट शब्‍दचित्र.

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  3. बहुत सारी जानकारी...बचपन में कभी खाया था रामकंद.

    हर हर बम बम!!

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  4. वाह वाह ! अच्छी तरह से घूमा दिये मेले मे। इलाहाबाद के कुम्भ मेले मे नागाओं की तरह तरह की किस्में दिखती हैं... चांदी के सिंघासन पर विराजने वाले से लेकर लिंग से भारी पत्थर उठाने वाले भी। उनके आसपास जाते हुए रहस्यमयी अनुभूति होती है... लेकिन आज के दौर मे जहां भी देखो पार्श्व मे हर जगह बाज़ार और दूकानदारी खड़ी है।

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  5. राजपथ पर बैलगाड़ी और सुकून का वातावरण, निश्चय ही मेला होगा।

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  6. गुड के रस पगी उखरा और रामकंद , दोनों के बारे में पहली बार ही जाना ..
    अच्छा लगा मेला वृतांत ...
    महाशिवरात्रि की शुभकामनायें !

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  7. जिमीकंद तो सुना था ये रामकंद के बारे में पहली बार जाना। यहां दिल्ली में ये मूसल सा लेकर बैठ जाऊं और पास में उन खासियतों का बोर्ड लगा लूं, जो आपने बताई हैं तो शाम को 2-4 हज़ार रुपये कमाकर ही उठूंगा। वैसे चाहिये हो तो मिलेगा कहां?

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  8. आपने तो मेले में ही पहुंचा दिया .. बैलगाड़ियों की रुनझुन और स्त्री- पुरुषों का वह सामंजस्य सचमुच बहुत सुंदर रहा होगा ..अब न वह प्रकृति है न ही वह सौन्दर्य !

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  9. ऐसा लगा जैसे मैं खुद घूम आया राजिम मेला।

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  10. राजिम कुम्भ का सुंदर यात्रा -वृत्तांत . आभार . महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं .

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  11. राजिम तो घूम ही लिए आपके साथ
    लेकिन अब अगली बार चला ही जाए

    बढ़िया लेखन शैली व वृतांत

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  12. बम-बम भोले , क्या चित्र खींचे ललित जी , बहुत खूब ! :)

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  13. हर हर महादेव शंभो, बहुते सुंदर चित्र और उतनी ही लाजवाब रपट लगाये हैं. बहुत आभार.

    रामराम.

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  14. "कुम्भ" को छोड़कर हमारे लिए बाकी सभी जानकारी नई थीं. मेला दिखाने का आभार .

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  15. पहले तो समझ नहीं आया पर बाद में ज्ञानचक्षु खुले कि बाबा के इतने नजदीक क्यों बैठे थे भाई.
    चिलम की हवा का रुख अपनी ओर जो था :-)

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  16. ललीत जी ,

    भले जो मैने कहा वह सच था, मगर उसे कहने के लिये जिस लहजे का इस्तेमाल किया वह सचमुच बेहुदा और गलत था ,इसका मुझे अफ़सोस है और इस गलती के लिये मै माफ़ी चाहुँगा ....अभद्रता भी सार्वजनीक थी ,सो माफ़ी भी सार्वजनीक मांग रहा हुँ ! आप ने सही कहा हमे ब्लाग को गंदा नही करना चाहीये ,इससे सार्थक भविष्य पैदा हो सकता है !

    दीपक

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  17. बम बम बम लहरी !
    अति विशिष्ठ प्रस्तुति ।

    मेहनत की है भाई ।
    दे रही है दिखाई ।

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  18. अरे बाबा तो बिलकुल नंगा बेठा हे, मुझे यह आम बाबा जी नही लगे, क्योकि पुरे शरीर पर राख या कुछ ओर मल रखा हे, कही यह बाबा शमशान वाले बाबा जी तो नही, बाकी मेले के मजे हम ने भी आप के संग ले लिये.
    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें.

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  19. jo na piye ganje ki kali,
    us ladke se to ladki bhali.

    जो न पीये गांजे की कली, उस लड़के से तो लड़की भली

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