शनिवार, 25 दिसंबर 2010

ब्योम बाला के साथ चेन्नई की उड़ान

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जब घर से यात्रा के लिए चला तो मैने दिल्ली से चेन्नई तक का हवाई जहाज का किराया देखा तो लगभग 4 हजार रुपए था। लेकिन आलस के कारण बुक नहीं किया। सोचा कि दिल्ली जाकर बुक कर लुंगा।

जब दिल्ली पहुंचा तो यही किराया 7000 हो चुका था। वह भी इंडिगो जैसी फ़्लाईट में। सीधा 3000 रुपए का फ़टका खाया आलस के कारण।

परमानंद जी और हम सुबह 9 बजे एयरपोर्ट पहुंच चुके थे। सुरक्षा जाँच से गुजरने में आधा घंटा लग गया। मेरा हैंड बैग एक्सरे मशीन ने रोक लिया। जब वहां पहुंचा तो उन्होने बताया कि आपके बैग में ब्लेड है।

मुझे याद आया कि छ: महीने पहले उड़ीसा गया था तब मैने सेंविंग के लिए ब्लेड मंगाई थी। उसे कब का भूल चुका था। मैने ब्लेड निकाल कर उनके ही सपुर्द कर दी। जब लाऊंज में पहुंचे तो पता चला कि फ़्लाईट आधा घंटा विलंब से चल रही है। काफ़ी पीकर समय गुजारने लगे। तभी घोषणा हुई कि चेन्नई की सवारी तैयार हो जाएं।

एक बार फ़िर सुरक्षा जांच की गयी। फ़िर लोफ़्लोर बस में सवार होकर प्लेन तक पहुंचे। मुझे प्लेन में पीछे की सीट में बैठना कभी पसंद ही नहीं है। इसलिए पहले आओ पहले पाओ योजना के अंतर्गत मैं पहले ही बोर्डिंग करना पसंद करता हूं जिससे मनचाही विंडो सीट मिल जाती हैं।

कुछ सवारियो को विंडो सीट से डर लगता है। नीचे झांकने पर चक्कर आ जाता है उल्टी तक हो जाती है। लेकिन मुझे विंडो सीट ही पसंद है जिससे बादलों के नजारे देखने को मिलते हैं।

इस बार भी 3-ए सीट पर सवार हुए। प्लेन ने दिल्ली से गुड़गांव तक का चक्कर पैदल ही लगाया उसके बाद अपने रन वे पर पहुंचा। इसमें आधा घंटा लग गया। एटीसी से आदेश मिलने पर प्लेन ने उड़ान भरी और हम उड़ चले नील गगन में चेन्नई के लिए।

व्योम बालाओं ने मुस्कुराकर स्वागत किया। लेकिन पेशेवर मुस्कान गहरे नहीं पैठती। सीट बेल्ट खोलने की सूचना मिल चुकी थी।

व्योम बालाओं ने अपनी ट्राली संभाल कर दुकान शुरु की। पानी, साफ़्ट ड्रिंक, कोल्ड ड्रिंक, कुकिज, सेंडबिच खिलौने, एयर बेग, ज्वेलरी, इत्यादि बेचना शुरु किया।

दो घंटे की फ़्लाईट में टाईम पास करना भी मुस्किल हो जाता है क्योंकि प्लेन की सवारी बहुत मुस्किल से ही आपस में संवाद करती है।

मेरे साथ तो परमानंद जी थे। इसलिए इस बार टाईम पास हो गया। भूख लगी तो सेंडवि्च लिए। परमानंद जी बोले कि प्लेट नहीं दी।

व्योम बाला ने कहा कि प्लेट नहीं है आपको ऐसे ही खाना पड़ेगा। तभी मुझे ध्यान आया कि घर से चलते समय श्रीमती जी ने नास्ते के लिए कुछ प्लेट मेरे हैंड बैग में डाली थी। फ़िर क्या था हमने वही निकाली और सैंडविच खाने लगे। व्योम बाला हमारे जुगाड़ को देख रही थी।

खिड़की से बादलों के अद्भुत नजारे दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था कि बादलों के पार भी अलग ही दुनिया है।

बादल पहाड़ों की तरह नजर आ रहे थे। जिस पर सूरज की सुनहली किरणें फ़ैल रही थी। जिससे कुछ बादल तो स्वर्णिम हो गए थे।

जब कभी भी प्लेन की सवारी करता हूं और बादलों का अद्भुत नजारा देखने मिलता है तो लगता है कि बस प्लेन का दरवाजा खोल कर छलांग लगा दूँ और पक्षियों की तरह बादलों के बीच उन्मुक्त होकर उड़ान भरुं।

एक एक बादल के पास पहुंच जाऊं और उससे संवाद करुं, बात चीत करुं। उसे हाथ लगा कर देखुं, उसकी कोमलता का अहसास करुं। उसकी पानी की कोठरी तक पहुंच जाऊं जहाँ वह जल भर कर लाता है और हमारे उपर बरसाता है। बस कु्छ इसी तरह के मनोभाव पैदा होते हैं मन में और यात्रा चलते रहती है।

इसी बीच मुझे याद आता है कि भाई योगेन्द्र मौदगिल ने एक गजल संग्रह (अंधी आँखे गीले सपने) भेंट किया था। उसे बैग से निकाल कर पढता हूँ। एक से एक उम्दा गजलों का खजाना खुल जाता है।

एक बानगी देखिए –“ हर यार हो दिलदार, जरुरी तो नहीं है, मिलता ही रहे प्यार जरुरी तो नहीं है। हमको तो बस एब एक है बस प्यार का मिंयां, वो भी तो करें प्यार, जरुरी तो नहीं है।----

आगे देखिए,-- माना के सूरज की तरह हर शाम ढलना है हमें, हर हाल में लेकिन अभी भी और चलना है हमें। माना ये दुनिया दुखों की गार है लेकिन मिंयां। सुखद स्वप्नों की तरह आँखों में पलना है हमें। मयकदे में झूमना तो मयकदे की रीत है, बहकना हर पल यहाँ, हर पल संभलना है हमें।

गजलों में भरा महुए का रस मदहोश कर रहा था। शब्द जब जागते हैं तो मुझे उनकी धड़कन का अहसास होता है। ऐसा घटते रहता है और मैं शब्द में डूब जाता हूँ।

पायलट ने मौसम खराब होने के कारण तीन बार सीट बेल्ट बांधने का निवेदन किया। चेन्नई पहुंचते पहुंचते मौसम बहुत खराब हो चुका था।

बादलों में से गुजरते हुए प्लेन थरथरा रहा था। मैं खिड़की से देख रहा था बादलों की रफ़्तार को। बारिद कहीं बरस रहे थे।

तभी अचानक मेरी बाँयी आँख के डोले में दर्द उठा और पूरी आँख में भर गया। असहनीय दर्द था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

मैने हाथ से आँख को दबाकर रखा जिससे दर्द कुछ कम हुआ। थोड़ी देर में दर्द शांत हो गया। पायलट ने घोषणा की –“ अब हम नी्चे जा रहे हैं सीट बेल्ट बांध ले। कुछ देर पश्चात चेन्नई एयरपोर्ट पर लैंड करेगें।

प्लेन के नीचे आते ही समुद्र दिखाई देने लगा। साथ ही चेन्नई की धरती भी। मौसम खराब था, प्रकाश कम होने के कारण प्लेन सही सलामत लैंड करले यही बड़ी बात होती है और पायलट की कुशलता का भी परिचय मिलता है। प्लेन ने लैंड कर लिया।

एक बार फ़िर बस ने हमें लाऊंज तक पहुंचाया। अपने लगेज का इंतजार करते हैं। पहले बोर्डिंग करने से सीट तो मन माफ़िक मिल जाती है पर लगेज पहले चढाने के कारण सबसे आखिर में आता है। आखिर मेरा बैग दिखाई दे ही गया। चलो एक यात्रा पूरी हुई। आगे पढ़ें 

21 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया लगा आपका ये यात्रा विवरण भी

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  2. अचानक क्‍या हुआ, आंख का दर्द 'अंधी आंखें, गीले सपने का असर तो नहीं था.

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  3. आप यूँ ही हवा में रहें, कल्पनाओं की।

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  4. bhayai guruji prnaam vyom bala kaa hvaa men terti chilgadi ke vivrn ke saath jo chitrn he jo mnzrkshi he bs mza aa gya hmne ghr bethe hi sfr kr liya or sendvich bhahbhi ji ki di hui plet men khane ka mzaa utha liyaa behtrin adnaaz he yeh kmaal sirf or sirf aap hi kr skte hen aakhir guru kiske ho bhayi. akhtar khan akela kota rajsthan

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  5. @दिनेशराय द्विवेदी

    आकर अपोलो में जांच करवाई। आँख में प्रेशर बढ गया था शायद। सारी जांच ठीक ही निकली।

    इसके बाद मैने 20 किलो मीटर की पदयात्रा भी करके देखी। जिसमें 8 किलोमीटर लगभग पहाड़ की चढाई उतराई भी थी। कोई समस्या नहीं हूई। मतलब मामला फ़िट है।

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  6. रोचक अभिव्यक्ति

    लगता है व्योम बालायों के ओझल होते ही आँख का दर्द ठीक हो गया :-)

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  7. जब कभी भी प्लेन की सवारी करता हूं और बादलों का अद्भुत नजारा देखने मिलता है तो लगता है कि बस प्लेन का दरवाजा खोल कर छलांग लगा दूँ और पक्षियों की तरह बादलों के बीच उन्मुक्त होकर उड़ान भरुं। एक एक बादल के पास पहुंच जाऊं और उससे संवाद करुं, बात चीत करुं। उसे हाथ लगा कर देखुं, उसकी कोमलता का अहसास करुं। उसकी पानी की कोठरी तक पहुंच जाऊं जहाँ वह जल भर कर लाता है और हमारे उपर बरसाता है।
    bahut sundar linee hai.

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  8. @Akhtar Khan Akela ji

    "चीलगाड़ी' की आपने याद दिला दी,मैं तो भूल ही गया था।

    बचपन में जब दिख जाती थी तो खुले मैदान में आसमान की तरफ़ देखते हुए खूब दौड़ लगाते थे और गिर भी पड़ते थे।

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  9. बहुत रोचक वर्णन ..बादलों से मिलने की आपकी कल्पना बहुत अच्छी लगी ....और मद्गिल जी की रचनाओं से भी परिचय मिला ..आभार

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  10. यात्रा विवरण है कि पूरी की पूरी एक कविता है. बानगी भी है :

    "पक्षियों की तरह
    बादलों के बीच उन्मुक्त होकर उड़ान भरुं
    एक एक बादल के पास पहुंच जाऊं
    और
    उससे संवाद करुं,
    बात चीत करुं।"
    चलो एक कविता भी पूरी हुई

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  11. आनन्द आ गया आपकी इस यात्रा के वर्णन में..

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  12. व्योम बाला जब बिना प्लेट के सैंडविच दे रही थी तो मुँह खोल देना था जी। कहते मेरे हाथ गंदे हैं, खिला भी दीजिये।:)

    प्रणाम

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  13. अरे वाह मेरी बात सच निकल रही हे जी, अब जहाज मै भी समान( खाने पीने का) बिकना शुरु हो गया हे,अंतर जी की बात पर गोर करे, उस बाला को कहते मेरे पास बेठ ओर मुझे खिला वरना आधे पेसे पलेट के कम मिलेगे. राम राम जी

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  14. ...मैंने बहुत पहले एक बार जैसलमेर से दिल्ली की यात्रा इंडियन एअरलाइंस से की थी जब पहली बार पाया था कि पहले आओ पहले पाओ जैसा भी कुछ होता है पर, आपकी पोस्ट पढ़ कर लगा कि शायद अब ये आम बात है :)

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  15. aisee sundar aur jeevant charchaa....lagata gai, mai bhi saath-sath safar kar raha hoo.

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  16. पेशेवर मुस्कान गहरे नहीं पैठती ...
    सही !
    बादलों के बीच उड़ने का रोचक यात्रा वर्णन !

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  17. रोचत यात्रा-वृतांत रहा..
    गज़ल की लाइनों ने मजा दुगना कर दिया...

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