रविवार, 5 दिसंबर 2010

पनघट की पनिहारिन और जबलपुर का गक्कड़ भर्ता

कालबेल बजने से सुबह हुई और खटिया की चाय पहुंच गई। समय देखा तो आठ बज रहे थे। मिसिर जी याद आ गए कि जल्दी तैयार होना है। गुरुदेव खुमारी में थे, लेकिन भेड़ाघाट और धुंवाधार दर्शन के लिए तैयार होना ही था।
भेड़ाघाट का जो प्राकृतिक सौंदर्य किताबों में पढा और चित्रों में देखा उसे प्रत्यक्ष देखने का उत्साह था। हम फ़टाफ़ट तैयार हो गए। मेरा नाश्ता करने का मन नहीं था। सिर्फ़ गोरस लिया और अवधिया जी ने नाश्ता किया विजय सतपती जी के साथ।

नाश्ता करते करते मिसिर जी का फ़ोन आ गया कि वे पहुंच रहे हैं। गिरीश दादा को लेकर आते हैं। लेकिन दुश्मनो की तबियत नासाज हो गई, गिरीश दादा को बुखार आ गया। रात ही कहा था कुछ ले लीजिए, स्वास्थ्य ठीक रहेगा। लेकिन बात न मानने की सजा भुगतनी पड़ती है। लग गयी न सर्दी,यही होता है बुजुर्गों की बात न मानने का नतीजा। ये आज कल के लड़के समझते कहां हैं किसी को?  

सो मिसिर जी पहुंच गए लेकिन बवाल साहब के इंतजार में बवाल होता रहा। एक मुजरा याद आ रहा था " बड़ी देर से दर पे आखें लगी थी, हुजुर आते-आते बहुत देर कर दी"। इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुई बवाल साहब आ गए।

जबलपुरिया पान का आनंद दुकानदार के अंदाज से कई गुना बढ गया। उसने पान बना कर अपने हाथों से खिलाया। मान गए भाई मनुहार का अंदाज गजबै ही था। ऐसा कहीं देखा नहीं।

मौसम सर्द हो चुका था हमने भी कंधे पर सफ़ेद कमरी डाल ली, कहीं ठंड न लग जाए। चल पड़े धुंवाधार की ओर। रास्ते में मिसिर जी की शायरी की चर्चा हुई। देश में एक से एक धांसु शायर हुए लेकिन फ़ाड़ु शायर सिर्फ़ मिसिर जी ही निकले।

इनके एक एक शेर में बब्बर शेर सी ताकत होती है और दार्जलिंग जी चाय जैसी खुश्बु के साथ ताजगी। एक बानगी देखिए -- मेरे प्यार को तू झूठी तोहमत न लगा, मेरे जैसा यार तुझे जन्नत में न मिलेगा.

आगे देखिए -- जब जर्द पत्ते खूब हवा देने लगे है ,जीने की दुआ..... दुश्मन देने लगे है, गम हद से गुजर कर आने लगे है, उदासी से मंजिल का पता देने लगे है. बस युं ही हंसी के ठहाके लगते रहे और कारवां बढता रहा।

पहुच गए धुंवाधार, दूर से ही उड़न खटोला दिखाई देने लगा। उड़न खटोले पर ही पार चलते हैं धुंवाधार के। हवा में लटक कर प्रकृति का नजारा देखेगें। जो कहीं नहीं देखा वो यहां हुआ,

लघु शंका पर भी एक रुपए का टैक्स है। अगर रेजगारी नहीं है तो पेट पकड़े खड़े रहिए। उड़न खटोले की आने और जाने की टिकिट प्रति व्यक्ति 60 रुपए है। मिसिर जी ने टिकिट लिया और हम बैठे उड़न खटोले पर। विजय सतपती, अवधिया जी, हम, मिसिर जी, बवाल साहब उड़ लिए।

उड़न खटोले से धुवांधार की  फ़ोटो ली गयी। पार उतरे जाकर, धुंवाधार के नजदीक पहुंचे, लेकिन बरगी डैम में पानी रोक दिए जाने के कारण धुंध नहीं बन रही थी। पर्यट्कों की नासमझी के कारण इस स्थान को काफ़ी नुकसान पहुंचा है।

झरने के पास से ही मार्बल खोदा जा रहा है जिससे झरने के प्राकृतिक स्वरुप को नुकसान पहुंच रहा है।पानी की तेज धार ने चट्टानों को छेद कर शानदार कलाकृतियों का निर्माण किया है। यहां  आकर पता चलता है कि प्रकृति से बड़ा शिल्पकार कोई नहीं।

लौट चले अब भेड़ा घाट की ओर तभी बवाल साहब को कूंए पर पानी भरती कुछ पनिहारिने नजर आई और उन्होने ड्रायवर को गाड़ी वापस मोड़ने का हुक्म दिया। बहुत ही मनोरम दृश्य था।

एक  पनिहारिन पनघट से सिर पर दोघड़ रखे आगे आ रही थी। जब से नलके लग गए गांव में तब से ही पनघट की रौनक खतम हो गयी। पता नहीं इसी पनघट ने कितनों को कवि शायर बनाया। कितने कवि यहां से उर्जा पाते थे। गांव की गोरी और पनघट का सीधा संबंध है।

लेकिन नलकों ने पनघट को बर्बाद कर दिया। अब तो कूंए की मुंडेर पर कौआ भी नहीं बैठता। पनघट पर पहुंचते ही बवाल साहब ने “माटी की गागरिया” नामक कविता सुनाई। सही मौके पर सही चोट। फ़िर क्या कहने थे। शब्द शब्द अंतरमन तक उतर गए। हम अंतर में ही तैरते रहे।

ये कंकाल मन के साथ जुड़ा है और मन यार के साथ जुड़ा है। यार और मन का मिलन हो गया। कंकाल कहीं पीछे छूट गया। बुराईयों की जड़ कंकाल में है, मन के साथ बुराईयां भी चली आती है कंकाल की, लेकिन यार की चलनी में सब छन जाता है। कूड़ा ठिकाने लग जाता है, निर्मल मन ही वहां तक पहुंच पाता है। तभी यार से मिलन हो पाता है।

बस आनंद ही आनंद पनघट से गागर में भर कर मैं चल पड़ा। कब पंचवटी आई पता ही नहीं चला। भेड़ाघाट पहुंच कर नर्मदा जी के दर्शन हुए। विशाल जल राशि नर्मदा का बहता हुआ पानी, बस एक ही आवाज निकली नर्मदे हर, नर्मदे हर।

बवाल भाई ने नाव तय की 400 रुपए में। मिसिर जी को कल से बुखार था। बवाल भाई दिल पर हाथ रखे बैठे थे, दिल की बीमारी जो है, दिल लगा बैठे हैं उस यार से। बस रुहानी अंदाज में ही गाते हैं।

हमारे कहने पर चल पड़े भेड़ाघाट में नर्मदा जी की सैर में। सैर नहीं, मां नर्मदा की गोद में किलोल करने। नाव चलते जाती है, संगमरमर का अद्भुत सौंदर्य सामने आता है,

मल्लाह कहता जाता है और हम सुनते जाते हैं। एक जगह पहुंच कर बोला- “यह मगरमच्छ की खोह है। एक फ़ैमिली रहती है, हम दो हमारे दो, दो बड़े दो बच्चे, देखना है किसी को? तो एक मित्र ने कहा देखना है। तो वह बोला – “ एक को फ़ेंक दो बाकी को दिख जाएगा। हा हा हा” कितना उम्दा तरीका बताया मगरमच्छ देखने का।

 
एक जोड़ी चप्पु चल रहे हैं नाव आगे बढती जा रही है। मैं सोचता हूं कि अगर किनारे बैठा रहता तो इस अद्भूत मरमरी सौंदर्य के दर्शन नहीं कर पाता। ईश्वर ने आंखें सौंदर्य देखने के लिए दी हैं और इसे देखने के लिए गहरे ही उतरना पड़ता है।

एक स्थान ऐसा आता है कि जहाँ पहुंचते ही लगता है कि अब यहीं रम लिया जाए। इस स्थान पर भगवान दत्तात्रेय की साधना स्थली एक खोह के रुप में है। यह वह स्थान हैं जहां पुण्यात्माओं ने साधना करके उपस्थान को पा लिया।

नि:संदेह समाधि लग जाती होगी। अगर कोई जुता जुताया खेत हो तो उसमें भरपूर फ़सल होने की संभावना रहती है। रास्ते में एक भूल भूलैया के बाद हम बंदर कूदनी तक पहुंचते हैं। यहां पर दोनो पहाड़िया आपस में मिली हूई इतनी नजदीक है कि नर्मदा के आर पार बंदर कूदा करते थे।

यहां वापस मुड़ गए, एक स्थान पर मोक्ष बिंदु है, जहां से लोग जान देने के लिए नर्मदा में छलांग लगा देते हैं। पुर्णिमा की चांदनी में संगमरमर की चमक वैसे भी 600 फ़िट पानी में कूदने के लिए मानव मन को आन्दोलित करती होगी है।

यहां पर कई फ़िल्मों की शु्टिंग भी हुई है, जिसमें “जिस देश में गंगा बहती है” बस अब एक गीत सुनने की इच्छा हुई,

बवाल भाई ने गाया, “ मेरा नाम राजु घराना अनाम, बहती है नर्मदा जहाँ मेरा धाम।“ संगमरमरी वादियों ने भी सुर में सुर मिलाया। खूब मेला जमा माँ नर्मदा की गोद में।

अद्भुत और बहुत ही अद्भुत इसके आगे आकर शब्द सामर्थ्य खो जाता है। बस अपलक निहारता रहा सौंदर्य को।

प्रकृति ने संगमरमर पर कई तरह ही अद्भुत शिल्पकारी दिखाई है, कहीं कार, कहीं कमल, कही तपस्यारत योगी, कहीं भालु, कहीं ब्रह्मा विष्णु महेश दिखाई देते हैं। आप जो भी ढुंढना चाहे मिल जाएगा। भाई बवाल के गीत वादियों में गुंज रहे हैं साथ ही मेरे कानों में भी। वापसी पर खाने का समय हो चुका था।

सुबह मैने गोरस ही लिया था इसलिए पेट में चूहे कूदने लगे, इसलिए हम गक्कड़ भर्ता खाने ग्वारी घाट पर चल पड़े, बवाल साहब साथ थे इसलिए लाल साहेब का फ़ोन नहीं आया।

ग्वारी घाट में अग्रवाल होटल में जमकर गक्कड़ भर्ता खाए, भूख भी जोरों की लगी थी। कलाकंद भी लिया। भर्ता की सौंधी सौंधी खुश्बु अभी तक साथ है।

यहां से होटल सुर्या आ गए, गक्कड़ों ने असर दिखाना शुरु किया, आलस छाने लगा। मिसिर का फ़ोन आया कि वे कैमरा कहीं भूल आए हैं।

हम तो उनकी फ़ोटुओं के भरोसे ही थे। हमने ग्वारी घाट होटल में भूल आने का कयास लगाया। जो कि सही था, लेकिन लगता है होटल वाले ने दबा दिया। मिसिर जी का नुकसान हो गया। मिसिर जी कैमरा ढूंढते रहे।
5 बजे दीपक की गाड़ी आ गयी, अवधिया जी बाटलियाँ खाने की जुगत में लग गये।  

हम दीपक के साथ 1904 में स्थापित गन कैरिज फ़ैक्टरी देखने चले गए। पास में ही हनुमान जी का मंदिर है विशाल प्रांगण में।

महाबली के दर्शन किए, इनके बिना तो हमारा काम ही नहीं चलता। एक अर्जी लगाते ही अच्छे-अच्छों को सुधार देते हैं। यहां से दन्डवत कर, स्टेशन चौराहे पर सांई मंदिर में गए। इस मंदिर को एक जोसेफ़ एन्थोनी नामक इसाई ने बनवाया है उसका नाम पत्थर पर खुदा है। यह देखना अच्छा लगा।

हमारी ट्रेन रायपुर के लिए साढे नौ बजे थी। भोजन के पश्चात दीपक ने स्टेशन छोड़ दिया, वहां अवधिया जी मिल गए। ट्रेन लेट आई। ठंड भी बढ गयी थी। टीचर्स की गर्मी भी काम नहीं आ रही थी। कांगड़ी होती तो कुछ ठंड का मुकाबला भी करती। ट्रेन चल पड़ी अंधेरे को चीरते हुए गंतव्य की ओर………….. जबलपुरिया ब्लागर को सलाम नमस्ते।

33 टिप्‍पणियां:

  1. नर्मदे हर! नर्मदे हर!... भेडाघाट की मनमोहक सुंदरता का वर्णन बहुत बार सुना है... चप्पुओं की छ्च्प छप्प के साथ संगमरमरी प्राचीरों से घिरे इस अनुपम सौंदर्य का सजीव और सुन्दर वृत्तांत जैसे भेडाघाट को साक्षात कर गया...उसपर ब्लॉगर मित्रों का साथ हो... उन्मुक्त स्वरलहरियां और खिलखिलाहटें हों तो कहने ही क्या ...

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  2. हम तो ऐसे निठल्ले थे कि पचमढी में, जहाँ लोग एक दिन में भ्रमण कर लेत हैं, हम छह दिन रुके रहे लेकिन जबलपुर नहीं गये कि फ़िर दोबारा आने का मन नहीं करेगा। भेड़ाघाट देखने का इरादा तो पहले से ही है, आपने और आग लगा दी है अब। और वो मगरमच्छ परिवार भी दिखाना है साथ वालों को।
    मजा आ गया शर्मा जी, आभार स्वीकारें।

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  3. हर बात पर बात निकले ऐसी बतरसी पोस्‍ट. मेरी नागपंचमी पोस्‍ट का एक अंश यहां लगा रहा हूं-
    मैं अभी गया था जबलपुर, सब जिसे जानते दूर-दूर।
    इस जबलपुर से कुछ हटकर, है भेड़ाघाट बना सुंदर।
    नर्मदा जहां गिरती अपार, वह जगह कहाती धुंआधार।
    कल कल छल छल, यूं धुंआधार में बहता जल।

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  4. अब जबलपुर आये भी तो मगरमच्छ देखने की जिद तो बिल्कुल नहीं करेंगे।

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  5. भाई रपट तो जोरदार दे दी है ये है असली हम ब्लागर मित्रों के घूमने फिरने की अधिकारिक रपट . रही कैमरा गुमने की तो उसका कोई रंज नहीं बस रंज इस बात का है की उस डिजिटल कैमरे में करीब २०० फोटो थी जो मेरे लिए अमूल्य थी .. बस मोबाइल की फोटो ही हाथ में हैं ... यहाँ वहां फोटो ख़ोज रहा हूँ ..... नर्मदे हर

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  6. भाई रपट तो जोरदार दे दी है ये है असली हम ब्लागर मित्रों के घूमने फिरने की अधिकारिक रपट . रही कैमरा गुमने की तो उसका कोई रंज नहीं बस रंज इस बात का है की उस डिजिटल कैमरे में करीब २०० फोटो थी जो मेरे लिए अमूल्य थी .. बस मोबाइल की फोटो ही हाथ में हैं ... यहाँ वहां फोटो ख़ोज रहा हूँ ..... नर्मदे हर

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  7. @ ईश्वर ने आंखें सौंदर्य देखने के लिए दी हैं और इसे देखने के लिए गहरे ही उतरना पड़ता है।
    रपट में दर्शन के अंदाज में एक वास्तविक बात भी कह दी आपने , अच्छा होता इस सुंदर सी धरती को हम सुंदर निगाहों से देख पाते.....बहुत बधाई ...शुक्रिया

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  8. ... har har narmade ... har har mahaadev ... sundar va saargarbhit post !!!

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  9. जिद तो हम भी नहीं करेंगे मगरमच्छ देखने की :-)

    बढ़िया वृतांत

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  10. कितना घुमा दिया है | बहुत मजा आया आपके साथ साथ चलते हुए | आभार |

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  11. बिल्कुल रनिंग कमेंट्री के सम्पादित अंश जैसा लगा . बहुत बढ़िया सुनाया आपने आँखों देखा हाल .आभार .

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  12. वाह दादा वाह खूब सैर कराई आपने !

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  13. @ ललीत जी राम राम
    कठे कठे घुमा रिया हो थे मैं तो लारे ही रह ग्यो

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  14. आपकी रिपोर्ट ने जबलपुर और भेड़ाघाट सब घुमा दिया ..बढ़िया तेपोर्ट

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  15. ओह सर क्या बात है कमाल की यात्रा और उससे भी कमाल की पोस्ट ..साल का अंत तो लगता है यादों का मेला लगाए जा रहा है

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  16. भैडाघाट भ्रमण शायरी के साथ और भी दिलचस्प हो गया ।

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  17. बहुत ही रोचक और सरस वर्णन किया है आपने यात्रा का ... सबसे अच्छा लगा मगरमच्छ देखने का तरीका ...
    पर ये गक्कड़ भर्ता क्या है ?

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  18. बेहद मनोहारी वर्णन ,मंत्रमुग्ध से पढते गए बस .
    "गौरस" पहली बार जाना यह शब्द ..बेहद सुन्दर लगा.आभार.

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  19. @Indranil Bhattacharjee ........."सैल"


    गक्कड़ भर्ता विशेष तौर पर मिसिर जी
    के जबलपुर मे मिलता है।

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  20. बहुत बढ़िया वर्णन किया है ललित भाई ! हार्दिक शुभकामनायें !

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  21. बहुत सुंदर और रोचक यात्रा वृतांत और ये सुबह सबेरे गौरस? बात कुछ समझ नही आई.

    रामराम.

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  22. yatra vratant ati rochak roop me prastut kiya hai .sabse rochak tareeka magarmachchh dekhne ka laga .

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  23. पनघट का दृश्य सजीव लग रहा है ...
    सुन्दर तस्वीरें ...रोचक वर्णन !

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  24. दुपहरिया बीत चली, पनघट पर रीत (ख़ाली) चली
    पनिहारिन फिर लौटी, भर रस की सागरिया .....
    माटी की गागरिया

    क्या ही ख़ूब यात्रा वृतांत लिखा है शर्मा जी आपने अहा ! क्या कहना ! एकदम सजीव और क्भी न भूलने वाला।
    हम इस वृतांत के हिस्से के रूप में अपने आप को सदैव गौरवान्वित महसूस किया करेंगे।

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  25. आपने तो पिकनिक, नौकायन, दाल-बाटी, रोप-वे, जल प्रपात, पाट बाबा (हनुमान जी का मंदिर) कुल मिला कर जबलपुर की "इस एक दिवसीय नर्मदा तट की यात्रा" को बेहद रोचक बना दिया, काश मेरा अत्यावश्यक कार्य नहीं होता तो मैं भी इस रोचक आनंद से वंचित नहीं होता .
    - विजय तिवारी

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  26. ek sal me udankhatole ki ticket 60 se badh kar 70 rupaye ho gayee hai...aur baki to hai himanohari sab...ha magarmachchha vala idea pasand aaya..

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  27. गन कैरिज फ़ैक्टरी के पास स्थित हनुमान जी का मंदिर पाठ बाबा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है.

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