बुधवार, 6 जून 2012

आकार 2012: कठपुतली वाली मेडम

आकार 2012 समापन कार्यक्रम 
त्तीसगढ शासन के संस्कृति विभाग द्वारा गर्मियों की छुट्टी में राज्य के प्रमुख शहरों में सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए "आकार" का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में शिल्प गुरुओं को आमंत्रित किया जाता है तथा उनके द्वारा उम्र के बंधन रहित सबको कला का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें भित्ती चित्र, पेंटिंग, नृत्य, ढोकरा शिल्प, रजवार, मधुबनी, पैरा आर्ट, मृदा शिल्प, ग्रीटिंग कार्ड, म्युरल आर्ट आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है। सांस्कृतिक विरासत को संजोने के साथ यह आयोजन जीविकोपार्जन का बायस बनता है। 26 मई को बिलासपुर आकार के समापन समारोह में जाना हुआ। गरिमामय आयोजन में सभी प्रशिक्षार्थियों को प्रमाण-पत्र एवं कला गुरुओं का सम्मान किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी था जिसमें भरथरी गायिका लक्ष्मी कंचन ने भरथरी लोककथा का गायन किया एवं छत्तीसगढ अंचल के विवाह गीतों का सुंदर प्रस्तुति करण किया।


इस कार्यक्रम के पश्चात कठपुतली का प्रदर्शन हुआ। बचपन में कठपुतलियों के शो बहुत देखे थे। उस समय राजस्थान से आने वाले कठपुतली कलाकार स्कूलों में एवं गाँव में तंबु लगा कर 10-20 पैसे प्रति व्यक्ति टिकिट लगाकर कठपुतली का प्रदर्शन करते थे। वे कठपुतलियाँ छोटी हुआ करती थी तथा संवाद परदे के पीछे कठपुतली नचा रहा कलाकार बोलता था। नागिन के रिकार्ड पर कठपुतली का नागिन डॉस दिखाया जाता था। उस समय कठपुतली के खेल का उद्देश्य सिर्फ़ मनोंरजन करना होता था। यद्यपि उसमें भी सामाजिक चेतना जगाने का भाव काम करता था। कठपुतलियों के खेल के माध्यम से गंभीर से गंभीर बात भी सरलता से समझाई जा सकती है। छत्तीसगढी भाषा में कठपुतली का प्रदर्शन मैने यहाँ पहली बार देखा ताज्जुब की बात तो यह है कि इस शो में 1 फ़ुट से लेकर 12 फ़ुट तक की  कठपुतलियों का प्रयोग किया गया तथा प्रहसन भी छत्तीसगढ की माटी से जुड़े थे। छत्तीसगढी गीतों पर कठपुतलियों नाच रही थी।

यह सब कर दिखाया नीलिमा मोईत्रा ने। नीलिमा सेंदरी हायर सेकेंडरी स्कूल बिलासपुर में व्यायाम शिक्षिका है। 15 वर्षों से कठपुतली के खेल का प्रदर्शन कर रही हैं। कठपुतलियों का डिजाईन इन्होने पात्र के अनुसार स्वयं किया है। ये गीतों के साथ नाटक और प्रहसन भी रचती हैं और उनका प्रदर्शन भी करती है। समाज में फ़ैली कुरितियों भ्रुण हत्या, बाल विवाह, दहेज एवं एडस, पल्स पोलियो, मलेरिया, पानी बचाओ आंदोलन, साक्षरता जैसे विषयों पर कठपुतलियों के माध्यम से जनमानस को जागृत करने का प्रयास करती है। छोटे बच्चों के चेतना में यह संदेश गहरे पैठ जाते हैं। जिसका सकारात्मक परिणाम भविष्य में समाज को मिलेगा और समाजिक जागृति फ़ैलाने में मील का पत्थर साबित होगा। टीवी चैनलों के प्रदुषित कार्यक्रमों की बाढ के बीच सार्थक संदेश देता कठपुतलियों का खेल भीषण गर्मी में ठंडी फ़ुहार जैसा है।

नीलिमा मोईत्रा बताती हैं कि उन्होने देश के नामी कठपुतली कलाकारों द्वारा कठपुतली का प्रशिक्षण लिया। जिसमें बिहारी भट्ट भोपाल, निरंजन गोस्वामी, दिलीप मंडल कलकत्ता, शम्पा घोष, चेतन शर्मा, शांतनु बनर्जी, सुरेन्द्र कौल दिल्ली, शंकर कला निकेतन सोसायटी गोहाटी आसाम, लीला महिपति कवि अहमदाबाद गुजरात एवं राजस्थान के उदयपुर में प्रशिक्षण प्राप्त किया। मोइत्रा बताती हैं देश और छत्तीसगढ़ की संस्कृति, इतिहास और वर्तमान में होने वाले तत्कालिक सवाल-जवाब स्पर्धा का भी आयोजन कठपुतली के द्वारा कार्यक्रम कर आम जनता को प्रश्नों के उत्तर पुरस्कार प्राप्त करने का अवसर भी देती हैं। सूचना के अधिकार के प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने पापेट शो के द्वारा भ्रष्टाचार के विरूध्द बिगुल फूंका था जिसमें देश के हजारों समाज सेवी, सरकारी, अधिकारी, कर्मचारी उपस्थित थे।

छ ग विधान सभा अध्यक्ष एवं नीलिमा मोईत्रा
एक प्रश्न के जवाब में कहती है कि सरकार द्वारा शिक्षा को आनंददायी बनाने के लिए कठपुतलियों के प्रयोग का प्रशिक्षण हजारों शिक्षकों ने प्राप्त किया। लेकिन मैने ही इस खेल को लोक भाषा एवं लोक शैली में ढाल कर पस्तुत किया। भारतीय सांस्कृति विरासत जो मृतप्राय होती जा रही है उसए कठपुतली नाच के माध्यम से लोक भाषा और लोक शैली में प्रदर्शित कर समाज के हर वर्ग को जोड़ने का प्रयास किया है। इसके माध्यम से लोगों में समाज के आम पहलूओं से जुड़े विषयों पर जागरूकता लाने का प्रयास भी हो रहा है। पश्चिमी संस्कृति और आधुनिकता में लोग अपनी विरासत को भूलते जा रहें हैं वहीं समाज में नीलिमा जैसे लोग भी है। जो अपनी विरासत को संजोने के लिये न सिर्फ कोशिश कर रहें हैं। बल्कि कठपुतली के माध्यम से सामाजिक चेतना जागृत कर कुरीतियों विरुद्ध युद्ध भी लड़ रहे हैं। 

आकार में पपेट शो
कठपुतली का प्रदर्शन सिर्फ़ समाज में जागरुकता फ़ैलाना ही नहीं है इसके पीछे गरीब कलाकारों का आर्थिक उत्थान भी जुड़ा हुआ है। कठपुतली शो से जुड़े हुए बच्चे गरीब परिवारों से होते हैं। जिनको भरण पोषण के लिए आय स्रोत भी जुटाने पड़ते हैं। वे आर्थिक तंगी से परेशान होकर अपनी पढ़ाई बीच में ही रोक कर हाथ में कुदाल फावड़ा लेकर मजदूरी करने पर बाध्य होते हैं। उन बच्चों को गौरव से आय अर्जित कर अपनी पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद शिक्षा को जारी रखने के आय के साधन के रूप में कठपुतली के द्वारा प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों द्वारा मिली हुई मानदेय राशि गरीब बच्चो को दी जाती है तथा उनके शिक्षा और स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाता है। नीलिमा मोईत्रा कठपुतली कला के विकास के लिए बहुत मेहनत करती हैं। इन्हे पुरस्कार के रुप में प्रमाण-पत्र के साथ शाबसी तो मिलती है पर आर्थिक सहायता कहीं से नहीं मिलती।

ललित शर्मा, रतन जैसवानी एवं डॉ सोमनाथ यादव "आकार" में
एक दुर्घटना में हाथ एवं पैर टूट गया था। शारीरिक क्षमता में कमी होने के बाद भी ये अपनी कठपुतलियाँ स्वयं डिजाईन करती हैं और उन्हें सुवा नाच, पंथी, कर्मा, राऊत नाचा, आदि में सजाकर प्रदर्शित भी करती है।चलते चलते वे एक प्रश्न भी खड़ा कर जाती हैं, बिना किसी सरकारी सहायता के पंजीकृत संस्था 10 वषों से कठपुतली प्रदर्शन का कार्य कर रही हैं उन विद्वानों, समाज सेवियो, शासन के अधिकारियों की तरफ देखते हुए ये प्रश्न पूछती हैं कि आखिर क्यों, कोई हाथ इस मृतप्राय होती कला को हमेशा-हमेशा के लिये छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत बनाने हेतु पहल नहीं करता हैं? क्यों इस कला के लिये संरक्षण आज तक किसी ने पहल नहीं की? मुझे तो लोग अब कठपुतली वाली मेडम कहते हैं। कठपुतली ही अब मेरी पहचान बन गयी है। कठपुतली (डॉल) थियेटर बनाने का सपना संजोकर हजारों कलाकारों के समान नीलिमा माइत्रा भी इस भीड़ में गुम न हो जाए इसलिये पहल होनी ही चाहिए। कठपुतली कला की विरासत को निरंतर बनाए रखने और संजोने में स्वयंसेवी संस्थाओं एवं प्रशासन द्वारा पहल होनी चाहिए।

16 टिप्‍पणियां:

  1. नीलिमा माइत्रा जी का परिचय देते हुए एक सार्थक लेख लिखा आपने .. भारतवर्ष में प्रतिभाओं की कमी नहीं .. अपनी रूचि का काम करने का और लक्ष्‍य को पाने का जुनून सा होता है इनके मन में .. थोडी सी सरकारी , सामाजिक या वैयक्तिक मदद से इनका संघर्ष कम हो तो इनके जीवनकाल में ही समाज के लिए इनका योगदान बहुत अधिक हो सकता है .. काश लोग इसे समझ पाते !!

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  2. नीलिमा मोईत्रा कठपुतली कला को आगे बढाने के लिये प्रशासन को मदद करनी चाहिए,,,,,,

    ललित जी ,,,,आपने सही कहा कि पुरस्कार के रुप में प्रमाण-पत्र के साथ शाबसी तो मिलती है पर आर्थिक सहायता कहीं से नहीं मिलती।

    MY RESENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: स्वागत गीत,,,,,

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  3. लोक कलायें संरक्षित हों, सुन्दर आलेख।

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  4. कठपुतली कला हालाँकि बड़े शहरों में अब लुप्त होती जा रही है . फिर भी बहुत से गरीबों का रोजी रोटी का सहारा है यह कला .
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार .

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  5. नीलिमा जी का प्रयास सचमुच सराहनीय है.

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  6. रोचक जानकारी ....नीलिमा जी का परिचय मिला

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  7. लोक कला में कठपुतली मेहनत और बुद्धि का रचनात्मक कार्य है . नीलिमा जी के प्रयास के लिए उन्हें सहयोग मिलना ही चाहिए !

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  8. सार्थक व सटीक लिखा है आपने ...आभार ।

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  9. सर्वप्रथम नीलिमा जी की लगन और मेहनत को प्रणाम। कभी-न-कभी उनकी मेहनत अवश्य सार्थक होगी। बचपन में हमने भी होमसाइंस में बहुत सी रंग-बिरंगी खड़ीया और कागज़ से कठपुतली बनाई है। खड़ीया और कागज़ की लुग्दी से अनेक सामान खिलौने बनाये जाते हैं। हमारे यहाँ सामान रखने के लिये ठाठिये भी बनते थे। जो माँ घर में ही बना लेती थी। आजकल सब बंद हो गया है। यह रुकना नही चाहिये था। एक प्रकार से बेस्ट आउट ऑफ़ बेस्ट में आता है यह।
    और भाई तेइस नवम्बर मै और पवन जी भी भिलाई आ रहे हैं। भानजे की शादी है। आप सबसे मुलाकात हो पायेगी।

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  10. फिर स्पैम में गई मेरी टिप्पणी :(

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  11. कृपया बेस्ट आउट ऑफ़ वेस्ट पढ़े...गलत लिखा गया।

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  12. नीलिमा जी के जज्बे को सलाम। नीलिमा जी के काम को ब्लाग के जरिये सबके सामने लाने के लिये आपका भी अभिनंदन। सच इस काम में शासकीय या सामाजिक संस्थागत सहायता मिले तो सोने पर सुहागा हो।

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  13. नीलिमा जी का प्रयास सचमुच सराहनीय है.

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  14. हमने भी बचपन में कठपुतलियो का डांस देखा था ..कभी स्कूल में तो कभी हमारी पुलिस कालोनी में ..जो ज्यादातर राजस्थान की वीरता के किस्से सुनाते थे ..कठपुतली मेडम का कार्य प्रशसनीय हैं

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  15. बचपन में हमने भी बहुत देखे हैं कठपुतली के खेल । इसमें गली गली घूम कर कलाकार एक खटिया के पीछे से खेल करते थे । पृथ्वीराज चौहान और महम्मज घोरी की कहानी पद्मिनि और अलाउद्दीन की कहानी । नीलिमा जी का प्रयास सराहनीय ही नही अनुकरणीय है ।

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