बुधवार, 25 जुलाई 2012

नर्मदा मंदिर अमरकंटक एवं पापमोचन हाथी -------- ललित शर्मा

रामघाट नर्मदा नदी अमरकंटक
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कार में पड़े-पड़े नींद कम आयी और अलसाए अधिक। कच्ची नींद की खुमारी लिए सुबह हुई। कार से बाहर निकले तो सूरज का रथ धरा पर आ रहा था। हमने कार रामघाट पर लगाई, बाहर निकलते ही नंदी महाराज के दर्शन हुए। धन्य हो गए भगवन नंदी देव के दर्शन पाकर। चाय हमने मृत्युंजय आश्रम के सामने टपरे में पी। लेमन टी ही मिली। आश्रम का गेट खुल चुका था। वहीं गाड़ी लगाई। स्वामी जी नर्मदा स्नान करने की कह रहे थे। हमने कहा कि यहाँ के नलों में भी नर्मदा का ही जल है। हम तो यहीं बाथरुम स्नान करेगें। आप लोग हो आईए नर्मदा स्नान करके। ये सभी नर्मदा स्नान करने चले गए और हमने बाथरुम में नर्मदा स्नान किया। इनके आते तक बचे हुए तरबूज कोठी के हवाले किए और एक झपकी भी ले ली। मदन साहू जी ने बताया कि आश्रम में नाश्ता मिल रहा है। उनके पंहुचते तक नाश्ता भी खत्म हो गया। उन्हे खाली हाथ लौटना पड़ा।

अखंड पाठ स्थान रामघाट अमरकंटक
स्नान से आकर स्वामी ध्यान में लग गए। हम रामघाट की ओर आ गए। नामदेव जी ने बताया कि सन 1980 में गंगाराम दास जी के मन में वैराग्य आ गया। उन्होने 12 साल तक अखंड रामचरित जाप करने का संकल्प लिया और यहीं राम घाट पर खुले आसमान के नीचे रामचरित रख कर दीया जला कर अखंड जाप करने बैठ गए। संकल्प लेते समय अमरकंटक के अन्य साधू संतो को भी बुलाया साक्षी होने के लिए। उन्हे संशय था कि यह 12 वर्ष का संकल्प पूरा होगा कि नहीं। जैसे-तैसे अखंड पाठ चलता रहा। लोग आते गए साथ देने के लिए। कारवां बनता गया। कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि लगता था अखंड जाप चल नहीं पाएगा। तभी एक बुढिया माई आ गयी यहाँ पर। उसने साथ देना शुरु किया। जो भी यहाँ भक्त आता था उसे रोटी सब्जी या जो भी भोजन उपलब्ध हो कराती थी। किसी को खाली हाथ नहीं जाने देती थी। इस तरह 12 वर्षों तक अखंड पाठ चलता रहा और फ़िर 1992 में पूर्ण भी हुआ।

राम धुनि करते भक्त
12 वर्षों के अखंड पाठ के बाद बाबा जी अयोध्या चले गए। फ़िर कभी लौट कर नहीं अमरकंटक इस स्थान पर नहीं आए। अब वे अयोध्या में रामहर्षण कुंज में रहते हैं। उनके अखंड पाठ स्थल पर एक झोंपड़ी बनी हुई है। उसके भीतर एक पक्का मंदिर है। जहाँ अयोध्या से आए दो चार चेले रहते हैं। एक चेला तो काफ़ी खाया पीया हष्ट-पुष्ट दिखा। बुढिया माई ही अब यहाँ की कर्ता-धर्ता हैं। हम स्नानाबाद से पहुचे तो यहां अखंड पाठ चालु था। भक्त लीन थे भक्ति में। काफ़ी श्रद्धालु जमा हो गए थे। छत्तीसगढ में होने वाली राम सत्ता(सप्ताह) जैसे ही गाना बजाना नाचना हो रहा था। थोड़ी देर में किसी ने हमें पत्तों में लपसी लाकर दी, प्रात:राश के लिए। दोपहर का भंडारा भी यहीं पर था। अखंड पाठ की पूर्णाहुति के बाद सभी ने भोजन प्रसाद ग्रहण किया। सामुहिक रुप से भक्तों द्वारा की गयी व्यवस्था अच्छी थी। सब अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार व्यवस्था कर रहे थे। भोजन प्रसाद ग्रहण करने बाद बताया गया कि शाम 5 बजे से अयोध्या से पधारे संतों द्वारा प्रवचन होगा। 

नर्मदा उद्गम मंदिर का प्रवेश द्वार
भोजनोपरांत हम अमरकंटक घुमने चल पड़े। सबसे पहले नर्मदा कुंड गये। जहाँ से नर्मदा जी का उद्गम माना जाता है। अमरकंटम मैं पहले भी आ चुका हूँ। चम्बल के किसी नामी गडरिया डकैत से यहीं मुलाकात हुई थी। उसे पेशी में लाने वाले पुलिस वाले नर्मदा स्नान कराने लाए थे। नाम याद नहीं आ रहा है लम्बा और काला था, मुंह में चेचक के दाग थे। एक दुकान में बैठा था, लगभग 10-12 पुलिस वाले उसे हथकड़ी लगा कर साथ थे। दुकान वाला कह रहा था उन्हे कि उनकी दुकान में न बैठें। धंधा खराब हो रहा है। तभी मेरा ध्यान उस पर गया था। पूछने पर कोई गड़रिया डकैत बताया। उसके बाद पुलिस वालों ने उसे ले जाकर नर्मदा कुंड में स्नान करवाया और खुद भी डूबे उसके साथ। हम किनारे पर बैठ कर नजारा देख रहे थे। कैमरा नहीं था वरना आज वह चित्र आपके सामने  होता। कभी-कभी कैमरे का न होना बड़ा अखरता है। यह बाद लगभग 4-5 साल पहले की होगी। जब हमने उसे देखा था। 

नर्मदा उद्गम कुंड
मंदिर के बाहर जूते चप्पल उतारे, मदन साहू का ध्यान चप्पलों की तरफ़ था कि कोई उठा कर ले जाएगा। अरे मंदिरों से चप्पल च्रोरी नहीं होगें तो कहां से होगें? चलो तुम्हारी दरिद्री दूर होगी, हमने उसे चेताया। नर्मदा उदगम कुंड में किसी को स्नान करने नहीं दिया जाता। स्नान करने का कुंड अलग से बना हुआ है। स्नान कुंड के समीप रुद्राक्ष के पेड़ लगे हैं। जिन पर मुख्यमंत्री द्वारा रोपण करने की पट्टि्का लगी हुई है। हमने मंदिर में दर्शन किए। मुख्य मंदिर काफ़ी पुराना बना हुआ है। मंदिर परिसर में ही प्रसाद खरीदने का काउंटर बना है। जहां से प्रसाद लिया जा सकता है। अब यह व्यवस्था सभी मंदिरों में दिखाई देती है। जहाँ ट्रस्ट बन गए हैं और उनके हाथ में ही मंदिर की देख-रेख है। मंदिर के बाहर भी प्रसाद, फ़ूल पत्ती एवं पूजा के  सामानों की दुकाने लगी हैं। साथ ही घरेलू आवश्यकता के उपकरण भी मिलते हैं। 

कार्तिकेय स्वामी मंदिर
नर्मदा मंदिर के समीप ही दांए हाथ की तरफ़ कार्तिकेय स्वामी का मंदिर हैं। यहां व्याधि से ग्रस्त लोग दर्शन करते हैं और मनौती मानते हैं। मंदिर में लिखा है - अपस्मार, कुष्ट क्षयार्श: प्रमेह ज्वरोन्माद, गुल्मादि रोगा: महन्त: पिशाचाश्च सर्वेभक्त प्रत्र भुतिम् विलोक्य क्षणाक्तारकारे द्रवन्ते॥ इतनी व्याधियों का यहाँ आने पर इलाज हो जाता है ऐसी  मान्यता जनमानस में व्यापक है। मंदिर परिसर के बाहर जड़ी बूटी बेचने वाले भी बैठे हैं। उन्होने अपने पसरे में तरह-तरह की जड़ी बूटियाँ फ़ैला रखी हैं। दो चार ग्राहक तो दिन भर में फ़ंस ही जाते हैं और उनकी दुकानदारी चल जाती है। यहाँ भिखारियों की लम्बी फ़ौज है। जो स्नान कुंड के बाहर बैठी रहती है।

हाथी के बीच से निकलते नामदेव जी के अग्रज
नर्मदा जी के उद्गम के विषय में मै पहले यहाँ पर लिख चुका हूँ। मंदिर के बांए तरफ़ घोडे एवं हाथी पर बैठे योद्धाओं की शीश कटी मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। हाथी के पैरों के बीचे से लोग निकलते हैं। मान्यता है कि पापी मनुष्य हाथी के बीच से नहीं बुलक सकता। हमने मदन साहू जी को हाथी के पैरों से निकलने कहा। उसने एक बार प्रयास किया लेकिन विफ़ल रहा। नामदेव जी के भाई ने उसे निकल कर दिखाया। उत्साह से उसने दुबारा प्रयास किया तब बीच में ही फ़ंस गया। निकल नहीं सका। मेरे साथ बैठे व्यक्ति ने कहा कि जो निकल नहीं सकता, फ़ंस जाता है उसे लात का स्पर्श कराने से निकल जाता है। मान्यता है कि लात लगने से उसके कर्मों का दंड मिल जाता है और वह पार निकल जाता है। मदन साहू ने तीसरी बार शर्ट उतार कर निकलने का प्रयास किया। पसीने-पसीने हो गया लेकिन निकल नहीं सका।

हाथी के बीच में फ़ंसे हुए मदन साहू जी
इसके बाद उसने मुझे निकलने के लिए कहा। मैं पहले ही प्रयास में सरलता से पार हो गया। तो कहने लगा कि उसका पेट फ़ंस जाता है इसलिए वह नहीं निकल सका। मैने स्वामी जी से भी निकलने कहा। ले्किन उनके मन में क्या भय था वो ही जाने। उन्होने एक प्रयास भी नहीं किया। हम हाथी के पैरों के नीचे से निकल कर धर्मात्मा घोषित हो चुके। उपस्थित दर्शकों से तालियों के रुप में प्रमाण पत्र भी मिल चुका था। लोग आकर बारी-बारी से प्रयास कर रहे थे और अपने पाप धो रहे थे। मदन साहू जी थक हार गए। हमारे उत्साह वर्धन के पश्चात भी उन्होने अगला प्रयास नहीं किया। कहने लगे - भले ही पापी सुनना मंजूर है लेकिन अब निकलने का प्रयास नहीं करुंगा। अब चलिए आगे चलते हैं। बर्फ़ानी बाबा का आश्रम देखना है मुझे। नर्मदा मंदिर से दर्शन करके हम बर्फ़ानी बाबा के आश्रम की ओर चल पड़े। बाहर निकलने पर मदनसाहू के चप्पल गायब मिले। थोड़ा तलाश करने पर देखा कि चप्पलों वाले काऊंटर के रैक में रखे हैं जहाँ दो रुपए की दक्षिणा के बाद ही चप्पल वापस मिले। ………आगे पढें

15 टिप्‍पणियां:

  1. 'मैं पहले ही प्रयास में सरलता से पार हो गया हम.. धर्मात्मा घोषित हो चुके।.. प्रमाण पत्र भी मिल चुका था।'
    - धन्य.धन्य!

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  2. बढि़या प्रवाह, साथ बहा ले जाता है.

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  3. अमरकंटक यात्रा का चित्रों सहित सुदर पप्मोचक वर्णन सदैव की भांति जीवंत जागृत

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  4. आखिर धर्मात्मा होने का सर्टिफिकेट मिल ही गया .
    अच्छी तस्वीरें , रोचक वृतांत !

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  5. पुरानी यादें ताज़ी हो रही हैं. हाथी के नीचे से निकलना कठिन नहीं है. अच्छे हट्टे कट्टे लोगों को भी हमने आसानी से बुलकते देखा है. एक ख़ास अंदाज है. पहले वाले चित्र में पगड़ी धारी बुजर्ग सही कर रहा है जबकि दूसरी तस्वीर में (शायद आप हैं) दाहिने पुट्ठे को उठा लिया है. यह अवरोध उत्पन्न करता है.

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  6. बहुत ही सारगर्भित आलेख प्रस्तुति ..त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ... नर्मदे हर ... हर हर महादेव ...
    कभी समय मिले तो पधारिये हमरे ब्लॉग में ...

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  7. @P.N. Subramanian

    दुसरी तश्वीर मे मै नहीं हूँ, चित्र पर कैप्शन लिखा है। वे मदन साहू जी हैं। मै तो बुलक गया था :)

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  8. नर्मदा जी से जबलपुर और होशंगाबाद में हमेशा भेंट होती है, उद्गम स्थल देखने की तीव्र इच्छा जाग्रत हो गई, आपकी पोस्ट पढ़कर...जल्दी जाना पड़ेगा...सुन्दर जीवंत विवरण

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  9. घुमक्कड़ी जिंदाबाद !
    यही है अच्छी सेहत का राज़ !

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  10. सर्टिफिकेट मिल गया महाराज ...बधाई !

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  11. पोस्ट मदन साहू जी लिखते तो शायद धर्मात्मा वाला सर्टिफिकेट वो झटक लेते, इसलिए ऐसे सर्टिफिकेट लेनेवालों का ब्लॉग लेखक होना और भी श्रेयस्कर है:)

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  12. अमरकंटक जाने की इच्छा पोस्ट पढकर पूरी हो गई। आप लिखते हैं कि पूरी यात्रा ही करा देते है।

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